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Updated by elsie yang on Oct 19, 2019
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सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का प्रचार करना

जिस प्रकार सूर्य के बाद सदैव चंद्रमा निकलता है, उसी प्रकार परमेश्वर का कार्य भी कभी नहीं रुकता है, और तुम पर, मुझ पर, उस पर, और उन सभी पर किया जाता है जो परमेश्वर के पदचिह्नों का अनुसरण करते हैं और परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करते हैं।

God's Appearance and Work of the Last Days | सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की उत्पत्ति और विकास

God's Appearance and Work of the Last Days | सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की उत्पत्ति और विकास

सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया सर्वशक्तिमान परमेश्वर - लौटे हुए परमेश्वर यीशु–अंतिम दिनों के मसीह की उपस्थिति और काम की वजह से और उसके धर्मी निर्णय और ताड़ना के अधीन, अस्तित्व में आयी। कलीसिया में उन सभी लोगों का समावेश है जो वास्तव में अंतिम दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करते हैं और परमेश्वर के वचन द्वारा जीते और बचाये जाते हैं। इसे पूरी तरह से सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से स्थापित किया गया था, और व्यक्तिगत रूप से उसके द्वारा नेतृत्व और मार्गदर्शन किया जाता है, और इसे किसी भी तरह से किसी भी व्यक्ति द्वारा स्थापित नहीं किया गया था। यह एक ऐसा तथ्य है जिसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया में सभी चुने हुए लोगों द्वारा स्वीकार किया गया है। देहधारी परमेश्वर द्वारा उपयोग किया जाने वाला कोई भी परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत है, और परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से नियुक्त किया गया और गवाही देने के लिए है, ठीक वैसे ही जैसे कि यीशु ने व्यक्तिगत रूप से बारह शिष्यों को चुना और नियुक्त किया। जो लोग परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाते हैं, वे केवल उसके काम में ही सहयोग करते हैं, और उसके बदले में परमेश्वर के कार्य को नहीं कर सकते हैं। कलीसिया उन लोगों द्वारा स्थापित नहीं की गई थी जो परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाते हैं, न ही परमेश्वर के चुने हुए लोग उन पर विश्वास करते हैं या उनका पालन करते हैं। अनुग्रह के युग की कलिसीयाओं की स्थापना पौलुस और अन्य प्रेरितों द्वारा नहीं की गई थी, बल्कि ये प्रभु यीशु के काम के परिणाम थे और इन्हें स्वयं प्रभु यीशु द्वारा स्थापित किया गया था। इसी तरह, अंतिम दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया उन लोगों द्वारा स्थापित नहीं की गई है जिन्हें परमेश्वर द्वारा उपयोग किया गया था बल्कि यह सर्वशक्तिमान परमेश्वर के काम के परिणाम है। परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने वाले लोग, मनुष्य का कर्तव्य करते हुए, केवल कलीसियाओं को सींचते, आपूर्ति करते और उनका मार्गदर्शन करते हैं। यद्यपि परमेश्वर के द्वारा उपयोग किए गए लोगों द्वारा परमेश्वर के चुने हुए लोगों का नेतृत्व किया जाता है, उन्हें सींचा जाता है और आपूर्ति की जाती है, तब भी वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अलावा किसी अन्य को नहीं मानते या किसी अन्य का अनुसरण नहीं करते हैं, और उस (परमेश्वर) के वचनों और काम को स्वीकार करते और उनका पालन करते हैं। यह एक तथ्य है जिसे कोई इनकार नहीं कर सकता है। देहधारी परमेश्वर की उपस्थिति और काम की वजह से, सभी धार्मिक पंथों और संप्रदायों में परमेश्वर के कई सच्चे विश्वासियों ने अंततः परमेश्वर की आवाज सुनी है, देखा है कि प्रभु यीशु पहले ही आ चुके हैं और अंतिम दिनों में न्याय का कार्य कर चुके हैं, और उन सभी ने पुष्टिकी है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर वापस आए हुए प्रभु यीशु हैं- और परिणामस्वरूप, उन्होंने अंतिम दिनों के उसके काम को स्वीकार कर लिया है। वे सभी जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन द्वारा जीते जाते हैं, उसके नाम के अधीन हो जाते हैं। इसलिए, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के सभी चुने हुए लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, और उसका अनुसरण,आज्ञा- पालन और उसकी आराधना करते हैं। परमेश्वर के न्याय और अनुशासन के कार्य का अनुभव करके, चीन के चुने हुए लोग उसके धर्मी स्वभाव की सराहना करने के लिए आए हैं, और उन्होंने उसकी महिमा और क्रोध को देखा है, और इसलिए वे पूरी तरह से परमेश्वर के वचन द्वारा जीते जा चुके हैं और वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सामने परास्त हो गए हैं, और परमेश्वर के वचन के न्याय और ताड़ना को मानने और स्वीकार करने के इच्छुक हैं। इस प्रकार, उन्होंने परमेश्वर के उद्धार को प्राप्त कर लिया है।

स्रोत :सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया

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परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है

परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है

**सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है

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मानवजाति का सदस्य और सच्चे ईसाई होने के नाते, अपने मन और शरीर को परमेश्वर के आदेश को पूरा करने के लिए समर्पित करना हम सभी की ज़िम्मेदारी और दायित्व है, क्योंकि हमारा सम्पूर्ण अस्तित्व परमेश्वर से आया है, और यह परमेश्वर की संप्रभुता के कारण अस्तित्व में है। यदि हमारे मन और शरीर परमेश्वर के आदेश के लिए नहीं हैं और मानवजाति के धर्मी कार्य के लिए नहीं हैं, तो हमारी आत्माएँ उन लोगों के योग्य नहीं हैं जो परमेश्वर के आदेश के लिए शहीद हुए हैं, परमेश्वर के लिए तो और भी अधिक अयोग्य हैं, जिसने हमें सब कुछ प्रदान किया है।

परमेश्वर ने इस संसार की सृष्टि की, उसने इस मानवजाति को बनाया, और इसके अलावा वह प्राचीन यूनानी संस्कृति और मानव सभ्यता का वास्तुकार था। केवल परमेश्वर ही इस मानवजाति को सांत्वना देता है, और केवल परमेश्वर ही रात-दिन इस मानवजाति का ध्यान रखता है। मानव का विकास और प्रगति परमेश्वर की सम्प्रभुता से अवियोज्य है और मानवजाति का इतिहास और भविष्य परमेश्वर की योजनाओं में जटिल है। यदि तुम एक सच्चे ईसाई हो, तो तुम निश्चय ही इस बात पर विश्वास करोगे कि किसी भी देश या राष्ट्र का उत्थान या पतन परमेश्वर की योजना के अनुसार होता है। केवल परमेश्वर ही किसी देश या राष्ट्र के भाग्य को जानता है और केवल परमेश्वर ही इस मानवजाति के जीवन के ढंग को नियंत्रित करता है। यदि मानवजाति अच्छा भाग्य पाना चाहती है, यदि कोई देश अच्छा भाग्य पाना चाहता है, तो मनुष्य को अवश्य परमेश्वर की आराधना में झुकना चाहिए, पश्चाताप करना चाहिए और परमेश्वर के सामने अपने पापों की स्वीकार करना चाहिए, अन्यथा मनुष्य का भाग्य और मंज़िल अपरिहार्य रूप से तबाह हो कर समाप्त हो जाएँगे।

नूह की नाव के समय में पीछे पलट कर देखें: मानवजाति पूरी तरह से भ्रष्ट थी, परमेश्वर की आशीषों से भटक गई थी, परमेश्वर के द्वारा उनकी देखभाल नहीं की जा रही थी, और परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को खो चुकी थी। वे परमेश्वर की रोशनी के बिना अंधकार में रहते थे। इस प्रकार वे प्रकृति से व्यभिचारी बन गए थे, उन्होंने अपने आप को घृणित चरित्रहीनता के मध्य उन्मुक्त कर दिया था। इस प्रकार के लोग परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को प्राप्त नहीं कर सकते थे; वे परमेश्वर के चेहरे की गवाही देने के अयोग्य थे, न ही वे परमेश्वर की आवाज़ को सुनने के योग्य थे, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर को त्याग दिया था, उन सब चीजों को बेक़ार समझ कर छोड़ दिया था जो परमेश्वर ने उन्हें प्रदान की थीं, और परमेश्वर की शिक्षाओं को भूल गए थे। उनका मन परमेश्वर से बहुत दूर भटक गया था, और जैसा कि इससे हुआ, वे अत्यधिक मूर्खतापूर्ण स्तरों तक और मानवता से पथभ्रष्ट हो गए थे, और उत्तरोत्तर दुष्ट होते गए। इस प्रकार से वे मृत्यु के और भी निकट आ गए थे, और परमेश्वर के कोप और दण्ड के अधीन हो गए थे। केवल नूह ने परमेश्वर की आराधना की और बुराई को दूर रखा, और इसलिए वह परमेश्वर की आवाज़ को सुनने और परमेश्वर के निर्देशों को सुनने में सक्षम था। उसने परमेश्वर के वचन के अनुसार नाव बनायी, और सभी प्रकार के जीवित प्राणियों को उसमें एकत्रित किया। और इस तरह, जब एक बार सब कुछ तैयार हो गया, तो परमेश्वर ने संसार पर अपनी विनाशलीला शुरू कर दी। केवल नूह और उसके परिवार के सात लोग इस विनाशलीला में जीवित बचे, क्योंकि नूह ने यहोवा की आराधना की थी और बुराई को दूर रखा था।

फिर वर्तमान युग पर विचार करें: नूह के जैसे धर्मी मनुष्य, जो परमेश्वर की आराधना कर सके और बुराई को दूर रख सके, उनका अस्तित्व समाप्त हो गया है। फिर भी परमेश्वर इस मानवजाति के प्रति दयालु है और इस अंतिम युग में मानवजाति को दोषमुक्त करता है। परमेश्वर उनकी खोज कर रहा है जो उसके प्रकट होने की लालसा करते हैं। वह उनकी खोज करता है जो उसके वचनों को सुनने में सक्षम हों, जो उसके आदेश को नहीं भूले हों और अपने हृदय एवं शरीर को उसके प्रति समर्पित करते हों। वह उनकी खोज करता है जो उसके सामने बच्चों के समान आज्ञाकारी हों, और उसका विरोध न करते हों। यदि तुम परमेश्वर के प्रति अपने समर्पण में किसी भी ताकत से अबाधित हो, तो परमेश्वर तुम्हारे ऊपर अनुग्रह की दृष्टि डालेगा और अपने आशीष तुम्हें प्रदान करेगा। यदि तुम उच्च पद वाले, आदरणीय प्रतिष्ठा वाले, प्रचुर ज्ञान से सम्पन्न, विपुल सम्पदा के मालिक हो, और कई लोगों के द्वारा समर्थित हो, फिर भी ये चीज़ें तुम्हें परमेश्वर के आह्वान और परमेश्वर के आदेश को स्वीकार करने, जो कुछ परमेश्वर तुम से कहता है उसे करने के लिए, उसके सम्मुख आने से नहीं रोकती हो, तब तुम जो कुछ भी करोगे वह पृथ्वी पर सर्वाधिक महत्वपूर्ण होगा और मानवजाति में सर्वाधिक धर्मी होगा। यदि तुम परमेश्वर के आह्वान को अपनी हैसियत और लक्ष्यों के वास्ते अस्वीकार करोगे, तो तुम जो कुछ भी करोगे वह श्रापित हो जाएगा और यहाँ तक कि परमेश्वर द्वारा भी तिरस्कृत किया जाएगा। हो सकता है कि तुम कोई अध्यक्ष, या कोई वैज्ञानिक, कोई पादरी, या कोई बुज़ुर्ग हो, किन्तु इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि तुम्हारा पद कितना उच्च है, यदि तुम अपने ज्ञान और अपने कार्य की योग्यता पर भरोसा रखोगे, तो तुम हमेशा ही असफल रहोगे, और परमेश्वर की आशीषों से हमेशा वंचित रहोगे, क्योंकि तुम जो कुछ भी करते हो परमेश्वर उससे कुछ भी अपेक्षा नहीं करता है, और वह नहीं मानता है कि तुम्हारी वृत्ति धर्मी है, या यह स्वीकार नहीं करता है कि तुम मानवजाति के भले के लिए कार्य कर रहे हो। वह कहेगा कि जो कुछ भी तुम करते हो, वह मानवजाति को परमेश्वर की सुरक्षा से वंचित करने, और परमेश्वर के आशीषों को इनकार करने के लिए मानवजाति के ज्ञान और मानवजाति की शक्ति का उपयोग करना है। वह कहेगा कि तुम मानवजाति को अंधकारी की ओर, मृत्यु की ओर, और एक ऐसे अस्तित्व के आरंभ की ओर ले जा रहे हो जिसकी सीमाएँ नहीं है जिसमें मनुष्य परमेश्वर और उसके आशीष को खो देगा।

जब सबसे पहले मनुष्य को सामाजिक विज्ञान मिला, तब से मनुष्य का मन विज्ञान और ज्ञान में व्यस्त था। फिर विज्ञान और ज्ञान मानवजाति के शासन के लिए उपकरण बन गए, और अब मनुष्य के पास परमेश्वर की आराधना करने के लिए पर्याप्त अवसर नहीं था, और परमेश्वर की आराधना के लिए अब और अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं थी। मनुष्यों के हृदय में परमेश्वर की स्थिति और भी नीचे हो गई थी। मनुष्य के हृदय का संसार, जिसमें परमेश्वर के लिये जगह न हो, अंधकारमय, और आशारहित है। और इसलिए, मनुष्य के हृदय और मन को भरने के लिए, सामाजिक विज्ञान के सिद्धांत, मानव विकास के सिद्धांत और अन्य कई सिद्धांतों को व्यक्त करने के लिए कई सामाजिक वैज्ञानिक, इतिहासकार और राजनीतिज्ञ उत्पन्न हो गए जिन्होंने इस सच्चाई की अवहेलना की कि परमेश्वर ने मनुष्य की रचना की। इस तरह, जो यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर ने सब कुछ बनाया है वे बहुत ही कम रह गए, और वे जो विकास के सिद्धांत पर विश्वास करते हैं उनकी संख्या और भी अधिक बढ़ गई। अधिकाधिक लोग पुराने विधान के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य के अभिलेखों और उसके वचनों को मिथकों और पौराणिक कथाओं के रूप में मानते हैं। लोग, अपने हृदयों में, परमेश्वर की गरिमा और महानता के प्रति, और इस सिद्धांत के प्रति कि परमेश्वर का अस्तित्व है और सभी चीज़ों पर प्रभुत्व धारण करता है, उदासीन बन जाते हैं। मानवजाति का अस्तित्व और देशों एवं राष्ट्रों का भाग्य उनके लिए अब और महत्वपूर्ण नहीं रह जाते हैं। मनुष्य केवल खाने, पीने और भोग-विलासिता की खोज में चिंतित, एक खोखले संसार में रहता है। ...कुछ लोग स्वयं इस बात की खोज करने का उत्तरदायित्व ले लेते हैं कि आज परमेश्वर अपना कार्य कहाँ करता है, या यह तलाशने का उत्तरदायित्व ले लेते हैं कि वह किस प्रकार मनुष्य के गंतव्य पर नियंत्रण करता और उसे सँवारता है। और इस तरह, मनुष्य की जानकारी में न रहते हुए, मानव सभ्यता मनुष्यों की इच्छाओं के अनुसार चलने में और भी अधिक अक्षम हो गयी है, और कई ऐसे लोग भी हैं जो यह महसूस करते हैं कि इस प्रकार के संसार में रह कर वे, उन लोगों के बजाय जो चले गए हैं, कम खुश हैं। यहाँ तक की उन देशों के लोग भी जो अत्यधिक सभ्य हुआ करते थे इस तरह की शिकायतों को हवा देते हैं। क्योंकि इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि मानवजाति की सभ्यता को सुरक्षित रखने के लिए शासक और समाजशास्त्री अपना कितना दिमाग ख़पाते हैं, परमेश्वर के मार्गदर्शन के बिना, यह किसी लाभ का नहीं है। मनुष्य के हृदय का खालीपन कोई नहीं भर सकता है, क्योंकि मनुष्य का जीवन कोई नहीं बन सकता है, और कोई भी सामाजिक सिद्धांत मनुष्य को उस खालीपन से मुक्ति नहीं दिला सकता है जिससे वह व्यथित है। विज्ञान, ज्ञान, स्वतंत्रता, लोकतंत्र, फुरसत, आराम ये सब मात्र अस्थायी चैन हैं। यहाँ तक कि इन बातों के साथ भी, मनुष्य अपरिहार्य रूप से पाप करेगा और समाज के अन्याय पर विलाप करेगा। ये वस्तुएँ मनुष्य की अन्वेषण की लालसा और इच्छा को दबा नहीं सकती हैं। क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर के द्वारा बनाया गया है और मनुष्यों के बेहूदे बलिदान और अन्वेषण केवल और भी अधिक कष्ट की ओर लेकर जा सकते हैं। मनुष्य एक निरंतर भय की स्थिति में रहेगा, और नहीं जान सकेगा कि मानवजाति के भविष्य का किस प्रकार से सामना किया जाए, या आगे आने वाले मार्ग पर कैसे चला जाए। मनुष्य यहाँ तक कि विज्ञान और ज्ञान के भय से भी डरने लगेगा, और स्वयं के भीतर के खालीपन से और भी अधिक डरने लगेगा। इस संसार में, इस बात की परवाह किए बिना कि क्या तुम एक स्वंतत्र देश में या बिना मानव अधिकार वाले देश में रहतें हो, तुम मानवजाति के भाग्य से बचकर भागने में सर्वथा अयोग्य हो। चाहे तुम एक शासक हो या शासित, तुम भाग्य, रहस्यों और मानवजाति के गंतव्य की खोज की इच्छा से बच कर भागने में सर्वथा अक्षम हो। खालीपन के व्याकुल करने वाले अनुभव से बचकर भागने में तो बिल्कुल भी सक्षम नहीं हो। इस प्रकार की घटनाएँ जो समस्त मानवजाति के लिए साधारण हैं, समाजशास्त्रियों द्वारा सामाजिक घटनाएँ कही जाती हैं, फिर भी कोई महान व्यक्ति इस समस्या का समाधान करने के लिए सामने नहीं आ सकता है। मनुष्य, आखिरकार, मनुष्य ही है। परमेश्वर का स्थान और जीवन किसी भी मनुष्य के द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है। मानवजाति को न केवल एक निष्पक्ष समाज की, जिसमें हर एक परिपुष्ट हो, और सभी एक समान और स्वतंत्र हों, बल्कि परमेश्वर द्वारा उद्धार और उनके लिए जीवन की उपलब्धता की भी आवश्यकता है। केवल जब मनुष्य परमेश्वर द्वारा उद्धार और अपने जीवन के लिए खाद्य सामग्री प्राप्त कर लेता है तभी मनुष्य की आवश्यकताएँ, अन्वेषण की लालसा और आध्यात्मिक रिक्तता का समाधान हो सकता है। यदि किसी देश या राष्ट्र के लोग परमेश्वर द्वारा उद्धार और उसकी देखभाल प्राप्त करने में अक्षम हैं, तो इस प्रकार का देश या राष्ट्र विनाश के मार्ग पर, अंधकार की ओर, चला जाएगा, और परमेश्वर के द्वारा जड़ से मिटा दिया जाएगा।

शायद तुम्हारा देश वर्तमान में समृद्ध हो रहा हो, किंतु यदि तुम लोगों को परमेश्वर से भटकने देते हो, तो तुम्हारा देश स्वयं को उत्तरोत्तर परमेश्वर की आशीषों से वंचित होता हुआ पाएगा। तुम्हारे देश की सभ्यता उत्तरोत्तर पैरों के नीचे कुचल दी जाएगी, और ज़्यादा समय नहीं लगेगा कि लोग परमेश्वर के विरूद्ध उठकर स्वर्ग को कोसने लगेंगे। और इसलिए, मनुष्य की जानकारी के बगैर, देश के भाग्य का विनाश कर दिया जाएगा। परमेश्वर शक्तिशाली देशों को उन देशों से निपटने के लिए अधिक ऊपर उठाएगा जिन्हें परमेश्वर द्वारा श्राप दिया गया है, यहाँ तक कि पृथ्वी से उनका अस्तित्व भी मिटा सकता है। किसी देश का उत्थान और पतन इस बात पर आधारित होता है कि क्या इसके शासक परमेश्वर की आराधना करते हैं, और क्या वे अपने लोगों को परमेश्वर के निकट लाने और आराधना करने में उनकी अगुआई करते हैं। और फिर भी, इस अंतिम युग में, क्योंकि वे जो वास्तव में परमेश्वर को खोजते और आराधना करते हैं वे तेजी से दुर्लभ हो रहे हैं, इसलिए परमेश्वर उन देशों पर अपना विशेष अनुग्रह प्रदान करता है जिनमें ईसाईयत एक राज्य धर्म है। वह संसार में एक अपेक्षाकृत धार्मिक शिविर बनाने के लिए उन्हें एक साथ एकत्रित करता है, जबकि नास्तिक देश या जो देश सच्चे परमेश्वर की आराधना नहीं करते हैं वे धार्मिक शिविर के विरोधी बन जाते हैं। इस तरह, परमेश्वर का मानवजाति के बीच न केवल एक स्थान होता है जिससे वह अपना कार्य कर करता है, बल्कि उन देशों को भी प्राप्त करता है जो धर्मी अधिकार का प्रयोग कर सकते हैं, ताकि उन देशों पर शास्तियाँ और प्रतिबंध लगाए जाएँ जो परमेश्वर का विरोध करते हैं। मगर, इसके बावजूद, अभी तक ऐसे लोग अधिक नहीं हैं जो परमेश्वर की आराधना करने के लिए आगे आते हैं, क्योंकि मनुष्य उससे बहुत दूर भटक गया है, और परमेश्वर बहुत लंबे समय से मनुष्यों के विचारों से अनुपस्थित रहा है। पृथ्वी पर ऐसे देश रह जाते हैं जो धार्मिकता का अभ्यास करते हैं और अधार्मिकता का विरोध करते हैं। किन्तु यह परमेश्वर की इच्छा से अत्यंत दूर है, क्योंकि किसी भी देश का शासक अपने लोगों के ऊपर परमेश्वर को नियंत्रण नहीं करने देगा, और कोई राजनीतिक दल परमेश्वर की आराधना करने के लिए अपने लोगों को एक साथ इकट्ठा नहीं करेगा; परमेश्वर ने प्रत्येक देश, राष्ट्र, सत्तारूढ़ दल, और यहाँ तक कि प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में अपना न्यायसंगत स्थान खो दिया है। यद्यपि धर्मी ताक़तें इस दुनिया में मौजूद हैं, किन्तु वह शासन जिसमें मनुष्य के हृदय में परमेश्वर का कोई स्थान नहीं हो नाज़ुक होता है। परमेश्वर के आशीष के बिना, राजनीतिक क्षेत्र अव्यवस्था में पड़ जाएँगे और हमले के लिए असुरक्षित हो जाएँगे। मानवजाति के लिए, परमेश्वर के आशीष के बिना होना धूप के न होने के समान है। इस बात की परवाह किए बिना कि शासक अपने लोगों के लिए कितने अधिक परिश्रम से योगदान करते हैं, इस बात पर ध्यान दिए बिना कि मानवजाति कितने धर्मी सम्मेलन आयोजित करती है, इनमें से कोई भी चीज़ों की कायापलट नहीं करेगा या मानवजाति के भाग्य को नहीं बदलेगा। मनुष्य का मानना है कि ऐसा देश जिसमें लोगों को खिलाया जाता है और पहनने के कपड़े दिए जाते हैं, जिसमें वे एक साथ शान्ति से रहते हैं, एक अच्छा देश है, और एक अच्छे नेतृत्व वाला देश है। किन्तु परमेश्वर ऐसा नहीं सोचता है। उसका मानना है कि कोई देश जिसमें कोई भी व्यक्ति उसकी आराधना नहीं करता है एक ऐसा देश है जिसे वह जड़ से मिटा देगा। मनुष्य के सोचने का तरीका परमेश्वर के सोचने के तरीकों से पूरी तरह भिन्न है। तो, यदि किसी देश का मुखिया परमेश्वर की आराधना नहीं करता है, तो उस देश का भाग्य बहुत ही दुःखदायक होगा, और उस देश का कोई गंतव्य नहीं होगा।

परमेश्वर मनुष्य की राजनीति में भाग नहीं लेता है, फिर भी देश या राष्ट्र का भाग्य परमेश्वर के द्वारा नियंत्रित होता है। परमेश्वर इस संसार को और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को नियंत्रित करता है। मनुष्य का भाग्य और परमेश्वर की योजना बहुत ही घनिष्ठता से जुड़ी हुई हैं, और कोई भी मनुष्य, देश या राष्ट्र परमेश्वर की सम्प्रभुता से मुक्त नहीं है। यदि मनुष्य अपने भाग्य को जानना चाहता है, तो उसे अवश्य परमेश्वर के सामने आना चाहिए। परमेश्वर उन लोगों को समृद्ध करवाएगा है जो उसका अनुसरण करते और उसकी आराधना करते हैं, और उनका पतन और विनाश करेगा जो उसका विरोध करते हैं और उसे अस्वीकार करते हैं।

बाइबल के दृष्य का स्मरण करें जब परमेश्वर ने सदोम पर विनाश का कार्य किया और इस बारे में भी विचार करें कि किस प्रकार से लूत की पत्नी नमक का खम्भा बन गई। वापस विचार करें कि किस प्रकार से नीनवे के लोगों ने टाट और राख में पश्चाताप किया, और स्मरण करें कि 2000 वर्ष पहले यहूदियों द्वारा यीशु को सलीब पर चढ़ा दिए जाने के बाद क्या हुआ था। यहूदियों को इस्राएल से निर्वासित कर दिया गया था और वे दुनियाभर के देशों में भाग गए थे। कई लोगों को मार दिया गया था, और सम्पूर्ण यहूदी देश अभूतपूर्व विनाश के अधीन कर दिया गया था। उन्होंने परमेश्वर को सलीब पर चढ़ाया था—जघन्य अपराध किया था—और परमेश्वर के स्वभाव को उकसाया था। उन्होंने जो किया था उसका उनसे भुगतान करवाया गया था, उनसे उनके कार्यों के परिणामों को भुगतवाया गया था। उन्होंने परमेश्वर की निंदा की थी, परमेश्वर को अस्वीकार किया था, और इसलिए उनकी केवल एक ही नियति थी: परमेश्वर द्वारा दण्डित किया जाना। यही वह कड़वा परिणाम और आपदा है जो उनके शासक अपने देश और राष्ट्र पर लाए।

आज, परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए संसार में वापस आ गया है। उसका पहला ठहराव, नास्तिकता का कट्टर गढ़, तानाशाही शासकों का विशाल जमावड़ाः चीन, है। परमेश्वर ने अपनी बुद्धि और सामर्थ्य से लोगों का एक समूह प्राप्त कर लिया है। इस अवधि के दौरान, चीन की सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा उसका हर तरह से शिकार किया जाता है और उसे अत्याधिक पीड़ा के अधीन किया जाता है, उसके पास अपना सिर टिकाने के लिए कोई जगह नहीं है और वह किसी भी शरणस्थल को पाने में असमर्थ है। इसके बावजूद, परमेश्वर तब भी उस कार्य को जारी रखता है जिसे करने का उसका इरादा हैः वह अपनी वाणी बोलता है और सुसमाचार का प्रसार करता है। कोई भी परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता की थाह नहीं ले सकता है। चीन में, जो कि एक ऐसा देश है जो परमेश्वर को एक शत्रु मानता है, परमेश्वर ने कभी भी अपना कार्य बंद नहीं किया है। इसके बजाय, और अधिक लोगों ने उसके कार्य और वचन को स्वीकार कर लिया है, क्योंकि परमेश्वर मानवजाति के हर एक सदस्य को बचाने के लिए वह सब कुछ करता है जो वह कर सकता है। हमें विश्वास है कि परमेश्वर जो कुछ प्राप्त करना चाहता है उस मार्ग में कोई भी देश या शक्ति ठहर नहीं सकता है। वे जो परमेश्वर के कार्य में बाधा उत्पन्न करते हैं, परमेश्वर के वचन का विरोध करते हैं, परमेश्वर की योजना में विघ्न डालते हैं और उसे बिगाड़ते हैं, अंततः परमेश्वर के द्वारा दण्डित किए जाएँगे। वह जो परमेश्वर के कार्य की अवज्ञा करता है नष्ट कर दिया जाएगा; कोई भी राष्ट्र जो परमेश्वर के कार्य को अस्वीकार करता है, उसे नष्ट कर दिया जाएगा; कोई भी देश जो परमेश्वर के कार्य का विरोध करने के लिए उठता है, वह इस पृथ्वी पर से मिटा दिया जाएगा; और उसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। मैं सभी देशों, राष्ट्रों और यहाँ तक कि उद्योग के लोगों से विनती करता हूँ, कि परमेश्वर की आवाज़ को सुनें, परमेश्वर के कार्य को देखें, मानवजाति के भाग्य पर ध्यान दें, इस प्रकार परमेश्वर को सर्वाधिक पवित्र, सर्वाधिक सम्माननीय, मानवजाति के बीच आराधना का सर्वोच्च, और एकमात्र लक्ष्य बनाएँ और सम्पूर्ण मानवजाति को परमेश्वर के आशीष के अधीन जीवन जीने की अनुमति दें, ठीक उसी तरह से जैसे अब्राहम के वंशज यहोवा की प्रतिज्ञाओं के अधीन रहे थे और ठीक उसी तरह से जैसे आदम और हवा, जो मूल रूप से परमेश्वर के द्वारा बनाए गए थे, अदन के बगीचे में रहे थे।

परमेश्वर का कार्य बलपूर्वक उमड़ती हुई लहरों के समान है। उसे कोई नहीं रोक सकता है, और कोई भी उसके क़दमों को थाम नहीं सकता है। केवल वे लोग ही जो उसके वचनों को सावधानीपूर्वक सुनते हैं, और उसकी खोज करते हैं और उसके लिए प्यासे हैं, उसके पदचिह्नों का अनुसरण करके उसकी प्रतिज्ञा को प्राप्त कर सकते हैं। जो ऐसा नहीं करते हैं वे ज़बर्दस्त आपदा और उचित दण्ड के अधीन किए जाएँगे।
स्रोत:सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया

Hindi Gospel Movie | बाइबल के बारे में रहस्य का खुलासा | Do You Know the Inside Story of the Bible?

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फेंग ज्याह्वई, चीन की एक गृह कलीसिया की प्रचारक हैं। उन्‍होंने कई सालों से प्रभु में विश्‍वास किया है और सदा यह सोचा कि बाइबल परमेश्‍वर से प्रेरित है, कि अपनी आस्‍था में इसका अनुसरण करना आवश्‍यक है, परमेश्‍वर के वचन बाइबल के बाहर नहीं प्रकट होते, और बाइबल से भटकना विधर्म है। परंतु हाल के वर्षों में कलीसिया के उजाड़ हो जाने और विश्‍वासियों के अपनी आस्‍था के प्रति उदासीन हो जाने से, उनमें गहन संशय पैदा हुआ। वे बाइबल के बारे में चाहे जैसे भी बातें करतीं, तो भी वे अपनी कलीसिया को पुनर्जिवित करने में असफल रहीं .. जब तक कि एक सहकर्मी, भाई युआन ने, सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर की कलीसिया के गवाहों को आमंत्रित नहीं किया। गहन चर्चाओं के कई दौरों के पश्‍चात् फेंग ज्याह्वई अंतत: बाइबल की अंदरूनी कहानी और उसका सार समझ जाती हैं। वे उसके बाहर कदम रखती हैं, मेम्‍ने के पदचिन्‍हों पर चलती हैं, और अन्‍य विश्‍वासियों को सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर की ओर मुड़ने में उनकी रहनुमाई करती हैं।

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परमेश्वर राज्य के युग में सर्वशक्तिमान परमेश्वर का नाम क्यों लेते हैं?

परमेश्वर राज्य के युग में सर्वशक्तिमान परमेश्वर का नाम क्यों लेते हैं?

बहुत से लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि चूँकि सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंतिम दिनों में प्रभु यीशु की वापसी हैं, तो क्यों जब प्रभु यीशु अंतिम दिनों में न्याय का कार्य करने के लिए आते हैं, तो उन्हें सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहा जाता है। क्यों उन्हें प्रभु यीशु के नाम से ही बुलाना जारी नहीं रखा जाता है? वास्तव में, हर बार जब भी परमेश्वर अपने कार्य का एक चरण करते हैं, तो उनका एक नया नाम होता है। यह नया नाम कार्य के मुताबिक परमेश्वर स्वयं लेते हैं—ऐसा नहीं है कि लोग जैसे चाहें वैसे ही उन्हें पुकारते हैं। कार्य के प्रत्येक चरण में परमेश्वर द्वारा लिया गया नाम बाइबल पर आधारित है। आखिरी दिनों में लौटे प्रभु यीशु के नाम की बहुत पहले बाइबल में भविष्यवाणी की गयी थी। यशायाह ने कहा, "तब जाति जाति के लोग तेरा धर्म और सब राजा तेरी महिमा देखेंगे, और तेरा एक नया नाम रखा जाएगा जो यहोवा के मुख से निकलेगा।" (यशायाह 62:2)। प्रकाशित वाक्य में यह भी कहा गया था कि "फिलदिलफिया की कलीसिया के दूत को यह लिख…. जो जय पाए उसे मैं अपने परमेश्‍वर के मन्दिर में एक खंभा बनाऊँगा, और वह फिर कभी बाहर न निकलेगा; और मैं अपने परमेश्‍वर का नाम और अपने परमेश्‍वर के नगर अर्थात् नये यरूशलेम का नाम जो मेरे परमेश्‍वर के पास से स्वर्ग पर से उतरनेवाला है, और अपना नया नाम उस पर लिखूँगा।" (प्रकाशितवाक्य 3:7, 12) प्रभु परमेश्‍वर, जो है और जो था और जो आनेवाला है, जो सर्वशक्‍तिमान है, यह कहता है, "मैं ही अल्फ़ा और ओमेगा हूँ।" (प्रकाशितवाक्य 1:8)। "फिर मैं ने बड़ी भीड़ का सा और बहुत जल का सा शब्द, और गर्जन का सा बड़ा शब्द सुना: "हल्‍लिलूय्याह! क्योंकि प्रभु हमारा परमेश्‍वर सर्वशक्‍तिमान राज्य करता है।"" (प्रकाशितवाक्य 19:6)। राज्य के युग के सर्वशक्तिमान परमेश्वर का नाम प्रकाशित वाक्य पुस्तक में की गई भविष्यवाणियों की पूर्ण पूर्ति है। प्रत्येक युग में परमेश्वर जो नाम लेते हैं, उसका गहरा महत्व है और उस युग के दौरान परमेश्वर के कार्य से उसका गहरा संबंध है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने इससे संबंधित रहस्यों को उजागर किया जब उन्होंने कहा, "प्रत्येक युग में, परमेश्वर नया कार्य करता है और उसे एक नए नाम से बुलाया जाता है; वह भिन्न-भिन्न युगों में एक ही कार्य कैसे कर सकता है? वह पुराने सेकैसे चिपका रह सकता है? यीशु का नाम छुटकारे के कार्यहेतु लिया गया था, तो क्या जब वह अंत के दिनों में लौटेगा तो तब भी उसे उसी नाम से बुलाया जाएगा? क्या वह अभी भी छुटकारे का कार्य करेगा? ऐसा क्यों है कि यहोवा और यीशु एक ही हैं, फिर भी उन्हें भिन्न-भिन्न युगों में भिन्न-भिन्न नामों से बुलाया जाता है? क्या यह इसलिए नहीं कि उनके कार्य के युग भिन्न-भिन्न हैं? क्या केवल एक ही नाम परमेश्वर का उसकी संपूर्णता में प्रतिनिधित्व कर सकता है? इस तरह, भिन्न युग में परमेश्वर को भिन्न नाम के द्वारा अवश्य बुलाया जाना चाहिए, उसे युग को परिवर्तित करने और युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए नाम का उपयोग अवश्य करना चाहिए, क्योंकि कोई भी एक नाम पूरी तरह से परमेश्वर स्वयं का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। और प्रत्येक नाम केवल एक निश्चित युग के दौरान परमेश्वर के स्वभाव का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है और प्रत्येक नाम केवल उसके कार्य का प्रतिनिधित्व करने के लिए आवश्यक है। इसलिए, समस्त युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए परमेश्वर अपने स्वभाव के लिए हितकारी किसी भी नाम को चुन सकता है। इस बात की परवाह किए बिना कि क्या यह यहोवा का युग है, या यीशु का युग है, प्रत्येक युग का एक नाम के द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाता है।" ("वचन देह में प्रकट होता है"से "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" से)

"'यहोवा' वह नाम है जिसे मैंने इस्राएल में अपने कार्य के दौरान अपनाया था, और इसका अर्थ है इस्राएलियों (परमेश्वर के चुने हुए लोग) का परमेश्वर जो मनुष्य पर दया कर सकता है, मनुष्य को शाप दे सकता है, और मनुष्य के जीवन को मार्गदर्शन दे सकता है। इसका अर्थ है वह परमेश्वर जिसके पास बड़ी सामर्थ्य है और जो बुद्धि से भरपूर है। "यीशु" इम्मानुएल है, और इसका मतलब है वह पाप बलि जो प्रेम से परिपूर्ण है, करुणा से भरपूर है, और मनुष्य को छुटकारा देता है। उसने अनुग्रह के युग का कार्य किया, और वह अनुग्रह के युग का प्रतिनिधित्व करता है, और वह प्रबन्धन योजना के केवल एक भाग का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है। अर्थात्, केवल यहोवा ही इस्राएल के चुने हुए लोगों का परमेश्वर, इब्राहीम का परमेश्वर, इसहाक का परमेश्वर, याकूब का परमेश्वर, मूसा का परमेश्वर, और इस्राएल के सभी लोगों का परमेश्वर है। और इसलिए वर्तमान युग में, यहूदा के कुटुम्ब के अलावा सभी इस्राएली यहोवा की आराधना करते हैं। वे वेदी पर उसके लिए बलिदान करते हैं, और याजकीय लबादे पहनकर मन्दिर में उसकी सेवा करते हैं। वे बस यहोवा के पुनः-प्रकट होने की आशा करते हैं। केवल यीशु ही मानवजाति को छुटकारा दिलाने वाला है। यीशु वह पाप बलि है जिसने मानवजाति को पाप से छुटकारा दिलाया है। जिसका अर्थ है, कि यीशु का नाम अनुग्रह के युग से आया, और अनुग्रह के युग में छुटकारे के कार्य के कारण विद्यमान रहा। अनुग्रह के युग के लोगों को आध्यात्मिक रूप से पुनर्जीवित किए जाने और उनका उद्धार किए जाने हेतु अनुमति देने के लिए यीशु का नाम विद्यमान था, और यीशु का नाम पूरी मानवजाति के उद्धार के लिए एक विशेष नाम है। और इस प्रकार यीशु का नाम छुटकारे के कार्य को दर्शाता है, और अनुग्रह के युग का द्योतक है। यहोवा का नाम इस्राएल के लोगों के लिए एक विशेष नाम है जो व्यवस्था के अधीन जीए थे। प्रत्येक युग में और कार्य के प्रत्येक चरण में, मेरा नाम आधारहीन नहीं है, किन्तु प्रतिनिधिक महत्व रखता हैः प्रत्येक नाम एक युग का प्रतिनिधित्व करता है। "यहोवा" व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व करता है, और यह उस परमेश्वर के लिए सम्मानसूचक है जिसकी आराधना इस्राएल के लोगों के द्वारा की जाती है। "यीशु" अनुग्रह के युग को दर्शाता है, और यह उन सब के परमेश्वर का नाम है जिन्हें अनुग्रह के युग के दौरान छुटकारा दिया गया था। यदि मनुष्य तब भी अंत के दिनों के दौरान उद्धारकर्त्ता यीशु के आगमन की अभिलाषा करता है, और तब भी उस से अपेक्षा करता है कि वह उस प्रतिरूप में आए जो उसने यहूदिया में धारण किया था, तो छः हज़ार सालों की सम्पूर्ण प्रबन्धन योजना छुटकारे के युग में रूक जाएगी, और थोड़ा सा भी प्रगति करने में अक्षम होगी। इसके अतिरिक्त, अंत के दिन का आगमन कभी नहीं होगा, और युग का समापन कभी नहीं होगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि उद्धारकर्त्ता यीशु सिर्फ मानवजाति के छुटकारे और उद्धार के लिए है। मैंने अनुग्रह के युग के सभी पापियों के लिए यीशु का नाम अपनाया था, और यह वह नाम नहीं है जिसके द्वारा मैं पूरी मानवजाति को समाप्त करूँगा। यद्यपि यहोवा, यीशु, और मसीहा सभी मेरे पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं, किंतु ये नाम मेरी प्रबन्धन योजना में केवल विभिन्न युगों के द्योतक हैं, और मेरी सम्पूर्णता में मेरा प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। ऐसे नाम जिनके द्वारा पृथ्वी के लोग मुझे पुकारते हैं मेरे सम्पूर्ण स्वभाव को और वह सब कुछ जो मैं हूँ उसे स्पष्ट रूप से नहीं कह सकते हैं। वे मात्र अलग-अलग नाम हैं जिनके द्वारा विभिन्न युगों के दौरान मुझे पुकारा जाता है। और इसलिए, जब अंतिम युग—अंत के दिनों के युग—का आगमन होगा, तो मेरा नाम पुनः बदल जाएगा। मुझे यहोवा, या यीशु नहीं कहा जाएगा, मसीहा तो कदापि नहीं, बल्कि मुझे स्वयं सामर्थ्यवान सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहा जाएगा, और इस नाम के अंतर्गत मैं समस्त युग को समाप्त करूँगा। एक समय मुझे यहोवा के नाम से जाना जाता था। मुझे मसीह भी कहा जाता था, और लोगों ने एक बार मुझे उद्धारकर्त्ता यीशु कहा था क्योंकि वे मुझ से प्रेम करते थे और मेरा आदर करते थे। किन्तु आज मैं वह यहोवा और यीशु नहीं हूँ जिसे लोग बीते समयों में जानते थे—मैं वह परमेश्वर हूँ जो अंत के दिनों में वापस आ गया है, वह परमेश्वर जो युग को समाप्त करेगा। वह परमेश्वर मैं स्वयं हूँ जो अपने स्वभाव की परिपूर्णता के साथ, और अधिकार, आदर एवं महिमा से भरपूर होकर पृथ्वी के अंतिम छोर से उदय होता हूँ।" ("वचन देह में प्रकट होता है"से "उद्धारकर्त्ता पहले से ही एक "सफेद बादल"पर सवार होकर वापस आ चुका है" से)

सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने स्पष्ट रूप से कहा कि हर युग में परमेश्वर के नाम का प्रतिनिधिक महत्व है: प्रत्येक नाम परमेश्वर के कार्य को और उस युग के दौरान व्यक्त स्वभाव को दर्शाता है। व्यवस्था के युग के दौरान, परमेश्वर ने अपने नियमों और आदेशों की घोषणा करने और धरती पर मानव जीवन का मार्गदर्शन करने के लिए यहोवा के नाम का प्रयोग किया; अनुग्रह के युग के दौरान, परमेश्वर ने मानव जाति के छुटकारे के कार्य को करने के लिए यीशु के नाम का इस्तेमाल किया; और राज्य के युग के दौरान, परमेश्वर को सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहा जाता है, वे परमेश्वर के घर से शुरू करते हुए मानव को शुद्ध करने, बदलने और बचाने के लिए न्याय का कार्य करते हैं। परमेश्वर अपने नाम का उपयोग कर युग को बदलते हैं, और युग के कार्य को दर्शाने के लिए इस नाम का इस्तेमाल करते हैं। जब यहोवा परमेश्वर ने व्यवस्था के युग का कार्य किया, तो केवल यहोवा के नाम से प्रार्थना कर और उनके नियमों और आदेशों का पालन कर लोग परमेश्वर का आशीर्वाद और सरंक्षण पा सकते थे। अनुग्रह के युग के आगमन के साथ, परमेश्वर ने छुटकारे का कार्य करने के लिए प्रभु यीशु के नाम का इस्तेमाल किया, और लोगों के लिए प्रभु यीशु को उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करना और प्रभु के नाम पर पश्चाताप के लिए प्रार्थना करना आवश्यक था, ताकि उनके पापों के लिए उन्हें क्षमा मिल सके और प्रभु यीशु द्वारा दिए गए सत्य और अनुग्रह का वे आनंद ले सकें। यदि लोग तब भी यहोवा के नाम से चिपके रहते और प्रभु यीशु को स्वीकार करने से इनकार करते, तो वे परमेश्वर की देखभाल और संरक्षण को खो देते थे, और यहूदी फरीसियों की तरह परमेश्वर से शापित और दण्डित होकर अंधेरे में गिर जाते थे। आखिरी दिनों के आगमन के साथ, परमेश्वर अपने घर से शुरू होने वाले न्याय का कार्य करने के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम का प्रयोग करते हैं। केवल सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम को स्वीकार करते हुए, परमेश्वर के कार्य के चरणों से साथ निभाते हुए, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय और ताड़ना से गुजरने के द्वारा लोग सत्य को समझ सकते और पा सकते हैं, पाप से दूर हो सकते हैं, शुद्ध हो सकते हैं, और परमेश्वर से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। जो लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम को स्वीकार करने से और आखिरी दिनों के उनके न्याय के कार्य को स्वीकार करने से इंकार करते हैं, वे पाप के बंधन से मुक्त होने में असमर्थ हैं, और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के लिए हमेशा अयोग्य रहेंगे।

स्रोत :सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया

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तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है

तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है

**सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन | तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है

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एक सामान्य समस्या जो सभी मनुष्यों में पाई जाती है कि वे सत्य को समझते तो हैं लेकिन उसे अभ्यास में नहीं ला सकते हैं। एक तथ्य यह है कि मनुष्य मूल्य चुकाने के लिए तैयार नहीं है, और दूसरा यह है कि मनुष्य की सूझ-बूझ बहुत अपर्याप्त है; वह अतीत की उन कई कठिनाईयों की उपेक्षा करने में असमर्थ है जो वास्तविक जीवन में विद्यमान हैं और नहीं जानता है कि कैसे उन्हें उचित रूप से अभ्यास करे। चूँकि मनुष्य के पास सत्य का बहुत कम अनुभव, कमज़ोर क्षमता, और सत्य की सीमित समझ है, इसलिए वह उन कठिनाईयों को हल करने में असमर्थ है जिनका सामना वह जीवन में करता है। वह परमेश्वर में अपने विश्वास के लिए सिर्फ़ दिखावटी प्रेम कर सकता है, मगर परमेश्वर को अपने रोज़मर्रा के जीवन में लाने में असमर्थ है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर परमेश्वर है, और जीवन जीवन है, मानो कि मनुष्य का अपने जीवन में परमेश्वर के साथ कोई भी सम्बंध नहीं है। यही सभी मनुष्य मानते हैं। परमेश्वर में इस तरह का विश्वास उसके द्वारा मनुष्य को वास्तव में प्राप्त किए जाने और पूर्ण बनाए जाने की अनुमति नहीं देगा। वास्तव में, ऐसा नहीं है कि परमेश्वर का वचन अधूरा है, बल्कि मनुष्य की उसके वचन को ग्रहण करने की योग्यता अपर्याप्त है। यह कहा जा सकता है कि लगभग कोई भी मनुष्य वैसे कार्यकलाप नहीं करता है जैसा कि मूलरूप से परमेश्वर के द्वारा अपेक्षा की गई थी। बल्कि, परमेश्वर में उनका विश्वास उनके अपने इरादों, स्थापित धार्मिक अवधारणाओं, और प्रथाओं के आधार पर है। कुछ ही लोग ऐसे हैं जो परमेश्वर के वचन की स्वीकृति के बाद एक रूपांतरण से गुज़रते हैं और उसकी इच्छा के अनुसार कार्य करना शुरू करते हैं। बल्कि, वे अपनी ग़लत धारणाओं में डटे रहते हैं। जब मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करना शुरू करता है, तो वह धर्म के पारंपरिक नियमों के आधार पर करता है, और दूसरों के साथ पूर्णतः जीवन के अपने स्वयं के दर्शनशास्त्र के आधार पर रहता और अन्योन्यक्रिया करता है। हर दस लोगों में से नौ के बारे में ऐसा ही मामला है। ऐसे लोग बहुत ही कम हैं जो परमेश्वर में विश्वास शुरू करने के बाद एक अन्य योजना बनाते हैं और एक नई शुरूआत करते हैं। कोई भी परमेश्वर के वचन को सत्य के रूप में नहीं मानता है या अभ्यास में नहीं लाता है।

उदाहरण के लिए, यीशु पर विश्वास को लें। चाहे कोई मनुष्य विश्वास में नौसिखिया था या फिर एक लम्बे समय से विश्वास में रहा था, सभी बस उन "प्रतिभाओं" को उपयोग में लाए जो उनके पास थी और जो कुछ भी "कौशल" उनमें थे उनका प्रदर्शन किया। मनुष्यों ने बस इन्हीं तीन शब्दों "परमेश्वर में विश्वास" को अपने आम जीवन में जोड़ दिया, मगर अपने स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं किए, और परमेश्वर में उनका विश्वास थोड़ा सा भी नहीं बढ़ा। मनुष्य की तलाश न तो उत्साही थी और न ही निरुत्साही। उसने यह नहीं कहा कि उसने विश्वास नहीं किया, मगर न ही उसने अपने आप को पूरी तरह से परमेश्वर को समर्पित किया। उसने कभी भी परमेश्वर को सचुमच में प्रेम नहीं किया या परमेश्वर की आज्ञा का पालन नहीं किया। परमेश्वर में उसका विश्वास सच्चा और झूठा दोनों था, और उसने आँखें मूँद ली और अपने विश्वास के अभ्यास में ईमानदार नहीं था। वह बिल्कुल शुरू से अपनी मृत्यु के समय तक एक संभ्रम की स्थिति में बना रहा। इसका क्या अर्थ है? आज, आपको सही रास्ते पर नियत अवश्य होना चाहिए क्योंकि तुम व्यावहारिक परमेश्वर में विश्वास करते हो। परमेश्वर में विश्वास करके, तुम्हें सिर्फ़ आशीषों को ही नहीं खोजना चाहिए, बल्कि परमेश्वर को प्रेम करने और परमेश्वर को जानने की कोशिश करनी चाहिए। इस प्रबुद्धता और तुम्हारी स्वयं की खोज के माध्यम से, तुम उसके वचन को खा और पी सकते हो, परमेश्वर के बारे में एक सच्ची समझ को विकसित कर सकते हो, और परमेश्वर के लिए एक सच्चा प्रेम रख सकते हो जो तुम्हारे हृदय से आता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम सबसे अधिक सच्चा है, इतना कि उसके लिए तुम्हारे प्रेम को कोई नष्ट नहीं कर सकता है या उसके लिए तुम्हारे प्रेम के मार्ग में कोई खड़ा नहीं हो सकता है। तब तुम परमेश्वर में विश्वास के सही रास्ते पर होते हो। यह साबित करता है कि तुम परमेश्वर से संबंध रखते हो, क्योंकि तुम्हारे हृदय पर परमेश्वर द्वारा कब्जा कर लिया गया है और तब दूसरा कोई तुम पर कब्जा नहीं कर सकता है। तुम्हारे अनुभव, तुमने जो मूल्य चुकाया है, और परमेश्वर के कार्य के कारण, तुम परमेश्वर के लिए एक स्वेच्छापूर्ण प्रेम को विकसित करने में समर्थ हो जाते हो। फिर तुम शैतान के प्रभाव से मुक्त कर दिए जाते हो और परमेश्वर के वचन के प्रकाश में जीते हो। सिर्फ़ जब तुम अंधकार के प्रभाव को तोड़ कर मुक्त हो जाते हो तभी तुमने परमेश्वर प्राप्त कर लिया समझे जा सकते हो। परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास में, तुम्हें इस लक्ष्य को अवश्य खोजना चाहिए। यह तुम लोगों में से हर एक का कर्तव्य है। किसी को भी चीज़े जैसे हैं उनसे आत्मसंतुष्ट नहीं होना चाहिए। तुम परमेश्वर के कार्य के प्रति दोहरे मन वाले नहीं हो सकते या इसे हल्के में नहीं मान सकते हो। तुम को हर तरह से और हर समय परमेश्वर के बारे में विचार करना चाहिए, और उसके वास्ते सब कुछ करना चाहिए। और जब तुम कुछ बोलते या करते हो, तो तुम को परमेश्वर के घर के हितों को सबसे पहले रखना चाहिए। सिर्फ़ यही परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है।

परमेश्वर में विश्वास करने का मनुष्य का सबसे बड़ा दोष यह है कि उसका विश्वास सिर्फ़ वचनों में है, और परमेश्वर उसके व्यावहारिक जीवन में कहीं भी विद्यमान नहीं है। वास्तव में, सभी मनुष्य परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास तो करते हैं, फिर भी परमेश्वर उनके प्रतिदिन के जीवन का हिस्सा नहीं है। परमेश्वर के लिए कई प्रार्थनाएँ मनुष्य के मुख से तो आती हैं, किन्तु परमेश्वर के लिए उसके हृदय में बहुत थोड़ी सी ही जगह है, और इसलिए परमेश्वर बार-बार मनुष्य की परीक्षा लेता है। चूँकि मनुष्य अशुद्ध है, इसलिए परमेश्वर के पास मनुष्य की परीक्षा लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, ताकि वह शर्मिंदगी महसूस करे और अपने आप को परीक्षाओं में जान ले। अन्यथा, सभी मनुष्य प्रधान दूत के बच्चे बन जाएँगे, और उत्तरोत्तर भ्रष्ट बन जाएँगे। परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास के दौरान, कई व्यक्तिगत इरादे और उद्देश्य छोड़ दिए जाते हैं जैसे-जैसे वह लगातार परमेश्वर के द्वारा शुद्ध किया जाता है। अन्यथा, कोई भी मनुष्य परमेश्वर के द्वारा उपयोग नहीं किया जा सकता है, और मनुष्य में उस कार्य को करने का परमेश्वर के पास कोई रास्ता नहीं है जो उसे करना चाहिए। परमेश्वर सबसे पहले मनुष्य को शुद्ध करता है। इस प्रक्रिया में, मनुष्य स्वयं को जान सकता है और परमेश्वर मनुष्य को बदल सकता है। सिर्फ़ इसके बाद ही परमेश्वर मनुष्य में अपना जीवन कार्य कर सकता है, और सिर्फ़ इसी ढंग से मनुष्य के हृदय को पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मोड़ा जा सकता है। इसलिए, परमेश्वर में विश्वास करना इतना आसान नहीं है जैसा कि मनुष्य कह सकता है। जैसे कि परमेश्वर इसे देखता है, यदि तुम्हारे पास सिर्फ़ ज्ञान है किन्तु जीवन के रूप में उसका वचन नहीं है; यदि तुम सिर्फ़ अपने स्वयं के ज्ञान तक ही सीमित हो परन्तु सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते हो या परमेश्वर के वचन को जी नहीं सकते हो, तो तब भी यह प्रमाण है कि तुम्हारे पास परमेश्वर को प्रेम करने वाला हृदय नहीं है, और दर्शाता है कि तुम्हारा हृदय परमेश्वर से संबंधित नहीं है। परमेश्वर में विश्वास करके उसे जान लेना; यह अंतिम लक्ष्य है और जिसे मनुष्य को खोजना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को जीने के लिए प्रयास समर्पित अवश्य करने चाहिए ताकि वे तुम्हारे अभ्यास में महसूस किए जा सकें। यदि तुम्हारे पास सिर्फ़ सैद्धांतिक ज्ञान है, तो परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास बेकार हो जाएगा। तब यदि तुम सिर्फ़ इसे अभ्यास में लाते हो और उसके वचन को जीते हो तभी तुम्हारा विश्वास पूर्ण और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप माना जाएगा। इस रास्ते पर, कई मनुष्य ज्ञान के बारे में बहुत कुछ बोल सकते हैं, लेकिन उनकी मृत्यु के समय, उनकी आँखें आँसूओं से भर जाती हैं, और अपना जीवनकाल नष्ट करने और बुढ़ापे तक व्यर्थ जीने के लिए वे स्वयं से घृणा करते हैं। वे केवल सिद्धांत समझते हैं, वे सत्य को अभ्यास में नहीं ला सकते, न परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं, इसके बजाय वे बस यहाँ-वहाँ, काम में मशगूल होकर दौड़ते रहते हैं; मौत की कगार पर पहुँचने के बाद वे अंतत: देख पाते हैं कि उनमें सच्ची गवाही की कमी है, कि वे परमेश्वर को बिल्कुल नहीं जानते हैं। क्या उस समय बहुत देर नहीं हो जाती है? क्यों फिर तुम वर्तमान समय का लाभ नहीं उठाते हो और उस सत्य की खोज नहीं करते हो जिसे तुम प्रेम करते हो? कल तक का इंतज़ार क्यों करते हो? यदि जीवन में तुम सत्य के लिए कष्ट नहीं उठाते हो, या इसे प्राप्त करने की कोशिश नहीं करते हो, तो क्या ऐसा हो सकता है कि तुम अपने मरने के समय में पछतावा महसूस करना चाहते हो? यदि ऐसा है तो, फिर परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो? वास्तव में, ऐसे कई मामले हैं जिन में मनुष्य, यदि वह सिर्फ़ हल्का सा प्रयास समर्पित करता है, तो सत्य को अभ्यास में ला सकता है और उसके द्वारा परमेश्वर को संतुष्ट कर सकता है। मनुष्य का हृदय निरंतर राक्षसों के कब्ज़े में रहता है और इसलिए वह परमेश्वर के वास्ते कार्य नहीं कर सकता है। बल्कि, वह देह के लिए निरंतर इधर-उधर यात्रा करता रहता है, और अंत में उसे कुछ भी लाभ नहीं मिलता है। यही कारण है कि मनुष्य के पास निरंतर समस्या और पीड़ा है। क्या ये शैतान की यातनाएँ नहीं हैं? क्या यह देह की भ्रष्टता नहीं है? केवल दिखावटी प्रेम करके तुम्हें परमेश्वर को मूर्ख नहीं बनाना चाहिए। बल्कि, तुम्हें ठोस कार्यवाही करनी चाहिए। अपने आप को मूर्ख मत बनाओ; इसका क्या अर्थ है? अपनी देह के वास्ते जी कर और प्रसिद्धि और भाग्य के लिए मेहनत करके तुम क्या प्राप्त कर सकते हो?

स्रोत:तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे" (भाग दो)

**सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे" (भाग दो)

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सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "परमेश्वर ने मानवजाति का सृजन किया, उसे पृथ्वी पर रखा, और उसकी आज के दिन तक अगुआई की। उसने तब मानवजाति को बचाया और मानवजाति के लिये पापबली के रूप में कार्य किया। अंत में उसे अभी भी अवश्य मानवजाति को जीतना चाहिए, मानवजाति को पूर्णतः बचाना चाहिए और उसे उसकी मूल समानता में पुनर्स्थापित करना चाहिए। यही वह कार्य है जिसमें वह आरंभ से लेकर अंत तक संलग्न रहा है—मनुष्य को उसकी मूल छवि में और उसकी मूल समानता में पुनर्स्थापित करना। वह अपना राज्य स्थापित करेगा और मनुष्य की मूल समानता पुनर्स्थापित करेगा, जिसका अर्थ है कि वह पृथ्वी पर अपने अधिकार को पुनर्स्थापित करेगा, और समस्त प्राणियों के बीच अपने अधिकार को पुर्नस्थापित करेगा।......जब मनुष्यजाति को उसकी मूल समानता में पुनर्स्थापित कर दिया जाता है, जब मानवजाति अपने संबंधित कर्तव्यों को पूरा कर सकती है, अपने स्वयं के स्थान को सुरक्षित रख सकती है और परमेश्वर की सभी व्यवस्थाओं का पालन कर सकती है, तो परमेश्वर पृथ्वी पर लोगों के एक समूह को प्राप्त कर चुका होगा जो उसकी आराधना करते हैं, वह पृथ्वी पर एक राज्य स्थापित कर चुका होगा जो उसकी आराधना करता है। उसके पास पृथ्वी पर अनंत विजय होगी, और जो उसके विरोध में है वे अनंतकाल के लिए नष्ट हो जाएँगे। इससे मनुष्य का सृजन करने का उसका मूल अभिप्राय पुनर्स्थापित हो जाएगा; इससे सब चीजों के सृजन का उसका मूल अभिप्राय पुनर्स्थापित हो जाएगा, और इससे पृथ्वी पर उसका अधिकार, सभी चीजों के बीच उसका अधिकार और उसके शत्रुओं के बीच उसका अधिकार भी पुनर्स्थापित हो जाएगा। ये उसकी संपूर्ण विजय के प्रतीक हैं। इसके बाद से मानवजाति विश्राम में प्रवेश करेगी और ऐसे जीवन में प्रवेश करेगी जो सही मार्ग का अनुसरण करता है। मनुष्य के साथ परमेश्वर भी अनंत विश्राम में प्रवेश करेगा, और एक अनंत जीवन में प्रवेश करेगा जो परमेश्वर और मनुष्य द्वारा साझा किया जाता है। पृथ्वी पर से गंदगी और अवज्ञा ग़ायब हो जाएगी, वैसे ही पृथ्वी पर से विलाप ग़ायब हो जाएगा। उन सभी का अस्तित्व पृथ्वी पर नहीं रहेगा जो परमेश्वर का विरोध करते हैं। केवल परमेश्वर और वे जिन्हें उसने बचाया है ही शेष बचेंगे; केवल उसकी सृष्टि ही बचेगी।"

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विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए

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**सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन | विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए

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वो क्या है जो मनुष्य ने प्राप्त किया है जब उसने सर्वप्रथम परमेश्वर में विश्वास किया? तुमने परमेश्वर के बारे में क्या जाना है? परमेश्वर में अपने विश्वास के कारण तुम कितने बदले हो? अब तुम सभी जानते हो कि परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास आत्मा की मुक्ति और देह के कल्याण के लिए ही नही है, और न ही यह उसके जीवन को परमेश्वर के प्रेम से सम्पन्न बनाने के लिए, इत्यादि है। जैसा यह है, यदि तुम परमेश्वर को सिर्फ़ देह के कल्याण के लिए या क्षणिक आनंद के लिए प्रेम करते हो, तो भले ही, अंत में, परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम इसके शिखर पर पहुँचता है और तुम कुछ भी नहीं माँगते, यह "प्रेम" जिसे तुम खोजते हो अभी भी अशुद्ध प्रेम होता है, और परमेश्वर को भाने वाला नहीं होता। वे लोग जो परमेश्वर के लिए प्रेम का उपयोग अपने बोझिल जीवन को सम्पन्न बनाने और अपने हृदय के एक शून्य को भरने के लिए करते हैं, ये वे हैं जो अपने जीवन को आसानी से जीना चाहते हैं, ना कि वे जो सचमुच में परमेश्वर को प्रेम करना चाहते हैं। इस प्रकार का प्रेम व्यक्ति की इच्छा के विरुद्ध होता है, भावनात्मक आनंद की खोज होता है, और परमेश्वर को इस प्रकार के प्रेम की आवश्यकता नहीं है। तो फिर, तुम्हारा प्रेम कैसा है? तुम परमेश्वर को किस लिए प्रेम करते हो? तुम में परमेश्वर के लिए कितना सच्चा प्रेम है? तुम लोगों में से अधिकतर का प्रेम वैसा ही है जिसका पहले जिक्र किया गया था। इस प्रकार का प्रेम सिर्फ़ यथापूर्व स्थिति को बरकरार रख सकता है; अनन्त स्थिरता को प्राप्त नहीं कर सकता, न ही मनुष्य में जड़ें जमा सकता है। इस प्रकार का प्रेम एक ऐसा फूल है जो खिलने के बाद फल नहीं देता और मुरझा जाता है। दूसरे शब्दों में, तुमने जब एक बार परमेश्वर को इस ढंग से प्रेम कर लिया और तुम्हें इस मार्ग पर आगे ले जाने वाला कोई ना हो, तो तुम गिर जाओगे। यदि तुम परमेश्वर को सिर्फ़ प्रेमी परमेश्वर के समय ही प्रेम कर सकते हो और उसके बाद तुम अपने जीवन स्वभाव में कोई बदलाव नहीं लाते, तो फिर तुम अंधकार में निरंतर घिरते चले जाओगे, तुम बच नहीं पाओगे, और शैतान द्वारा बांधे जाने और मूर्ख बनाये जाने से मुक्त होने में असमर्थ होगे। ऐसा कोई भी मनुष्य परमेश्वर को पूरी तरह से प्राप्त नहीं हो सकता; अंत में, उनकी आत्मा, प्राण, और शरीर शैतान के ही होंगे। यह असंदिग्ध है। वे सभी जो पूरी तरह से परमेश्वर को प्राप्त नहीं हो पाएँगे अपने मूल स्थान में वापस लौट जायेंगे, अर्थात, वापस शैतान के पास, और वे परमेश्वर के दंड के अगले चरण को स्वीकार करने के लिये, उस झील में जायेंगे जो आग और गन्धक से जलती रहती है। जो परमेश्वर के हो चुके हैं, वो वे होते हैं जो शैतान के खिलाफ विद्रोह करते हैं और उसके शासन से बच जाते हैं। ऐसे मनुष्य राज्य के लोगों में आधिकारिक रूप से गिने जायेंगे। इस तरह से राज्य के लोग अस्तित्व में आते हैं। क्या तुम इस प्रकार के व्यक्ति बनने को तैयार हो? तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किये जाने के लिए तैयार हो? क्या तुम शैतान के शासन से बचना और वापस परमेश्वर के पास जाना चाहते हो? क्या तुम अब शैतान के हो या तुम राज्य के लोगों में गिने जाते हो? ऐसी सारी चीज़ें स्पष्ट होनी चाहिए और आगे किसी भी स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए।

बीते समयों में, अनेक लोग मनुष्य की महत्वाकांक्षा और धारणाओं के साथ मनुष्य की आशाओं के लिए आगे बढ़े। अब इन मामलों पर चर्चा नहीं की जाएगी। कुंजी है अभ्यास का ऐसा ढंग खोजना जो तुम लोगों में से हर एक को परमेश्वर के सम्मुख एक सामान्य स्थिति बनाये रखने और धीरे-धीरे शैतान के प्रभाव की बेड़ियों को तोड़ डालने में सक्षम करे, ताकि तुम लोग परमेश्वर को प्राप्त हो सको और पृथ्वी पर वैसे जियो जैसे परमेश्वर तुमसे चाहता है। केवल इसी से परमेश्वर की इच्छा पूरी हो सकती है। परमेश्वर में विश्वास तो बहुत से लोग करते हैं, फिर भी न तो यह जानते हैं कि परमेश्वर क्या चाहता है और न ही यह कि शैतान क्या चाहता है। वे मूर्खता से विश्वास करते हैं और दूसरों का अंधानुकरण करते हैं, और इसलिए उनके पास कभी भी एक सामान्य ईसाई जीवन नहीं होता; मनुष्य का परमेश्वर के साथ जो सामान्य संबंध है वो होना तो दूर, उनके पास सामान्य व्यक्तिगत संबंध तक नहीं होते। इससे यह देखा जा सकता है कि मनुष्य की समस्याएं और गलतियां, और दूसरे कारण जो परमेश्वर की इच्छा के आड़े आते हैं बहुत हैं। यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि मनुष्य ने अपने आप को सही रास्ते पर नहीं रखा है, न ही उसने वास्तविक जीवन का अनुभव लिया है। तो इस प्रकार यह सही रास्ते पर आना क्या है? सही रास्ते पर आने का अर्थ है कि तुम सब समय परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत रख सकते हो और स्वाभाविक रूप से परमेश्वर के साथ संवाद कर सकते हो, तुम्हें क्रमशः यह पता लगने लगता है कि मनुष्य में क्या कमी है और परमेश्वर के विषय में एक गहरा ज्ञान होने लगता है। इसके द्वारा तुम्हें प्रतिदिन अपनी आत्मा में एक नया दृष्टि बोध और प्रकाश प्राप्त होता है; तुम सत्य में प्रवेश करने की अधिकाधिक लालसा करने लगते हो। हर दिन नया प्रकाश और नई समझ होती है। इस रास्ते के द्वारा, धीरे-धीरे तुम शैतान के प्रभाव से मुक्त होते जाते हो, और तुम्हारा जीवन महान बनता जाता है। इस प्रकार का व्यक्ति सही रास्ते पर आ चुका होता है। उपरोक्त के मुक़ाबले अपने वास्तविक अनुभवों का मूल्यांकन करो और तुमने परमेश्वर के विश्वास का जो रास्ता चुना है उसे उपरोक्त के मुकाबले जांचो। क्या तुम वह व्यक्ति हो जो सही रास्ते पर आ चुका है? तुम किन मामलों में शैतान की बेड़ियों और शैतान के प्रभाव से मुक्त हो चुके हो? यदि तुम सही रास्ते पर आ चुके हो तब भी शैतान के साथ तुम्हारे संबंधों का टूटना बाकी है। इस तरह, क्या परमेश्वर के प्रेम की इस तलाश का निष्कर्ष एक ऐसे प्रेम के रूप में होगा जो प्रमाणिक, समर्पित, और शुद्ध हो? तुम कहते हो कि परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम दृढ़ और हार्दिक है, फिर भी तुम शैतान की बेड़ियों से अपने आपको मुक्त नहीं कर पाये हो। क्या तुम परमेश्वर को मूर्ख नहीं बना रहे हो? यदि तुम परमेश्वर के लिए विशुद्ध प्रेम प्राप्त करना चाहते हो, परमेश्वर को प्राप्त हो जाना चाहते हो और चाहते हो कि तुम राज्य के लोगों में गिने जाओ तो तुम्हें पहले खुद को सही रास्ते पर लाना होगा।

और पढ़ें:प्रभावी ईसाई प्रार्थना - अभ्यास के 4 तरीके - ईसाई धर्म के अनिवार्य तत्व

क्या आप पवित्र आत्मा के कार्य और शैतान के कार्य के बीच भेद कर सकते हैं? विवेक प्राप्त करना और आध्यात्मिक लड़ाई जीतना सीखने के लिए परमेश्वर के वचनों को पढ़ें।

स्रोत:[ सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया](https://hi.godfootsteps.org/what-viewpoint-believers-ought-to-hold-2.html)
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परमेश्वर के प्रकटन ने एक नए युग का सूत्रपात किया है

परमेश्वर के प्रकटन ने एक नए युग का सूत्रपात किया है

परमेश्वर के छह हज़ार साल की प्रबंधन योजना का अंत आ रहा है, और उसके राज्य का द्वार उन सभी के लिए खोल दिया गया है, जो परमेश्वर के प्रकट होने की खोज कर रहे हैं। प्रिय भाइयों और बहनों, तुम लोग किस बात की प्रतीक्षा कर रहे हो? ऐसा क्या है जिसकी तुम लोग खोज कर रहे हो? क्या तुम लोग परमेश्वर के प्रकट होने का इंतजार कर रहे हो? क्या तुम लोग परमेश्वर के पदचिन्हों की खोज कर रहे हो? परमेश्वर का प्रकट होना कितना इच्छित है! और परमेश्वर के पदचिन्हों को खोजना कितना मुश्किल है! एक ऐसे युग में, एक ऐसे संसार में, हमें परमेश्वर के प्रकट होने के दिन का गवाह बनने के लिए क्या करना चाहिए? हमें परमेश्वर के पदचिन्हों का अनुसरण करने के लिए क्या करना चाहिए? इस तरह के प्रश्नों का सामना वे सभी करते हैं जो परमेश्वर के प्रकट होने का इंतजार करते हैं। तुम लोगों ने उन सभी पर एक से अधिक अवसर पर विचार किया है — लेकिन किस परिणाम के साथ? परमेश्वर कहाँ प्रकट होता है? परमेश्वर के पदचिन्ह कहाँ हैं? क्या तुम लोगों को उत्तर मिला है? कई लोगों का उत्तर यह होगाः परमेश्वर उनके बीच में प्रकट होता है जो उसका अनुसरण करते हैं और उसके पदचिन्ह हमारे बीच में हैं; यह इतना आसान है! कोई भी व्यक्ति एक सूत्रबद्ध उत्तर दे सकता है, लेकिन क्या तुम लोग परमेश्वर के प्रकटीकरण को, और परमेश्वर के पदचिन्ह को समझते हो? परमेश्वर का प्रकट होना पृथ्वी पर कार्य करने के लिए उसके व्यक्तिगत आगमन को दर्शाता है। उसकी स्वयं की पहचान और स्वभाव के साथ, और उसकी निहित विधि में, वह एक युग की शुरुआत और एक युग के समाप्त होने के कार्य का संचालन करने के लिए मनुष्यों के बीच में उतरता है। इस प्रकार का प्रकट होना किसी समारोह का रूप नहीं है। यह एक संकेत नहीं है, एक चित्र, एक चमत्कार, या एक भव्यदर्शन नहीं है, और उससे भी कम यह एक धार्मिक प्रक्रिया भी नहीं है। यह एक असली और वास्तविक तथ्य है जिसको छुआ और देखा जा सकता है। इस तरह का प्रकट होना किसी प्रक्रिया का अनुसरण करने के लिए नहीं है, और न ही एक अल्पकालिक उपक्रम के लिए; बल्कि यह, उसकी प्रबंधन योजना में कार्य करने के स्तर के लिए है। परमेश्वर का प्रकट होना हमेशा अर्थपूर्ण होता है, और हमेशा उसकी प्रबंधन योजना से जुड़ा होता है। यह प्रकटीकरण परमेश्वर के मार्गदर्शन, नेतृत्व, और मनुष्य के ज्ञान के प्रकाशन से पूरी तरह से अलग है। परमेश्वर हर बार प्रकट होने पर कार्य के एक बड़े स्तर को क्रियान्वित करता है। यह कार्य किसी भी अन्य युग से अलग है। यह मनुष्य के लिए अकल्पनीय है, और इसे कभी भी मनुष्य ने अनुभव नहीं किया। यह वह कार्य है जो एक नए युग को शुरू करता है और पुराने युग का अंत करता है, और यह मानव जाति के उद्धार के लिए कार्य का एक नया और बेहतर रूप है; इसके अलावा, यह मानव जाति को नए युग में लाने का कार्य है। वह परमेश्वर के प्रकट होने का महत्व है।

परमेश्वर के प्रकट होने को समझने के समय पर, तुम लोगों को परमेश्वर के पदचिन्हों को कैसे ढूंढना चाहिए? इस प्रश्न की व्याख्या करना कठिन नहीं हैः जहाँ कहीं परमेश्वर का प्रकटन है, वहां तुम्हें परमेश्वर के पदचिन्ह मिलेंगे। इस तरह की व्याख्या बहुत सीधी लगती है, लेकिन करने के लिए बहुत आसान नहीं है, क्योंकि कई लोगों को नहीं पता कि परमेश्वर अपने आप को कहाँ प्रकट करता है, उससे भी कम कि कहाँ वह स्वयं प्रकट होना चाहता है या, उसे प्रकट होना चाहिए। कुछ आवेगशीलता से विश्वास करते हैं कि जहां पवित्र आत्मा का कार्य है, वहीं परमेश्वर का प्रकटन है। अन्यथा उनका यह मानना है कि जहां आध्यात्मिक मूर्तियां हैं, वहीं परमेश्वर का प्रकटन है। अन्यथा उनका यह मानना है कि जहां लोगों को अच्छी पहचान है, वहाँ परमेश्वर का प्रकट होना है। अभी के लिए, हम विचार विमर्श नहीं करते हैं कि ये मान्यताएं सही हैं या गलत हैं। इस तरह के प्रश्न की व्याख्या करने के लिए, हमारा पहले एक उद्देश्य के विषय में स्पष्ट होना अनिवार्य हैः हम परमेश्वर के पदचिन्हों को खोज रहे हैं। हम आध्यात्मिक व्यक्तियों को नहीं खोज रहे हैं, प्रसिद्ध मूर्तियों का अनुसरण तो बिल्कुल नहीं कर रहे हैं; हम परमेश्वर के पदचिन्हों का अनुसरण कर रहे हैं। वैसे, चूँकि हम परमेश्वर के पदचिन्हों को खोज रहे हैं, हमें अवश्य ही परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के वचन, परमेश्वर के कथन की खोज करनी चाहिए; क्योंकि जहां परमेश्वर के नए वचन हैं, वहाँ परमेश्वर की वाणी है, और जहां परमेश्वर के पदचिन्ह हैं, वहाँ परमेश्वर के कार्य हैं। जहां परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, वहाँ परमेश्वर का प्रकट होना है, और जहां परमेश्वर का प्रकट होना है, वहाँ मार्ग, सत्य और जीवन का अस्तित्व है। परमेश्वर के पदचिन्हों को ढूँढते हुए, तुम लोगों ने उन शब्दों की अवहेलना कर दी कि "परमेश्वर ही मार्ग, सत्य और जीवन है।" इसलिए कई लोग जब सत्य प्राप्त करते हैं, वे विश्वास नहीं करते कि वे परमेश्वर के पदचिन्हों को पा चुके हैं और बहुत कम परमेश्वर के प्रकट होने को स्वीकार करते हैं। कितनी गंभीर त्रुटि है यह! परमेश्वर के प्रकट होने का मनुष्य की धारणाओं के साथ समझौता नहीं किया जा सकता है, परमेश्वर का मनुष्य के आदेश पर दिखाई देना उस से भी कम संभव है। जब परमेश्वर अपना कार्य करता है तो वह अपने स्वयं के चुनाव करता है और अपनी स्वयं की योजनाएं बनाता है; इसके अलावा, उसके पास अपने ही उद्देश्य हैं, और अपने ही तरीके हैं। जो कार्य वह करता है उसे उस पर मनुष्य के साथ चर्चा करने की या मनुष्य की सलाह लेने की आवश्यकता नहीं है, और ना ही उसे अपने कार्य की हर एक व्यक्ति को सूचना देने की आवश्यकता है। यह परमेश्वर का स्वभाव है और, इससे बढ़कर, हर किसी को यह पहचानना चाहिए। यदि तुम लोग परमेश्वर के प्रकट होने को देखने की चाहत रखते हो, यदि तुम लोग परमेश्वर के पदचिन्हों का अनुसरण करने के इच्छुक हो, तो फिर तुम लोगों को पहले अपनी धारणाओं से ऊँचा उठना आवश्यक है। तुम लोगों को यह माँग नहीं करनी चाहिए कि परमेश्वर यह कार्य करे या वह करे, उससे भी कम तुझे उसे अपनी स्वयं की सीमा में रखना चाहिए और उसे अपनी स्वयं की धारणाओं में सीमित करना चाहिए। इसके बजाय, तुम लोगों को उससे यह पूछना चाहिए कि कैसे तुम लोग परमेश्वर के पदचिन्हों को खोज सकते हो, तुम लोगों को परमेश्वर के प्रकट होने को कैसे स्वीकार करना चाहिए, और कैसे तुम लोगो को परमेश्वर के नए कार्य के लिए समर्पण करना चाहिए; मनुष्य को यही कार्य करना चाहिए। चूँकिमनुष्य सत्य नहीं है, और न ही सत्य के अधीन है, इसलिए मनुष्य को खोज करनी, स्वीकार करना, और पालन करना चाहिए।

चाहे तू अमेरिकी, ब्रिटिश, या किसी भी अन्य राष्ट्रीयता का हो, तुझे अपने स्वयं के दायरे से बाहर आना चाहिए, तुझे स्वयं को पार करना चाहिए, और परमेश्वर की एक सृष्टि के रूप में परमेश्वर के कार्य को देखना चाहिए। इस तरीके से, तू परमेश्वर के पदचिन्हों पर रुकावट नहीं डाल पाएगा। क्योंकि, आज, कई लोग परमेश्वर के एक निश्चित देश या राष्ट्र में प्रकट होने को असंभव समझते हैं। परमेश्वर के कार्य का कितना गहरा महत्व है, और परमेश्वर का प्रकट होना कितना महत्वपूर्ण है! उन्हें कैसे मनुष्य की धारणाओं और सोच से मापा जा सकता है? और इसलिए मैं कहता हूँ, जब तू परमेश्वर के प्रकट होने को खोजता है तब तुझे अपनी राष्ट्रीयता या जातीयता की धारणाओं को तोड़ देना चाहिए। इस तरह, तू अपने स्वयं की धारणाओं से विवश नहीं हो पाएगा; इस तरह, तू परमेश्वर के प्रकट होने का स्वागत करने में सक्षम हो पाएगा। अन्यथा, तू हमेशा अन्धकार में रहेगा, और परमेश्वर की मंजूरी कभी हासिल नहीं कर पाएगा।

परमेश्वर सभी मानव जाति का परमेश्वर है। वह अपने आप को किसी भी देश या राष्ट्र की निजी संपत्ति नहीं बनाता है, और वह किसी भी रूप, देश, या राष्ट्र द्वारा बाधित हुए बिना अपनी योजना का कार्य करता है। शायद तूने इस रूप की कभी कल्पना भी नहीं की होगी, या शायद तू इसके अस्तित्व का इनकार करता है, या शायद उस देश या राष्ट्र के साथ, जिसमें परमेश्वर प्रकट होता है, भेदभाव किया जाता है और पृथ्वी पर सबसे कम विकसित माना जाता है। फिर भी परमेश्वर के पास उसकी बुद्धि है। उसकी शक्ति के द्वारा और उसकी सत्यता और स्वभाव के माध्यम से उसे ऐसे लोगों का समूह मिल गया है जो उसके साथ एक विचार के हैं। और उसे ऐसे लोगों का समूह मिल गया है जैसा वह बनाना चाहता थाः उसके द्वारा जीता गया एक समूह, जो अति पीड़ादायक दुख और सब प्रकार के अत्याचार को सह लेता है और अंत तक उसका अनुसरण कर सकता है। किसी भी रूप में या देश की बाधाओं से मुक्त हो कर परमेश्वर के प्रकट होने का उद्देश्य उसे उसकी योजना का कार्य पूरा करने में सक्षम होने के लिए है। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर यहूदिया में देहधारी हुआ, उसका लक्ष्य सूली पर चढ़ाये जाने के कार्य को पूरा करने के द्वारा सारी मानव जाति को पाप से मुक्त करना था। फिर भी यहूदियों का मानना था कि परमेश्वर के लिए ऐसा करना असंभव था, और उन्होंने सोचा कि परमेश्वर के लिए देहधारी होना और प्रभु यीशु के रूप में होना असंभव है। उनका "असंभव" एक ऐसा आधार बन गया जिसके द्वारा उन्होंने परमेश्वर को अपराधी ठहराया और विरोध किया, और अंत में इस्राएल को विनाश की ओर ले गए। आज, कई लोगों ने उसी प्रकार की गलती की है। वे परमेश्वर के किसी भी क्षण आ जाने का प्रचार बहुत हल्के रूप में करते हैं, साथ ही वे उसके प्रकट होने को गलत भी ठहराते हैं; उनका "असंभव" एक बार फिर परमेश्वर के प्रकट होने को उनकी कल्पना की सीमाओं के भीतर सीमित करता है। और इसलिये मैंने कई लोगों को परमेश्वर के शब्दों को सुनने के बाद उन पर हँसने की गलती करते हुए देखा है। क्या यह हँसी यहूदियों द्वारा अपराधी ठहराने और निन्दा करने से अलग है? तुम लोग सच का सामना करने में गम्भीर नहीं हो, उससे भी कम सच के लिए इच्छा और भी कम रखते हो। तुम लोग केवल आँख बंद करके अध्ययन करते हो और उदासीनता पूर्वक प्रतीक्षा करते हो। तुम लोग इस तरह पढ़कर और प्रतीक्षा करके क्या प्राप्त कर सकते हो? क्या तुम लोग परमेश्वर का व्यक्तिगत मार्गदर्शन पा सकते हो? यदि तू परमेश्वर के कथनों को ही नहीं पहचान सकता है, तो तू परमेश्वर के प्रकट होने को देखने के योग्य कैसे हो सकता है? जहाँ परमेश्वर प्रकट होता है, वहाँ सत्य की अभिव्यक्ति है, और वहाँ परमेश्वर की वाणी है। केवल वे ही लोग, जो सत्य को स्वीकार कर सकते हैं परमेश्वर की वाणी सुन सकते हैं, और केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के प्रकट होने को देखने के योग्य हैं। अपनी धारणाओं को एक तरफ रख दो! रुको और ध्यान से इन शब्दों को पढ़ो। यदि तू सच के लिए तीव्र इच्छा रखता है, तो परमेश्वर तुझे उसकी इच्छा और शब्दों को समझने के लिए प्रकाशमान करेगा। अपने "असंभव" के विचार को एक तरफ रखो! जितना अधिक लोग यह मानते हैं कि कुछ असंभव है, उतना ही अधिक उसके घटित होने की संभावना है, क्योंकि परमेश्वर की बुद्धि स्वर्ग से भी ऊँची उड़ान भरती है, परमेश्वर के विचार मनुष्य के विचारों की तुलना में ऊँचे हैं, और परमेश्वर का कार्य मनुष्य की सोच और धारणा की सीमा से कहीं ऊँचा होता है। जितना अधिक कुछ असंभव है, उतना अधिक वहाँ सच्चाई को खोजने की आवश्यकता है; जितना अधिक वह मनुष्य की धारणा और कल्पना से परे है, उतना ही अधिक उस में परमेश्वर की इच्छा समाहित होती है। क्योंकि परमेश्वर स्वयं को चाहे जहां भी प्रकट करे, परमेश्वर फिर भी परमेश्वर है, और उसके स्थान और उसके प्रकट होने के तरीकों के कारण उसका तत्व कभी नहीं बदलेगा। उसके पदचिन्ह चाहे कहीं भी क्यों न हों परमेश्वर का स्वभाव एक जैसा बना रहता है। चाहे जहां कहीं भी परमेश्वर के पदचिन्ह क्यों न हों, वह सभी मानव जाति का परमेश्वर है। उदाहरण के लिए, प्रभु यीशु केवल इस्राएलियों का परमेश्वर नहीं है, बल्कि एशिया, यूरोप और अमेरिका में सभी लोगों का परमेश्वर है, और यहां तक कि पूरे ब्रह्मांड में सिर्फ वो ही परमेश्वर है। इसलिए, हम परमेश्वर के कथनों से परमेश्वर की इच्छा की और उसके प्रकट होने की खोज करें और उसके पदचिन्हों का अनुसरण करें! परमेश्वर ही मार्ग, सत्य और जीवन है। उसके वचन और उसका प्रकट होना समवर्ती है, और उसका स्वभाव और पदचिन्ह हमेशा मानव जाति के लिए उपलब्ध रहेंगे। प्रिय भाइयों और बहनों, मुझे आशा है कि तुम लोग इन शब्दों में परमेश्वर के प्रकट होने को देख सकते हो, और तुम लोग उसके पदचिन्हों का अनुसरण करना शुरू कर दोगे, एक नए युग की ओर और एक सुंदर नए आकाश और नई पृथ्वी में प्रवेश कर सकोगे जो परमेश्वर के प्रकट होने की प्रतीक्षा करनेवालों के लिए तैयार किए गए हैं।

स्रोत सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया:परमेश्वर के प्रकटन ने एक नए युग का सूत्रपात किया है

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प्रार्थना की शक्ति, लोगों को निराशा में चमत्कार दिखाई देने की सच्ची कहानियां।

मसीह के कथन "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX" (भाग दो के क्रम में)

**मसीह के कथन "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है (III)" (भाग दो के क्रम में)

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[सर्वशक्तिमान परमेश्वर

](https://hi.godfootsteps.org/about-us.html)अर्थ होगा कि लोगों का जीवन, अर्थात् देह में लोगों का जीवन लुप्त हो जाएगा।

यह मानवजाति के लिए जीवित रहने हेतु परमेश्वर द्वारा स्थापित विभिन्न वातावरण का महत्व है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि तुम किस जाति के हो या तुम भूमि के किस हिस्से पर रहते हो, चाहे पश्चिम में हो या पूर्व में- तुम जीवित रहने के लिए उस वातावरण से अपने आपको अलग नहीं कर सकते हो जिसे परमेश्वर ने मानवजाति के लिए स्थापित किया है, और तुम जीवित रहने के लिए उस वातावरण के पोषण और प्रयोजनों से अपने आपको अलग नहीं कर सकते हो जिसे उसने मनुष्यों के लिए स्थापित किया है। कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारी आजीविका क्या है, तुम जीने के लिए किस पर आश्रित हो, और देह में अपने जीवन को बनाए रखने के लिए तुम किस पर आश्रित हो, क्योंकि तुम स्वयं को परमेश्वर के शासन और प्रबंधन से अलग नहीं कर सकते हो।"

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" (भाग दो)

**परमेश्वर के वचन "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" (भाग दो)

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सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "उसके कार्य में कोई निषेधात्मकता नहीं है, और किसी मनुष्य, चीज़ या पदार्थ के द्वारा उसे बाध्य नहीं किया जाएगा, और उसे किसी प्रचण्ड शक्ति के द्वारा छिन्न भिन्न नहीं किया जाएगा। अपने इस नए कार्य में, वह सर्वदा के लिए एक विजयी राजा है, और किसी भी प्रकार की प्रचण्ड ताकतों और झूठी शिक्षाओं और मानव की अशुद्धियों को उसके चरणों की चौकी के नीचे कुचल दिया गया है। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह अपने कार्य के किस नए स्तर पर काम कर रहा है, इसे मानव जाति के बीच में विकसित एवं विस्तारित करना होगा, उसे समूचे विश्व में तब तक बिना किसी बाधा के पूरा करना होगा जब तक उसका महान कार्य पूर्ण ना हो जाए। यह परमेश्वर की सर्वसामर्थता और बुद्धिमत्ती है, और उस का अधिकार और सामर्थ है।"

परमेश्वर के वचनो ने उन सत्यो को उजागर किया हैं जिसे हमें समझने की आवशकता हैं, और अधिक वीडियो देखने के लिए हमारे आधिकारिक वेबसाइट पर आपका स्वागत है।
प्रार्थना का महत्व - प्रार्थना की उपेक्षा न करें

Hindi Christian Movie | स्वप्न से जागृति | Revealing the Mystery of Entering the Kingdom of Heaven

**Hindi Christian Movie | स्वप्न से जागृति | Revealing the Mystery of Entering the Kingdom of Heaven

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यू फान भी प्रभु यीशु में विश्वास करने वाले अन्य बहुतेरे लोगों के समान ही हैं—उन्हें लगता है कि प्रभु यीशु को जब सूली पर चढ़ाया गया , तो उन्होंने पहले ही इंसान के पापों को क्षमा कर दिया था। उन्हें लगता है कि अपनी आस्था के कारण उन्होंने धार्मिकता पाई है और यदि वे सर्वस्व त्यागकर प्रभु के लिये कड़ी मेहनत करेंगी, तो प्रभु यीशु के लौटन पर वे निश्चित रूप से स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर पाएंगी। लेकिन उनके सहकर्मियों को संदेह है: प्रभु में हमारी आस्था के कारण हमें क्षमा कर दिया गया है, हम प्रभु के लिये त्याग और खुद को व्यय कर सकते हैं, लेकिन अक्सर पाप और प्रभु का विरोध करते रहते हैं। क्या हम इस प्रकार सचमुच स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं? ... अंतत: जब यू फान सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के गवाहों से संगति और िचार-विमर्श करती हैं,

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प्रार्थना की क्रिया के विषय में

प्रार्थना की क्रिया के विषय में

**प्रार्थना की क्रिया के विषय में

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प्रतिदिन के जीवन में तुम प्रार्थना पर बिलकुल ध्यान नहीं देते। लोगों ने प्रार्थना को सदैव नजरअंदाज किया है। अपनी प्रार्थनाओं में वे ऐसे ही इधर-उधर घूमते हैं और ऊपरी तौर पर कार्य करते हैं, और किसी ने भी कभी परमेश्वर के समक्ष पूरी रीति से अपने हृदय को समर्पित नहीं किया है और न ही परमेश्वर से सच्चाई से प्रार्थना की है। लोग परमेश्वर से तभी प्रार्थना करते हैं जब उनके साथ कुछ घटित हो जाता है। इन सारे समयों के दौरान, क्या तुमने कभी सच्चाई के साथ परमेश्वर से प्रार्थना की है? क्या तुमने कभी पीड़ा के आँसुओं को परमेश्वर के सामने बहाया है? क्या तुमने कभी परमेश्वर के सामने स्वयं को पहचाना है? क्या तुमने कभी परमेश्वर के साथ हृदय से हृदय मिलाते हुए प्रार्थना की है? प्रार्थना का अभ्यास धीरे-धीरे किया जाता है: यदि तुम सामान्य रीति से घर पर प्रार्थना नहीं करते हो, तब तुम्हारा कलीसिया में प्रार्थना करने का कोई अर्थ नहीं होगा, और यदि तुम छोटी-छोटी सभाओं में सामान्य रीति से प्रार्थना नहीं करते हो, तो बड़ी-बड़ी सभाओं में प्रार्थना करने में भी असमर्थ होगे। यदि तुम सामान्य रीति से परमेश्वर के निकट नहीं आते या परमेश्वर के वचनों पर मनन नहीं करते हो, तो तुम्हारे पास तब कहने के लिए कुछ भी नहीं होगा जब प्रार्थना का समय होगा - और यदि तुम प्रार्थना करते भी हो, तो बस तुम्हारे होंठ ही हिलते रहेंगे, तुम सच्चाई से प्रार्थना नहीं कर रहे होगे।

सच्चाई के साथ प्रार्थना करने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है अपने हृदय में शब्दों को कहना, और परमेश्वर की इच्छा को समझकर और उसके वचनों पर आधारित होकर परमेश्वर के साथ वार्तालाप करना; इसका अर्थ है विशेष रूप से परमेश्वर के निकट महसूस करना, यह महसूस करना कि वह तुम्हारे सामने है, और कि तुम्हारे पास उससे कहने के लिए कुछ है; और इसका अर्थ है अपने हृदय में विशेष रूप से प्रज्ज्वलित या प्रसन्न होना, और यह महसूस करना कि परमेश्वर विशेष रूप से मनोहर है। तुम विशेष रूप से प्रेरणा से भरे हुए महसूस करोगे, और तुम्हारे शब्दों को सुनने के बाद तुम्हारे भाई और तुम्हारी बहनें आभारी महसूस करेंगे, वे महसूस करेंगे कि जो शब्द तुम बोलते हो वे उनके हृदय के भीतर के शब्द हैं, वे ऐसे शब्द हैं जो वे कहना चाहते हैं, और जो तुम कहते हो वह वही है जो वे कहना चाहते हैं। सच्चाई के साथ प्रार्थना करने का अर्थ यही है। सच्चाई के साथ प्रार्थना करने के बाद, अपने हृदय में तुम शांतिपूर्ण, और आभारी महसूस करोगे; परमेश्वर से प्रेम करने की सामर्थ्य बढ़ जाएगी, और तुम महसूस करोगे कि तुम्हारे जीवन में परमेश्वर से प्रेम करने से अधिक योग्य और महत्वपूर्ण कुछ नहीं है - और यह सब प्रमाणित करेगा कि तुम्हारी प्रार्थनाएँ प्रभावशाली रही हैं। क्या तुमने कभी इस तरह से प्रार्थना की है?

और प्रार्थना की विषय-वस्तु के बारे में क्या? तुम्हें अपनी सच्ची दशा के अनुसार चरण दर चरण प्रार्थना करनी चाहिए, और यह पवित्र आत्मा के द्वारा होनी चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर की इच्छा और मनुष्य के लिए उसकी माँगों को पूरा करते हुए परमेश्वर के साथ वार्तालाप करनी चाहिए। जब तुम अपनी प्रार्थनाओं का अभ्यास करना आरंभ करते हो तो सबसे पहले अपना हृदय परमेश्वर को दो। परमेश्वर की इच्छा को समझने का प्रयास न करो; केवल परमेश्वर से अपने हृदय की बातों को कहने की कोशिश करो। जब तुम परमेश्वर के सामने आते हो तो इस प्रकार कहो : "हे परमेश्वर! केवल आज ही मैंने यह महसूस किया है कि मैं तेरी आज्ञा का उल्लंघन किया करता था। मैं पूरी तरह से भ्रष्ट और घृणित हूँ। पहले मैं अपने समय को बर्बाद कर रहा था; आज से मैं तेरे लिए जीऊँगा। मैं अर्थपूर्ण जीवन जीऊँगा, और तेरी इच्छा को पूरी करूँगा। मैं जानता हूँ कि तेरा आत्मा सदैव मेरे भीतर कार्य करता है, और सदैव मुझे प्रज्ज्वलित और प्रकाशित करता है, ताकि मैं तेरे समक्ष प्रभावशाली और मजबूत गवाही दे सकूँ, जिससे मैं हमारे भीतर शैतान को तेरी महिमा, तेरी गवाही और तेरी विजय दिखाऊँ।" जब तुम इस तरह से प्रार्थना करते हो, तो तुम्हारा हृदय पूरी तरह से स्वतंत्र हो जाएगा, इस प्रकार से प्रार्थना कर लेने के बाद तुम्हारा हृदय परमेश्वर के निकट होगा, और इस प्रकार से अक्सर प्रार्थना करने के द्वारा पवित्र आत्मा तुम्हारे भीतर अवश्य कार्य करेगा। यदि तुम इस तरह से सदैव परमेश्वर को पुकारोगे और परमेश्वर के समक्ष अपने दृढ़ निश्चय को रखोगे तो ऐसा दिन आएगा जब तुम्हारा दृढ़ निश्चय परमेश्वर के सामने स्वीकार हो सकता है, जब तुम्हारा हृदय और संपूर्ण अस्तित्व परमेश्वर के द्वारा स्वीकार कर लिया जाएगा, तब तुम अंततः परमेश्वर के द्वारा सिद्ध कर दिए जाओगे। प्रार्थना तुम लोगों के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। जब तुम प्रार्थना करते हो, तुम पवित्र आत्मा के कार्य को ग्रहण करते हो, इस प्रकार तुम्हारा हृदय परमेश्वर के द्वारा स्पर्श किया जाता है, और तुम्हारे भीतर परमेश्वर से किए जाने वाले प्रेम का सामर्थ्य सामने आ जाता है। यदि तुम अपने हृदय से प्रार्थना नहीं करते, यदि तुम परमेश्वर से वार्तालाप करने के लिए अपने हृदय को नहीं खोलते, तब परमेश्वर के पास तुम्हारे हृदय में कार्य करने का कोई तरीका नहीं होगा। यदि तुमने प्रार्थना करते हुए अपने हृदय के सभी शब्दों को बोल दिया है और पवित्र आत्मा द्रवित नहीं हुआ है, यदि तुम अपने भीतर प्रेरित महसूस नहीं करते, तो यह दिखाता है कि तुम्हारा हृदय गंभीर नहीं है, कि तुम्हारे शब्द सच्चे नहीं हैं, और अभी भी अशुद्ध हैं। यदि प्रार्थना करते हुए तुम आभारी होते हो, तब तुम्हारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के द्वारा स्वीकार की जा चुकी हैं और परमेश्वर का आत्मा तुम्हारे भीतर कार्य कर चुका है। परमेश्वर के समक्ष सेवा करने वाले एक व्यक्ति के रूप में तुम प्रार्थनाओं के बिना नहीं रह सकते। यदि तुम परमेश्वर के साथ संगति को सचमुच अर्थपूर्ण और महत्वपूर्ण रूप में देखते हो, तो क्या तुम प्रार्थना को त्याग सकते हो? परमेश्वर के साथ वार्तालाप करने के बिना कोई नहीं रह सकता। प्रार्थना के बिना तुम देह में रहते हो, तुम शैतान के बंधन में रहते हो; सच्ची प्रार्थना के बिना, तुम अंधकार के प्रभाव तले रहते हो। मैं आशा करता हूँ कि भाई और बहन प्रत्येक दिन सच्चाई के साथ प्रार्थना करने के योग्य हैं। यह किसी धर्मसिद्धांत का पालन करना नहीं है, परंतु एक ऐसा प्रभाव है जिसे पूरा किया जाना चाहिए। क्या तुम थोड़ी सी नींद और आनंद को त्यागने के लिए तैयार हो, भोर को ही सुबह की प्रार्थना करने और फिर परमेश्वर के वचनों का आनंद लेने के द्वारा? यदि इस तरह से तुम शुद्ध हृदय के साथ परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हो तो तुम परमेश्वर के द्वारा और अधिक स्वीकार किए जाओगे। यदि तुम इसे हर दिन करते हो, हर दिन अपने हृदय को परमेश्वर को देने का अभ्यास करते हो और परमेश्वर के साथ वार्तालाप करते हो, तो परमेश्वर के प्रति तुम्हारा ज्ञान निश्चित रूप से बढ़ जाएगा, और परमेश्वर की इच्छा को बेहतर रीति से समझ पाओगे। तुम्हें कहना चाहिए: "हे परमेश्वर! मैं अपने कर्त्तव्य को पूरा करना चाहता हूँ। इसलिए कि तू हम में महिमा को प्राप्त करे, और हम में, लोगों के इस समूह में गवाही का आनंद ले, मैं बस यह कर सकता हूँ कि अपने संपूर्ण अस्तित्व को तेरे प्रति भक्तिमय रूप में समर्पित कर दूँ। मैं तुझसे विनती करता हूँ कि तू हम में कार्य कर, ताकि मैं सच्चाई के साथ तुझसे प्रेम कर सकूँ और तुझे संतुष्ट कर सकूँ, और तुझे वह लक्ष्य बना सकूँ जिसको मैं पाना चाहता हूँ।" जब तुम में यह बोझ होगा, तो परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हें सिद्ध बनाएगा; तुम्हें केवल अपने लिए ही प्रार्थना नहीं करनी चाहिए, बल्कि परमेश्वर की इच्छा को पूरी करने के लिए भी, और परमेश्वर से प्रेम करने के लिए भी। ऐसी प्रार्थना सबसे सच्ची प्रार्थना होती है। क्या तुम परमेश्वर की इच्छा को पूरी करने के लिए प्रार्थना करते हो?

पहले तुम लोग नहीं जानते थे कि प्रार्थना कैसे करें, और तुमने प्रार्थना को नजरअंदाज कर दिया था, तुम लोगों को स्वयं को प्रार्थना में प्रशिक्षित करने के लिए अपना सर्वोत्तम करना आवश्यक है। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम करने में अपने आंतरिक बल को बाहर नहीं निकाल सकते, तो तुम प्रार्थना कैसे कर सकते हो? तुम्हें कहना चाहिए: "हे परमेश्वर! मेरा हृदय तुझसे सच्चाई के साथ प्रेम करने में असमर्थ है, मैं तुझसे प्रेम करना चाहता हूँ परंतु मुझ में बल की कमी है। मुझे क्या करना चाहिए? मैं चाहता हूँ कि तू मेरी आत्मा की आँखें खोल दे, मैं चाहता हूँ कि तेरा आत्मा मेरे हृदय को स्पर्श करे, ताकि मैं तेरे समक्ष सारी निष्क्रिय अवस्थाओं से रहित हो जाऊँ, और किसी भी व्यक्ति, विषय, या वस्तु के अधीन न रहूँ; मैं अपने हृदय को तेरे समक्ष पूरी तरह से खोल कर रख देता हूँ, इस प्रकार से कि मेरा पूरा अस्तित्व तेरे समक्ष समर्पित हो जाए, और तू मुझे वैसे ही परख सके जैसे तू चाहता है। अब मैं भावी संभावनाओं को कोई विचार नहीं देता, और न ही मृत्यु के बंधन में हूँ। मेरे उस हृदय का प्रयोग करते हुए जो तुझसे प्रेम करता है, मैं जीवन के मार्ग को खोजना चाहता हूँ। सारी बातें और घटनाएँ तेरे हाथों में हैं, मेरी नियति तेरे हाथों में है, और इससे बढ़कर, मेरा जीवन तेरे हाथों के नियंत्रण में है। अब मैं तुम्हारे प्रेम का अनुसरण करता हूँ, और इस बात की परवाह न करते हुए कि क्या तू मुझे अपने से प्रेम करने देगा, इस बात की परवाह न करते हुए कि शैतान कैसे हस्तक्षेप करेगा, मैं तुझसे प्रेम करने के प्रति दृढ़ हूँ।" जब तुम ऐसी बातों का सामना करते हो, तो तुम इस तरह से प्रार्थना करते हो। यदि तुम प्रतिदिन ऐसा करते हो, तो परमेश्वर से प्रेम करने का बल धीरे-धीरे बढ़ता जाएगा।

किस प्रकार कोई सच्ची प्रार्थना में प्रवेश करता है?

प्रार्थना करते हुए तुम्हारा हृदय परमेश्वर के समक्ष शांतिपूर्ण होना चाहिए, और यह सच्चा होना चाहिए। तुम सच्चाई के साथ परमेश्वर से वार्तालाप कर रहे होते हो और उससे प्रार्थना कर रहे होते हो; तुम्हें अच्छे-अच्छे शब्दों का प्रयोग करते हुए परमेश्वर को धोखा नहीं देना चाहिए। प्रार्थना उसके इर्द-गिर्द केंद्रित होती है जिसे परमेश्वर आज पूरा करना चाहता है। परमेश्वर से प्रार्थना करो कि वह तुम्हारे लिए और बड़े प्रकाशन और प्रज्ज्वलन को लेकर आए, और तुम परमेश्वर के समक्ष प्रार्थना के लिए अपनी वास्तविक अवस्था और समस्याओं को लेकर आओ, और परमेश्वर के समक्ष दृढ़ निश्चय करो। प्रार्थना किसी प्रक्रिया का अनुसरण करना नहीं, बल्कि अपने सच्चे हृदय का इस्तेमाल करते हुए परमेश्वर को खोजना है। प्रार्थना करो कि परमेश्वर तुम्हारे हृदय की सुरक्षा करे, और इसे अक्सर परमेश्वर के समक्ष शांतिपूर्ण बनाए, तुम्हें योग्य बनाए कि तुम स्वयं को जान सको, और स्वयं का तिरस्कार कर सको, और उस वातावरण में स्वयं को त्याग सको जिसे परमेश्वर ने तुम्हारे लिए निर्धारित किया है, और इस प्रकार वह तुम्हें परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध रखने की अनुमति दे और एक ऐसा व्यक्ति बनाए जो परमेश्वर से सच्चाई से प्रेम करता है।

प्रार्थना का महत्व क्या है?

प्रार्थना एक ऐसा तरीका है जिसमें मनुष्य परमेश्वर के साथ सहयोग करता है, यह एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर को पुकारता है, और यह ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य को परमेश्वर के आत्मा के द्वारा स्पर्श किया जाता है। यह कहा जा सकता है कि जो प्रार्थनारहित होते हैं वे आत्मा के बिना मृत लोग होते हैं, और यह इसका प्रमाण है कि उनमें परमेश्वर के द्वारा स्पर्श को पाने की क्षमताओं की कमी होती है। प्रार्थना के बिना वे एक सामान्य आत्मिक जीवन को प्राप्त नहीं कर सकते, वे पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करने के योग्य भी नहीं बन पाते; प्रार्थना के बिना वे परमेश्वर के साथ अपने संबंध को तोड़ देते हैं, और वे परमेश्वर के अनुमोदन को प्राप्त करने में अयोग्य हो जाते हैं। एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जो परमेश्वर पर विश्वास करता है, जितना अधिक तुम प्रार्थना करते हो, उतना अधिक तुम परमेश्वर के द्वारा स्पर्श को प्राप्त करते हो। ऐसे व्यक्तियों के पास दृढ़ निश्चय होता है और वे परमेश्वर की ओर से नवीनतम प्रकाशन को प्राप्त करने के अधिक योग्य होते हैं; परिणामस्वरूप, इस प्रकार के लोग ही पवित्र आत्मा के द्वारा जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी सिद्ध किए जा सकते हैं।

प्रार्थना के द्वारा किस प्रभाव को प्राप्त किया जाता है?

लोग प्रार्थना के कार्य को करने और प्रार्थना के महत्व को समझने में सक्षम हैं, परंतु प्रार्थना के द्वारा प्राप्त किया जाने वाला प्रभाव कोई साधारण विषय नहीं है। प्रार्थना औपचारिकताओं से होकर जाने, या प्रक्रिया का अनुसरण करने, या परमेश्वर के वचनों का उच्चारण करने का विषय नहीं है, कहने का अर्थ यह है कि प्रार्थना का अर्थ शब्दों को रटना और दूसरों की नकल करना नहीं है। प्रार्थना में तुम्हें अपना हृदय परमेश्वर को देना आवश्यक है, जिसमें अपने हृदय में परमेश्वर के साथ वचनों को बांटा जाता है ताकि तुम परमेश्वर के द्वारा स्पर्श किए जाओ। यदि तुम्हारी प्रार्थनाओं को प्रभावशाली होना है तो उन्हें तुम्हारे द्वारा परमेश्वर के वचनों के पढ़े जाने पर आधारित होना आवश्यक है। परमेश्वर के वचनों के मध्य में प्रार्थना करने के द्वारा ही तुम और अधिक प्रकाशन और प्रज्ज्वलन को प्राप्त कर सकोगे। एक सच्ची प्रार्थना एक ऐसे हृदय को रखने के द्वारा ही दर्शाई जाती है जो परमेश्वर के द्वारा रखी माँगों की लालसा रखता है, और इन माँगों को पूरा करने की इच्छा रखने के द्वारा तुम उन सब बातों से घृणा कर पाओगे जिनसे परमेश्वर घृणा करता है, उसी के आधार पर तुम्हें ज्ञान प्राप्त होगा, और परमेश्वर के द्वारा स्पष्ट किए गए सत्यों को जानोगे और उनके विषय में स्पष्ट हो जाओगे। दृढ़ निश्चय, और विश्वास, और ज्ञान, और उस मार्ग को प्राप्त करना, जिसके द्वारा प्रार्थना के पश्चात् अभ्यास किया जाता है, ही सच्चाई के साथ प्रार्थना करना है, केवल ऐसी प्रार्थना ही प्रभावशाली हो सकती है। फिर भी प्रार्थना की रचना परमेश्वर के वचनों का आनंद लेने और परमेश्वर के वचनों में उसके साथ वार्तालाप करने की बुनियाद पर होनी चाहिए, इससे तुम्हारा हृदय परमेश्वर को खोजने और परमेश्वर के समक्ष शांतिपूर्ण बनने में सक्षम होगा। ऐसी प्रार्थना परमेश्वर के साथ सच्ची वार्तालाप के बिंदु तक पहले ही पहुँच चुकी है।

प्रार्थना करने के विषय में आधारभूत ज्ञान:

  1. बिना सोचे-समझे वह सब न कहो जो मन में आता है। तुम्हारे हृदय में एक बोझ होना आवश्यक है, कहने का अर्थ है कि जब तुम प्रार्थना करो तो एक लक्ष्य होना चाहिए।

  2. तुम्हारी प्रार्थनाओं में परमेश्वर के वचन होने चाहिए; वे परमेश्वर के वचनों पर आधारित होनी चाहिए।

  3. प्रार्थना करते समय तुम पुरानी बातों पर बने नहीं रह सकते; तुम्हें उन बातों को नहीं लाना चाहिए जो पुरानी हो चुकी हैं। तुम्हें विशेष रीति से स्वयं को तैयार करना है कि तुम पवित्र आत्मा के वास्तविक शब्दों को कहो; केवल तभी तुम परमेश्वर के साथ एक संबंध बना सकोगे।

  4. सामूहिक प्रार्थना एक सार पर केंद्रित होनी चाहिए, जो आज पवित्र आत्मा का कार्य होना चाहिए।

  5. सब लोगों को सीखना आवश्यक है कि दूसरों के लिए प्रार्थना कैसे करें। उन्हें परमेश्वर के वचनों में उस भाग को ढूँढना चाहिए जिसके लिए वे प्रार्थना करना चाहते हैं, उसी पर आधारित होकर उनमें एक बोझ होना चाहिए, और उसी के लिए उन्हें अक्सर प्रार्थना करनी चाहिए। यह परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने का एक प्रकटीकरण है।

व्यक्तिगत प्रार्थना जीवन प्रार्थना के महत्व और प्रार्थना के आधारभूत ज्ञान को समझने पर आधारित है। मनुष्य को अक्सर अपने दैनिक जीवन की अपनी गलतियों के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, और परमेश्वर के वचनों के ज्ञान के आधार पर प्रार्थना करनी चाहिए ताकि वह अपने जीवन के स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त कर सके। प्रत्येक व्यक्ति को अपना प्रार्थना जीवन स्थापित करना चाहिए, उन्हें परमेश्वर के वचनों पर आधारित ज्ञान के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, उन्हें परमेश्वर के कार्य के ज्ञान को खोजने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। परमेश्वर के समक्ष अपनी वास्तविक परिस्थितियों को रख दो, और व्यावहारिक बनो, और विधि पर ध्यान न दो; मुख्य बात एक सच्चे ज्ञान को प्राप्त करना है, और वास्तव में परमेश्वर के वचनों का अनुभव करना है। जो कोई भी आत्मिक जीवन में प्रवेश करना चाहता है, उसे कई तरीकों से प्रार्थना करने में योग्य होना आवश्यक है। शांत प्रार्थना, परमेश्वर के वचनों पर मनन करना, परमेश्वर के काम को जानना, इत्यादि - वार्तालाप का यह लक्षित कार्य सामान्य आत्मिक जीवन में प्रवेश प्राप्त करने के लिए है, जिससे परमेश्वर के समक्ष तुम्हारी परिस्थिति और अधिक बेहतर होगी, और इससे तुम्हारे जीवन में और अधिक उन्नति प्राप्त होगी। सारांश में, तुम जो कुछ भी करते हो - चाहे यह परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना हो, या शांत रूप में प्रार्थना करना या ऊँची आवाज में घोषणा करना हो - यह परमेश्वर के वचनों को और उसके कार्यों को, और उसको स्पष्ट रूप से देखने के लिए है जिसे वह तुम में पूरा करना चाहता है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण, यह उन स्तरों तक पहुँचने के लिए है जिनकी परमेश्वर माँग करता है और जो तुम्हारे जीवन को अगले स्तर तक लेकर जाने के लिए है। परमेश्वर द्वारा लोगों से माँग किया जाने वाला सबसे निम्नतम स्तर यह है कि वे अपने हृदयों को परमेश्वर के प्रति खोल सकें। यदि मनुष्य अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दे दे और परमेश्वर से वह कहे जो वास्तव में उसके हृदय में परमेश्वर के लिए है, तो परमेश्वर मनुष्य में कार्य करने के लिए तैयार है; परमेश्वर मनुष्य का विकृत हृदय नहीं चाहता, बल्कि उसका शुद्ध और खरा हृदय चाहता है। यदि मनुष्य सच्चाई के साथ परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय से नहीं बोलता है, तो परमेश्वर मनुष्य के हृदय को स्पर्श नहीं करता या उसके भीतर कार्य नहीं करता। इस प्रकार, प्रार्थना करने के विषय में सबसे महत्वपूर्ण बात अपने सच्चे हृदय के शब्दों को परमेश्वर से बोलना है, परमेश्वर को अपनी कमियों या विद्रोही स्वभाव के बारे में बताना है और संपूर्ण रीति से स्वयं को परमेश्वर के समक्ष खोल देना है। केवल तभी परमेश्वर तुम्हारी प्रार्थनाओं में रूचि रखेगा; यदि नहीं, तो परमेश्वर अपने चेहरे को तुमसे छिपा लेगा। प्रार्थना के लिए निम्नतम मापदंड यह है कि तुम अपने हृदय को परमेश्वर के समक्ष शांतिपूर्ण बनाए रख सको, और यह परमेश्वर से दूर न हो। शायद इस दौरान तुमने किसी नए या उच्च दृष्टिकोण को प्राप्त न किया हो, परंतु तुम्हें बातों को यथावत बनाए रखने के लिए प्रार्थना का प्रयोग करना चाहिए - तुम पीछे नहीं लौट सकते। यह वह सबसे निम्नतम है जिसे तुम्हें प्राप्त करना आवश्यक है। यदि तुम इतना भी पूरा नहीं कर सकते, तो यह प्रमाणित करता है कि तुम्हारे आत्मिक जीवन ने सही मार्ग पर प्रवेश नहीं किया है; इसके परिणामस्वरूप तुम अपने मूल दर्शन पर और परमेश्वर पर विश्वास की ऊँचाई पर बने नहीं रह सकते, और तुम्हारा दृढ़ निश्चय इसके बाद अदृश्य हो जाता है। आत्मिक जीवन में तुम्हारा प्रवेश इस बात से चिह्नित होता है कि क्या तुम्हारी प्रार्थनाओं ने सही मार्ग में प्रवेश किया है या नहीं। सब लोगों को इस वास्तविकता में प्रवेश करना आवश्यक है, उन सबको प्रार्थना में स्वयं को सचेत रूप से प्रशिक्षित करने का कार्य करना आवश्यक है, वे निष्क्रिय रूप से प्रतीक्षा न करें, बल्कि पवित्र आत्मा के द्वारा स्पर्श किए जाने के लिए सचेत रूप में प्रयास करें। केवल तभी वे ऐसे लोग बन पाएँगे जो सच्चाई के साथ परमेश्वर को खोजते हैं।

जब तुम प्रार्थना करना आरंभ करते हो तो यथार्थवादी बनो, और महत्वाकांक्षी बनकर स्वयं को असफल न कर दो; तुम जरुरत से अधिक माँगों को नहीं रख सकते, यह आशा करते हुए कि जैसे तुम अपना मुँह खोलोगे तभी तुम्हें पवित्र आत्मा का स्पर्श मिल जाएगा, तुम प्रकाशित और प्रज्ज्वलित हो जाओगे एवं अधिक अनुग्रह को प्राप्त करोगे। यह असंभव है - परमेश्वर ऐसे कार्य नहीं करता जो अलौकिक हों। परमेश्वर लोगों की प्रार्थनाओं को अपने समय से पूरा करता है और कभी-कभी वह यह देखने के लिए तुम्हारे विश्वास को परखता है कि क्या तुम उसके समक्ष वफादार हो या नहीं। जब तुम प्रार्थना करते हो तो तुम में विश्वास, धीरज, और दृढ़ निश्चय होना आवश्यक है। जब वे प्रार्थना के लिए स्वयं को प्रशिक्षित करना आरंभ करते हैं, तो अधिकाँश लोग महसूस नहीं करते कि उनको पवित्र आत्मा के द्वारा स्पर्श किया गया है और इसलिए वे साहस खो देते हैं। इससे कुछ नहीं होगा! तुम में अटलता होनी आवश्यक है, तुम्हें पवित्र आत्मा के स्पर्श को महसूस करने पर और खोजने और जाँचने पर ध्यान देना आवश्यक है। कभी-कभी, जिस मार्ग पर तुम चलते हो वह गलत होता है; कभी-कभी, तुम्हारी प्रेरणाएँ और अवधारणाएँ परमेश्वर के समक्ष स्थिर खड़ी नहीं रह सकतीं, और इसलिए परमेश्वर का आत्मा तुम्हें द्रवित नहीं करता; अतः ऐसे समय भी आते हैं जब परमेश्वर देखता है कि क्या तुम वफ़ादार हो या नहीं। सारांश में, तुम्हें स्वयं को प्रशिक्षित करने के लिए और अधिक प्रयास करना आवश्यक है। यदि तुम पाते हो कि जिस मार्ग को तुमने लिया है वह भ्रष्ट है, तो तुम अपने प्रार्थना के तरीके को बदल सकते हो। जब तुम सच्चाई के साथ प्रयास करते हो, और प्राप्त करने की इच्छा रखते हो, तब पवित्र आत्मा निश्चित रूप से तुम्हें इस वास्तविकता में ले जाएगा। कभी-कभी तुम सच्चे हृदय से प्रार्थना करते हो परंतु महसूस नहीं करते कि तुम्हें विशेष रूप से स्पर्श किया गया है। ऐसे समयों पर तुम्हें अपने विश्वास पर निर्भर रहना आवश्यक है, और भरोसा रखना है कि परमेश्वर तुम्हारी प्रार्थनाओं की ओर दृष्टि लगाता है; तुम्हें अपनी प्रार्थनाओं में धीरज रखने की आवश्यकता है।

तुम्हें ईमानदार होना आवश्यक है, और तुम्हें अपने हृदय की धूर्तता से छुटकारा पाने के लिए प्रार्थना करना आवश्यक है। जब तुम जरुरत के समय स्वयं को शुद्ध करने के लिए प्रार्थना का प्रयोग करते हो, और परमेश्वर के आत्मा के द्वारा स्पर्श किए जाने के लिए इसका प्रयोग करते हो, तो तुम्हारा स्वभाव धीरे-धीरे बदलता जाएगा। सच्चा आत्मिक जीवन प्रार्थना का जीवन है, और यह ऐसा जीवन है जिसे पवित्र आत्मा के द्वारा स्पर्श किया जाता है। पवित्र आत्मा के द्वारा स्पर्श किए जाने की प्रक्रिया मनुष्य के स्वभाव को बदलने की प्रक्रिया है। वह जीवन जिसे पवित्र आत्मा के द्वारा स्पर्श नहीं किया गया है, वह आत्मिक जीवन नहीं है, यह अभी भी धार्मिक रीति है; केवल वे ही जिन्हें अक्सर पवित्र आत्मा के द्वारा स्पर्श किया जाता है, और जो पवित्र आत्मा के द्वारा प्रकाशित और प्रज्ज्वलित किए गए हैं, ऐसे लोग हैं जिन्होंने आत्मिक जीवन में प्रवेश किया है। मनुष्य का स्वभाव निरंतर रूप से बदलता रहता है जब वह प्रार्थना करता है, और जितना अधिक वह परमेश्वर के आत्मा के द्वारा द्रवित होता है, उतना ही अधिक वह सक्रिय और आज्ञाकारी हो जाता है। इसलिए, धीरे-धीरे उसका हृदय भी शुद्ध हो जाएगा, जिसके बाद उसका स्वभाव धीरे-धीरे बदल जाएगा। सच्ची प्रार्थना का प्रभाव ऐसा ही होता है।

स्रोत: सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन "तीन चेतावनियाँ" | The Warning of God to Man (Hindi)

**सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन "तीन चेतावनियाँ" | The Warning of God to Man (Hindi)

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सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "परमेश्वर में विश्वासी के रूप में, तुम लोगों को सभी बातों में परमेश्वर के अलावा और किसी के प्रति वफादार नहीं होना चाहिए और सभी बातों में उसकी इच्छा के अनुरूप होने में समर्थ होना चाहिए। तथापि, यद्यपि हर कोई इस सिद्धांत को समझता है, फिर भी ये सच्चाइयाँ जो अत्यधिक स्पष्ट और बुनियादी हैं, जहाँ तक मनुष्य का संबंध है, उसकी अज्ञानता, बेहूदगी, और भ्रष्टता जैसी नानाविध मनोव्यथाओं के कारण उसमें पूरी तरह से नहीं देखी जा सकती है। इसलिए, तुम लोगों का अंत निर्धारित करने से पहले, मुझे सबसे पहले तुम लोगों को कुछ चीज़ें बतानी चाहिए, जो तुम लोगों के लिए अत्यधिक महत्व की हैं। ...... मैं तुम लोगों के जीवन में बहुत कुछ देखता हूँ जो तुम लोग करते हो जो सत्य के लिए अप्रासंगिक है, और इसलिए मैं तुम लोगों से सत्य के सेवक बनने और दुष्टता और कुरूपता द्वारा दास न बनाए जाने के लिए स्पष्ट रूप से कह रहा हूँ। सत्य को मत कुचलो और परमेश्वर के घर के किसी भी कोने को दूषित मत करो। तुम लोगों के लिए यह मेरी चेतावनी है।"

अनुशंसित:सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को सावधानी से सुनना

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परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें

परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें

**सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें

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आज, हम प्राथमिक रूप से संवाद करेंगे कि लोगों को परमेश्वर पर अपने विश्वास में परमेश्वर की सेवा कैसे करनी चाहिए, किन शर्तों को पूरा किया जाना चाहिए और उन लोगों के द्वारा जो परमेश्वर की सेवा करते हैं, कौन से सत्य समझे जाने चाहिए, और तुम लोगों की सेवा में कौन-कौन से विचलन हैं। तुम लोगों को यह सब कुछ समझना चाहिए। ये मुद्दे इस बात की चर्चा करते हैं कि तुम लोग परमेश्वर पर किस प्रकार विश्वास करते हो, तुम लोग पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के मार्ग पर किस प्रकार चलते हो, और कैसे तुम हर चीज़ में परमेश्वर के आयोजनों को समर्पित होते हो, और ये तुम लोगों में परमेश्वर के कार्य के हर कदम को जानने की तुम लोगों को अनुमति देंगे। जब तुम लोग उस स्थिति पर पहुँचोगे, तब तुम लोग समझोगे कि परमेश्वर में विश्वास क्या होता है, किस प्रकार उचित तरीके से परमेश्वर पर विश्वास करें, और परमेश्वर की इच्छा की समरसता में क्रिया करने हेतु तुम लोगों को क्या करना चाहिए। यह तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य के प्रति पूर्णतः और सर्वथा आज्ञाकारी बना देगा, और तुम लोगों के पास कोई शिकायतें नहीं होंगी, तुम लोग आलोचना या विश्लेषण नहीं करोगे, और अनुसंधान तो बिलकुल नहीं करोगे। इसके अलावा, तुम सभी लोग मृत्यु तक परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी होने में सक्षम होगे, और परमेश्वर को अनुमति दोगे कि वह तुम लोगों को एक भेड़ की तरह रास्ते पर ले आए और तुम लोगों का वध करे, ताकि तुम सभी लोग 1990 के पतरस बन सको, और यहाँ तक कि सलीब पर भी, जरा सी भी शिकायत के बिना, परमेश्वर से अत्यधिक प्रेम कर सको। केवल तभी तुम लोग 1990 के पतरस के समान जीवन बिताने में समर्थ हो सकते हो।

प्रत्येक व्यक्ति जिसने संकल्प लिया है वह परमेश्वर की सेवा कर सकता है—परन्तु यह अवश्य है कि जो परमेश्वर की इच्छा की बहुत परवाह करते हैं और जो परमेश्वर की इच्छा को समझते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा करने के योग्य एवं पात्र हैं। मैंने तुम लोगों में ये पाया है: बहुत से लोगों का मानना है कि जब तक वे परमेश्वर के लिए उत्साहपूर्वक सुसमाचार का प्रचार करते हैं, परमेश्वर के लिए सड़क पर जाते हैं, परमेश्वर के लिए स्वयं को व्यय करते एवं चीज़ों का त्याग करते हैं, इत्यादि, तो यह परमेश्वर की सेवा करना है; यहाँ तक कि अधिक धार्मिक लोग मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ बाइबल को हाथों में लेकर यहाँ-वहाँ भागना, स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को फैलाना और पश्चाताप तथा पाप स्वीकार करवाने के द्वारा लोगों को बचाना है; बहुत से धार्मिक अधिकारी हैं जो सोचते हैं कि सेमेनरी में अध्ययन करने और प्रशिक्षण लेने के बाद प्रार्थनालय में उपदेश देना, बाइबल के अध्यायों को पढ़ कर लोगों को शिक्षा देना परमेश्वर की सेवा करना है; दरिद्र प्रदेशों में ऐसे भी लोग हैं जो मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ चंगाई करना और दुष्टात्माओं को निकालना है, या भाईयों एवं बहनों के लिए प्रार्थना करना, या उनकी सेवा करना है; तुम लोगों के बीच, बहुत से ऐसे लोग हैं जो मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना, प्रतिदिन परमेश्वर से प्रार्थना करना, साथ ही हर जगह कलीसियाओं में जाना और कार्य करना है; कुछ ऐसे भाई-बहन भी हैं जो मानते हैं कि कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ कभी भी विवाह न करना और परिवार न बढ़ाना, और अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को परमेश्वर के प्रति समर्पित कर देना है;। फिर भी कुछ लोग जानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का वास्तविक अर्थ क्या है। यद्यपि परमेश्वर की सेवा करने वाले इतने लोग हैं जितने आकाश में तारे हैं, किन्तु ऐसे लोगों की संख्या नगण्य है—महत्वहीन रूप से छोटी है, जो प्रत्यक्षतः परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं, और जो परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने में समर्थ हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? मैं ऐसा इसलिए कहता हूँ क्योंकि तुम लोग "परमेश्वर की सेवा" वाक्यांश के मुख्य सार को नहीं समझते हो, और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा कैसे की जाए इस बारे में तुम लोग बहुत कम समझते हो। आज, हम मुख्य रूप से संगति कर रहें हैं कि परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप किस प्रकार सेवा करें, परमेश्वर की इच्छा को सन्तुष्ट करने के लिए किस प्रकार सेवा करें।

यदि तुम लोग परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करना चाहते हो, तो तुम लोगों को पहले यह अवश्य समझना चाहिए कि किस प्रकार के लोगों को परमेश्वर प्यार करता है, किस प्रकार के लोगों से परमेश्वर घृणा करता है, किस प्रकार के लोग परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाते हैं, और किस प्रकार के लोग परमेश्वर की सेवा करने के लिए योग्य होते हैं। यह सब से छोटी चीज़ है जिससे तुम लोगों को सज्जित होना चाहिए। इसके अतिरिक्त, तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य के लक्ष्यों को, और उस कार्य को जानना चाहिए जिसे परमेश्वर अभी यहीँ करेगा। इसे समझने के पश्चात्, और परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन के माध्यम से, तुम लोग सब से पहले प्रवेश करना चाहिए और सबसे पहले परमेश्वर के महान आदेश को प्राप्त करना चाहिए। जब तुम लोग परमेश्वर के वचनों के आधार पर वास्तव में अनुभव कर लोगे, और जब तुम लोग वास्तव में परमेश्वर के कार्य को जान लोगे, तो तुम लोग परमेश्वर की सेवा करने के लिए योग्य हो जाओगे। और जब तुम लोग उसकी सेवा करते हो तो तब होता है कि परमेश्वर तुम लोगों की आध्यात्मिक आँखों को खोलता है, और तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य की अधिक समझ प्राप्त करने एवं उसे अधिक स्पष्टता से देखने की अनुमति देता है। जब तुम इस वास्तविकता में प्रवेश करते हो, तो तुम्हारे अनुभव अधिक गम्भीर एवं वास्तविक हो जाएँगे, और तुम लोगों में से वे सभी जिन्हें इस प्रकार के अनुभव हुए हैं वे कलीसियाओं के बीच आने जाने और तुम लोगों के भाईयों और बहनों को, तुम लोगों की स्वयं की कमियों को पूरा करने के लिए दूसरे की मज़बूतियों का इस्तेमाल कर सको, और अपनी आत्माओं में एक अधिक समृद्ध ज्ञान प्राप्त करो। केवल इस प्रभाव को प्राप्त करने के बाद ही तुम लोग परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने और अपनी सेवा के दौरान परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने के योग्य बनोगे।

जो परमेश्वर की सेवा करते हैं वे परमेश्वर के अंतरंग होने चाहिए, वे परमेश्वर के प्यारे होने चाहिए, और उन्हें परमेश्वर के प्रति अत्यंत वफादारी के लिए सक्षम होना चाहिए। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम लोगों के पीठ पीछे कार्यकलाप करते हो या उनके सामने, तुम परमेश्वर के सामने परमेश्वर के आनन्द को प्राप्त करने में समर्थ हो, तुम परमेश्वर के सामने अडिग रहने में समर्थ हो, और इस बात की परवाह किए बिना कि अन्य लोग तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार करते हैं, तुम हमेशा अपने स्वयं के मार्ग पर चलते हो, और परमेश्वर की ज़िम्मेदारी का पूरा ध्यान रखते हो। केवल यह ही परमेश्वर का एक अंतरंग है। यह कि परमेश्वर के अंतरंग ही सीधे तौर पर उसकी सेवा करने में समर्थ हैं क्योंकि उन्हें परमेश्वर का महान आदेश और परमेश्वर की ज़िम्मेदारी दी गई है, वे परमेश्वर के हृदय को अपने स्वयं के हृदय के रूप में मानने और परमेश्वर की ज़िम्मेदारी को अपनी मानने में समर्थ हैं, और वे इस बात पर कोई विचार नहीं करते हैं कि उन्हें संभावना प्राप्त होगी या खो जाएगी: यहाँ तक कि जब उनके पास संभावित नहीं होती है, और वे कुछ भी प्राप्त नहीं करेंगे, तब भी वे एक प्रेममय हृदय के साथ हमेशा परमेश्वर में विश्वास करेंगे। और इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर का अंतरंग है। परमेश्वर के अंतरंग उसके विश्वासपात्र भी हैं; केवल परमेश्वर के विश्वासपात्र ही उसकी बेचैनी, और उसकी चाहतों को साझा कर सकते हैं, और यद्यपि उनकी देह दुःखदायी और कमज़ोर हैं, फिर भी वे परमेश्वर को सन्तुष्ट करने के लिए दर्द को सहन कर सकते हैं एवं उसे छोड़ सकते हैं जिससे वे प्रेम करते हैं। परमेश्वर ऐसे लोगों को और भी अधिक ज़िम्मेदारी देता है, और वह जो परमेश्वर करेगा वह इन लोगों के माध्यम से प्रकट होता है। इस प्रकार, ये लोग परमेश्वर के प्यारे हैं, वे परमेश्वर के सेवक हैं जो उसके हृदय के अनुरूप हैं, और केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के साथ-साथ शासन कर सकते हैं। जब तुम वास्तव में परमेश्वर के अंतरंग बन जाते हो तो तभी निश्चित रूप से तुम परमेश्वर के साथ-साथ शासन करोगे।

यीशु परमेश्वर के आदेश—समस्त मानवजाति के छुटकारे के कार्य—को पूरा करने में समर्थ था क्योंकि उसने अपनी व्यक्तिगत योजनाओं एवं विचारों के बिना परमेश्वर की इच्छा की पूरी परवाह की। इसलिए भी, वह परमेश्वर—परमेश्वर स्वयं का अंतरंग था, कुछ ऐसा जिसे तुम सभी लोग अच्छी तरह से समझते हो। (वास्तव में, वह परमेश्वर स्वयं था जिसकी गवाही परमेश्वर के द्वारा दी गई थी; इस विषय की व्याख्या करने हेतु यीशु के तथ्य का उपयोग करने के लिए मैंने इसका यहाँ उल्लेख किया है)। वह परमेश्वर की प्रबन्धन योजना को बिलकुल केन्द्र में स्थापित करने में समर्थ था, और स्वर्गिक पिता से हमेशा प्रार्थना करता था और स्वर्गिक पिता की इच्छा की तलाश करता था। उसने प्रार्थना की और कहाः "परमपिता परमेश्वर! जो तेरी इच्छा हो उसे पूरी कर, और मेरी इच्छाओं के अनुसार कार्य मत कर; तू जैसा चाहे वैसे अपनी योजना के अनुसार काम कर। मनुष्य कमज़ोर हो सकता है, किन्तु तुझे उसकी चिंता क्यों करनी चाहिए? मनुष्य तेरी चिंता का विषय कैसे हो सकता है, मनुष्य जो कि तेरे हाथों में एक चींटी के समान है? मैं अपने हृदय में केवल तेरी इच्छा को पूरा करना चाहता हूँ, और चाहता हूँ कि तू वह कर सके जो तू अपनी इच्छाओं के अनुसार मुझ में करना चाहता है।" यरूशलेम जाने के मार्ग पर, यीशु ने संताप में महसूस किया, मानो कि कोई एक नश्तर उसके हृदय में भोंक दिया गया हो, फिर भी उसमें अपने वचन से पीछे हटने की थोड़ी सी भी इच्छा नहीं थी; हमेशा से एक सामर्थ्यवान ताक़त थी जो उसे लगातार उस ओर आगे बढ़ने के लिए बाध्य कर रही थी जहाँ उसे सलीब पर चढ़ाया जाएगा। अंततः, उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया और वह मानवजाति के छुटकारे के कार्य को पूरा करते हुए, तथा मृत्यु एवं अधोलोक के बन्धनों से ऊपर उठते हुए, पापमय देह के सदृश बन गया। उसके सामने नैतिकता, नरक एवं अधोलोक ने अपनी सामर्थ्य खो दी, और उसके द्वारा परास्त हो गए थे। वह तैंतीस वर्षों तक जीवित रहा, पूरे समयकाल में उसने उस वक्त परमेश्वर के कार्य के अनुसार परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए, अपने व्यक्तिगत लाभ या नुकसान के बारे में कभी विचार नहीं करते हुए, और हमेशा परमपिता परमेश्वर की इच्छा के बारे में सोचते हुए, हमेशा अपना अधिकतम प्रयास किया। इस प्रकार, उसका बपतिस्मा हो जाने के बाद, परमेश्वर ने कहाः "यह मेरा प्रिय पुत्र है जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ।" परमेश्वर के सामने उसकी सेवा के कारण जो परमेश्वर की इच्छा की समरसता में थी, परमेश्वर ने उसके कंधों पर समस्त मानवजाति के छुटकारे की भारी ज़िम्मेदारी डाल दी और उसे पूरा करने के लिए उसे आगे बढ़ा दिया, और वह इस महत्वपूर्ण कार्य को पूरा करने के लिए योग्य एवं पात्र था। अपने पूरे जीवनकाल में, उसने परमेश्वर के लिए अपरिमित कष्ट सहा, और उसे शैतान के द्वारा अनगिनित बार प्रलोभित किया गया, किन्तु वह कभी भी निरुत्साहित नहीं हुआ। परमेश्वर ने उसे ऐसा कार्य इसलिए दिया था क्योंकि वह उस पर भरोसा करता था और उससे प्रेम करता था, और इसलिए परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से कहाः "यह मेरा प्रिय पुत्र है जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ।" उस समय, केवल यीशु ही इस आदेश को पूरा कर सकता था, और यह अनुग्रह के युग में परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किए गए समस्त मानवजाति के छुटकारे के उसके कार्य का एक भाग था।

यदि, यीशु के समान, तुम लोग परमेश्वर की ज़िम्मेदारी पर पूरा ध्यान देने में समर्थ हो, और अपनी देह से मुँह मोड़ लो, तो परमेश्वर अपना महत्वपूर्ण कार्य तुम लोगों को सौंप देगा, ताकि तुम लोग परमेश्वर की सेवा करने की शर्तों को पूरा करोगे। केवल ऐसी परिस्थितियों में ही तुम लोगों में यह कहने की हिम्मत होगी कि तुम लोग परमेश्वर की इच्छा को पूरा कर रहे हो एवं उसके आदेश को पूरा कर रहे हो, केवल तभी तुम लोग यह कहने की हिम्मत करोगे कि तुम लोग सचमुच में परमेश्वर की सेवा कर रहे हो। यीशु के उदाहरण की तुलना में, क्या तुममें यह कहने की हिम्मत है कि तुम परमेश्वर के अंतरंग हो? क्या तुममें यह कहने की हिम्मत है कि तुम परमेश्वर की इच्छा को पूरा कर रहे हो? क्या तुममें यह कहने की हिम्मत है कि तुम सचमुच परमेश्वर की सेवा कर रहे हो? आज, यदि तुम परमेश्वर के प्रति ऐसी सेवा को नहीं समझते हो, तो क्या तुममें यह कहने की हिम्मत है कि तुम परमेश्वर के अंतरंग हो? यदि तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा करते हो, तो क्या तुम उसके विरूद्ध ईशनिन्दा नहीं करते हो? इसके बारे में विचार करो: क्या तुम परमेश्वर की सेवा कर रहे हो या स्वयं की सेवा कर रहे हो? तुम शैतान की सेवा करते हो, फिर भी तुम ढिठाई से कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा कर रहे हो—इसमें क्या तुम परमेश्वर की ईशनिन्दा नहीं कर रहे हो? मेरी पीठ पीछे बहुत से लोग हैसियत के आशीष का लोभ करते हैं, वे ठूँस-ठूँस कर खाना खाते हैं, वे नींद से प्यार करते हैं तथा देह पर बहुत ध्यान देते हैं, हमेशा भयभीत रहते हैं कि देह से बाहर कोई मार्ग नहीं है। वे कलीसिया में अपना सामान्य प्रकार्य नहीं करते हैं, और मुफ़्त में खाते हैं, या अन्यथा मेरे वचनों से अपने भाईयों एवं बहनों की भर्त्सना करते हैं, वे ऊँचे स्थान में खड़े होते हैं तथा दूसरों के ऊपर आधिपत्य जताते हैं। ये लोग निरन्तर कहते रहते हैं कि वे परमेश्वर की इच्छा को पूरा कर रहे हैं, वे हमेशा कहते हैं कि वे परमेश्वर के अंतरंग हैं—क्या यह बेतुका नहीं है? यदि तुम्हारे पास सही प्रेरणाएँ हैं, किन्तु तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने में असमर्थ हो, तो तुम मूर्ख हो; किन्तु यदि तुम्हारी प्रेरणाएँ सही नहीं हैं, और तुम तब भी कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा करते हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर का विरोध करता है, और तुम्हें परमेश्वर के द्वारा दण्डित किया जाना चाहिए! ऐसे लोगों के लिए मेरे पास कोई सहानुभूति नहीं है! परमेश्वर के घर में वे मुफ़्त में भोजन करते हैं, और हमेशा देह के आराम का लोभ करते हैं, और परमेश्वर की रूचियों पर कोई विचार नहीं करते हैं; वे हमेशा उसकी खोज करते हैं जो उनके लिए अच्छा है, वे परमेश्वर की इच्छा पर कोई ध्यान नहीं देते हैं, वे जो कुछ भी करते हैं उस पर परमेश्वर की आत्मा के द्वारा कोई विचार नहीं किया जाता है, वे हमेशा अपने भाईयों एवं बहनों के विरूद्ध चालाकी और साजिश करते रहते हैं, और दो-मुँहे हो कर, वे दाख की बाड़ी में लोमड़ी के समान, हमेशा अंगूरों को चुराते हैं और दाख की बाड़ी को कुचलते हैं। क्या ऐसे लोग परमेश्वर के अंतरंग हो सकते हैं? क्या तुम परमेश्वर की आशीषों को प्राप्त करने के लायक़ हो? तुम अपने जीवन एवं कलीसिया के लिए कोई उत्तरदायित्व नहीं लेते हो, क्या तुम परमेश्वर के आदेश को लेने के लायक़ हो? कौन तुम जैसे व्यक्ति पर भरोसा करने की हिम्मत करेगा? जब तुम इस प्रकार से सेवा करते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें बड़ा काम देने की हिम्मत कर सकता है? क्या तुम चीजों में विलंब नहीं कर रहे हो?

मैं ऐसा कहता हूँ ताकि तुम लोग जान लो कि परमेश्वर की इच्छा की समरसता में सेवा करने के लिए कौन सी शर्तों को पूरा अवश्य करना चाहिए। यदि तुम लोग अपना हृदय परमेश्वर को नहीं देते हो, यदि तुम लोग यीशु की तरह परमेश्वर की इच्छा की पूरी परवाह नहीं करते हो, तो तुम लोगों पर परमेश्वर के द्वारा भरोसा नहीं किया जा सकता है, और अंतत: परमेश्वर द्वारा तुम्हारा न्याय किया जायेगा। शायद आज, परमेश्वर के प्रति तुम्हारी सेवा में, तुम हमेशा से परमेश्वर को धोखा देने के इरादे को आश्रय देते हो—किन्तु परमेश्वर तब भी तुम्हें ध्यान में रखेगा। संक्षेप में, इन सभी बातों की परवाह किए बिना, यदि तुम परमेश्वर को धोखा देते हो तो तुम्हारे ऊपर क्रूर न्याय पड़ेगा। तुम लोगों को परमेश्वर की सेवा के सही मार्ग पर अभी-अभी प्रवेश करने का लाभ सबसे पहले परमेश्वर को अपने हृदय, विभाजित वफादारी के बिना, देने के लिए उठाना चाहिए। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम परमेश्वर के सामने हो, या लोगों के सामने हो, तुम्हारे हृदय को हमेशा परमेश्वर के सम्मुख होना चाहिए, और तुम्हारा यीशु के समान परमेश्वर से प्रेम करने का संकल्प होना चाहिए। इस तरीके से, परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाएगा, ताकि तुम परमेश्वर के ऐसे सेवक बन जाओ जो उसके हृदय के अनुकूल हो। यदि तुम परमेश्वर के द्वारा वास्तव में पूर्ण बनाए जाना, और अपनी सेवा को उसकी इच्छा की समरसता में होना चाहते हो, तो परमेश्वर के प्रति विश्वा स के बारे में तुम्हें अपने पूर्व दृष्टिकोण को बदलना चाहिए, और जिस तरीके से तुम परमेश्वर की सेवा किया करते थे उसे बदलना चाहिए, ताकि परमेश्वर द्वारा तुम्हें अधिक से अधिक पूर्ण बनाया जाए; इस तरीके से, परमेश्वर तुम्हें नहीं त्यागेगा, और, पतरस के समान, तुम उन लोगों की पंक्ति में सबसे आगे होगे जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं। यदि तुम पश्चाताप नहीं करते हो, तो तुम्हारा अंत यहूदा के समान होगा। इसे उन सभी लोगों को समझ लेना चाहिए जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं।

स्रोत :सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया

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वास्तविकता को कैसे जानें

वास्तविकता को कैसे जानें

**सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन वास्तविकता को कैसे जानें

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परमेश्वर वास्तविकता का परमेश्वर है: उसका समस्त कार्य वास्तविक है, सभी वचन जिन्हें वह कहता है वास्तविक हैं, और सभी सच्चाईयाँ जिन्हें वह व्यक्त करता है वास्तविक हैं। हर चीज़ जो उसके वचन नहीं हैं वे खोखले, अस्तित्वहीन, और अनुचित हैं। आज, पवित्र आत्मा परमेश्वर के वचनों में लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए है। यदि लोगों को वास्तविकता में प्रवेश की खोज करनी है, तो उन्हें अवश्य वास्तविकता को ढूँढ़ना, और वास्तविकता को जानना चाहिए, जिसके बाद उन्हें अवश्य वास्तविकता का अनुभव करना चाहिए, और वास्तविकता को जीना चाहिए। लोग जितना अधिक वास्तविकता को जानते हैं, वे उतना ही अधिक यह बताने में समर्थ होते हैं कि दूसरों के वचन वास्तविक हैं या नहीं; लोग जितना अधिक वास्तविकता को जानते हैं, उनकी उतनी ही कम धारणाएँ होती हैं; लोग जितना अधिक वास्तविकता का अनुभव करते हैं, वे उतना ही अधिक वास्तविकता के परमेश्वर के कर्मों को जानते हैं, और उनके लिए अपने भ्रष्ट, शैतानी स्वभावों के बंधन से मुक्त होना उतना ही अधिक आसान होता है; लोगों के पास जितनी अधिक वास्तविकता होती है, वे उतना ही अधिक परमेश्वर को जानते हैं, और उतना ही अधिक देह से घृणा और सत्य से प्रेम करते हैं; और लोगों के पास जितनी अधिक वास्तविकता होती है, वे परमेश्वर की अपेक्षाओं के मानकों के उतना ही अधिक करीब होते हैं। जो लोग परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किए जाते हैं ये वे लोग हैं जो वास्तविकता से सम्पन्न हैं, जो वास्तविकता को जानते हैं और जिन्हें वास्तविकता का अनुभव करने के माध्यम से परमेश्वर के वास्तविक कर्मों का पता चल गया है। जितना अधिक तुम सचमुच परमेश्वर के साथ सहयोग करोगे और अपने शरीर को अनुशासित करोगे, उतना ही अधिक तुम पवित्र आत्मा के कार्य को अर्जित करोगे, उतना ही अधिक तुम वास्तविकता को प्राप्त करोगे, और उतना ही अधिक तुम परमेश्वर के द्वारा प्रबुद्ध किए जाओगे—और इस प्रकार उतना ही अधिक परमेश्वर के वास्तविक कर्मों का तुम्हारा ज्ञान होगा। यदि तुम पवित्र आत्मा के वर्तमान प्रकाश में रहने में समर्थ हो, तो अभ्यास का वर्तमान मार्ग तुम्हें और अधिक स्पष्ट हो जाएगा, और तुम अतीत की धार्मिक धारणाओं एवं पुराने अभ्यासों से अपने आपको अलग करने में और भी अधिक सक्षम हो जाओगे। आज वास्तविकता केन्द्र बिंदु है: लोगों में जितनी अधिक वास्तविकता होगी, सत्य का उनका ज्ञान उतना ही अधिक स्पष्ट होगा, और उतनी ही अधिक विशाल परमेश्वर की इच्छा की उनकी समझ होगी। वास्तविकता सभी पत्रों और सिद्धांतों पर विजय पा सकती है, यह समस्त सिद्धान्त और विशेषज्ञता पर विजय पा सकती है, और लोग जितना अधिक वास्तविकता पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, उतना ही अधिक सचमुच में वे परमेश्वर से प्रेम करते हैं, और उसके वचनों के लिए भूखे एवं प्यासे होते हैं। यदि तुम हमेशा वास्तविकता पर ध्यान केन्द्रित करते हो, तो तुम्हारा जीवन दर्शन, धार्मिक धारणाएँ एवं प्राकृतिक चरित्र परमेश्वर के कार्य का अनुसरण करने से स्वाभाविक रूप से मिटा दिया जाएगा। जो वास्तविकता की खोज नहीं करते हैं, और जिन्हें वास्तविकता का कोई ज्ञान नहीं है, उनकी उस चीज की खोज करने की संभावना है जो अलौकिक है, और उनके साथ आसानी से छल किया जाएगा। पवित्र आत्मा के पास ऐसे लोगों में कार्य का कोई उपाय नहीं है, और इसलिए वे खालीपन महसूस करते हैं, और यह कि उनके जीवन का कोई अर्थ नहीं है।

पवित्र आत्मा तुम में केवल तभी कार्य कर सकता है जब तुम वास्तव में अभ्यास करते हो, वास्तव में खोजते हो, वास्तव में प्रार्थना करते हो, और सत्य की खोज के वास्ते दुःख उठाने को तैयार हो। जो सत्य की खोज नहीं करते हैं उनके पास पत्रों और सिद्धांतों और खोखले सिद्धांत के अलावा कुछ भी नहीं होता है, और जिनके पास सत्य नहीं होता है उनके पास परमेश्वर के बारे में स्वाभाविक रूप से अनेक धारणाएँ होती हैं। इस प्रकार के लोग परमेश्वर से केवल यही लालसा करते हैं कि वह उनकी शारीरिक देह को एक आध्यात्मिक देह में बदल दे ताकि वे तीसरे स्वर्ग में अवरोहित हो सकें। ये लोग कितने मूर्ख हैं! ऐसी चीज़ें बोलने वाले सभी को परमेश्वर का, या वास्तविकता का कोई ज्ञान नहीं है; इस तरह के लोग संभवतः परमेश्वर के साथ सहयोग नहीं कर सकते हैं, और वे केवल निष्क्रियता से प्रतीक्षा कर सकते हैं। यदि लोगों को सत्य को समझना है, और सत्य को स्पष्ट रूप से देखना है, उससे बढ़कर, यदि उन्हें सत्य में प्रवेश करना है, और उसे अभ्यास में लाना है, तो उन्हें अवश्य वास्तव में अभ्यास करना चाहिए, वास्तव में खोजना चाहिए, और वास्तव में भूखा एवं प्यासा रहना चाहिए। जब तुम भूखे और प्यासे होते हो, और जब तुम वास्तव में परमेश्वर के साथ सहयोग करते हो, तो परमेश्वर का आत्मा निश्चित रूप से तुम्हें स्पर्श करेगा और तुम्हारे भीतर कार्य करेगा, जो तुममें और अधिक प्रबुद्धता लाएगा, और तुम्हें वास्तविकता का और अधिक ज्ञान देगा, तथा तुम्हारे जीवन के लिए और अधिक सहायक होगा।

यदि लोगों को परमेश्वर को जानना है, तो सब से पहले उन्हें यह अवश्य जानना चाहिए कि परमेश्वर वास्तविक परमेश्वर है, और परमेश्वर के वचनों को, देह में परमेश्वर के वास्तविक प्रकटन को और परमेश्वर के वास्तविक कार्य को अवश्य जानना चाहिए। केवल यह जानने के बाद ही कि परमेश्वर का समस्त कार्य वास्तविक है तुम वास्तव में परमेश्वर के साथ सहयोग करने में समर्थ हो सकोगे, और केवल इसी मार्ग के माध्यम से तुम अपने जीवन के विकास को प्राप्त करने में समर्थ हो सकोगे। वे सभी जिन्हें वास्तविकता का कोई ज्ञान नहीं है उनके पास परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने का कोई उपाय नहीं है, वे अपनी धारणाओं में उलझे हुए हैं, वे अपनी कल्पनाओं में जीते हैं, और इस प्रकार उन्हें परमेश्वर के वचनों का कोई ज्ञान नहीं है। वास्तविकता का तुम्हारा ज्ञान जितना अधिक होता है, तुम परमेश्वर के उतने ही करीब होते हो, और तुम उसके उतने ही अधिक घनिष्ठ होते हो; तुम जितना अधिक अज्ञातता और अमूर्तता, तथा सिद्धांत की खोज करते हो, तुम परमेश्वर से उतने ही अधिक भटक जाते हो, और इस प्रकार तुम उतना ही अधिक यह महसूस करोगे कि परमेश्वर के वचनों का अनुभव करना दुःसाध्य एवं कठिन है, और कि तुम प्रवेश के लिए अक्षम हो। यदि तुम परमेश्वर के वचन की वास्तविकता में, और अपने आध्यात्मिक जीवन के सही पथ में प्रवेश करने की इच्छा करते हो, तो तुम्हें सबसे पहले वास्तविकता को जानना और अपने आप को अज्ञात एवं अलौकिक चीज़ों से पृथक करना अवश्य चाहिए—जिसका अर्थ है, कि सबसे पहले तुम्हें अवश्य समझना चाहिए कि पवित्र आत्मा किस प्रकार से वास्तव में तुम्हें भीतर से प्रबुद्ध करता और तुम्हारा मार्गदर्शन करता है। इस तरह से, यदि तुम सचमुच में अपने भीतर पवित्र आत्मा के वास्तविक कार्य को समझ सकते हो, तो तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के सही रास्ते में प्रवेश कर चुके होगे।

आज, हर चीज वास्तविकता से शुरू होती है। परमेश्वर का कार्य सर्वाधिक वास्तविक है, और लोगों के द्वारा स्पर्श किया जा सकता है; यह वह है जिसे लोग अनुभव कर सकते हैं और उसे प्राप्त कर सकते हैं। लोगों में ऐसा बहुत कुछ है जो अज्ञात एवं अलौकिक है, जो उन्हें परमेश्वर के वर्तमान कार्य को जानने से रोकता है। इस प्रकार, वे अपने अनुभवों में हमेशा पथभ्रष्ट हो जाते हैं, और हमेशा कठिनाई महसूस करते हैं, जो कि सब कुछ उनकी धारणाओं के कारण होता है। लोग पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांतों को समझने में असमर्थ हैं, वे वास्तविकता को नहीं जानते हैं और इसलिए वे प्रवेश के अपने मार्ग में हमेशा नकारात्मक होते हैं। वे दूर से परमेश्वर की माँगों को देखते हैं, उन्हें हासिल करने में असमर्थ होते हैं; वे मात्र यह देखते हैं कि परमेश्वर के वचन वास्तव में अच्छे हैं, किन्तु प्रवेश का मार्ग नहीं खोज सकते हैं। पवित्र आत्मा इस सिद्धांत के अनुसार काम करता है: लोगों के सहयोग के माध्यम से, उनके परमेश्वर की सक्रियता से प्रार्थना करने, परमेश्वर को खोजने एवं उसके करीब आने के माध्यम से, परिणामों को प्राप्त किया जा सकता है और पवित्र आत्मा द्वारा उन्हें प्रबुद्ध और रोशन किया जा सकता है। यह ऐसा मामला नहीं है कि पवित्र आत्मा एकतरफ़ा कार्य करता है, या कि मनुष्य एकतरफ़ा कार्य करता है। दोनों ही अपरिहार्य हैं, और लोग जितना अधिक सहयोग करते हैं, और वे जितना अधिक परमेश्वर की अपेक्षाओं के मानकों को प्राप्त करने की खोज करते हैं, पवित्र आत्मा का कार्य उतना ही अधिक विशाल होता है। पवित्र आत्मा के कार्य के साथ जोड़ा गया केवल लोगों का वास्तविक सहयोग ही, परमेश्वर के वचनों के वास्तविक अनुभवों एवं सारभूत ज्ञान को उत्पन्न कर सकता है। धीरे-धीरे, इस तरीके से अनुभव करने के माध्यम से, अंततः एक पूर्ण व्यक्ति उत्पन्न होता है। परमेश्वर अलौकिक चीज़ें नहीं करता है; लोगों की धारणाओं में, परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, और सब कुछ परमेश्वर के द्वारा किया जाता है—परिणामस्वरूप लोग निष्क्रियता से प्रतीक्षा करते हैं, परमेश्वर के वचनों को नहीं पढ़ते हैं या प्रार्थना नहीं करते हैं, और मात्र पवित्र आत्मा के स्पर्श की प्रतीक्षा करते हैं। हालाँकि, जिनके पास सही समझ है, वे यह विश्वास करते हैं कि: परमेश्वर के कार्यकलाप केवल वहाँ तक जा सकते हैं जहाँ तक मेरा सहयोग होता है, और मुझ पर परमेश्वर के कार्य का जो प्रभाव पड़ता है इस बात पर निर्भर करता है कि मैं किस प्रकार सहयोग करता हूँ। जब परमेश्वर बोलता है, तो परमेश्वर के वचनों को ढूँढ़ने और उनकी ओर प्रयत्न करने के लिए मुझे वह सब करना चाहिए जो मैं कर सकता हूँ; यही है वह जो मुझे प्राप्त करना चाहिए।

पतरस और पौलुस में तुम लोग स्पष्ट रूप से देख सकते हो कि वह पतरस था जिसने वास्तविकता पर सर्वाधिक ध्यान दिया। जिन हालातों से पतरस गुज़रा, उनसे यह देखा जा सकता है कि उसके अनुभव उन लोगों के सबकों के सार को प्रस्तुत करता है, जो अतीत में असफल हुए थे, और यह कि उसने अतीत के संतों की शक्ति को अवशोषित कर लिया था—और इससे यह देखा जा सकता है कि पतरस के अनुभव कितने वास्तविक थे, यह कि वे लोगों को स्पर्श करने देने, और उसके योग्य होने के लिए पर्याप्त थे, और यह कि वे लोगों के द्वारा प्राप्त करने योग्य थे। यद्यपि, पौलुस भिन्न था: उसने जो कुछ भी बोला वह अज्ञात और अदृश्य था, ऐसी चीजें जैसे कि तीसरे स्वर्ग में जाना, सिंहासन पर अधिरोहण, और धार्मिकता का मुकुट। उसने उन चीजों पर ध्यान केन्द्रित किया जो बाहरी थीं: हैसियत पर, और लोगों को फटकारना, अपनी वरिष्ठता का दिखावा करने पर, पवित्र आत्मा के द्वारा स्पर्श किया जाना इत्यादि। उसने जिसका भी अनुसरण किया था वह वास्तविक नहीं था, और उसमें से बहुत कुछ कोरी कल्पना थी, और इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि वह सब जो अलौकिक है, जैसे कि पवित्र आत्मा लोगों को कितना अधिक स्पर्श करता है, वह बड़ी खुशी जिसका लोग आनन्द उठाते हैं, तीसरे स्वर्ग में जाना, या नियमित प्रशिक्षण और उसका एक निश्चित सीमा तक आनन्द उठाना, परमेश्वर के वचनों को पढ़ना और एक निश्चित सीमा तक उनका आनंद उठाना—इसमें से कुछ भी वास्तविक नहीं है। पवित्र आत्मा का समस्त कार्य सामान्य एवं वास्तविक हैं। जब तुम परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हो और प्रार्थना करते हो, तो भीतर से तुम प्रकाशमान और अडिग होते हो, बाहरी संसार तुम्हारे साथ हस्तक्षेप नहीं कर सकता है, अन्दर से तुम परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हो, सकारात्मक चीज़ों में शामिल होना चाहते हो, और तुम बुराई की दुनिया से घृणा करते हो; यह परमेश्वर के भीतर जीवन जीना है, और यह, जैसा कि लोग कहते हैं, उतने आनन्द लेने की बात नहीं है—ऐसी बात वास्तविक नहीं है। आज, हर चीज वास्तविकता से आरम्भ होती है। जो कुछ भी परमेश्वर करता है वह वास्तविक है, और अपने अनुभवों में तुम्हें परमेश्वर को वास्तव में जानने, और परमेश्वर के कार्य के पदचिन्हों और उस उपाय को खोजने पर ध्यान देना चाहिए जिसके द्वारा पवित्र आत्मा लोगों को स्पर्श और प्रबुद्ध करता है। यदि तुम परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हो, और प्रार्थना करते हो, और, गुज़रे हुए समयों में जो कुछ अच्छा था उसे आत्मसात करते हुए, और पतरस के समान जो कुछ खराब था उसे अस्वीकार करते हुए, इस तरीके से सहयोग करते हो जो अधिक वास्तविक है, यदि तुम अपने कानों से सुनते हो और अपनी आँखों से देखते हो, और प्रायः अपने हृदय में प्रार्थना करते हो और चिंतन करते हो, और परमेश्वर के कार्य में सहयोग करने के लिए वह सब कुछ करते हो जो तुम कर सकते हो, तो परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा।
स्रोत : सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन वास्तविकता को कैसे जानें

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आज परमेश्वर के कार्य को जानना

आज परमेश्वर के कार्य को जानना

**सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन आज परमेश्वर के कार्य को जानना

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इन दिनों परमेश्वर के कार्यों को जानना, अधिकांशतः, यह जानना है कि अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर की मुख्य सेवकाई क्या है और पृथ्वी पर वह क्या करने के लिए आया है। मैंने पहले अपने वचनों में उल्लेख किया था कि प्रस्थान से पहले हमारे सामने एक उदाहरण स्थापित करने के लिए परमेश्वर पृथ्वी पर (अंत के दिनों के दौरान) आया है। परमेश्वर किस प्रकार यह उदाहरण स्थापित करता है? सम्पूर्ण देशों में कार्य करने और वचनों को बोलने के द्वारा। अंत के दिनों में यही परमेश्वर का कार्य है; वह केवल बोलता है, ताकि पृथ्वी वचनों का संसार बन जाए, ताकि प्रत्येक व्यक्ति को उसके वचनों द्वारा भरण पोषण और प्रबुद्ध किया जाए, और ताकि मनुष्य की आत्मा जागरूक हो जाए और वह स्वप्न के बारे में स्पष्ट हो जाए। अंत के दिनों के दौरान, देहधारी परमेश्वर मुख्य रूप से वचनों को कहने के लिए आया है। जब यीशु आया, उसने स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को फैलाया और सलीब पर चढ़कर छुटकारे का कार्य पूरा किया। वह व्यवस्था के युग का अंत लाया और उसने सभी पुरानी बातों को समाप्त कर दिया। यीशु के आगमन से व्यवस्था के युग का अंत हो गया और अनुग्रह के युग का आरम्भ हुआ। अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर का आगमन अनुग्रह के युग के अंत को लाया है। वह मुख्य रूप से अपने वचनों को कहने, मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए वचनों का उपयोग करने, मनुष्य को रोशन और प्रबुद्ध करने, और मनुष्य के हृदय से अज्ञात परमेश्वर के स्थान को हटाने के लिए आया है। यह कार्य का वह चरण नहीं है जो यीशु ने तब किया था जब वह आया था। जब यीशु आया, तो उसने कई चमत्कार किए, उसने बीमारों को चंगा किया और पिशाचों को निकाला, और सलीब पर चढ़ने का छुटकारे का कार्य पूर्ण किया। परिणामस्वरूप, अपनी धारणाओं में, मनुष्य विश्वास करता है कि परमेश्वर को ऐसा ही होना चाहिए। क्योंकि जब यीशु आया, तो उसने मनुष्य के हृदय से अज्ञात परमेश्वर की छवि को हटाने का कार्य नहीं किया; जब वह आया, तो उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया, उसने बीमारों को चंगा किया और पिशाचों को बाहर निकाला, और स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को फैलाया। एक विचार से, अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर का देहधारण मनुष्य की धारणाओं में अज्ञात परमेश्वर द्वारा धारण किए गए स्थान को हटाता है, ताकि मनुष्य के हृदय में अज्ञात परमेश्वर की छवि अब और नहीं रहे। अपने वास्तविक कार्य और वचनों का उपयोग करके, वह सम्पूर्ण देशों में जाता है और मनुष्यों के बीच वह जो कार्य करता है वह असाधारण रूप से वास्तविक और सामान्य होता है, इतना कि मनुष्य को परमेश्वर की सच्चाई पता लग जाती है, और मनुष्य के हृदय में अज्ञात परमेश्वर का स्थान समाप्त हो जाता है। दूसरे विचार से, परमेश्वर अपनी देह द्वारा कहे गए वचनों का उपयोग मनुष्य को पूर्ण करने, और सभी बातों को निष्पादित करने के लिए करता है। यही वह कार्य है जो परमेश्वर अंत के दिनों में निष्पादित करेगा।

तुम लोगों को क्या अवश्य जानना चाहिए:

  1. परमेश्वर का कार्य अलौकिक नहीं है, और इसके बारे में तुम लोगों को कोई भी अवधारणाएँ नहीं रखनी चाहिए।

  2. तुम लोगों को मुख्य कार्य को अवश्य समझना चाहिए जो इस बार देहधारी परमेश्वर करने के लिए आया है।

वह चंगा करने या पिशाचों को निकालने, या चमत्कार करने नहीं आया है और वह पश्चाताप का सुसमाचार फैलाने, या मनुष्य को छुटकारा प्रदान करने के लिए नहीं आया है। ऐसा इसलिए क्योंकि यीशु ने पहले ही इस कार्य को कर दिया है, और परमेश्वर एक ही कार्य को फिर कभी नहीं दोहराता है। आज, परमेश्वर अनुग्रह के युग को समाप्त करने और अनुग्रह के युग की सभी प्रथाओं को बाहर निकालने आया है। व्यावहारिक परमेश्वर मुख्य रूप से यह दिखाने आया है कि वह वास्तविक है। जब यीशु आया, तो उसने कुछ वचन कहे; उसने मुख्य रूप से चिह्न और चमत्कार प्रदर्शित किए और लोगों को चंगा किया तथा दुष्टात्माओं को बाहर निकाला, फिर उसने मनुष्यों को आश्वस्त करने, और मनुष्य को यह दिखाने के लिए कि वह ही वास्तव में परमेश्वर, और एक निष्पक्ष परमेश्वर है, भविष्यवाणियाँ की। अंततः, उसने सलीब पर चढ़ने का कार्य पूर्ण किया। आज का परमेश्वर चिह्न और चमत्कार नहीं करता है, न ही वह चंगा करता और पिशाचों को निकालता है। जब यीशु आया, तो उसने परमेश्वर के एक भाग को प्रकट करने वाला कार्य किया, परन्तु इस समय परमेश्वर कार्य के उस चरण को करने आया है जो बाकी है, क्योंकि परमेश्वर एक ही कार्य को दोहराता नहीं है; वह हमेशा नया रहने वाला परमेश्वर है और कभी भी पुराना नहीं पड़ता है, और इसलिए तुम आज जो कुछ भी देख रहे हो वह व्यावहारिक परमेश्वर के वचन और कार्य हैं।

अंत के दिनों का देहधारी परमेश्वर मुख्य रूप से अपने वचनों को कहने, जो कुछ भी मनुष्य के जीवन के लिए आवश्यक है उसे समझाने, जिसमें मनुष्य को प्रवेश चाहिए उसे दिखाने, परमेश्वर के कार्यों को मनुष्य को दिखाने और परमेश्वर की बुद्धि, सर्वशक्तिमत्ता और चमत्कारिकता को दिखाने के लिए आया है। उन कई मार्गों के माध्यम से जिनसे परमेश्वर बातचीत करता है, मनुष्य परमेश्वर की सर्वोच्चता, परमेश्वर की महत्ता, और इसके अलावा, परमेश्वर की विनम्रता और गंभीरता को निहारता है। मनुष्य देखता है कि परमेश्वर सर्वोच्च है, परन्तु वह विनम्र और गंभीर भी है। उसके कुछ वचन प्रत्यक्षतः आत्मा के दृष्टिकोण से कहे गए हैं, कुछ वचन प्रत्यक्षतः मनुष्य के दृष्टिकोण से, और कुछ वचन तीसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण से कहे गए हैं। इसमें यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर के कार्य करने के तरीके में बहुत भिन्नता होती है और यह वचन के माध्यम से है कि वह मनुष्य को इसे देखने देता है। अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर का कार्य सामान्य और वास्तविक दोनों है, और इस प्रकार अंत के दिनों के लोगों का समूह सभी परीक्षणों में से सबसे बड़े परीक्षण के अधीन किया जाता है। परमेश्वर की सादगी और वास्तविकता के कारण, सभी लोगों ने इस प्रकार के परीक्षणों के बीच प्रवेश किया है; और यह कि मनुष्य परमेश्वर की परीक्षाओं में उतर गए हैं, ऐसा परमेश्वर की सादगी और वास्तविकता की वजह से हुआ है। यीशु के युग के दौरान, कोई भी अवधारणाएँ या परीक्षण नहीं थे। क्योंकि यीशु के द्वारा किया गया अधिकांश कार्य मनुष्य की अवधारणाओं के अनुसार था, इसलिए लोगों ने उनका अनुसरण किया, और उसके बारे में कोई अवधारणाएँ नहीं रखी थीं। आज के परीक्षण मनुष्य के द्वारा कभी भी सामना किए गए परीक्षणों में सबसे बड़े परीक्षण हैं और जब यह कहा जाता है कि ये लोग बहुत महान क्लेश से निकल कर आए हैं, तो यही वह क्लेश है जिसके बारे में उल्लेख किया जाता है। आज, परमेश्वर इन लोगों में विश्वास, प्रेम, सहनशीलता और आज्ञाकारिता उत्पन्न करने के लिए बोलता है। अंत के दिनों में देहधारी परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचन मनुष्य की प्रकृति के सार, मनुष्य के व्यवहार, तथा आज जिसमें उसे प्रवेश करना चाहिए उसके अनुसार हैं। उसके बोलने का तरीका[क] वास्तविक और सामान्य दोनो हैः वह आने वाले कल के बारे में नहीं बोलता है, न ही वह बीते हुए कल को पलट कर देखता है; वह केवल उसके बारे में बोलता है जिसमें प्रवेश किया जाना चाहिए, जिसे अभ्यास में लाना और आज ही समझना चाहिए। यदि, वर्तमान समय में, कोई व्यक्ति उभर कर आता है जो चिह्नों और चमत्कारों को प्रदर्शित करने, पिशाचों को निकालने, चंगाई करने में और कई चमत्कारों को करने में समर्थ है, और यदि यह व्यक्ति दावा करता है कि वो यीशु की वापसी है, तो यह दुष्टात्माओं की जालसाजी और उसका यीशु की नकल करना होगा। इस बात को स्मरण रखें! परमेश्वर एक ही कार्य को दोहराता नहीं है। यीशु के कार्य का चरण पहले ही पूर्ण हो चुका है, और परमेश्वर फिर से उस चरण के कार्य को पुनः नहीं दोहराएगा। परमेश्वर का कार्य मनुष्य की सभी अवधारणाओं के असंगत है; उदाहरण के लिए, पुराने नियम में मसीहा के आगमन के बारे में पहले से ही बताया गया है, परन्तु यह पाया गया कि यीशु आया, इसलिए एक अन्य मसीहा का फिर से आना गलत होगा। यीशु एक बार आ चुका है, और इस समय यदि यीशु को फिर से आना होता तो यह गलत होता। प्रत्येक युग के लिए एक नाम है और प्रत्येक नाम युग के द्वारा चिन्हित किया जाता है। मनुष्य की अवधारणाओं में, परमेश्वर को अवश्य हमेशा चिह्न और चमत्कार दिखाने चाहिए, हमेशा चंगा करना और पिशाचों को निकालना चाहिए, और हमेशा यीशु के ही समान अवश्य होना चाहिए, फिर भी इस समय परमेश्वर इन सब के समान बिल्कुल भी नहीं है। यदि अंत के दिनों के दौरान, परमेश्वर अभी भी चिह्नों और चमत्कारों को प्रदर्शित करता है और अभी भी दुष्टात्माओं को निकालता और बीमारों को चंगा करता है—यदि वह यीशु के ही समान करता है—तो परमेश्वर एक ही कार्य को दोहरा रहा होगा, और यीशु के कार्य का कोई महत्व या मूल्य नहीं होगा। इस प्रकार, प्रत्येक युग में परमेश्वर कार्य के एक ही चरण को करता है। एक बार जब उसके कार्य का प्रत्येक चरण पूरा हो जाता है, तो शीघ्र ही इसकी दुष्टात्माओं के द्वारा नकल की जाती है, और शैतान द्वारा परमेश्वर का करीब से पीछा करने के बाद, परमेश्वर एक दूसरा तरीका बदल देता है। एक बार परमेश्वर अपने कार्य का एक चरण पूर्ण कर लेता है, तो इसकी दुष्टात्माओं द्वारा नकल कर ली जाती है। तुम लोगों को इस बारे में अवश्य स्पष्ट हो जाना चाहिए। परमेश्वर का आज का कार्य क्यों यीशु के कार्य से भिन्न है? आज परमेश्वर क्यों चिह्नों और चमत्कारों को प्रदर्शित नहीं करता है, पिशाचों को निकालता नहीं है और बीमारों को चंगा नहीं करता है? यदि यीशु का कार्य व्यवस्था के युग के दौरान किए गए कार्य के समान ही होता, तो क्या वह अनुग्रह के युग के परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता था? क्या वह सलीब पर चढ़ने के कार्य को पूर्ण कर सकता था?, जैसे कि व्यवस्था के युग में, यदि यीशु मंदिर में गया होता और उसने सब्त को मान लिया होता, तो उसे किसी के द्वारा सताया नहीं जाता और सभी के द्वारा अंगीकार कर लिया जाता। यदि ऐसा होता, तो क्या उसे सलीब पर चढ़ाया जा सकता था? क्या वह छुटकारे के कार्य को पूरा कर सकता था? इसमें कौन सी बात होती, यदि अंत के दिनों का देहधारी परमेश्वर यीशु के समान चिह्नों और चमत्कारों को दिखाता? यदि परमेश्वर अंत के दिनों के दौरान केवल अपने कार्य का दूसरा भाग करता है, जो उसकी प्रबंधन योजना के एक भाग को प्रदर्शित करता है, तभी मनुष्य परमेश्वर का गहरा ज्ञान प्राप्त कर सकता है, और केवल तभी परमेश्वर के प्रबंधन का कार्य पूर्ण हो सकता है।

अंत के दिनों में, परमेश्वर मुख्य रूप से अपने वचन बोलने के लिए आया है। वह आत्मा के दृष्टिकोण से, मनुष्य के दृष्टिकोण से, और तीसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण से कहता है; वह कुछ समय के लिए एक प्रकार का उपयोग करते हुए, भिन्न-भिन्न तरीकों से कहता है, और बोलने के तरीकों का मनुष्य की अवधारणाओं को बदलने और मनुष्य के हृदय से अस्पष्ट परमेश्वर की छवि को हटाने के लिए उपयोग करता है। यही मुख्य कार्य परमेश्वर के द्वारा किया गया है। क्योंकि मनुष्य विश्वास करता है कि परमेश्वर चंगा करने, पिशाचों को निकालने, चमत्कारों को करने, और मनुष्य पर भौतिक आशीषें प्रदान करने के लिए आया है, इसलिए परमेश्वर कार्य के इस चरण—ताड़ना और न्याय का कार्य—करता है, ताकि मनुष्य की अवधारणाओं में से इस प्रकार की बातों को निकाल दिया जाए, ताकि मनुष्य परमेश्वर की वास्तविकता और सादगी को जान ले, और ताकि उसके हृदय में यीशु की छवि परमेश्वर की एक नई छवि से प्रतिस्थापित कर दी जाए। जैसे ही परमेश्वर की छवि मनुष्यों के हृदयों में पुरानी हो जाती है, तो वह एक प्रतिमा बन जाती है। जब यीशु ने आकर कार्य के चरण को किया, तो उसने परमेश्वर की सम्पूर्णता का प्रतिनिधित्व नहीं किया। उसने कुछ चिह्नों और चमत्कारों को प्रदर्शित किया, कुछ वचन बोले, और उसे अंत में सलीब पर चढ़ा दिया गया, और उसने परमेश्वर के एक हिस्से का प्रतिनिधित्व किया। वह उस सम्पूर्ण को प्रकट नहीं कर सका जो परमेश्वर का है, बल्कि उसने परमेश्वर के कार्य के एक भाग को करने में परमेश्वर का प्रतिनिधित्व किया। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर बहुत महान है, और बहुत चमत्कारिक है, और अथाह है, और क्योंकि परमेश्वर प्रत्येक युग में अपने कार्य के एक भाग को करता है। इस युग के दौरान परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य मुख्य रूप से मनुष्य के जीवन के लिए वचनों का प्रावधान करना, मनुष्य की प्रकृति के सार और भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करना, और धार्मिक अवधारणाओं, सामन्ती सोच, पुरानी सोच के साथ ही मनुष्य के ज्ञान और संस्कृति को समाप्त करना था। यह सब कुछ परमेश्वर के वचनों के माध्यम से अवश्य सामने लाया जाना और साफ किया जाना चाहिए। अंत के दिनों में, मनुष्य को पूर्ण करने के लिए परमेश्वर वचनों का उपयोग करता है, न कि चिह्नों और चमत्कारों का। वह मनुष्य को उजागर करने, उसका न्याय करने, उसे ताड़ित करने और पूर्ण बनाने के लिए वचनों का उपयोग करता है, ताकि परमेश्वर के वचनों में, मनुष्य परमेश्वर की बुद्धि और सुन्दरता को देख ले, और परमेश्वर के स्वभाव को समझ जाए, ताकि परमेश्वर के वचनों के माध्यम से, मनुष्य परमेश्वर के कार्यों को निहार ले। व्यवस्था के युग के दौरान, मूसा को यहोवा अपने वचनों के साथ मिस्र से बाहर ले गए, और कुछ वचन इज़राइलियों को बोले; उस समय, परमेश्वर के कर्मों के हिस्से को समझाया गया था, परन्तु क्योंकि मनुष्य की क्षमता सीमित थी और कोई भी चीज उसके ज्ञान को पूर्ण नहीं कर सकती थी, इसलिए परमेश्वर निरंतर बोलता और कार्य करता रहा। अनुग्रह के युग में, मनुष्य ने एक बार और परमेश्वर के कार्यों के हिस्से को देखा। यीशु चिह्नों और चमत्कारों को दिखाने, चंगा करने और दुष्टात्माओं को निकालने और सलीब पर चढ़ने में समर्थ था, जिसके तीन दिन बाद वह पुनर्जीवित हुआ और देह में मनुष्य के सामने प्रकट हुआ। परमेश्वर के बारे में, मनुष्य इससे अधिक और कुछ नहीं जानता है। मनुष्य उतना ही जानता है जितना उसे परमेश्वर के द्वारा दिखाया जाता है, और यदि परमेश्वर को मनुष्य को और अधिक नहीं दिखाना होता, तो यह परमेश्वर के बारे में मनुष्य के परिसीमन की सीमा होती। इस प्रकार, परमेश्वर कार्य करता रहता है, ताकि उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान अधिक गहरा हो जाए, और ताकि वह धीरे-धीरे परमेश्वर के सार को जान जाए। अंत के दिनों में, परमेश्वर अपने वचनों को मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए उपयोग में लाता है। परमेश्वर के वचनों के माध्यम से तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव प्रकट होता है, और तुम्हारी धार्मिक अवधारणाएँ परमेश्वर की वास्तविकता के द्वारा प्रतिस्थापित होती हैं। अंत के दिनों का देहधारी परमेश्वर मुख्य रूप से अपने इन वचनों को पूरा करने आया है कि "वचन देहधारी होता है, वचन देह में आता है और वचन देह में प्रकट होता है।" और यदि तुम्हें इसका सम्पूर्ण ज्ञान नहीं है, तो तुम दृढ़ता से खड़े रहने में असमर्थ रहोगे। अंत के दिनों के दौरान, परमेश्वर मुख्य रूप से कार्य के ऐसे चरण को पूरा करने का विचार रखता है जिसमें वचन देह में प्रकट होता है, और यह परमेश्वर के प्रबंधन की योजना का एक भाग है। इस प्रकार, तुम लोगों का ज्ञान अवश्य स्पष्ट होना चाहिए; इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर कैसे कार्य करता है, परमेश्वर स्वयं की सीमा निर्धारित करने की मनुष्य को अनुमति नहीं देता है। यदि परमेश्वर अंत के दिनों के दौरान इस कार्य को नहीं करता है, तो मनुष्य का परमेश्वर के प्रति ज्ञान आगे नहीं बढ़ सकता। तुम केवल यह जानोगे कि परमेश्वर को सलीब पर चढ़ाया जा सकता है और परमेश्वर सदोम को नष्ट कर सकता है, और यह कि यीशु मर कर भी जीवित हो सकता है और पतरस के सामने प्रकट हो सकता है... परन्तु तुम कभी भी नहीं कहोगे कि परमेश्वर के वचन सब कुछ निष्पादित कर सकते हैं, और मनुष्य को जीत सकते हैं। केवल परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने के द्वारा ही तुम इस प्रकार के ज्ञान के बारे में बोल सकते हो, और जितना अधिक तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव करोगे, उतना ही अधिक विस्त़ृत तुम्हारा ज्ञान हो जाएगा। केवल तभी तुम अपनी स्वयं की अवधारणाओं की सीमाओं में परमेश्वर को बाँधना समाप्त करोगे। मनुष्य परमेश्वर के कार्यों का अनुभव करने के द्वारा उसे जान लेता है, और परमेश्वर को जानने का कोई अन्य सही मार्ग नहीं है। आज, यहाँ कई लोग हैं जो कुछ नहीं करते हैं बल्कि चिह्नों और चमत्कारों तथा विनाश के समय को देखने की प्रतीक्षा करते हैं। क्या तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, अथवा क्या तुम विनाश पर विश्वास करते हो? यदि तुम विनाश तक इंतजार करोगे तो बहुत देर हो जाएगी, और यदि परमेश्वर विनाश को नहीं भेजता है, तो क्या तब वह परमेश्वर नहीं है? क्या तुम चिह्नों और चमत्कारों पर विश्वास करते हो, या तुम स्वयं परमेश्वर पर विश्वास करते हो? जब दूसरों के द्वारा यीशु का उपहास किया गया था तो उसने चिह्न और चमत्कार नहीं दिखाए; तो क्या वह परमेश्वर नहीं था? क्या तुम चिह्नों और चमत्कारों पर विश्वास करते हो, अथवा तुम परमेश्वर के सार में विश्वास करते हो? परमेश्वर में विश्वास के बारे में मनुष्य का दृष्टिकोण गलत है! यहोवा ने व्यवस्था के युग में बहुत से वचन कहे, बल्कि यहाँ तक कि आज भी उनमें से कुछ को अभी पूरा होना है। क्या तुम कह सकते हो कि यहोवा परमेश्वर नहीं था?

आज, तुम सभी लोगों को यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि अंत के दिनों में, यह मुख्य रूप से "वचन देहधारी हुआ" का तथ्य है जो परमेश्वर के द्वारा निष्पादित हुआ है। पृथ्वी पर परमेश्वर के वास्तविक कार्य के माध्यम से, वह मनुष्य को परमेश्वर को जानने का, उसके साथ संलग्न होने का, और उसके वास्तविक कर्मों को देखने का कारण बनता है। वह मनुष्यों को स्पष्टता से दिखाने का कारण बनता है कि वह चिह्नों और चमत्कारों को दिखाने में सक्षम है और ऐसा समय भी आता है जब वह ऐसा करने में असमर्थ होता है, और यह उस युग पर निर्भर करता है। इससे तुम देख सकते हो कि परमेश्वर चिह्नों और चमत्कारों को दिखाने में अक्षम नहीं है, बल्कि इसके बजाय वह अपने कार्य, और युग के अनुसार कार्यप्रणाली को बदल देता है। कार्य के वर्तमान चरण में, वह चिह्नों और चमत्कारों को नहीं दिखाता है; और यह कि उसने यीशु के युग में कुछ चिह्नों और चमत्कारों को दिखाया था वह इसलिए था क्योंकि उस युग में उसका कार्य भिन्न था। परमेश्वर आज उस कार्य को नहीं करता है, और कुछ लोग विश्वास करते हैं कि वह चिह्नों और चमत्कारों को दिखाने में अक्षम हैं, या फिर वे सोचते हैं कि यदि वह चिह्नों और चमत्कारों को नहीं दिखाता है, तो वह परमेश्वर नहीं है। क्या यह एक भ्रांति नहीं है? परमेश्वर चिह्नों और चमत्कारों को दिखाने में सक्षम है, परन्तु वह एक भिन्न युग में कार्य कर रहा है, और इसलिए वह इस प्रकार का कार्य नहीं करता है। क्योंकि यह भिन्न युग है, और क्योंकि यह परमेश्वर के कार्य का एक भिन्न चरण है, इसलिए परमेश्वर द्वारा समझाए गए कर्म भी भिन्न हैं। मनुष्य का परमेश्वर पर विश्वास चिह्नों और चमत्कारों पर विश्वास करना नहीं है, न ही आश्चर्यों पर विश्वास करना है, बल्कि नए युग में उसके वास्तविक कार्य पर विश्वास करना है। मनुष्य परमेश्वर को उस तरीके के माध्यम से जानता है जिससे परमेश्वर कार्य करता है, और यह ज्ञान मनुष्य में परमेश्वर के प्रति विश्वास उत्पन्न करता है, जिसका अर्थ है, परमेश्वर के कार्य और कर्म पर विश्वास। कार्य के इस चरण में, परमेश्वर मुख्य रूप से बोलता है। चिह्नों और चमत्कारों की प्रतीक्षा मत करो, वह तुम्हें दिखाई नहीं देंगे! क्योंकि तुम अनुग्रह के युग में पैदा नहीं हुए थे। यदि तुम पैदा हुए होते, तो तुम चिह्नों और चमत्कारों को देख सकते थे, परन्तु तुम अंत के दिनों के दौरान पैदा हुए, और इसलिए तुम केवल परमेश्वर की वास्तविकता और सादगी को देख सकते हो। अंत के दिनों में अलौकिक यीशु को देखने की अपेक्षा मत करो। तुम केवल व्यवहारिक देहधारी परमेश्वर को ही देखने में सक्षम हो, जो किसी भी सामान्य मनुष्य से भिन्न नहीं है। प्रत्येक युग में, परमेश्वर विभिन्न कर्मों को समझाता है। प्रत्येक युग में वह परमेश्वर के कर्मों को समझाता है और प्रत्येक युग का कार्य परमेश्वर के स्वभाव के एक भाग का, और परमेश्वर के कर्मों के एक भाग का प्रतिनिधित्व करता है। कर्म जिन्हें वह समझाता है, उस युग के हिसाब से भिन्न-भिन्न होते हैं जिसमें वह कार्य करता है, परन्तु ये सब मनुष्य को परमेश्वर का ऐसा ज्ञान प्रदान करते है जो गहरा होता है, परमेश्वर पर ऐसा विश्वास जो बहुत व्यावहारिक एवं बहुत सच्चा होता है। मनुष्य परमेश्वर के समस्त कर्मों की वजह से परमेश्वर में विश्वास करता है, और इसलिए विश्वास करता है क्योंकि परमेश्वर बहुत चमत्कारिक है, क्योंकि परमेश्वर सर्वशक्तिमान और अथाह है। यदि तुम परमेश्वर पर इसलिए विश्वास करते हो क्योंकि वह चिह्नों और चमत्कारों को प्रदर्शित करने में सक्षम है और बीमारों को चंगा कर सकता है और पिशाचों को बाहर निकाल सकता है, तो तुम्हारा दृष्टिकोण गलत है, और कुछ लोग तुमसे कहेंगे, कि "क्या दुष्टात्माएँ भी इस तरह की चीजें करने में सक्षम नहीं हैं?" क्या यह परमेश्वर की छवि को शैतान की छवि के साथ भ्रमित करना नहीं है? आज, परमेश्वर पर मनुष्य का विश्वास उसके कई कर्मों और उन तरीकों की वजह से है जिनसे वह कार्य करता और बोलता है। परमेश्वर अपने कथनों का उपयोग मनुष्य को जीतने और उसे पूर्ण बनाने के लिए करता है। मनुष्य परमेश्वर पर उसके कई कर्मों की वजह से विश्वास करता है, इसलिए नहीं क्योंकि वह चिह्नों और चमत्कारों को दिखाने में सक्षम है, और मनुष्य उन्हें केवल इसलिए समझता है क्योंकि वह उसके कर्मों को देखता है। केवल परमेश्वर के वास्तविक कर्मों को जानकर, यह जान कर कि वह कैसे कार्य करता है, वह कौन से बुद्धिमान तरीकों का उपयोग करता है, वह कैसे बोलता है, और वह मनुष्य को कैसे पूर्ण बनाता है—केवल इन पहलुओं को जानने के बाद ही, तुम परमेश्वर की वास्तविकता को जान और उसके स्वभाव को समझ सकते हो, यह जानकर कि उसे क्या पसंद है, उसे क्या नापसंद है, कैसे वह मनुष्य पर कार्य करता है। परमेश्वर की पसंद और नापसंद को समझने के द्वारा, तुम उसके बीच में भेद कर सकते हो जो सकारात्मक और नकारात्मक है, और परमेश्वर के बारे में तुम्हारे ज्ञान के माध्यम से तुम्हारे जीवन में प्रगति होती है। संक्षेप में, तुम्हें परमेश्वर के कार्य का ज्ञान अवश्य प्राप्त करना चाहिए, और परमेश्वर पर विश्वास के बारे में अपने विचारों को सुधार लेना चाहिए।

स्रोत:सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन आज परमेश्वर के कार्य को जानना

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन "परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है"(अंश III)

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन "परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है"(अंश III)

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "जिस क्षण से तुम रोते हुए इस दुनिया में आए हो, तब से तुम अपना कर्तव्य करना शुरू करते हो। परमेश्वर की योजना और उसके विधान में अपनी भूमिका ग्रहण करके, तुम जीवन में अपनी यात्रा शुरू करते हो। तुम्हारी पृष्ठभूमि जो भी हो और तुम्हारी आगे की यात्रा जो भी हो, कोई भी उस योजना और व्यवस्था से बच कर भाग नहीं सकता है जो स्वर्ग ने बनायी हैं, और किसी का भी अपनी नियति पर नियंत्रण नहीं है, क्योंकि केवल वही जो सभी चीजों पर शासन करता है ऐसा कार्य करने में सक्षम है। जिस दिन से मनुष्य अस्तित्व में आया है, परमेश्वर अपना कार्य इसी तरह से करता आ रहा है, इस ब्रह्मांड का प्रबंधन करता आ रहा है और सभी चीज़ों और उन रास्तों में परिवर्तन की लय को निर्देशित करता आ रहा है जिनके साथ वे चलती हैं। शेष सभी चीजों के साथ, मनुष्य चुपचाप और अनजाने में परमेश्वर से मिठास और बारिश और ओस द्वारा पोषित होता है। शेष सभी चीजों की तरह, मनुष्य अनजाने में परमेश्वर के हाथ की योजना के अधीन रहता है। मनुष्य का हृदय और आत्मा परमेश्वर के हाथ में हैं, और उसका पूरा जीवन परमेश्वर की दृष्टि में है। भले ही तुम यह मानो या न मानो, कोई भी और सभी चीज़ें, चाहे जीवित हों या मृत, परमेश्वर के विचारों के अनुसार ही जगह बदलेंगी, परिवर्तित, नवीनीकृत और गायब होंगी। परमेश्वर सभी चीजों को इसी तरीके से संचालित करता है।"

हमारा अनुसरण करें:परमेश्वर के वचनो ने उन सत्यो को उजागर किया हैं जिसे हमें समझने की आवशकता हैं, और अधिक वीडियो देखने के लिए हमारे आधिकारिक वेबसाइट पर आपका स्वागत है।
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मसीह के कथन "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX" (भाग दो के क्रम में)

**मसीह के कथन "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है (III)" (भाग दो के क्रम में)

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सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "सभी चीज़ों को परमेश्वर के शासन से अलग नहीं किया जा सकता है, और न ही एक अकेला व्यक्ति स्वयं को उसके शासन से अलग कर सकता है। उसके नियम को खोने और उसके प्रयोजनों को खोने का

अर्थ होगा कि लोगों का जीवन, अर्थात् देह में लोगों का जीवन लुप्त हो जाएगा।

यह मानवजाति के लिए जीवित रहने हेतु परमेश्वर द्वारा स्थापित विभिन्न वातावरण का महत्व है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि तुम किस जाति के हो या तुम भूमि के किस हिस्से पर रहते हो, चाहे पश्चिम में हो या पूर्व में- तुम जीवित रहने के लिए उस वातावरण से अपने आपको अलग नहीं कर सकते हो जिसे परमेश्वर ने मानवजाति के लिए स्थापित किया है, और तुम जीवित रहने के लिए उस वातावरण के पोषण और प्रयोजनों से अपने आपको अलग नहीं कर सकते हो जिसे उसने मनुष्यों के लिए स्थापित किया है। कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारी आजीविका क्या है, तुम जीने के लिए किस पर आश्रित हो, और देह में अपने जीवन को बनाए रखने के लिए तुम किस पर आश्रित हो, क्योंकि तुम स्वयं को परमेश्वर के शासन और प्रबंधन से अलग नहीं कर सकते हो।"

अधिक:परमेश्वर के वचनों के पठन - परमेश्वर के नवीनतम कथन

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परमेश्वर का वचन-परमेश्वर के कार्य का दर्शन (2)

परमेश्वर का वचन-परमेश्वर के कार्य का दर्शन (2)

**परमेश्वर का वचन-परमेश्वर के कार्य का दर्शन (2)

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अनुग्रह के युग में पश्चाताप के सुसमाचार का उपदेश दिया गया, और कहा गया कि यदि मनुष्य विश्वास करता है, तो उसे बचाया जाएगा। आज, उद्धार के स्थान पर केवल विजय और पूर्णता की बात होती है। ऐसा कभी नहीं कहा जाता है कि यदि एक व्यक्ति विश्वास करता है, तो उसका पूरा परिवार धन्य हो जाएगा, या कि उद्धार एक बार और सदा के लिए हो जाता है। आज, कोई इन वचनों को नहीं बोलता है, और ऐसी चीजें पुरानी हो गई हैं। उस समय यीशु का कार्य समस्त मानव जाति का छुटकारा था। उन सभी के पापों को क्षमा कर दिया गया था जो उसमें विश्वास करते थे; जितने समय तक तुम उस पर विश्वास करते थे, उतने समय तक वह तुम्हें छुटकारा देगा; यदि तुम उस पर विश्वास करते थे, तो तुम अब और पापी नहीं थे, तुम अपने पापों से मुक्त हो गए थे। यही है बचाए जाने, और विश्वास द्वारा उचित ठहराए जाने का अर्थ। फिर भी जो विश्वास करते थे उन लोगों के बीच, वह रह गया था जो विद्रोही था और परमेश्वर का विरोधी था, और जिसे अभी भी धीरे-धीरे हटाया जाना था। उद्धार का अर्थ यह नहीं था कि मनुष्य पूरी तरह से यीशु द्वारा प्राप्त कर लिया गया था, लेकिन यह कि मनुष्य अब और पापी नहीं था, कि उसे उसके पापों से क्षमा कर दिया गया था: बशर्ते कि तुम विश्वास करते थे, तुम कभी भी अब और पापी नहीं बनोगे। उस समय, यीशु ने बहुतायत से ऐसे कार्य किये जो उसके शिष्यों की समझ से बाहर थे, और बहुतायत से ऐसा कहा जो लोगों की समझ में नहीं आया। इसका कारण यह है कि, उस समय, उसने व्याख्या नहीं की। इस प्रकार, उसके जाने के कई वर्ष बाद, मत्ती ने उसकी वंशावली बनायी, और अन्य लोगों ने भी बहुतायत से कार्य किये जो मनुष्य की इच्छा के थे। यीशु मनुष्य को पूर्ण करने और प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि कार्य का एक चरण करने के लिए आया था: स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को आगे बढ़ाना और क्रूसीकरण के कार्य को पूरा करना—और इसलिए एक बार जब यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया गया, तो उसके कार्य का पूरी तरह से अंत हो गया। किन्तु वर्तमान चरण—विजय के कार्य—में अधिक वचन अवश्य बोले जाने चाहिए, अधिक कार्य अवश्य किया जाना चाहिए, कई प्रक्रियाएँ अवशय होनी चाहिए। इसलिए भी यीशु और यहोवा के कार्यों के रहस्य अवश्य प्रकट किये जाने चाहिए, ताकि सभी लोगों को अपने विश्वास में समझ और स्पष्टता मिल जाए, क्योंकि यह अंत के दिनों का कार्य है, और अंत के दिन परमेश्वर के कार्य की समाप्ति है, इस कार्य के समापन का समय है। कार्य का यह चरण तुम्हारे लिए यहोवा की व्यवस्था और यीशु द्वारा छुटकारे को स्पष्ट करेगा, और मुख्य रूप से इसलिए है ताकि तुम परमेश्वर की छह-हजार वर्षीय प्रबंधन योजना के पूरे कार्य को समझ सको, और इस छः-हज़ार वर्ष की प्रबंधन योजना के महत्व और सार की सराहना कर सको, और यीशु द्वारा किए गए सभी कार्यों और उसके द्वारा बोले गए वचनों के प्रयोजन, और यहाँ तक कि बाइबल में तुम्हारे अंध विश्वास और श्रद्धा को समझ सको। यह तुम्हें इन सबको समझने की अनुमति देगा। यीशु द्वारा किया गया कार्य और परमेश्वर का आज का कार्य दोनों तुम्हारी समझ में आ जाएँगे; तुम समस्त सत्य, जीवन और मार्ग को समझ जाओगे और देख लोगे। यीशु द्वारा किए गए कार्य के चरण में, यीशु परमेश्वर के कार्य का समापन किए बिना क्यों चला गया? क्योंकि यीशु के कार्य का चरण समापन का कार्य नहीं था। जब उसे सलीब पर ठोका गया था, तब उसके वचनों का भी अंत हो गया था; उसके सलीब पर चढ़ने के बाद, उसका कार्य पूरी तरह समाप्त हो गया। वर्तमान चरण भिन्न है: केवल वचनों के अंत तक बोले जाने और परमेश्वर के समस्त कार्य का उपसंहार हो जाने के बाद ही उसका कार्य समाप्त हुआ होगा। यीशु के कार्य के चरण के दौरान, बहुत से वचन थे जो अनकहे रह गए थे, या जो पूरी तरह स्पष्ट नहीं थे। फिर भी यीशु ने जो कहा या जो नहीं कहा उसकी परवाह नहीं की, क्योंकि उसकी सेवकाई वचन की सेवकाई नहीं थी, और इसलिए उसे सलीब पर ठोके जाने के बाद, वह चला गया। कार्य का वह चरण मुख्यतः सलीब पर चढ़ने के वास्ते था, और आज के चरण से भिन्न है। कार्य का यह चरण मुख्य रूप से पूर्णता, स्वच्छ करने, और समस्त कार्य का समापन करने के लिए है। यदि वचनों को उनके बिल्कुल अंत तक नहीं कहा जाता है, तो इस कार्य का समापन करने का कोई तरीका नहीं होगा, क्योंकि कार्य के इस चरण में समस्त कार्य को अंत तक लाया जाता है और वचनों का उपयोग करके सम्पन्न किया जाता है। उस समय, यीशु ने बहुतायत से कार्य किया जो मनुष्य के लिए समझ से बाहर था। वह चुपचाप चला गया, और आज भी ऐसे कई लोग हैं जो उसके वचनों को नहीं समझते हैं, जिनकी समझ त्रुटिपूर्ण है मगर फिर भी उनके द्वारा सही मानी जाती है, जो नहीं जानते हैं कि वे गलत हैं। अंत में, यह वर्तमान चरण परमेश्वर के कार्य का पूर्णतः अंत करेगा, और इसका उपसंहार प्रदान करेगा। परमेश्वर की प्रबंधन योजना सभी की समझ और सभी के ज्ञान में आ जाएगी। मनुष्य के भीतर धारणाएँ, उसके इरादे, उसकी त्रुटिपूर्ण समझ, यहोवा और यीशु के कार्यों के प्रति उसकी धारणाएँ, अन्य जतियों के बारे में उसके विचार और उसके अन्य विचलन और उसकी सभी त्रुटियाँ ठीक कर दी जाएँगी। और जीवन के सभी सही मार्ग, और परमेश्वर द्वारा किया गय समस्त कार्य और संपूर्ण सत्य मनुष्य की समझ में आ जाएँगे। जब ऐसा होगा, तो कार्य का यह चरण समाप्त हो जाएगा। यहोवा का कार्य दुनिया का सृजन था, यह आरंभ था; कार्य का यह चरण कार्य का अंत है, और यह समापन है। आरंभ में, परमेश्वर का कार्य इस्राएल के चुने हुए लोगों के बीच किया गया था, और यह सभी जगहों में से सबसे पवित्र में एक नए युग का उद्भव था। कार्य का अंतिम चरण, दुनिया का न्याय करने और युग को समाप्त करने के लिए, सभी देशों में से सबसे अशुद्ध में किया जाता है। पहले चरण में, परमेश्वर का कार्य सबसे प्रकाशमान स्थान में किया गया था, और अंतिम चरण सबसे अंधकारमय स्थान में किया जाता है, और इस अंधकार को बाहर निकाल दिया जाएगा, प्रकाश को प्रकट किया जाएगा, और सभी लोगों पर विजय प्राप्त की जाएगी। जब सभी जगहों में इस सबसे अशुद्ध और सबसे अंधकारमय स्थान के लोगों पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी, और समस्त आबादी स्वीकार कर लेगी कि एक परमेश्वर है, जो सच्चा परमेश्वर है, और हर व्यक्ति सर्वथा आश्वस्त हो जाएगा, तब समस्त जगत में विजय का कार्य करने के लिए इस तथ्य का उपयोग किया जाएगा। कार्य का यह चरण प्रतीकात्मक है: एक बार इस युग का कार्य समाप्त हो गया, तो प्रबंधन का 6000 वर्षों कार्य पूरा हो जाएगा। एक बार सबसे अंधकारमय स्थान के लोगों को जीत लिया, तो कहने की आवश्यकता नहीं कि हर अन्य जगह पर भी ऐसा ही होगा। वैसे तो, केवल चीन में विजय का कार्य सार्थक प्रतीकात्मकता रखता है। चीन अंधकार की सभी शक्तियों का मूर्तरूप है, और चीन के लोग उन सभी लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो देह के हैं, शैतान के हैं, मांस और रक्त के हैं। ये चीनी लोग हैं जो बड़े लाल अजगर द्वारा सबसे ज़्यादा भ्रष्ट किए गए हैं, जिनका परमेश्वर के प्रति सबसे मज़बूत विरोध है, जिनकी मानवता सर्वाधिक अधम और अशुद्ध है, और इसलिए वे समस्त भ्रष्ट मानवता के मूलरूप आदर्श हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि अन्य देशों में कोई भी समस्या नहीं है; मनुष्य की धारणाएँ पूरी तरह से समान हैं, और यद्यपि इन देशों के लोग अच्छी क्षमता वाले हो सकते हैं, किन्तु यदि वे परमेश्वर को नहीं जानते हैं, तो यह अवश्य होगा कि वे उसका विरोध करते हैं। यहूदियों ने भी क्यों परमेश्वर का विरोध किया और उसकी अवहेलना की? फ़रीसियों ने भी क्यों उसका विरोध किया? यहूदा ने क्यों यीशु के साथ विश्वासघात किया? उस समय, बहुत से अनुयायी यीशु को नहीं जानते थे। क्यों यीशु को सलीब पर चढ़ाये जाने और उसके फिर से जी उठने के बाद भी, लोगों ने फिर भी उस पर विश्वास नहीं किया? क्या मनुष्य की अवज्ञा पूरी तरह से समान नहीं है? यह केवल ऐसा है कि चीन के लोग इसका एक उदाहरण बनाए जाते हैं, और जब उन पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी तो वे एक नमूना और प्रतिदर्श बन जाएँगे, और दूसरों के लिए संदर्भ के रूप में कार्य करेंगे। मैंने हमेशा क्यों कहा है कि तुम लोग मेरी प्रबंधन योजना के सहायक हो? यह चीन के लोगों में है कि भ्रष्टाचार, अशुद्धता, अधार्मिकता, विरोध और विद्रोहशीलता सर्वाधिक पूर्णता से व्यक्त होते हैं और अपने सभी विविध रूपों में प्रकट होते हैं। एक ओर, वे खराब क्षमता के हैं, और दूसरी ओर, उनके जीवन और उनकी मानसिकता पिछड़े हुए हैं, और उनकी आदतें, सामाजिक वातावरण, जन्म का परिवार—सभी गरीब और सबसे पिछड़े हुए हैं। उनकी हैसियत भी कम है। इस स्थान में कार्य प्रतीकात्मक है, और इस परीक्षा के कार्य के इसकी संपूर्णता में पूरा कर दिए जाने के बाद, उसका बाद का कार्य बहुत बेहतर तरीके से होगा। यदि कार्य के इस चरण को पूरा किया जा सकता है, तो इसके बाद का कार्य ज़ाहिर तौर पर होगा ही। एक बार कार्य का यह चरण सम्पन्न हो जाता है, तो बड़ी सफलता पूर्णतः प्राप्त कर ली गई होगी, और समस्त विश्व में विजय का कार्य पूर्णतः पूरा हो गया होगा। वास्तव में, एक बार तुम लोगों के बीच कार्य सफल हो जाता है, तो यह समस्त विश्व में सफलता के बराबर होगा। यही इस बात का महत्व है कि क्यों मैं तुम लोगों से एक प्रतिदर्श और नमूने के रूप में कार्यकलाप करवाता हूँ। विद्रोहशीलता, विरोध, अशुद्धता, अधार्मिकता—इन लोगों में सभी पाए जाते हैं, और इनमें मानव जाति की सभी विद्रोहशीलता का प्रतिनिधित्व होता है। वे वास्तव में कुछ और ही हैं। इस प्रकार, उन्हें विजय के प्रतीक के रूप में प्रदर्शित किया जाता है, और एक बार जब वे जीत लिए जाते हैं तो वे स्वाभाविक रूप से दूसरों के लिए एक प्रतिदर्श और आदर्श बन जाएँगे। इस्राएल में किए जा रहे पहले चरण की तुलना में कुछ भी अधिक प्रतीकात्मक नहीं था: इस्राएली सभी लोगों में से सबसे पवित्र और सबसे कम भ्रष्ट थे, और इसलिए इस देश में नए युग का उद्भव सर्वाधिक महत्व रखता था। ऐसा कहा जा सकता है कि मानव जाति के पूर्वज इस्राएल से आये, और यह कि इस्राएल परमेश्वर के कार्य का जन्मस्थान था। आरंभ में, ये लोग सर्वाधिक पवित्र थे, और वे सभी यहोवा की उपासना करते थे, और उन में परमेश्वर का कार्य सबसे बड़े परिणाम प्राप्त करने में सक्षम था। पूरी बाइबिल में दो युगों का कार्य दर्ज किया गया है: एक व्यवस्था के युग का कार्य था, और एक अनुग्रह के युग का कार्य था। पुराने विधान (ओल्ड टेस्टामेंट) में इस्राएलियों के लिए यहोवा के वचनों को और इस्राएल में उसके कार्यों कोदर्ज किया गया है; नये विधान में यहूदिया में यीशु के कार्य को दर्ज किया गया है। किन्तु बाइबल में कोई चीनी नाम क्यों नहीं है? क्योंकि परमेश्वर के कार्य के पहले दो हिस्से इस्राएल में किये गए थे, क्योंकि इस्राएल के लोग चुने हुए लोग थे—जिसका अर्थ है कि वे यहोवा के कार्य को स्वीकार करने वाले सबसे पहले लोग थे। वे समस्त मानवजाति में सबसे कम भ्रष्ट थे, और आरंभ में, वे परमेश्वर की खोज करने और उसका आदर करने का मन रखने वाले लोग थे। वे यहोवा के वचनों का पालन करते थे, और हमेशा मंदिर में सेवा करते थे, और याजकीय लबादे या मुकुट पहनते थे। वे परमेश्वर की पूजा करने वाले सबसे आरंभिक लोग थे, और उसके कार्य के सबसे आरंभिक विषयवस्तुथे। ये लोग संपूर्ण मानवजाति के लिए एक प्रतिदर्श और नमूना थे। वे पवित्रता और धार्मिकता के प्रतिदर्श और नमूने थे। अय्यूब, इब्राहीम, लूत या पतरस और तीमुथियुस जैसे लोग—सभी इस्राएली, और सर्वाधिक पवित्र प्रतिदर्श और नमूने थे। इस्राएल मानव जाति के बीच परमेश्वर की पूजा करने वाला सबसे आरंभिक देश था, और कहीं अन्यत्र की तुलना में अधिक धर्मी लोग यहाँ से आते थे। परमेश्वर ने उनमें कार्य किया ताकि भविष्य में वह पूरे देश में मानव जाति को बेहतर ढंग से प्रबंधित कर सके। उनकी उपलब्धियाँ और यहोवा की उनकी आराधना की धार्मिकता दर्ज की गई थी, ताकि वे अनुग्रह के युग के दौरान इस्राएल से परे लोगों के लिए प्रतिदर्शों और नमूनों के रूप में काम कर सकें; और उनकी क्रियाओं ने, आज के दिन तक, कई हजार वर्षों के कार्य को कायम रखा है।

दुनिया की नींव के बाद, परमेश्वर के कार्य का पहला चरण इस्राएल में पूरा किया गया था और इस प्रकार इस्राएल पृथ्वी पर परमेश्वर के कार्य का जन्मस्थान, और पृथ्वी पर परमेश्वर के कार्य का आधार था। यीशु के कार्य ने पूरे यहूदिया को आवृत किया। उसके कार्य के दौरान, यहूदिया के बाहर बहुत कम लोग इसके बारे में जानते थे, क्योंकि उसने यहूदिया से से बाहर कोई कार्य नहीं किया। आज, परमेश्वर का कार्य चीन में लाया गया है, और यह पूरी तरह इस क्षेत्र के भीतर किया जाता है। इस चरण के दौरान, चीन के बाहर कोई कार्य शुरू नहीं किया जाता है; चीन से बाहर इसके फैलने का कार्य बाद में आएगा। कार्य का यह चरण यीशु के कार्य के चरण के क्रम में है। यीशु ने छुटकारे का कार्य किया, और यह चरण वह कार्य है जो इसके पीछे आता है; छुटकारे का कार्य पूरा हो चुका है, और इस चरण में पवित्र आत्मा द्वारा गर्भधारण की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि कार्य का यह चरण अंतिम चरण से असदृश है, और, इसके अलावा, क्योंकि चीन इस्राएल के असदृश है। यीशु द्वारा किए गए कार्य का चरण छुटकारे का कार्य था। मनुष्य ने यीशु को देखा, और शीघ्र ही, उसका कार्य अन्य जातियों में फैल गया। आज, ऐसे कई लोग हैं जो अमेरिका, ब्रिटेन और रूस में परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, तो चीन में कम क्यों हैं? क्योंकि चीन सबसे बंद राष्ट्र है। वैसे तो, चीन परमेश्वर के मार्ग को स्वीकार करने वाला अंतिम था, और यहाँ तक कि अभी भी स्वीकार किए हुए इसे एक सौ वर्ष से भी कम हुआ है—अमेरिका और ब्रिटेन की तुलना में बहुत बाद में। परमेश्वर के कार्य का अंतिम चरण चीन की भूमि में किया जाता है ताकि वह अपने कार्य का अंत करे, और ताकि उसका समस्त कार्य सम्पन्न हो सके। इस्राएल के सभी लोगों ने यहोवा को अपना प्रभु कहा। उस समय, उन्होंने उसे अपने परिवार का मुखिया माना, और पूरा इस्राएल एक बड़ा परिवार बन गया जिसमें हर कोई अपने प्रभु यहोवा की उपासना करता था। यहोवा का आत्मा प्रायः उन पर प्रकट होता था, और वह उनसे बोलता था अपनी वाणी कहता था, और उनके जीवन का मार्गदर्शन करने के लिए बादल और ध्वनि के एक स्तंभ का उपयोग करता था। उस समय, पवित्रात्मा ने लोगों को अपनी वाणी के कथन से और बोलते हुए, इस्राएइल में सीधे मार्गदर्शन किया, और वे बादलों को देखते थे और वे मेघ की गड़गड़ाहट सुनते थे, और इस तरह से उसने कई हजारों वर्षों तक उनके जीवन का मार्गदर्शन किया। इस प्रकार, केवल इस्राएलियों ने ही हमेशा यहोवा की आराधना की है। वे मानते हैं कि यहोवा उनका परमेश्वर है, और अन्य जातियों का परमेश्वर नहीं है। यह आश्चर्य की बात नहीं है: आखिरकार, यहोवा ने उनके बीच करीब 4,000 वर्षों तक कार्य किया था। हजारों वर्षों तक नींद में रहने के बाद, चीन के देश में, केवल अब अधमों को पता चला है कि स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजें प्राकृतिक रूप से नहीं बनी थीं, बल्कि सृष्टा द्वारा बनाई गई थी। क्योंकि यह सुसमाचार विदेश से आया है, इसलिए वे सामंतवादी, प्रतिक्रियावादी मन मानते हैं कि वे सभी लोग जो इस सुसमाचार को स्वीकार कर रहे हैं वे एक भयानक अपराध कर रहे हैं, वे ऐसे कायर हैं जो अपने पूर्वज—बुद्ध—के साथ विश्वासघात करते हैं। इसके अलावा, ये सामंतवादी मन वाले बहुत से लोग पूछते हैं, कि चीनी लोग विदेशियों के परमेश्वर पर कैसे विश्वास कर सकते हैं? क्या वे अपने पूर्वजों के साथ विश्वासघात नहीं करते हैं? क्या वे दुष्टता नहीं कर रहे हैं? आज, लोग बहुत समय से भूले हुए हैं कि यहोवा उनका[क] परमेश्वर है। उन्होंने बहुत समय से सृष्टा को अपने मन में पीछे धकेल दिया है, और इसके बजाय वे क्रमिक विकास में विश्वास करते हैं, जिसका अर्थ है कि मनुष्य का क्रमिक विकास वानर से हुआ है और यह कि प्राकृतिक दुनिया सामान्य ढंग से अस्तित्व में आयी। मानवजाति के द्वारा आनंद लिया गया समस्त अच्छा भोजन प्रकृति द्वारा प्रदान जाता जाताहै, मनुष्य के जीवन और मृत्यु के लिए क्रम है, और कोई भी परमेश्वर विद्यमान नहीं है जो इस सभी पर शासन करता है। इसके अलावा, कई नास्तिक हैं जो मानते हैं कि सभी चीजों पर परमेश्वर का प्रभुत्व एकअंधविश्वास है। लेकिन क्या विज्ञान परमेश्वर के कार्य की जगह ले सकता है? क्या विज्ञान मानव जाति पर शासन कर सकता है? ऐसे देश में जहाँ नास्तिकता का शासन है, वहाँ सुसमाचार का प्रचार करना कोई आसान कार्य नहीं है, और इसमें बड़ी बाधाएँ शामिल हैं। आज, ऐसे लोग अधिक नहीं हैं जो इस तरह से परमेश्वर का विरोध करते हैं?

बहुत से लोगों ने यहोवा के कार्य के विरुद्ध यीशु के कार्य को प्रदर्शित किया, और जब उन्होंने विसंगतियाँ पाई, तो उन्होंने यीशु को सलीब पर ठोक दिया। लेकिन उनके कार्य के बीच असंगतता क्यों थी? यह आंशिक रूप से इसलिए थी क्योंकि यीशु ने नया कार्य किया था, और इसलिए क्योंकि यीशु के अपना कार्य शुरू करने से पहले किसी ने भी उसका वंश-क्रम नहीं लिखा था। यदि किसी ने लिखा होता, तो चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं होती, और तब भी किस ने यीशु को सलीब पर ठोका होता? यदि मत्ती ने कई दशकों पहले यीशु का वंश-क्रम लिखा होता, तो यीशु ने इस तरह के महान उत्पीड़न का सामना नहीं किया होता। क्या ऐसा नहीं है? जैसे ही लोग यीशु के वंश-क्रम को पढ़ते—कि वह इब्राहीम का पुत्र है, और दाऊद का मूल है—तो वे उसका उत्पीड़न करना बंद कर देते। क्या यह दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि उसका वंश-क्रम बहुत देर से लिखा गया था? और यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि बाइबल केवल परमेश्वर के कार्य के दो चरणों को ही दर्ज करती है: एक चरण जो व्यवस्था के युग का कार्य था, और एक जो अनुग्रह के युग का कार्य था; एक चरण जो कि यहोवा का कार्य था, और एक जो यीशु का कार्य था। कितना अच्छा होता यदि किसी महान नबी ने आज के कार्य के बारे में भविष्यवाणी की होती। बाइबल में "अंत के दिनों का कार्य" शीर्षक का एक अतिरिक्त खंड होता—क्या यह अधिक बेहतर नहीं होता? आज आदमी को इतनी कठिनाई के अधीन क्यों किया जाना चाहिए? तुम लोगों का इतना मुश्किल समय रहा था! यदि कोई घृणा किए जाने के योग्य है, तो वह अंत के दिनों के कार्य की भविष्यवाणी न करने के लिए यशायाह और दानिय्येल हैं, और यदि किसी को दोषी ठहराया जाना है, तो वह नए विधान के प्रेरित हैं जिन्होंने परमेश्वर के दूसरे देहधारण की वंश-क्रमावली को पहले सूचीबद्ध नहीं किया। यह कितने शर्म की बात है! तुम लोगों को साक्ष्य के लिए सभी जगह खोजना होगा, और यहाँ तक कि छोटे-छोटे वचनों के टुकड़ों को खोजने के बाद भी तुम लोग यह नहीं बता सकते कि क्या वे वास्तव में साक्ष्य हैं। कितना शर्मनाक है! परमेश्वर अपने कार्य में इतना रहस्यात्मक क्यों है? आज, बहुत से लोगों को अभी तक निर्णायक साक्ष्य नहीं मिले हैं, फिर भी वे इसे इनकार करने में असमर्थ हैं। तो उन्हें क्या करना चाहिए? वे दृढ़ता से परमेश्वर का अनुसरण नहीं कर सकते हैं, फिर भी वे इस तरह के संदेह में आगे भी नहीं बढ़ सकते हैं। और इसलिए, कई "चतुर और प्रतिभाशाली विद्वान" जब वे परमेश्वर का अनुसरण करते हैं तो "प्रयास करें और देखें" की प्रवृत्ति को अंगीकार करते हैं। यह बहुत ज्यादा मुसीबत है! यदि मत्ती, मरकुस, लूका, यूहन्ना भविष्य के बारे में पहले से बताने में सक्षम होते, तो क्या चीजें बहुत आसान नहीं हो गई होती? यह बेहतर होता यदि यूहन्ना ने राज्य में जीवन की आंतरिक सच्चाई को देख लिया होता—कितने दुर्भाग्य की बात है कि उसने केवल दर्शन देखे और पृथ्वी पर वास्तविक, भौतिक कार्य नहीं देखा। यह कितने शर्म की बात है! परमेश्वर की समस्या क्या है? इस्राएल में उसका कार्य इतनी अच्छी तरह से चलने के बाद, अब वह चीन में क्यों आ गया है, और, उसे देह क्यों बनना पड़ा, और क्यों लोगों के बीच व्यक्तिगत रूप से कार्य करना और रहना पड़ा? परमेश्वर मनुष्य के प्रति अत्यधिक विचारशून्य है! उसने न केवल लोगों को पहले से नहीं बताया, बल्कि अचानक अपनी ताड़ना और न्याय ले आया। इसका वास्तव में कोई मतलब नहीं है! जब पहली बार परमेश्वर देह बना, तो उसने मनुष्य को समस्त आंतरिक सत्य के बारे में पहले से नहीं बताने के परिणामस्वरूप अत्यंत कठिनाई को झेला। निश्चित रूप से वह इसे नहीं भूल सका होगा? और इसलिए उसने अब भी इस बार मनुष्य को क्यों नहीं बताया? आज, यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि बाइबल में केवल 66 पुस्तकें हैं। इसमें अंत के दिनों के कार्य की भविष्यवाणी करने वाली सिर्फ एक पुस्तक और होने की आवश्यकता है! क्या तुम्हें नहीं लगता है? यहाँ तक कि यहोवा, यशायाह और दाऊद ने भी आज के कार्य का कोई उल्लेख नहीं किया। 4,000 वर्षों से अधिक समय के अलगाव के साथ, उन्हें वर्तमान में से और ज़्यादा हटा दिया गया था। न ही यीशु ने, इसके बारे में सिर्फ थोड़ा सा बोलते हुए, आज के कार्य की पूरी तरह से भविष्यवाणी की, और तब भी मनुष्य को अपर्याप्त साक्ष्य मिलता है। यदि तुम आज के कार्य की पहले के कार्य के साथ तुलना करते हो, तो दोनों एक दूसरे के साथ मिलान कैसे कर सकते हैं? यहोवा के कार्य का चरण इस्राएल पर निर्देशित था, इसलिए यदि तुम आज के कार्य की इसके साथ तुलना करते हो तो इससे भी अधिक असंगति होगी; इन दो की तुलना की ही नहीं जा सकती है। न ही तुम इस्राएल के हो, या एक यहूदी हो; तुम्हारी क्षमता और तुम्हारे बारे मे हर चीज का अभाव है—तुम उनसे स्वयं की तुलना कैसे कर सकते हो? क्या यह संभव है? जान लो कि आज राज्य का युग है, और यह व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग से भिन्न है। किसी भी हालत में, किसी फार्मूले को ना जाँचो और उसे लागू न करो; परमेश्वर को ऐसे किसी फार्मूले में नहीं पाया जा सकता है।

यीशु ने अपने जन्म के 29 वर्षों के दौरान कैसे निर्वाह किया? बाइबिल में उसके बचपन और उसकी युवावस्था के बारे में कुछ भी दर्ज नहीं किया गया है; क्यातुम जानते हो कि वह किसकी तरह का था? क्या ऐसा हो सकता है कि उसका कोई बचपन या युवावस्था नहीं थी, और यह कि जब वह पैदा हुआ था तो वह पहले से ही 30 वर्ष का था? तुम बहुत कम जानते हो, इसलिए अपने विचारों को प्रसारित करने में इतने लापरवाह मत बनो। इससे तुम्हारा कोई भला नहीं होता है! बाइबिल में केवल यह दर्ज किया गया है कि यीशु के 30वें जन्मदिन से पहले, उसका बपतिस्मा किया गया था और शैतान के प्रलोभन को झेलने के लिए बीहड़ में पवित्र आत्मा द्वारा उसकी अगुआई की गई थी। और चार सुसमाचारों में उसके साढ़े तीन साल का कार्य दर्ज है। उसके बचपन और युवावस्था का कोई अभिलेख नहीं है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि उसका कोई बचपन और उसकी युवावस्था नहीं थी; यह सिर्फ इतना ही है, कि आरंभ में, उसने कोई कार्य नहीं किया, और वह एक साधारण व्यक्ति था। एक साधारण व्यक्ति होने के नाते, तब, क्या वह युवावस्था के बिना 33 वर्ष तक रह सकता था? क्या उसका बचपन नहीं रहा होगा? क्या वह 11 या 12 या 17 या 18 वर्ष की उम्र से गुजरे बिना अचानक 33.5 वर्ष की उम्र में पहुँच सका होगा? मनुष्य उसके बारे में जो कुछ भी सोचता है वह अलौकिक है। मनुष्य के पास सत्य नहीं है! इसमें कोई संदेह नहीं है कि देहधारी परमेश्वर साधारण और सामान्य मानवता से सम्पन्न है, किन्तु जब वह अपना कार्य करता है, तो वह सीधे अपनी अपूर्ण मानवता और पूर्ण दिव्यता के साथ होता है। इसी वजह से लोग आज के कार्य के बारे में, और यहाँ तक कि यीशु के कार्य के बारे में भी संदेह करते हैं। यद्यपि परमेश्वर के दो बार देह बनने में उसका कार्य भिन्न रहा, किन्तु उसका सार भिन्न नहीं रहा। निस्संदेह, यदि तुम चार सुसमाचारों के अभिलेखों को पढ़ो, तो अंतर बहुत बड़े हैं। तुम यीशु के बचपन और युवावस्था के दौरान उसके जीवन में कैसे वापस आ सकते हो? तुम यीशु की सामान्य मानवता को कैसे समझ सकते हो? हो सकता है कि आज तुम्हें परमेश्वर की मानवता की एक मजबूत समझ हो, फिर भी तुम्हें यीशु की मानवता की कोई समझ नहीं है, तुम इसे समझते तो बहुत ही कम हो। यदि इसे मत्ती द्वारा दर्ज नहीं किया गया होता, तो तुम्हें यीशु की मानवता का कोई आभास नहीं होता। हो सकता है, कि जब मैं तुम्हें यीशु की जिंदगी के दौरान उसकी कहानियों के बारे में बताऊँगा, और तुम्हें यीशु के बचपन और युवावस्था के आंतरिक सत्य बताऊँगा, तो तुम इनकार कर दोगे: नहीं! वह ऐसा नहीं हो सकता है। उसमें कोई कमजोरी नहीं हो सकती है, उसमें मानवता तो बहुत ही कम होनी चाहिए! यहाँ तक कि तुम चिल्लाओगे और चीखोगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम यीशु को नहीं समझते हो कि तुम्हारे पास मेरी धारणाएँ हैं। तुम यीशु को अत्यधिक दिव्य होना, उसके बारे में देह का कुछ भी न होना, मानते हो। किन्तु तथ्य तब भी तथ्य हैं। कोई भी तथ्यों की सच्चाई की अवहेलना में नहीं बोलना चाहता है, क्योंकि जब मैं बोलता हूँ तो यह सच्चाई के संबंध में होता है; यह अटकलें नहीं है, न ही यह भविष्यवाणी है। जान लो कि परमेश्वर बड़ी ऊँचाइयों तक उठ सकता है, और इसके अलावा, कि वह बड़ी गहराईयों में छिप सकता है। वह तुम्हारी बुद्धि द्वारा अकल्पनीय है, वह समस्त प्राणियों का परमेश्वर है, और किसी विशेष व्यक्ति द्वारा कल्पना किया गया कोई निजी परमेश्वर नहीं है।

स्रोत: [सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया](https://hi.godfootsteps.org)
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सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की मूलभूत मान्यताएँ

सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की मूलभूत मान्यताएँ

**सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के सिद्धांत

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ईसाई धर्म के सिद्धांत बाइबल से उत्पन्न होते हैं, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के सिद्धांत उन सभी सच्चाइयों से उत्पन्न होते हैं, जो परमेश्वर द्वारा सृष्टि के समय से लेकर व्यवस्था के युग, अनुग्रह के युग और राज्य के युग के कार्य के दौरान व्यक्त किए गए हैं। इसका मतलब यह है कि पुराना नियम, नया नियम और राज्य के युग की बाइबल—लौटे हुए प्रभु यीशु, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, के द्वारा व्यक्त 'वचन देह में प्रकट होता है'—सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की मूलभूत मान्यताएँ और सिद्धांत हैं। पुराना नियम व्यवस्था के युग के दौरान यहोवा परमेश्वर के नियमों और आदेशों को पारित करने और मनुष्य के जीवन का मार्गदर्शन करने सम्बन्धी परमेश्वर के कार्य का आलेख करता है; नया नियम अनुग्रह के युग के दौरान प्रभु यीशु द्वारा किए गए छुटकारे के कार्य को दर्ज करता है; और 'वचन देह में प्रकट होता है' में राज्य के युग के दौरान मानव जाति की शुद्धि और उद्धार के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त सभी सत्य हैं, साथ ही आखिरी दिनों के दौरान परमेश्वर के न्याय के कार्य का एक विवरण भी। कार्य के तीनों चरणों में परमेश्वर के सभी उदगार ही सच्ची बाइबल हैं, और कार्य के इन तीनों चरणों के दौरान परमेश्वर के सारे कथन, अर्थात कार्य के इन तीनों चरणों के दौरान परमेश्वर द्वारा व्यक्त किये गए सभी सत्य, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की मूलभूत मान्यताएँ हैं। ये तीन पवित्र ग्रंथ सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की मूलभूत मान्यताएँ और सिद्धांत हैं।

ईसाई धर्म अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु के कार्य से उत्पन्न हुआ था, लेकिन प्रभु यीशु मसीह ने, जिनको यह मानता ​​है, अनुग्रह के युग में केवल छुटकारे का कार्य किया था। चूंकि देहधारी प्रभु यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया था और उन्होंने मनुष्य के पापों की बलि के रूप में सेवा की, मनुष्य को शैतान के हाथों से मुक्त किया और नियमों द्वारा उसे निंदा और फटकार पाने से छुड़ाया, फिर भी मनुष्य को अपने पापों की माफ़ी और परमेश्वर के कृपापूर्ण अनुग्रह और आशीर्वाद का आनंद पाने के लिए परमेश्वर के सामने आकर अपने पापों को कबूल करना और पश्चाताप करना ज़रूरी था। यह प्रभु यीशु द्वारा किया गया छुटकारे का कार्य था। यद्यपि मनुष्य के पापों को प्रभु यीशु के छुटकारे के द्वारा माफ किया गया था, मनुष्य को उसके पापी स्वभाव से मुक्त नहीं किया गया था, वह अभी भी उसके द्वारा बाध्य और नियंत्रित था, और वह पाप किये बिना और अहंकारी तथा अभिमानी बनकर परमेश्वर का विरोध किये बिना, अपने यश और मुनाफे के लिए प्रयास किये बगैर, ईर्ष्यापूर्ण और विवादी हुए बिना, झूठ बोलने और लोगों को धोखा दिए बगैर, संसार के बुरे तरीकों का अनुसरण करने आदि के बिना रह नहीं सकता था। मनुष्य पाप के बंधन से मुक्त नहीं हुआ था और पवित्र नहीं बना था, और इस तरह प्रभु यीशु ने कई बार भविष्यवाणी की थी कि वे आखिरी दिनों के न्याय के कार्य को पूरा करने के लिए फिर से आएँगे, यह कहते हुए कि: "देख, मैं शीघ्र आनेवाला हूँ;" (प्रकाशितवाक्य 22:12)। "यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता; क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिये आया जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा" (यूहन्ना 12:47-48) पतरस के पहले धर्मपत्र में यह भी लिखा है कि "क्योंकि वह समय आ पहुँचा है कि पहले परमेश्‍वर के लोगों का न्याय किया जाए" (1 पतरस 4:17)। सर्वशक्तिमान परमेश्वर, आखिरी दिनों के मसीह, लौटे हुए प्रभु यीशु हैं। उन्होंने मनुष्य की शुद्धि और उद्धार के लिए सभी सत्यों को व्यक्त किया है, परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले निर्णय के कार्य को किया है, और बाइबल की भविष्यवाणियों को पूर्ण रूप से पूरा किया है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त 'वचन देह में प्रकट होता है' अंतिम दिनों में परमेश्वर के न्याय के कार्य का एक विवरण है और इसके बारे में प्रकाशित वाक्य की पुस्तक में भविष्यवाणी की गई थी "आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है" (प्रकाशितवाक्य 2:7)। सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा किया गया न्याय का कार्य मानव जाति के लिए परमेश्वर के उद्धार के कार्य का अंतिम चरण है, और यह इसका सबसे मौलिक और निर्णायक चरण भी है। यदि मनुष्य परमेश्वर द्वारा बचाया जाना और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना चाहता है, तो उसे परमेश्वर के न्याय के कार्य को स्वीकार करना चाहिए, और इसी में प्रभु यीशु के इन वचनों को पूरा किया गया है: "आधी रात को धूम मची: 'देखो, दूल्हा आ रहा है! उससे भेंट करने के लिये चलो'" (मत्ती 25:6)। "देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ" (प्रकाशितवाक्य 3:20)। केवल अगर मनुष्य परमेश्वर के वचनों के न्याय और उनकी ताड़ना को स्वीकार करता है और उनका अनुभव करता है, तो वह परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिकता को जान पाता है, शैतान द्वारा की गई मनुष्य की भ्रष्टता के सार और उसकी प्रकृति को और उसके सच्चे तथ्य को जान सकता है, नेकी से परमेश्वर के सामने पश्चाताप कर सकता है, स्वयं को समस्त पाप से मुक्त कर सकता है, पवित्रता प्राप्त कर सकता है, एक ऐसा व्यक्ति बन सकता है जो परमेश्वर की आज्ञा का पालन और परमेश्वर की पूजा करता हो, और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। केवल तभी वह परमेश्वर के वादों और आशीषों के उत्तराधिकार को पाने के योग्य होगा, और उस सुंदर गंतव्य को प्राप्त करेगा।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के सिद्धांत, परमेश्वर द्वारा उनके कार्य के तीन चरणों में व्यक्त सभी सत्यों से उत्पन्न होते हैं, जिसका अर्थ है कि वे बाइबल तथा 'वचन देह में प्रकट होता है' में दर्ज किए गए ईश्वर के वचनों से उत्पन्न होते हैं। परमेश्वर ने सृष्टि के सर्जन के बाद मानव जाति को बचाने का काम शुरू कर दिया, और मनुष्य के उद्धार के लिए उनकी प्रबंधन योजना तब तक पूरी नहीं होगी जब तक कि वे आखिरी दिनों के दौरान परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले निर्णय के कार्य को खत्म नहीं करेंगे। कार्य के तीन चरणों में परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचनों और सभी सत्यों से हम पूरी तरह से यह देख पाएँगे कि चाहे वह शुरुआत में व्यवस्था के युग में मनुष्य के उपयोग द्वारा किया गया परमेश्वर का कार्य हो, या वह अनुग्रह और राज्य के युगों में दो बार देह-धारण के समय किया गया कार्य हो, ये सभी एक आत्मा के उद्गार और उसकी सच्चाई की अभिव्यक्ति हैं; सार में, बस एक ही परमेश्वर हैं जो बोलते और कार्य करते हैं। इसलिए, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के सिद्धांत बाइबल और 'वचन देह में प्रकट होता है' से उत्पन्न होते हैं।

(2) 'वचन देह में प्रकट होता है' के बारे में

'वचन देह में प्रकट होता है' सर्वशक्तिमान परमेश्वर, आखिरी दिनों के मसीह, के व्यक्तिगत कथन है, और यही वे सारे सत्य हैं जो कि परमेश्वर ने आखिरी दिनों के अपने न्याय के कार्य के दौरान मनुष्य को शुद्ध करने और बचाने के लिए व्यक्त किये हैं। ये सत्य पवित्र आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति हैं, परमेश्वर के जीवन और तत्व का प्रकाशन हैं, और परमेश्वर के स्वभाव की, और उनके पास क्या है और वे क्या है, इसकी अभिव्यक्ति हैं। यह एक ही मार्ग है जिससे होकर मनुष्य परमेश्वर को जान सकता है और शुद्ध होकर बचाया जा सकता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए वचन मनुष्य के कार्यों और आचरण का सर्वोच्च सिद्धांत हैं, और मनुष्य के जीवन के लिए इससे उच्चतर और कोई सूत्र नहीं हैं।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के ईसाई रोज 'वचन देह में प्रकट होता है' में परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं ठीक उसी तरह जैसे ईसाई धर्म के ईसाई बाइबल पढ़ते हैं। सभी ईसाई परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन के मार्गदर्शक और जीवन के समस्त सूत्रों में सर्वोच्च मानते हैं। अनुग्रह के युग में, सभी ईसाइयों ने बाइबल पढ़ी और बाइबल के उपदेश सुने। धीरे-धीरे लोगों के व्यवहार में परिवर्तन हुआ, और उन्होंने कम, और भी कम पाप किये। इसी तरह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढने और परमेश्वर के वचनों की सहभागिता के माध्यम से, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के ईसाई धीरे-धीरे सच्चाई को समझते हैं और पाप के बंधन से मुक्त हो जाते हैं, वे अब और पाप नहीं करते और परमेश्वर का विरोध नहीं करते, और परमेश्वर के साथ अनुकूल बन जाते हैं। तथ्य यह साबित करते हैं कि केवल परमेश्वर के वचनों को पढ़ने से मनुष्य शुद्ध और परिवर्तित हो सकता है और वास्तविक व्यक्ति की छवि को जी सकता है। ये वे तथ्य हैं जिनसे कोई भी इनकार नहीं कर सकता है। जब परमेश्वर ने व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग में कार्य किया तो परमेश्वर के वचनों को बाइबल में दर्ज किया गया था, जबकि 'वचन देह में प्रकट होता है' में परमेश्वर द्वारा आखिरी दिनों के कार्य के दौरान व्यक्त किए गए वचन हैं। दोनों का स्रोत पवित्र आत्मा से है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों और कार्य ने बाइबल की भविष्यवाणियों को पूर्ण रूप से पूरा किया है, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर लौटे हुए प्रभु यीशु हैं, जैसा कि प्रभु यीशु ने कहा था: "मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)। और उसी तरह, प्रकाशित वाक्य में भी यह भविष्यवाणी की गई है कि, "जिसके कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है।" (प्रकाशितवाक्य 2:7)। "जो सिंहासन पर बैठा था, मैं ने उसके दाहिने हाथ में एक पुस्तक देखी जो भीतर और बाहर लिखी हुई थी, और वह सात मुहर लगाकर बन्द की गई थी. … देख, यहूदा के गोत्र का वह सिंह जो दाऊद का मूल है, उस पुस्तक को खोलने और उसकी सातों मुहरें तोड़ने के लिये जयवन्त हुआ है।" (प्रकाशितवाक्य 5:1, 5)।

आज, हम सभी ने एक तथ्य को देखा है: सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सभी वचन सत्य हैं, और उन में अधिकार और शक्ति है--वे परमेश्वर की वाणी हैं। कोई भी इस से इनकार नहीं कर सकता या इसको बदल नहीं सकता है। 'वचन देह में प्रकट होता है' इंटरनेट पर सभी देशों और क्षेत्रों के लोगों के द्वारा खोज करने और जांच के लिए मुक्त रूप से उपलब्ध है। कोई भी इससे इनकार करने की हिम्मत नहीं करता कि वे परमेश्वर के वचन हैं, या वे सच्चाई हैं। परमेश्वर के वचन सारी मानव जाति को अग्रसर कर रहे हैं, लोगों ने धीरे धीरे परमेश्वर के वचनों के बीच जागृत होना शुरू कर दिया है, और वे धीरे-धीरे सच्चाई की स्वीकृति तथा सच्चाई के ज्ञान की ओर बढ़ रहे हैं। राज्य का युग वह युग है जब सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पृथ्वी पर शासन करते हैं। परमेश्वर के एक-एक वचन को कार्यान्वित और पूर्ण किया जाएगा। जिस तरह परमेश्वर के सभी विश्वासी आज बाइबल को स्वीकार करते हैं, जो लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, वे निकट भविष्य में मानेंगे कि 'वचन देह में प्रकट होता है' आखिरी दिनों में परमेश्वर के उदगार है। आज, 'वचन देह में प्रकट होता है' सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की मान्यताओं का आधार है, और यह (पुस्तक) निश्चित रूप से अगले युग में सारी मानव जाति के अस्तित्व की नींव बन जाएगी।

(3) परमेश्वर के नाम और परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों के बारे में

शैतान के द्वारा भ्रष्ट होने के बाद, मनुष्य शैतान के अधिकार क्षेत्र में रहता है और उसका भ्रष्टाचार निरंतर गहरा हो गया है। मनुष्य खुद को बचा नहीं सकता, और उसे परमेश्वर द्वारा उद्धार की ज़रूरत है। भ्रष्ट मानव जाति की ज़रूरतों के अनुसार, परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में, अनुग्रह के युग में, और राज्य के युग में तीन चरणों में कार्य किया है। व्यवस्था के युग में, परमेश्वर ने नियमों और आदेशों को पारित करने और मनुष्य के जीवन का मार्गदर्शन करने का कार्य किया। अनुग्रह के युग में, परमेश्वर देह बने और व्यवस्था के युग में उनके किये कार्य के आधार पर, क्रूस पर चढ़ने का कार्य किया और मनुष्य को पाप से छुड़ाया। राज्य के युग में, परमेश्वर एक बार फिर देह बन गए हैं, और अनुग्रह के युग के छुटकारे के कार्य के आधार पर, परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को करते हैं, मनुष्य की शुद्धि और उसके उद्धार के लिए सभी सत्यों को व्यक्त करते हैं, और हमारे लिए शुद्धि और मुक्ति की खोज का एकमात्र तरीका ले आते हैं। सिर्फ अगर हम सच्चाई की वास्तविकता को अपने जीवन के रूप में हासिल करें, और उसके माध्यम से हम ऐसे लोग बन जाएँ जो परमेश्वर की आज्ञा मानते हैं और पूजा करते हैं, तभी हम परमेश्वर के राज्य में ले जाये जाने और परमेश्वर के वादे और आशीषें प्राप्त करने के योग्य होंगे। परमेश्वर द्वारा मनुष्य के उद्धार के कार्य के तीन चरण आपस में घनिष्टता से जुड़े हुए हैं, प्रत्येक चरण अपरिहार्य है, प्रत्येक पिछले चरण से अधिक ऊंचा और गहरा जाता है, वे सभी एक ही परमेश्वर के कार्य हैं, और मानव जाति के उद्धार का पूरा कार्य परमेश्वर के कार्य के ये तीन चरण ही हैं।

ये तीन नाम—यहोवा, यीशु, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर—वे अलग-अलग नाम हैं, जिन्हें परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में, अनुग्रह के युग में, और राज्य के युग में ग्रहण किए हैं। परमेश्वर विभिन्न नाम लेते हैं क्योंकि अलग-अलग युग में उनका कार्य बदलता रहता है। परमेश्वर एक नया युग शुरू करने और उस युग के कार्य का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक नए नाम का उपयोग करते हैं। परमेश्वर का नाम व्यवस्था के युग में यहोवा था, और अनुग्रह के युग में यीशु। परमेश्वर एक नए नाम—सर्वशक्तिमान परमेश्वर—का प्रयोग करते हैं राज्य के युग में, प्रकाशित वाक्य की भविष्यवाणियों को पूरा करते हुए: "फिलदिलफिया की कलीसिया के दूत को यह लिख : …. जो जय पाए उसे मैं अपने परमेश्‍वर के मन्दिर में एक खंभा बनाऊँगा, और वह फिर कभी बाहर न निकलेगा; और मैं अपने परमेश्‍वर का नाम और अपने परमेश्‍वर के नगर अर्थात् नये यरूशलेम का नाम जो मेरे परमेश्‍वर के पास से स्वर्ग पर से उतरनेवाला है,और अपना नया नाम उस पर लिखूँगा।" (प्रकाशितवाक्य 3:7, 12)। "प्रभु परमेश्‍वर, जो है और जो था और जो आनेवाला है,जो सर्वशक्‍तिमान है, यह कहता है, मैं ही अल्फ़ा और ओमेगा हूँ" (प्रकाशितवाक्य 1:8)। यद्यपि इन तीन युगों में परमेश्वर के नाम और कार्य अलग-अलग हैं, तत्व में केवल एक ही परमेश्वर हैं, और एक ही स्रोत है।

मनुष्य को बचाने के लिए परमेश्वर के कार्य में मुख्य रूप से तीन चरण शामिल हैं। उन्होंने प्रत्येक युग में एक अलग नाम का प्रयोग किया है, लेकिन परमेश्वर का तत्व कभी नहीं बदलता है। कार्य के तीनों चरण एक ही परमेश्वर द्वारा किये जाते हैं; इस प्रकार, यहोवा, यीशु और सर्वशक्तिमान परमेश्वर एक ही परमेश्वर हैं। यीशु यहोवा के प्रकटन थे, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर लौटे हुए प्रभु यीशु हैं, और इसलिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर एक सच्चे परमेश्वर हैं जिन्होंने स्वर्ग और पृथ्वी और सारी चीजों का सर्जन किया, समस्त चीज़ों को आदेश देते हैं, और सब कुछ पर संप्रभुता रखते हैं, और वे ही अनन्त और एक मात्र सृष्टा हैं।

मनुष्य को बचाने के कार्य के तीन चरणों में, परमेश्वर ने मनुष्य को अपने पूरे स्वभाव से अवगत कराया है, जिससे हम यह देख सकें कि परमेश्वर का स्वभाव न केवल दया और प्रेम है, बल्कि धार्मिकता, महिमा और क्रोध भी है, कि उनका तत्व पवित्रता और धार्मिकता है, और सच्चाई और प्रेम है, और यह कि परमेश्वर का स्वभाव और परमेश्वर का अधिकार और उनकी शक्ति किसी भी सर्जित या असर्जित सत्ता के पास नहीं है। हम मानते हैं कि सृष्टि के समय से लेकर दुनिया के अंत तक परमेश्वर ने जो भी वचन कहे हैं वे सभी सत्य हैं। स्वर्ग और पृथ्वी खत्म हो जाएँगे, लेकिन परमेश्वर के वचन कभी ओझल नहीं होंगे, और उनमें से एक-एक को कार्यान्वित किया जाएगा!

स्रोत:सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की मूलभूत मान्यताएँ

अंतिम दिनों के मसीह के कथन "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" (भाग चार)

अंतिम दिनों के मसीह के कथन "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" (भाग चार)

सर्वशक्तिमान परमेश्वर
कहते हैं "हम यहाँ पर आदर्श वचनों को पढ़ते हैं जिन्हें अय्यूब के द्वारा बोला गया था, ऐसे वचन जो इस बात का प्रमाण हैं कि उसने शैतान पर विजय पा लिया था। उसने कहा, "मैं अपनी माँ के पेट से नंगा निकला और वहीं नंगा लौट जाऊँगा।" यह परमेश्वर के प्रति अय्यूब की आज्ञाकारिता की मनोवृत्ति है। इसके आगे, फिर उसने कहा: "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।" अय्यूब के द्वारा कहे गए इन वचनों से प्रमाणित होता है कि परमेश्वर मनुष्य के हृदय की गहराई का अवलोकन करता है, यह कि वह मनुष्य के मस्तिष्क के भीतर देख सकता है, और वे साबित करते हैं कि अय्यूब के विषय में उसकी स्वीकृति त्रुटिहीन है, और यह कि यह मनुष्य धर्मी था जिसे परमेश्वर के द्वारा स्वीकार किया गया था। "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।" ये वचन परमेश्वर के प्रति अय्यूब की गवाही हैं।......इन सब बातों में भी अय्यूब ने अपने मुँह से कोई पाप नहीं किया। उसने न केवल अपने होंठों से पाप नहीं किया, बल्कि उसने अपने हृदय में परमेश्वर के बारे में कोई शिकायत नहीं की। उसने परमेश्वर के बारे में कष्टदायक शब्दों को नहीं कहा, न ही उसने परमेश्वर के विरूद्ध पाप किया। न केवल उसके मुँह ने परमेश्वर के नाम को धन्य कहा, बल्कि उसने अपने हृदय में भी परमेश्वर के नाम को धन्य कहा; उसका मुँह एवं हृदय एक ही था। यही वह सच्चा अय्यूब था जिसे परमेश्वर के द्वारा देखा गया था, और यही वह प्रमुख कारण था कि क्यों परमेश्वर ने अय्यूब को हृदय में संजोकर रखा था।"

और पढ़ें:परमेश्वर के वचनों के पठन - परमेश्वर के नवीनतम कथन

Hindi Christian Movie | खोलें दिल की ज़ंजीरें | So Happy to Obey God's Arrangements (Hindi Dubbed)

**Hindi Christian Movie | खोलें दिल की ज़ंजीरें | So Happy to Obey God's Arrangements (Hindi Dubbed)

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चन ज़ी एक बेहद गरीब किसान परिवार में पैदा हुए थे। स्कूल में पढ़ाये गये "ज्ञान आपकी नियति को बदल सकता है" और "आपकी नियति आपके अपने हाथ में है" के चलते, स्कूल में ये उनके आदर्श-वाक्य बन गये। उन्हें यकीन था कि जब तक वे लगातार कड़ी मेहनत करेंगे, वे दूसरे लोगों से एक कदम आगे रहेंगे, योग्यता और शोहरत हासिल करेंगे। विश्वविद्यालय से स्नातक होने के बाद, चन ज़ी को विदेश व्यापार में एक अच्छे वेतनवाली नौकरी मिल गयी। लेकिन वे अपने मौजूदा हालातों से बिल्कुल भी खुश नहीं थे। दूसरों से एक कदम आगे रहने के अपने आदर्श को पाने के लिए, उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी और खुद की ट्रेडिंग कंपनी खड़ी की। लेकिन अच्छा वक्त ज़्यादा दिन नहीं चला। परिचालन अच्छा न होने के कारण, ग्राहक कम हो गये, और कंपनी का व्यवसाय धीमा हो गया। अंत में, कंपनी चल नहीं पायी। कंपनी का व्यवसाय बंद हो जाने के बाद भी, चन ज़ी हार स्वीकार करने को बिल्कुल तैयार नहीं थे। उन्हें यकीन था कि अपनी खुद की अक्ल और काबिलियत के भरोसे जब तक वे मेहनत का पसीना बहायेंगे, वे अपना व्यवसाय फिर से खड़ा कर लेंगे। बाद में, चन ज़ी ने एक डिजिटल मार्केटिंग वेबसाइट चालू की और इंटरनेट पर सामान बेचने का कारोबार शुरू किया। कई सालों तक व्यस्तता के साथ खूब भाग-दौड़ करने के बाद भी वे फिर से कुछ हासिल नहीं कर पाये। चन ज़ी जबरदस्त हताशा और मायूसी में डूब गये....

2016 में, चन ज़ी का परिवार अमेरिका रहने चला गया। अपनी पत्नी की मदद से, उन्होंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार कर लिया। परमेश्वर के वचनों को पढ़कर चन ज़ी आखिर यह समझ सके कि परमेश्वर मानवजाति की नियति पर नियंत्रण करते हैं, और मनुष्य अपनी खुद की काबिलियत के भरोसे अपने मुकद्दर को नहीं बदल सकता। उन्होंने मनुष्य के जीवनकाल में उसकी मुसीबतों के स्रोत के बारे में जाना, और यह भी समझा कि शैतान ने किस तरह से मानवजाति को भ्रष्ट कर दिया है। वे यह जान पाये कि अगर मनुष्य को एक सार्थक जीवन जीना है, तो उसे परमेश्वर की शरण में आना होगा, उसे परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करना होगा, ताकि शुद्धिकरण पा सके, और परमेश्वर के वचनों पर भरोसा करते हुए जीना होगा, तभी वह परमेश्वर की सराहना पा सकेगा। चन ज़ी ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों में निहित कुछ सत्यों को समझ लिया, जीवन के बारे में सही नज़रिया अपनाया, अपनी पूरी ज़िंदगी परमेश्वर को सौंप दी, परमेश्वर के नियंत्रण और उनकी व्यवस्थाओं का पालन किया, और अंत में “किसी की नियति उसके खुद के हाथ में होती है” की ज़ंजीर से छूट गये, इस तरह उन्होंने सुकून और आज़ादी हासिल की। तब से वे जीवन के बेदाग़ और सही रास्ते पर चल पड़े।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम" (भाग दो)

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम" (भाग दो)

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "जो कुछ मनुष्य देखता, अनुभव करता, और कल्पना कर सकता है उसे वह अभिव्यक्त करता है। भले ही ये सिद्धान्त या धारणाएं हों, इन सभी तक मनुष्य की सोच पहुंच सकती है। मनुष्य के कार्य के आकार की परवाह किए बगैर, यह मनुष्य के अनुभव के दायरे, जो मनुष्य देखता है, या जिसकी मनुष्य कल्पना या जिसका विचार कर सकता है उनसे बढ़कर नहीं हो सकता है। जो कुछ परमेश्वर प्रगट करता है परमेश्वर स्वयं वही है, और यह मनुष्य की पहुंच से परे है, और यह मनुष्य की सोच से परे है। वह सम्पूर्ण मानवजाति की अगुवाई करने के अपने कार्य को अभिव्यक्त करता है, और यह मानवजाति के अनुभव के विवरणों के विषय से सम्बद्ध नहीं है, परन्तु इसके बजाए यह उसके अपने प्रबंधन से सम्बन्धित है। मनुष्य अपने अनुभव को अभिव्यक्त करता है, जबकि परमेश्वर अपने अस्तित्व को अभिव्यक्त करता है - यह अस्तित्व उसका अंतर्निहित स्वभाव है और यह मनुष्य की पहुंच से परे है।"

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परमेश्वर के वचनों के पठन - परमेश्वर के नवीनतम कथन

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तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है

तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है

**सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है

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तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में क्या पता होना चाहिए? आत्मा, व्यक्तित्व और वचन मिलकर ही स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर को बनाते हैं; और यही स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर का वास्तविक अर्थ है। यदि तू सिर्फ़ व्यक्तित्व के बारे में जानता है, यदि तू उसकी आदतों, और उसकी शख्सियत के बारे में जानता है, लेकिन तू आत्मा के कार्य या देह में आत्मा के कार्य के बारे में कुछ नहीं जानता है, और व्यावहारिक परमेश्वर में परमेश्वर के आत्मा के कार्य के बारे में कुछ भी जाने बिना, सिर्फ़ आत्मा और वचन पर ध्यान देता है, और केवल आत्मा के सामने प्रार्थना करता है, तो यह साबित करता है कि तुझे व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं है। व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में ज्ञान में उसके वचनों को जानना और अनुभव करना, और उन नियमों और सिद्धांतों को समझना जिनके द्वारा पवित्र आत्मा कार्य करता है, और परमेश्वर के आत्मा द्वारा देह में कार्य करने के तरीके को समझना शामिल है। इसी तरह, इसमें यह जानना भी शामिल है कि देह में परमेश्वर का हर कार्य आत्मा के द्वारा निर्देशित होता है, और उसके द्वारा बोले गए वचन आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। इसलिये, यदि तू व्यावहारिक परमेश्वर को जानना चाहता है, तो तुझे मुख्य रूप से यह जानना है कि परमेश्वर कैसे अपनी मानवीयता में, और अपनी ईश्वरीयता में कार्य करता है; यह सम्बन्ध रखता है आत्मा की अभिव्यक्ति से, जिससे सभी लोगों का जुड़ाव है।

वह कौन सा पहलु है जो आत्मा की अभिव्यक्तियों में शामिल है? कभी-कभी व्यावहारिक परमेश्वर अपनी मानवीयता में कार्य करता है और कभी-कभी अपनी ईश्वरीयता में लेकिन कुल मिलाकर, दोनों मामलों में कमान आत्मा के पास होती है। लोगों के भीतर जैसी भी आत्मा होती है उनकी बाहरी अभिव्यक्ति वैसी ही होती है। आत्मा साधारण ढंग से कार्य करता है, लेकिन आत्मा के द्वारा निर्देश के दो भाग होते हैं: एक भाग उसका मानवीयता में कार्य है, जबकि दूसरा उसका ईश्वरीयता के द्वारा कार्य है। यह तुझे अच्छे ढंग से समझ लेना चाहिए। आत्मा का कार्य परिस्थिति के अनुसार अलग-अलग होता है: जब उसके मानवीय कार्य की आवश्यकता होती है, तो आत्मा इस मानवीय कार्य को निर्देशित करता है; जब उसके ईश्वरीय कार्य की आवश्यकता पड़ती है, तो उसके निष्पादन के लिए सीधे ईश्वरीयता प्रकट होती है। क्योंकि परमेश्वर देह में कार्य करता है और देह में प्रकट होता है, वह मानवीयता और अपनी ईश्वरीयता दोनों में कार्य करता है। मानवीयता में उसका कार्य आत्मा के द्वारा निर्देशित होता है, और मनुष्य की देह की आवश्यकताओं को संतुष्ट करने, मनुष्य को और आसानी से अपने साथ जुड़ने, और मनुष्य को परमेश्वर की सच्चाई और सामान्यता देखने के योग्य बनाता है, और उन्हें यह देखने के योग्य बनाता है कि परमेश्वर के आत्मा ने देह धारण किया है और मनुष्यों के बीच है, मनुष्य के साथ रहता है और मनुष्य के साथ जुड़ता है। ईश्वरीयता में उसका कार्य, लोगों के जीवन की पूर्ति करने, लोगों की हर चीज़ में सकारात्मक पक्ष से अगुवाई करने, लोगों के स्वभाव को बदलने, और उन्हें वास्तव में आत्मा के देह में प्रकटीकरण को देखने देने के लिए है। मनुष्य के जीवन में बढ़ोतरी मुख्य रूप से ईश्वरीयता में परमेश्वर के कार्य और वचनों के द्वारा प्राप्त की जाती है। सिर्फ़ ईश्वरीयता में परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करके ही मनुष्य के स्वभाव में बदलाव प्राप्त किया जा सकता है और केवल तभी वे आत्मा में तुष्ट हो सकते हैं; उसमें मानवीयता का कार्य, अर्थात् परमेश्वर का मार्गदर्शन, सहायता, और मानवीयता में पूर्ति जोड़ देने के बाद ही मनुष्य परमेश्वर की इच्छा को पूरा कर सकता है। आज्ञाओं का पालन करने के लिए, लोगों को कम से कम देह में प्रकट होने वाले व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में बिल्कुल स्पष्ट ज्ञान तो होना ही चाहिए। दूसरे शब्दों में, लोगों को आज्ञा मानने के सिद्धान्त को समझना चाहिए। आज्ञाओं के पालन का मतलब उनका लापरवाही या मनमाने ढंग से पालन करना नहीं है, बल्कि आधार, उद्देश्य, और सिद्धान्तों के आधार पर पालन करना है। सबसे पहले हासिल की जाने वाली चीज़ तुम्हारी दृष्टि का स्पष्ट होना है। व्यावहारिक परमेश्वर जिसके बारे में आज हम बातें करते हैं वो अपनी मानवीयता और अपनी ईश्वरीयता दोनों में ही कार्य करता है। व्यावहारिक परमेश्वर के प्रकटीकरण के द्वारा उसका सामान्य मानवीय कार्य और जीवन, तथा उसके सम्पूर्ण ईश्वरीयता वाले कार्य पूरे होते हैं। उसकी मानवता और ईश्वरीयता मिल कर एक हो जाते हैं, और दोनों के[क] कार्य वचनों के द्वारा पूरे किए जाते हैं; चाहे मानवता में हों या ईश्वरीयता में, वह वचन बोलता है। जब परमेश्वर मानवीयता में काम करता है, तो वह मानवता की भाषा में बोलता है ताकि मनुष्य उससे जुड़ सके और उसके वचनों को समझ सके। उसके वचन स्पष्ट ढंग से बोले जाते हैं और समझने में आसान होते हैं, इस तरह के कि वे सभी लोगों तक पहुँचाए जा सकें; सुशिक्षित और कम शिक्षित दोनों ही उसके वचनों को स्वीकार करने के योग्य होते हैं। ईश्वरीयता में परमेश्वर का कार्य भी वचनों के द्वारा ही किया जाता है, लेकिन वह पूर्ति और जीवन से भरपूर है, उसमें मानवीय अवधारणाओं की मिलावट नहीं है, उसमें मानवीय प्राथमिकताएँ शामिल नहीं हैं, वो किसी भी सामान्य मानवता से बंधनमुक्त और सामान्य मानवीय सीमाओं से परे है, यह कार्य भी देह में किया जाता है, लेकिन यह आत्मा की सीधी अभिव्यक्ति है। यदि लोग परमेश्वर के कार्य को सिर्फ़ उसकी मानवीयता में ही स्वीकार करते हैं, तो वे अपने आप को एक दायरे में सीमित कर लेंगे, और एक छोटे से बदलाव के लिए भी उन्हें कई वर्षों के निपटारे, कांट-छांट, और अनुशासन की आवश्यकता होगी। हालाँकि, पवित्र आत्मा के कार्य या उपस्थिति के बिना, वे हमेशा अपने पुराने रास्ते पर लौट जायेंगे। इस तरह के रोग और कमियों को केवल ईश्वरीयता के काम के माध्यम से ठीक किया जा सकता है, केवल तभी मनुष्य को सम्पूर्ण बनाया जा सकता है। बहुत लम्बे समय तक निपटारे और कांट-छांट के बजाय, जो चीज़ ज़रूरी है वह है सकारात्मक पूर्ति, सभी कमियों को पूरा करने के लिए वचनों का उपयोग करना, लोगों की सभी अवस्थाओं को प्रकट करने के लिए वचनों का उपयोग करना, उनके जीवन, उनके प्रत्येक कथन, उनके हर कार्य को निर्देशित करने तथा उनके इरादों और प्रेरणा को खोल कर रख देने के लिए वचनों का उपयोग करना; यही है व्यावहारिक परमेश्वर का वास्तविक कार्य। और इसलिए, व्यावहारिक परमेश्वर के प्रति अपने रवैये में, तुझे उसे पहचानते और स्वीकार करते हुए उसकी मानवीयता के सामने समर्पण करना चाहिए और साथ ही साथ, तुझे ईश्वरीय कार्य और वचनों को भी स्वीकार करना और पालन करना चाहिए। परमेश्वर द्वारा देह में प्रकट होने का अर्थ है कि परमेश्वर के आत्मा के सब कार्य और वचन उसकी सामान्य मानवता, और उसके देहधारी शरीर द्वारा किये जाते हैं। अर्थात्, परमेश्वर का आत्मा उसके मानवीय कार्य को निर्देशित करता है और ईश्वरीयता के कार्य को देह में पूरा करता है, और देहधारी परमेश्वर में तू, परमेश्वर के मानवता में कार्य और संपूर्ण ईश्वरीय कार्य दोनों को देख सकता है; व्यावहारिक परमेश्वर के देह में प्रकट होने का यही महत्व है। यदि तू सचमुच में इसे समझ सकता है, तो फिर तू परमेश्वर के सभी अलग-अलग भागों से जुड़ पाएगा; और तू उसके ईश्वरीयता के कार्य को बहुत ज़्यादा महत्व देना, या उसके मानवता के कार्य के प्रति बहुत नकरात्मक होना बंद कर देगा, और तू चरम पर नहीं जाएगा, न ही गलत रास्ते पर मुड़ेगा। कुल मिलाकर, व्यावहारिक परमेश्वर का अर्थ यह है कि उसके मानवता के कार्य और ईश्वरीयता के कार्य, आत्मा के निर्देशानुसार, उसके देह के द्वारा अभियक्त किये जाते हैं, ताकि लोग देख सकें कि वो जीवंत और सजीव है, तथा असली और वास्तविक है।

परमेश्वर के आत्मा के मानवता में कार्य के परिवर्ती स्तर हैं। मानवता को सिद्ध करके, वो अपनी मानवता को आत्मा का निर्देश प्राप्त करने में समर्थ बनाता है, जिसके बाद उसकी मानवता कलीसियाओं का भरण पोषण और उनकी अगुवाई कर पाती है। परमेश्वर के सामान्य कार्य की यह एक अभिव्यक्ति है। इसलिए, यदि तू परमेश्वर के मानवता में कार्य के सिद्धांतों को अच्छे ढंग से समझ जाता है, तो फिर परमेश्वर के मानवता में कार्य के बारे में तुझमें धारणाएँ बनाने की संभावना नहीं होगी। चाहे कुछ भी हो, परमेश्वर का आत्मा गलत नहीं हो सकता है। वह सही है और दोष रहित है; वह कुछ भी गलत नहीं करेगा। ईश्वरीय कार्य परमेश्वर की इच्छा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है, उसमें मानवता का कोई भी हस्तक्षेप नहीं होता है। यह पूर्णता से होकर नहीं गुजरता, बल्कि सीधे आत्मा से आता है। तो भी, वह ईश्वरीयता में कार्य सिर्फ़ अपनी सामान्य मानवता के कारण कर पाता है; यह थोड़ा भी अलौकिक नहीं है, और किसी सामान्य मनुष्य के द्वारा किया जाता प्रतीत होता है; परमेश्वर के स्वर्ग से पृथ्वी पर आने का मुख्य कारण परमेश्वर के वचनों को देह के द्वारा प्रकट करना है और देह का उपयोग करके परमेश्वर के आत्मा का कार्य पूरा करना है।

आजकल, व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में लोगों का ज्ञान बहुत अधिक एक तरफा है, और देह धारण के महत्व के बारे में उनकी समझ अभी भी बहुत कम है। जब परमेश्वर की देह की बात आती है, मनुष्य उसके कार्य और वचनों के माध्यम से देखता है कि परमेश्वर के आत्मा में बहुत कुछ शामिल है और वह बहुत सम्पन्न है। लेकिन कुछ भी हो, आख़िरकार परमेश्वर की गवाही परमेश्वर के आत्मा से ही आती है: परमेश्वर देह में जो कार्य करता है, वह जिन सिद्धांतों के द्वारा कार्य करता है, वह मानवता में जो करता है और ईश्वरीयता में जो करता है। लोगों को इसका ज्ञान होना ही चाहिए। आज, तुम इस व्यक्तित्व की आराधना कर पाते हो, लेकिन वास्तव में, तुम आत्मा की आराधना कर रहे हो। यह वह न्यूनतम चीज है जिसका ज्ञान लोगों को देहधारी परमेश्वर के संबंध में पता होना चाहिए: देह के माध्यम से आत्मा के तत्व के बारे में जानना, देह में आत्मा के ईश्वरीय कार्य और मानवता के कार्य को जानना, आत्मा द्वारा देह के माध्यम से बोले गए सभी वचनों और कथनों को स्वीकार करना, और देखना कि कैसे परमेश्वर का आत्मा देह को निर्देशित करता है, और कैसे अपनी शक्ति को देह में दर्शाता है। अर्थात्, इस देह के माध्यम से, मनुष्य स्वर्ग के को जान जाता है, मानव जाति के मध्य में स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर के प्रकट होने से, संदिग्ध परमेश्वर स्वयं जो मनुष्य की धारणाओं में होता है लुप्त हो जाता है, लोगों द्वारा व्यावहारिक परमेश्वर स्वयं की आराधना के कारण परमेश्वर के प्रति उनकी आज्ञाकारिता बढ़ गई है; और परमेश्वर के आत्मा के देह में ईश्वरीय कार्य और मानवीय कार्य के माध्यम से, मनुष्य प्रकाशन और मार्गदर्शन पाता है, और अपने जीवन स्वभाव में परिवर्तन को प्राप्त करता है। आत्मा के देह में आने का केवल यही वास्तविक अर्थ है, और यह मुख्य रूप से इसलिए कि लोग परमेश्वर से जुड़ सकें, परमेश्वर पर आश्रित हो सकें, और परमेश्वर के ज्ञान को पा सकें।

मुख्य रूप से, मनुष्य को व्यावहारिक परमेश्वर के प्रति क्या रवैया रखना चाहिए? तू देह धारण, वचन के देह में प्रकट होने, परमेश्वर के देह में प्रकट होने, और व्यावहारिक परमेश्वर के कर्मों के बारे में क्या जानता है? और आज मुख्य रूप से किसके बारे में बात हो रही है? देहधारण, वचन के देह में आने, और परमेश्वर के देह में प्रकट होने को-इन सब मामलों को समझ लिया जाना चाहिए। तुम लोगों के कद और युग के अनुसार, अपने जीवन अनुभवों के दौरान, तुम लोगों को धीरे-धीरे इन मामलों की समझ जाना चाहिए और इनका स्पष्ट ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिए। मनुष्य के द्वारा परमेश्वर के वचन को अनुभव करने की प्रक्रिया असल में परमेश्वर के वचनों के देह में प्रकट होने के बारे में जानने की प्रक्रिया के समान है। मनुष्य जितना अधिक परमेश्वर के वचनों को अनुभव करता है, उतना ही अधिक परमेश्वर के आत्मा के बारे में जानता है; परमेश्वर के वचनों के अनुभव के द्वारा, मनुष्य आत्मा के कार्य के सिद्धांतों को समझता है और व्यावहारिक परमेश्वर स्वयं के बारे में जान जाता है। वास्तविकता में, जब परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाता और प्राप्त करता है, तो वह उन्हें व्यावहारिक परमेश्वर के कामों के बारे में बता रहा होता है; वह व्यावहारिक परमेश्वर के कार्य का उपयोग लोगों को देह धारण का असल महत्व दिखाने और यह दिखाने के लिए कर रहा होता है कि परमेश्वर का आत्मा मनुष्य के सामने वास्तव में प्रकट हुआ है। जब लोग परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किये जाते हैं और उसके द्वारा पूर्ण बनाए जाते हैं, व्यावहारिक परमेश्वर की अभिव्यक्तियाँ उन्हें जीत लेती है, व्यावहारिक परमेश्वर के वचन उन्हें बदल देते हैं, और उनके भीतर अपना जीवन डाल देते हैं, उन लोगों को उस चीज से भर देते हैं जो वह है (चाहे वह जो मानवता में है उससे, या जो वह ईश्वरीयता में है उससे), उन लोगों को उसके वचनों के तत्व से भर देते हैं, और लोगों को उसके वचनों कोजीने देते हैं। जब परमेश्वर लोगों को प्राप्त करता है, वह ऐसा मुख्य रूप से व्यावहारिक परमेश्वर के वचनों और कथनों का उपयोग करके करता है ताकि लोगों की कमियों को दूर करे, और उनके विद्रोही स्वभाव का न्याय करे और उन्हें प्रकट करे, जिससे वे वह चीजें प्राप्त कर सकें जिनकी उन्हें जरूरत है, और उन्हें दिखाये कि परमेश्वर उनके बीच आया है। सबसे महत्वपूर्ण बात, व्यावहारिक परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला कार्य है, प्रत्येक मनुष्य को शैतान के प्रभाव से बचाना, उन्हें गंदगी वाली जगह से दूर ले जाना, और उनके भ्रष्ट स्वभाव को दूर करना। व्यावहारिक परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किये जाने का सबसे गहरा महत्व उसे एक आदर्श, एक प्रतिमान के तौर पर ले पाने योग्य बनना, और एक सामान्य मानवता को जीना है, और जो कुछ भी वो कहे उसका अभ्यास करते हुए, व्यावहारिक परमेश्वर के वचनों और अपेक्षाओं को बिना किसी विचलन या फिराव के, अभ्यास में लाने योग्य बनना है, और जो कुछ भी वह माँगता है उसे प्राप्त करने योग्य बनना है। इस तरह तुम परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किये जा चुके होगे। जब तुम परमेश्वर के द्वारा प्राप्त कर लिए जाते हो तो तुम में केवल पवित्र आत्मा का कार्य ही नहीं होता है; सैद्धांतिक रूप से तुम व्यावहारिक परमेश्वर की अपेक्षाओं को जी पाते हो। सिर्फ़ पवित्र आत्मा के कार्य को पा लेने का अर्थ यह नहीं है कि तुम्हारे पास जीवन है; मुख्य यह है कि क्या तुम व्यावहारिक परमेश्वर की तुमसे जो अपेक्षा है उसके अनुसार कार्य कर पाते हो या नहीं, जो इससे संबंधित है कि तुम परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किये जा सकते हो कि नहीं। ये बातें देह में व्यावहारिक परमेश्वर के कार्य के सबसे महान अर्थ हैं। अर्थात, परमेश्वर सचमुच और वाकई देह में प्रकट हो कर, तथा जीवंत और सजीव होकर, लोगों द्वारा देखे जाकर, देह में आत्मा का काम वास्तव में करके, और देह में लोगों के लिए एक आदर्श के रूप में काम करके लोगों के समूह को प्राप्त करता है। परमेश्वर का देह में आगमन मुख्यतः इसलिए है कि मनुष्य परमेश्वर के असली कार्यों को देख सके, निराकार आत्मा को देह में साकार कर सके, और वह मनुष्य के द्वारा स्पर्श किया और देखा जा सके। इस तरह से, जिन्हें वह पूर्ण बनाता है वह उसे जी पाएँगे, उसके द्वारा प्राप्त किये जा सकेंगे, और वे उसके हृदय के अनुसार हो पाएँगे। यदि परमेश्वर केवल स्वर्ग में ही बोलता, और वास्तव में पृथ्वी पर नहीं आता, तो लोग अब भी परमेश्वर को जानने के अयोग्य होते; वे खोखले सिद्धांत का उपयोग करते हुए परमेश्वर के कार्यों का केवल उपदेश दे पाते, और उनके पास परमेश्वर के वचन वास्तविकता के रूप में नहीं होते। परमेश्वर पृथ्वी पर मुख्यतः उनके लिए एक प्रतिमान और आदर्श का कार्य करने के लिए आता है जिन्हें परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाता है। सिर्फ़ इसी ढंग से मनुष्य व्यावहारिक रूप से परमेश्वर को स्पर्श कर सकता, जान और देख सकता है; और केवल इसी ढंग से मनुष्य सचमुच में परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।

स्रोत : सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया

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बाइबल के विषय में (1)

बाइबल के विषय में (1)

**सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन बाइबल के विषय में (1)

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परमेश्वर में विश्वास करते हुए बाइबल के समीप कैसे जाना चाहिए? यह एक सैद्धांतिक प्रश्न है। हम इस प्रश्न पर संवाद क्यों कर रहे हैं? क्योंकि तुम भविष्य में सुसमाचार को फैलाओगे और राज्य के युग के कार्य का विस्तार करोगे, और इसलिए आज मात्र परमेश्वर के कार्य के बारे में बात करने के योग्य होना ही काफी नहीं है। उसके कार्य का विस्तार करने के लिए, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि तुम लोगों की पुरानी धार्मिक अवधारणाओं और विश्वास के पुराने माध्यमों का समाधान करने के योग्य बनो, और उन्हें पूरी तरह आश्वस्त करके ही छोड़ो—और उस स्थिति तक आने में बाइबल शामिल है। बहुत सालों से, लोगों के विश्वास का परम्परागत माध्यम (दुनिया के तीन मुख्य धर्मों में से एक, मसीहियत के विषय में) बाइबल पढ़ना ही रहा है; बाइबल से दूर जाना प्रभु में विश्वास नहीं है, बाइबल से दूर जाना एक पाषंड और विधर्म है, और यहाँ तक कि जब लोग अन्य पुस्तकों को पढ़ते हैं, तो इन पुस्तकों की बुनियाद, बाइबल की व्याख्या ही होनी चाहिए। कहने का अर्थ है कि, यदि तुम कहते हो कि तुम प्रभु में विश्वास करते हो, तो तुम्हें बाइबल अवश्य पढ़नी चाहिए, तुम्हें बाइबल खानी और पीनी चाहिए, बाइबल के अलावा तुम्हें किसी अन्य पुस्तक की आराधना नहीं करनी चाहिए जिस में बाइबल शामिल नहीं हो। यदि तुम करते हो, तो तुम परमेश्वर के साथ विश्वासघात कर रहे हो। उस समय से जब बाइबल थी, प्रभु के प्रति लोगों का विश्वास बाइबल के प्रति विश्वास रहा है। यह कहने के बजाए कि लोग प्रभु में विश्वास करते हैं, यह कहना बेहतर है कि वे बाइबल में विश्वास करते हैं; यह कहने की अपेक्षा की उन्होंने बाइबल पढ़नी आरम्भ कर दी है, यह कहना बेहतर है कि उन्होंने बाइबल पर विश्वास करना आरम्भ कर दिया है; और यह कहने की अपेक्षा कि वे प्रभु के सामने वापस आ गए हैं, यह कहना बेहतर होगा कि वे बाइबल के सामने वापस आ गए हैं। इस तरह से, लोग बाइबल की आराधना ऐसे करते हैं मानो कि यह ईश्वर है, मानो कि यह उनका जीवन रक्त है और इसे खोना अपने जीवन को खोने के समान होगा। लोग बाइबल को परमेश्वर के समान ही ऊँचा देखते हैं, और यहाँ तक कुछ ऐसे भी हैं जो इसे परमेश्वर से भी ऊँचा देखते हैं। यदि लोग पवित्र आत्मा के कार्य के बिना हैं, यदि वे परमेश्वर का एहसास नहीं कर सकते हैं, तो वे जीवन जीते रह सकते हैं—परन्तु जैसे ही वे बाइबल को खो देते हैं, या बाइबल के प्रसिद्ध अध्यायों और कथनों को खो देते हैं, तो यह ऐसा है मानो उन्होंने अपना जीवन खो दिया हो। और इसलिए, जैसे ही लोग प्रभु में विश्वास करते हैं वे बाइबल पढ़ना, और बाइबल को याद करना आरम्भ कर देते हैं, और जितना ज़्यादा वे बाइबल को याद कर पाते हैं, उतना ही ज़्यादा यह साबित होता है कि वे प्रभु से प्रेम करते हैं और बड़े विश्वासी हैं। वे जिन्होंने बाइबल को पढ़ा है और उसके बारे में दूसरों को बोल सकते हैं वे सभी अच्छे भाई और बहन हैं। इन सारे वर्षों में, प्रभु के प्रति लोगों के विश्वास और उनकी वफादारी को बाइबल की उनकी समझ के विस्तार के अनुसार मापा गया है। अधिकांश लोग साधारण तौर पर यह नहीं समझते हैं कि उन्हें परमेश्वर पर क्यों विश्वास करना चाहिए, और न ही यह समझते हैं कि परमेश्वर पर कैसे विश्वास करना है, किन्तु बाइबल के अध्यायों का गूढ़ार्थ निकालने के लिए आँख बंद करके सुरागों ढूँढ़ने के अलावा और कुछ भी नहीं करते हैं। लोगों ने कभी भी पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा का अनुसरण नहीं किया है; शुरूआत से ही, उन्होंने हताशापूर्ण ढंग से बाइबल का अध्ययन और उसकी खोजबीन करने के अलावा और कुछ नहीं किया है, और किसी ने कभी भी बाइबल के बाहर पवित्र आत्मा के नवीनतम कार्य को नहीं पाया है, कोई कभी भी बाइबल से दूर नहीं गया है, और न ही उसने कभी बाइबल से दूर जाने की हिम्मत की है। लोगों ने इन सभी वर्षों में बाइबल का अध्ययन किया है, वे बहुत सी व्याख्याओं के साथ सामने आए हैं, और बहुत सा काम किया है; उनमें भी बाइबल के बारे में कई मतभेद हैं, जिस पर वे अंतहीन रूप से वाद-विवाद करते हैं, इतना कि आज दो हज़ार से ज़्यादा अलग-अलग सम्प्रदाय बन गए हैं। वे सभी कुछ विशेष व्याख्याओं, या बाइबल के अधिक गम्भीर रहस्यों का पता लगाना चाहते हैं, वे इसकी खोज करना चाहते हैं, और इसे इस्राएल में यहोवा के कार्य की पृष्ठभूमि में, या यहूदिया में यीशु के कार्य की पृष्ठभूमि में, या और अधिक रहस्यों को ढूँढ़ना चाहते हैं जिन्हें कोई नहीं जानता है। लोग धुन और विश्वास के साथ बाइबल के समीप जाते हैं, और बाइबल की भीतरी कहानी या सार के बारे में कोई भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सकता है। इसलिए आज, जब बाइबल की बात आती है तो लोगों के पास अभी भी जादुईगिरी का एक अवर्णनीय एहसास है; और उस से भी बढ़कर, उसके बारे में उन्हें धुन लगी है, और उस पर विश्वास करते हैं। आज, हर कोई बाइबल में अंत के दिनों के कार्य की भविष्यवाणियों का पता लगाना चाहता है, वह यह खोज करना चाहता है कि अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर क्या कार्य करता है, और अंत के दिनों के लिए क्या लक्षण हैं। इस तरह से, बाइबल की उनकी आराधना और उत्कट हो जाती है, और यह जितना ज़्यादा अंत के दिनों के नज़दीक आती है, उतना ही ज़्यादा वे बाइबल की भविष्यवाणियों को विश्वसनीयता देने लगते हैं, विशेषकर उनको जो अंत के दिनों के बारे में हैं। बाइबल में ऐसे अन्धे विश्वास के साथ, बाइबल में ऐसे भरोसे के साथ, उनमें पवित्र आत्मा के कार्य को खोजने की कोई इच्छा नहीं होती है। लोगों की अवधारणाओं के अनुसार, वे सोचते हैं कि केवल बाइबल ही पवित्र आत्मा के कार्य को ला सकती है; केवल बाइबल में ही वे परमेश्वर के पदचिह्नों को खोज सकते हैं; केवल बाइबल में ही परमेश्वर के कार्य के रहस्य छिपे हुए हैं; केवल बाइबल—न कि अन्य पुस्तकें या लोग—परमेश्वर के बारे में हर बात को और उनके कार्य की सम्पूर्णता को स्पष्ट कर सकती है; बाइबल स्वर्ग के कार्य को पृथ्वी पर ला सकती है; और बाइबल युगों का आरंभ और अंत दोनों कर सकती है। इन अवधारणाओं के साथ, लोगों का पवित्र आत्मा के कार्य को खोजने की ओर कोई झुकाव नहीं होता है। अतः, इस बात की परवाह किए बिना कि अतीत में बाइबल लोगों के लिए कितनी मददगार थी, यह परमेश्वर के नीवनतम कार्य के लिए एक बाधा बन गई है। बाइबल के बिना, लोग अन्य स्थानों पर परमेश्वर के पदचिह्नों को खोज सकते हैं, फिर भी आज, उसके कदमों को बाइबल के द्वारा "रोक लिया" गया है, और उनके नवीनतम कार्य को बढ़ाना दोगुना कठिन, और एक कठिन संघर्ष बन गया है। यह सब बाइबल के प्रसिद्ध अध्यायों एवं कथनों, और साथ ही बाइबल की विभिन्न भविष्यवाणियों की वजह से हैं। बाइबल लोगों के मनों में एक आदर्श बन चुकी है, यह उनके मस्तिष्कों में एक पहेली बन चुकी है, वे मात्र यह विश्वास करने में असमर्थ हैं कि परमेश्वर बाइबल से अलग भी काम कर सकता है, वे मात्र यह विश्वास करने में असमर्थ हैं कि लोग बाइबल के बाहर भी परमेश्वर को पा सकते हैं, और वे यह बिलकुल भी विश्वास करने में सक्षम नहीं हैं कि परमेश्वर अंतिम कार्य के दौरान बाइबल से दूर जा सकता है और एक नए सिरे से शुरू कर सकता है। यह लोगों के लिए अकल्पनीय है; वे इस पर विश्वास नहीं कर सकते हैं, और न ही वे इसकी कल्पना कर सकते हैं। लोगों द्वारा परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करने में बाइबल एक बहुत बड़ी बाधा बन चुकी है, और इसने परमेश्वर के लिए इस नए कार्य का विस्तार करना कठिन बना दिया है। इस प्रकार, यदि तुम लोग बाइबल की भीतर की कहानी को नहीं समझते हो, तो तुम लोग सुसमाचार को सफलतापूर्वक फैलाने में सक्षम नहीं होगे, और न ही तुम लोग नए कार्य के गवाह बनने के योग्य होगे। यद्यपि, आज, तुम लोग बाइबल को नहीं पढ़ते हो, फिर भी तुम लोग उसके प्रति अभी भी अत्यधिक स्नेह से भरे हुए हो, कहने का अर्थ है कि, हो सकता है कि बाइबल तुम लोगों के हाथों में नहीं हो, किन्तु तुम लोगों की बहुत सी अवधारणाएँ उसी से आती हैं। तुम लोग बाइबल के उद्गमों या परमेश्वर के कार्य के पिछले दो चरणों के बारे में भीतर की कहानी को नहीं समझते हो। यद्यपि तुम लोग बाइबल को खाते और पीते नहीं हो, फिर भी तुम लोगों को बाइबल को समझना चाहिए, तुम लोगों को बाइबल का सही ज्ञान प्राप्त करना चाहिए, और केवल इस तरह से ही तुम लोग जान सकते हो कि परमेश्वर के 6,000 सालों की प्रबन्धन योजना कुल मिलाकर किस बारे में है। लोगों को जीतने के लिए, लोगों से यह स्वीकार कराने के लिए कि यह धारा ही सच्चा मार्ग है, उनसे यह स्वीकार कराने के लिए कि जिस पथ पर आज तुम लोग चल रहे हो वही सत्य का मार्ग है, कि यह पवित्र आत्मा के द्वारा मार्गदर्शित होता है, और इसे किसी भी मनुष्य के द्वारा खोला नहीं गया है, तुम लोग इन चीज़ों का उपयोग करेंगे।

अनुग्रह के युग के पहले लोग बाइबल पढ़ते थे, किन्तु उस समय केवल पुराना विधान था; कोई नया विधान नहीं था। चूँकि बाइबल का पुराना विधान ही था, इसलिए लोगों ने पवित्र शास्त्रों को पढ़ना आरम्भ कर दिया। जब उसके लिए यहोवा का मार्गदर्शन समाप्त हो गया था, तब मूसा ने उत्पत्ति, निर्गमन, और व्यवस्थाविवरण... को लिखा। उसने यहोवा के उस समय के कार्य का स्मरण किया, और उसे लिखा। बाइबल इतिहास की एक पुस्तक है। वास्तव में, इस में भविष्यद्वक्ताओं के कुछ पूर्वकथन शामिल हैं, और ये पूर्वकथन किसी भी मायने में इतिहास नहीं हैं। बाइबल में अनेक भाग शामिल हैं—इस में केवल भविष्यवाणी ही नहीं है, या केवल यहोवा का कार्य ही नहीं है, और न ही इस में मात्र पौलुस के धर्मपत्र ही हैं। तुम्हें अवश्य ज्ञात होना चाहिए कि बाइबल में कितने भाग शामिल हैं; पुराने विधान में उत्पत्ति, निर्गमन..., शामिल हैं, और इसमें वे भविष्यवाणी की पुस्तकें भी हैं जिन्हें नबियों ने लिखा था। अतं में, पुराना विधान मलाकी की पुस्तक के साथ समाप्त होता है। इसमें व्यवस्था के युग के कार्य को दर्ज किया गया है, जिसकी अगुवाई यहोवा के द्वारा की गई थी; उत्पत्ति से लेकर मलाकी की पुस्तक तक, यह व्यवस्था के युग के सभी कार्य का विस्तृत लिखित दस्तावेज़ है। कहने का अर्थ है, कि पुराने विधान में वह सब कुछ दर्ज है जिसे उन लोगों के द्वारा अनुभव किया गया था जिनका व्यवस्था के युग में यहोवा के द्वारा मार्गदर्शन किया गया था। पुराने नियम के व्यवस्था के युग के दौरान, यहोवा के द्वारा बड़ी संख्या में खड़े किए गए भविष्यद्वक्ताओं ने उसके लिए भविष्यवाणी की, उन्होंने विभिन्न कबीलों एवं राष्ट्रों को निर्देश दिए, और उस कार्य की भविष्यवाणी की जो यहोवा करेगा। ये लोग जिन्हें खड़ा किया गया था, उन सभी को यहोवा के द्वारा भविष्यवाणी का पवित्रात्मा दिया गया थाः वे यहोवा से परिकल्पनाओं को देखने, और उसकी आवाज़ को सुनने में समर्थ थे, और इस प्रकार वे उसके द्वारा प्रेरित थे और उन्होंने भविष्यवाणियों को लिखा। उन्होंने जो कार्य किया वह यहोवा की आवाज़ की अभिव्यक्ति था, यह उस भविष्यवाणी का कार्य था जिसे उन्होंने यहोवा की ओर से किया था, और उस समय यहोवा का कार्य केवल पवित्रात्मा का उपयोग करके लोगों को मार्गदर्शन करना था; वह देहधारी नहीं हुआ, और लोगों ने उसके चेहरे में से कुछ भी नहीं देखा। इस प्रकार, उसने अपना कार्य करने के लिए बहुत से भविष्यद्वक्ताओं को खड़ा किया, और उन्हें आकाशवाणियाँ दीं जो उन्होंने इस्राएल के प्रत्येक कबीले और कुटुम्ब को सौंप दी। उनका कार्य भविष्यवाणी कहना था, और उन में से कुछ ने अन्य लोगों को दिखाने के लिए यहोवा के निर्देशों को लिख लिया। यहोवाने इन लोगों को भविष्यवाणी करने, भविष्य के कार्य या उस कार्य के बारे में पूर्वकथन कहने के लिए खड़ा किया था जो उस युग के दौरान अभी किया जाना था, ताकि लोग यहोवा की चमत्कारिकता एवं बुद्धि को देख सकें। भविष्यवाणी की ये पुस्तकें बाइबल की अन्य पुस्तकों से बिलकुल अलग थीं; वे उन लोगों के द्वारा बोले या लिखे गए वचन थे जिन्हें भविष्यवाणी का पवित्रात्मा दिया गया था—उनके द्वारा जिन्होंने यहोवा की परिकल्पना या आवाज़ को प्राप्त किया था। भविष्यवाणी की पुस्तकों के अलावा, पुराने विधान में हर चीज़ वह अभिलेख है जिसे लोगों के द्वारा तब बनाया गया था जब यहोवा ने अपना काम समाप्त कर लिया था। ये पुस्तकें यहोवा के द्वारा खड़े किए गए भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बोले गए पूर्वकथनों का स्थान नहीं ले सकती हैं, बिलकुल वैसे ही जैसे उत्पत्ति और निर्गमन की तुलना यशायाह की पुस्तक और दानिय्येल की पुस्तक से नहीं की जा सकती है। कार्य के पूरा होने से पहले ही भविष्यवाणियाँ बोली गई थीं; अन्य पुस्तकें, इस बीच, इसके पूरा हो जाने के बाद लिखी गई थीं, जो कि वह था जिसे करने में लोग समर्थ थे। उस समय के भविष्यद्वक्ता यहोवा के द्वारा प्रेरित थे और उन्होंने कुछ भविष्यवाणियाँ की, और उन्होंने कई वचन बोले, और अनुग्रह के युग की चीजों की, और साथ ही अंत के दिनों में संसार के विनाश—वह कार्य जिसे करने की यहोवा की योजना थी—के बारे में भविष्यवाणी की। बाकी बची सभी पुस्तकों में यहोवा के द्वारा इस्राएल में किए गए कार्य को दर्ज किया गया है। इस प्रकार, जब तुम बाइबल को पढ़ते हो, तो तुम मुख्य रूप से यहोवा के द्वारा इस्राएल में किये कार्यों के बारे में पढ़ रहे होते हो; बाइबल के पुराने विधान में मुख्यतः इस्राएल का मार्गदर्शन करने का यहोवा का कार्य, मिस्र से बाहर इस्राएलियों का मार्गदर्शन करने के लिए उसका मूसा का उपयोग, किसने उन्हें फिरौन के बन्धनों से छुटकारा दिलाया, और कौन उन्हें बाहर जंगल में ले गया, जिसके बाद उन्होंने कनान में प्रवेश किया और इसके बाद की हर चीज़ कनान में उनका जीवन था, दर्ज किया गया है। इसके अलावा बाकी सब पूरे इस्राएल में यहोवा के कार्य का अभिलेख है। पुराने विधान में दर्ज सब कुछ इस्राएल में यहोवा का कार्य है, यह वह कार्य है जिसे यहोवा ने उस भूमि में किया जिस में उसने आदम और हव्वा को बनाया था। जब से परमेश्वर ने नूह के बाद आधिकारिक रूप से पृथ्वी पर लोगों की अगुवाई करनी आरम्भ की, तब से पुराने विधान में दर्ज सब कुछ इस्राएल का कार्य है। और क्यों इस्राएल के बाहर का कोई भी कार्य दर्ज नहीं किया गया है? क्योंकि इस्राएल की भूमि मानवजाति का पालना है। आदि में, इस्राएल के अलावा कोई अन्य देश नहीं थे, और यहोवा ने अन्य स्थानों में कार्य नहीं किया। इस तरह, बाइबल में जो कुछ भी दर्ज है वह केवल उस समय इस्राएल में किया गया कार्य है। भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा, यशायाह, दानिय्येल, यिर्मयाह, और यहेज़केल के द्वारा बोले गए वचन... उनके वचन पृथ्वी पर उसके अन्य कार्य के बारे में पूर्वकथन करते हैं, वे यहोवा परमेश्वर स्वयं के कार्य का पूर्वकथन करते हैं। यह सब कुछ परमेश्वर से आया, यह पवित्र आत्मा का कार्य था, और भविष्यद्वक्ताओं की इन पुस्तकों के अलावा, बाकी हर चीज़ उस समय लोगों के यहोवा के कार्य के अनुभव का अभिलेख है।

सृष्टि की रचना का कार्य मानवजाति के आने से पहले हुआ, किन्तु उत्पत्ति की पुस्तक सिर्फ मानवजाति के आने के बाद ही आयी; यह वह पुस्तक थी जिसे मूसा के द्वारा व्यवस्था के युग के दौरान लिखा गया था। यह ऐसी चीज़ों के समान है जो आज तुम लोगों के बीच होती हैं: उनके होने के बाद, तुम लोग, भविष्य में लोगों को दिखाने के लिए, और भविष्य के लोगों के लिए उन्हें लिख लेते हो, जो कुछ भी तुम लोगों ने दर्ज किया वे ऐसी बातें हैं जो अतीत में घटित हुई थीं—वे इतिहास से बढ़कर और कुछ भी नहीं हैं। पुराने विधान में दर्ज की गई चीजें इस्राएल में यहोवा के कार्य हैं, और जो कुछ भी नए विधान में दर्ज है वह अनुग्रह के युग के दौरान यीशु के कार्य हैं; वे दो भिन्न-भिन्न युगों में परमेश्वर के द्वारा किए गए कार्य को अभिलिखित करते हैं। पुराना विधान व्यवस्था के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य को अभिलिखित करता है, और इस प्रकार पुराना विधान एक ऐतिहासिक पुस्तक है, जबकि नया विधान अनुग्रह के युग के कार्य का उत्पाद है। जब नया कार्य आरम्भ हुआ, तो वे भी पुरानी पड़ गईं—और इस प्रकार, नया विधान भी एक ऐतिहासिक पुस्तक है। वास्तव में, नया विधान पुराने विधान के समान सुव्यवस्थित नहीं है, न ही इसमें इतनी बातें दर्ज हैं। पुराने विधान के यहोवा के द्वारा बोले गए सभी वचनों को बाइबल में दर्ज किया गया है, जबकि सुसमाचार की चार पुस्तकों में यीशु के कुछ ही वचनों को दर्ज किया गया। वास्तव में, यीशु ने भी बहुतायत से काम किए, किन्तु उन्हें विस्तारपूर्वक दर्ज नहीं किया गया था। नए विधान में इसलिए कम दर्ज किया गया है क्योंकि यीशु ने जितना काम किया; पृथ्वी पर साढे़-तीन-वर्षों के दौरान किए गए उसके कार्य और प्रेरितों के कार्य की मात्रा यहोवा के कार्य की अपेक्षा बहुत ही कम थी। और इस प्रकार, पुराने विधान की अपेक्षा नए विधान में कम पुस्तकें हैं।

बाइबल किस प्रकार की पुस्तक है? पुराना विधान व्यवस्था के युग के दौरान परमेश्वर का कार्य है। बाइबल के पुराने विधान में व्यवस्था के युग के दौरान यहोवा के सभी कार्य और उसके सृजन के कार्य दर्ज हैं। इसमें यहोवा के द्वारा किए गए समस्त कार्य दर्ज हैं, और यहोवा के कार्य के वृत्तान्त अंततः मलाकी की पुस्तक के साथ समाप्त होते हैं। पुराने विधान में परमेश्वर के द्वारा किए गए कार्य के दो टुकड़े दर्ज हैं: एक सृष्टि की रचना का कार्य है, और एक व्यवस्था की आज्ञा देना है। दोनों ही यहोवा के द्वारा किए गए कार्य थे। व्यवस्था का युग यहोवा परमेश्वर के नाम के अधीन कार्य का प्रतिनिधित्व करता है; यह मुख्यतः यहोवा के नाम के अधीन किए गए कार्य की समग्रता है। इस प्रकार, पुराने नियम में यहोवा के कार्य दर्ज हैं, और नए नियम में यीशु के कार्य, वह कार्य जिसे मुख्यतः यीशु के नाम के अधीन किया गया था, दर्ज है। यीशु के नाम का महत्व और जो कार्य उसने किया वे नए विधान में दर्ज हैं। पुराने विधान व्यवस्था के युग के दौरान, यहोवा ने इस्राएल में मन्दिर और वेदी को बनायी, उसने पृथ्वी पर इस्राएलियों के जीवन का मार्गदर्शन किया, इस बात को साबित करते हुए कि वे उसके चुने हुए लोग हैं, लोगों का पहला समूह हैं जिन्हें उसने पृथ्वी पर चुना है और जो उसकी पसंद के अनुसार हैं, वह प्रथम समूह हैं जिसकी उसने व्यक्तिगत रूप से अगुवाई की थी; कहने का अर्थ है, कि इस्राएल के बारह कबीले यहोवा के चुने हुए प्रथम लोग थे, और इसलिए उसने, व्यवस्था के युग के यहोवा के कार्य का समापन हो जाने तक, हमेशा उन में कार्य किया। कार्य का द्वितीय चरण नए विधान के अनुग्रह के युग का कार्य था, और उसे यहूदा के कबीले के बीच किया गया था, जो इस्राएल के बारह कबीलों में से एक था। उस कार्य का दायरा इसलिए छोटा था क्योंकि यीशु परमेश्वर देहधारी हुआ था। यीशु ने केवल यहूदिया की पूरी धरती पर काम किया, और सिर्फ साढ़े-तीन-वर्षों का काम किया; इस प्रकार, जो कुछ नए विधान में दर्ज है वह पुराने विधान में दर्ज कार्य की मात्रा से बढ़कर होने में समर्थ नहीं है। अनुग्रह के युग के यीशु का कार्य मुख्यतः सुसमाचार की चार पुस्तकों में दर्ज है। वह मार्ग जिस पर अनुग्रह के युग के लोग चले थे वह उनके जीवन स्वभाव में अति सतही परिवर्तन का मार्ग था, उस में से अधिकांश धर्मपत्रों में दर्ज हैं। ये धर्मपत्र दर्शाते हैं कि उस समय पवित्र आत्मा किस प्रकार कार्य करता था। (वास्तव में, इस बात की परवाह किए बिना कि कैसे पौलुस को ताड़ित किया गया या वह दुर्भाग्य के घेरे में आया, उसने जो कार्य किया उसमें उसे पवित्र आत्मा के द्वारा निर्देश दिया गया था, वह एक ऐसा व्यक्ति था जिसे उस समय पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया गया था; पतरस, भी, पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया गया था, किन्तु उसने पौलुस के समान इतना अधिक कार्य नहीं किया। हालाँकि पौलुस के कामों में मनुष्यों की अशुद्धता शामिल थी, लेकिन उसके द्वारा लिखे गए धर्मपत्रों से यह देखा जा सकता है कि उस समय पवित्र आत्मा ने किस प्रकार काम किया; वह मार्ग जिसमें पौलुस ने अगुवाई की सच्चा मार्ग था, यह सही था और यही पवित्र आत्मा का मार्ग था।)

यदि तुम व्यवस्था के युग के कार्य को देखने की इच्छा करते हो, और यह देखना चाहते हो कि इज़राइली किस प्रकार यहोवा के मार्ग का अनुसरण करते थे, तो तुम्हें पुराना विधान अवश्य पढ़ना चाहिए; यदि तुम अनुग्रह के युग के कार्य को समझना चाहते हो, तो तुम्हें नया विधान अवश्य पढ़ना चाहिए। किन्तु तुम अंतिम दिनों के कार्य को किस प्रकार देखते हो? तुम्हें आज के परमेश्वर की अगुआई को स्वीकार अवश्य करनी चाहिए, और आज के कार्य में प्रवेश करना चाहिए, क्योंकि यह नया कार्य है, और किसी ने भी पूर्व में इसे बाइबल में दर्ज नहीं किया है। आज, परमेश्वर देहधारी हो चुका है और उसने चीन में अन्य चयनित लोगों को छाँट लिया है। परमेश्वर इन लोगों में कार्य ता है, वह पृथ्वी पर अपने काम को निरन्तर जारी रखता है, और अनुग्रह के युग के कार्य को जारी रखता है। आज का कार्य एक मार्ग है जिस पर मनुष्य कभी नहीं चला, और एक तरीका है जिसे किसी ने कभी नहीं देखा है। यह वह कार्य है जिसे पहले कभी नहीं किया गया है—यह पृथ्वी पर परमेश्वर का नवीनतम कार्य है। इस प्रकार, ऐसा कार्य जो पहले कभी नहीं किया गया हो वह इतिहास नहीं है, क्योंकि अभी तो अभी है, और इसे अभी अतीत बनना है। लोग नहीं जानते हैं कि परमेश्वर ने पृथ्वी पर और इस्राएल के बाहर बड़ा, नया काम किया है, कि यह पहले ही इस्राएल के दायरे के बाहर, और भविष्यवक्ताओं के पूर्वकथनों के परे चला गया है, कि यह भविष्यवाणियों के बाहर नया और बेहतरीन, और इस्राएल के परे नवीनतम कार्य है, और ऐसा कार्य है जिसे लोग न तो समझ सकते हैं और न ही जिसकी कल्पना कर सकते हैं। बाइबल ऐसे कार्य के सुस्पष्ट अभिलेखों को कैसे समाविष्ट कर सकती है? कौन आज के कार्य के प्रत्येक अंश को, बिना किसी चूक के, पहले से ही दर्ज कर सका होगा? कौन इस अति पराक्रमी, अति बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य को इस पुरानी घिसीपिटी पुस्तक में दर्ज कर सकता है जो परम्परा का अनादर करता है? आज का कार्य इतिहास नहीं है, और वैसे तो, यदि तुम आज के नए पथ पर चलने की इच्छा करते हो, तो तुम्हें बाइबल से दूर अवश्य जाना चाहिए, तुम्हें बाइबल की भविष्यवाणियों या इतिहास की पुस्तकों के परे अवश्य जाना चाहिए। केवल तभी तुम इस नए मार्ग पर उचित तरीके से चल पाओगे, और केवल तभी तुम एक नए राज्य और नए कार्य में प्रवेश कर पाओगे। तुम्हें यह अवश्य समझना चाहिए कि क्यों, आज, तुम से बाइबल न पढ़ने को कहा जा रहा है, क्यों एक अन्य कार्य है जो बाइबल से अलग है, क्यों परमेश्वर बाइबल में किसी नवीनतम तथा अधिक विस्तृत अभ्यासों की ओर नहीं देखता है, क्यों इसके बजाए बाइबल के बाहर अधिक पराक्रमी कार्य हैं। यही वह सब है जो तुम लोगों को समझना चाहिए। तुम्हें पुराने और नए कार्य के बीच के अंतर को अवश्य जानना चाहिए, और यद्यपि तुम बाइबल को नहीं पढ़ते हो, फिर भी तुम्हें उसका विश्लेषण करने में समर्थ होना चाहिए; यदि नहीं, तो तुम अभी भी बाइबल की ही आराधना करोगे, और तुम्हारे लिए नए कार्य में प्रवेश करना और नए परिवर्तनों से गुज़रना कठिन होगा। चूँकि यहाँ एक उच्चतर मार्ग है, तो उस निम्न एवं पुराने मार्ग का अध्ययन क्यों करते हो? चूँकि यहाँ अधिक नवीन कथन हैं, और अधिक नया कार्य है, तो पुराने ऐतिहासिक अभिलेखों के मध्य जीवन क्यों बिताते हो? नए कथन तुम्हारा भरण-पोषण कर सकते हैं, जिससे यह साबित होता है कि यह नया कार्य है; पुराने लिखित दस्तावेज़ तुम्हें तृप्त नहीं कर सकते हैं, या तुम्हारी वर्तमान आवश्यकताओं को संतुष्ट नहीं कर सकते हैं, जिससे यह साबित होता है कि वे इतिहास हैं, और यहाँ के और वर्तमान के कार्य नहीं हैं। उच्चतम मार्ग ही नवीनतम कार्य है, और नए कार्य के साथ, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि अतीत का मार्ग कितना ऊँचा था, यह अभी भी लोगों के चिंतनों का इतिहास है, और इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि सन्दर्भ के रूप में इसका कितना महत्व है, यह अभी भी एक पुराना मार्ग है। यद्यपि इसे "पवित्र पुस्तक" में दर्ज किया गया है, फिर भी पुराना मार्ग इतिहास है; यद्यपि "पवित्र पुस्तक" में इसका कोई अभिलेख नहीं है, फिर भी नया मार्ग यहाँ का और अभी का है। यह मार्ग तुम्हें बचा सकता है, और यह मार्ग तुम्हें परिवर्तित कर सकता है, क्योंकि यह पवित्र आत्मा का कार्य है।

तुम लोगों को बाइबल को अवश्य समझना चाहिए—इस कार्य की अति आवश्यकता है! आज, तुम्हें बाइबल को पढ़ने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इस में कुछ भी नया नहीं है; सब कुछ पुराना है। बाइबल एक ऐतिहासिक पुस्तक है, और यदि तुम ने अनुग्रह के युग के दौरान पुराने विधान को खाया और पिया होता—यदि अनुग्रह के युग के दौरान पुराने विधान के समय में जो अपेक्षित था उसे तुम व्यवहार में लाए होते—तो यीशु ने तुम्हें अस्वीकार कर दिया होता, और तुम्हें निन्दित किया होता; यदि तुमने यीशु के कार्य में पुराने विधान को लागू किया होता, तो तुम एक फरीसी होते। यदि, आज, तुम पुराने और नए विधान को खाने और पीने के लिए एक साथ मिलाओगे, और अभ्यास करोगे, तो आज का परमेश्वर तुम्हारी निन्दा करेगा; तुम पवित्र आत्मा के आज के कार्य में पिछड़ जाओगे! यदि तुम पुराने विधान और नए विधान को खाते और पीते हो, तो तुम पवित्र आत्मा की धारा के बाहर हो! यीशु के समय में, यीशु ने अपने में पवित्र आत्मा के कार्य के अनुसार यहूदियों और उन सब की अगुवाई की थी जिन्होंने उस समय उसका अनुसरण किया था। उसने जो कुछ किया उस में उसने बाइबल को आधार के रूप में नहीं लिया, बल्कि वह अपने कार्य के अनुसार बोला; बाइबल क्या कहती है उसने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया, और न ही उसने अपने अनुयायियों की अगुवाई करने के लिए बाइबल में किसी मार्ग को ढूँढ़ा था। ठीक उस समय से ही जब उसने कार्य करना आरम्भ किया, उसने पश्चाताप—एक शब्द जिसके बारे में पुराने विधान की भविष्यवाणियों में बिलकुल भी उल्लेख नहीं किया गया था—के मार्ग को फैलाया। न केवल उसने बाइबल के अनुसार कार्य नहीं किया, बल्कि उसने एक नए मार्ग की अगुवाई भी की, और नया कार्य किया। जब उसने उपदेश दिए तब उसने कभी भी बाइबल को संदर्भित नहीं किया। व्यवस्था के युग के दौरान, बीमारों को चंगा करने और दुष्टात्माओं को निकालने के उसके चमत्कारों को करने के योग्य कोई कभी नहीं हो पाया था। और इसी तरह उसका कार्य, उसकी शिक्षाएँ, अधिकार और उसके वचनों की शक्ति व्यवस्था के युग के दौरान के किसी भी मनुष्य से परे थी। यीशु ने मात्र अपना नया काम किया, और भले ही बहुत से लोगों ने बाइबल का उपयोग करते हुए उसकी निन्दा की—और यहाँ तक कि उसे सलीब पर चढ़ाने के लिए पुराने विधान का उपयोग किया—फिर भी उसका कार्य पुराने विधान से बढ़कर था; यदि ऐसा न होता, तो लोग उसे सलीब पर क्यों चढ़ाते? क्या यह इसलिए नहीं था क्योंकि पुराने विधान में उसकी शिक्षाओं, और बीमारों को चंगा करने और दुष्टात्माओं को निकालने की उसकी योग्यता के बारे में कुछ नहीं कहा गया था? उसका कार्य एक नए मार्ग की अगुवाई करने के लिए था, यह जानबूझकर बाइबल के विरूद्ध "लड़ाई करना", या जानबूझकर पुराने विधान को अनावश्यक बना देना नहीं था। वह केवल अपनी सेवकाई करने के लिए आया था, और अपने नए कार्य को उन लोगों के लिए लेकर आया था जो उसके लिए लालायित थे और उसे खोजते थे। वह पुराने विधान की व्याख्या करने या इसके कार्य का समर्थन करने के लिए नहीं आया था। उसका कार्य व्यवस्था के युग के निरन्तर विकास की अनुमति देने के लिए नहीं था, क्योंकि उसके कार्य ने इस बात पर कोई विचार नहीं किया कि इसमें एक आधार के रूप में बाइबल थी या नहीं; यीशु केवल वह कार्य करने के लिए आया था जो उनके लिए करना आवश्यक था। इस प्रकार, उसने पुराने विधान की भविष्यवाणियों की व्याख्या नहीं की, न ही उसने पुराने विधान के व्यवस्था के युग के वचनों के अनुसार कार्य किया। जो कुछ पुराने विधान ने कहा उसने उसकी उपेक्षा की, उसने इस बात की परवाह नहीं की कि पुराना विधान उनके कार्य से सहमत था या नहीं, और इस बात की परवाह नहीं की कि लोग उसके कार्य के बारे में क्या जानते हैं, या उसने कैसे इसकी निन्दा की। वह केवल निरन्तर वह कार्य करता रहा जो उसे करना चाहिए था, भले ही बहुत से लोगों ने उसकी निन्दा करने के लिए पुराने विधान के भविष्यवक्ताओं के पूर्वकथनों का उपयोग किया। लोगों को, ऐसा प्रतीत हुआ मानो उसके कार्य का कोई आधार नहीं था, और उस में बहुत कुछ ऐसा था जो पुराने विधान के अभिलेखों से असंगत था। क्या यह मूर्खता नहीं है? क्या परमेश्वर के कार्य में सिद्धांतों को लागू किए जाने की आवश्यकता है? और क्या इसे भविष्यवक्ताओं के पूर्वकथनों के अनुसार अवश्य होना चाहिए? आख़िरकार, कौन बड़ा हैः परमेश्वर या बाइबल? परमेश्वर का कार्य बाइबल के अनुसार क्यों होना चहिए? क्या ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर को बाइबल से आगे बढ़ने का कोई अधिकार नहीं है? क्या परमेश्वर बाइबल से दूर नहीं जा सकता है और अन्य काम नहीं कर सकता है? यीशु और उनके शिष्यों ने सब्त का पालन क्यों नहीं किया? यदि उसे सब्त का पालन करना होता और पुराने विधान की आज्ञाओं के अनुसार अभ्यास करना होता, तो आने के बाद यीशु ने सब्त का पालन क्यों नहीं किया, बल्कि इसके बजाए उसने पाँव धोए, सिर को ढका, रोटी तोड़ी और दाखरस पीया? क्या यह सब पुराने विधान की आज्ञाओं से अनुपस्थित नहीं हैं? यदि यीशु पुराने विधान का सम्मान करता, तो उसने इन सिद्धांतो का अनादर क्यों किया? तुम्हें जानना चाहिए कि पहले कौन आया था, परमेश्वर या बाइबल! सब्त का प्रभु होते हुए, क्या वह बाइबल का भी प्रभु नहीं हो सकता है?

नए विधान के दौरान यीशु के द्वारा किए गए कार्य ने नए कार्य की शुरूआत कर की: उसने पुराने विधान के कार्य के अनुसार कार्य नहीं किया, न ही उसने पुराने विधान के यहोवा के द्वारा बोले गए वचनों को लागू किया। उसने अपना स्वयं का कार्य किया, और उसने बिलकुल नया और ऐसा कार्य किया जो व्यवस्था के ऊँचा था। इसलिए, उसने कहाः "यह न समझो, कि मैं व्यवस्था या भविष्यवक्ताओं की पुस्तकों को लोप करने आया हूँ, लोप करने नहीं, परन्तु पूरा करने आया हूँ।" इस प्रकार, जो कुछ उसने सम्पन्न किया उसके अनुसार बहुत से सिद्धांत टूट गए थे। सब्त के दिन जब वह अपने चेलों को अनाज के खेतों में ले गया, उन्होंने अनाज की बालियों को तोड़ा और खाया; उसने सब्त का पालन नहीं किया, और कहा "मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है।" उस समय, इस्राएलियों के नियमों के अनुसार, जो कोई भी सब्त का पालन नहीं करता था उसे पत्थरों से मार डाला जाता था। यीशु ने, हालाँकि, न तो मन्दिर में प्रवेश किया और न ही सब्त का पालन किया, और उसका कार्य पुराने विधान के समय के दौरान यहोवा के द्वारा नहीं किया गया था। इस प्रकार, यीशु के द्वारा किया गया कार्य पुराने विधान की व्यवस्था से आगे बढ़ गया, यह उस से ऊँचा था, और यह उसके अनुसार नहीं था। अनुग्रह के युग के दौरान, यीशु ने पुराने विधान की व्यवस्था के अनुसार कार्य नहीं किया, उसने उन सिद्धांतों की अवहेलना की थी। आज अभी भी ऐसे लोग हैं जो बाइबल से और विशेषरूप से पुराने विधान की व्यवस्था से चिपके हुए हैं—क्या यह यीशु के कार्य को नकारता नहीं है? कुछ लोग कहते हैं, "बाइबल एक पवित्र पुस्तक है, और इसे अवश्य पढ़ा जाना चाहिए।" कुछ लोग कहते हैं, "परमेश्वर के कार्य को सदैव कायम रखा जाना चाहिए, पुराना विधान इस्राएलियों के साथ परमेश्वर की वाचा है, और उसे छोड़ा नहीं जा सकता है, और सब्त का अवश्य हमेशा पालन करना चाहिए!" क्या वे हास्यास्पद नहीं हैं? यीशु ने सब्त का पालन क्यों नहीं किया? क्या वह पाप कर रहा था? कौन ऐसी चीज़ों की सही प्रकृति का पता लगा सकता है? इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम बाइबल को कैसे पढ़ते हो, मनुष्य की समझने की शक्तियों का उपयोग करके परमेश्वर के कार्य को जानना असंभव होगा। न केवल तुम परमेश्वर का शुद्ध ज्ञान प्राप्त नहीं करोगे, बल्कि तुम्हारी धारणाएँ पहले से कहीं अधिक ख़राब हो जाएँगी, इतनी ख़राब कि तुम परमेश्वर का विरोध करना प्रारम्भ कर दोगे। यदि आज परमेश्वर का देहधारण न होता, तो लोग स्वयं अपनी धारणाओं के कारण बर्बाद हो जाते, और वे परमेश्वर की ताड़ना के बीच मर जाते।
स्रोत :सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया