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Updated by milyl7643 on Dec 18, 2019
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परमेश्वर चाहे ज़्यादा लोग उससे उद्धार पाएँ

मसीह ही सत्य, मार्ग और जीवन है। परमेश्वर की भेड़ परमेश्वर की आवाज़ सुनती है। जब तक आप सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, आप देखेंगे कि परमेश्वर प्रकट हो गए हैं।

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धर्मोपदेश और संगति: आपदा से पहले स्वर्गारोहित होने के लिए परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकारो और प्रभु के स...

धर्मोपदेश और संगति: आपदा से पहले स्वर्गारोहित होने के लिए परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकारो और प्रभु के स...

अब अंत के दिनों में, परमेश्वर प्रकट हुए हैं और कार्य शुरू कर दिया है, यानी, देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने अंत के दिनों के लिए अपना न्याय का कार्य शुरू कर दिया है; इसलिए वे जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर सकते हैं सबसे अधिक धन्य हैं। कुछ धार्मिक लोग इसे सुनते और अस्वीकार करते हैं, वे इस वाक्य को स्वीकृति नहीं देते, वे कहते हैं: "हमारा प्रभु यीशु सच्चा परमेश्वर है, प्रभु यीशु मसीह हैI हमें स्वर्ग के राज्य में प्रवेश के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर विश्वास करने की जरूरत नहीं है।" क्या सभी धार्मिक लोग इसी तरह सोचते हैं? क्या यह परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है? प्रभु यीशु ने यह कभी नहीं कहा कि अगर तुम उन पर विश्वास करते हो तो तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हो, उन्होंने ऐसा नहीं कहा था। उन्होंने यह भी नहीं कहा था कि अगर तुम छुटकारे के कार्य को स्वीकार करते हो तो वह तुम्हारे पापों को क्षमा करेंगे और तुम्हें स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने की अनुमति देंगे। न ही उन्होंने यह कहा कि अगर तुम प्रभु यीशु के नाम पर, इन तीन शब्दों पर टिके रहते हो, तो तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हो। उन्होंने ऐसा नहीं कहा था। उन्होंने कहा कि अंत के दिनों में, वे सभी जो दूल्हे के आगमन के बारे में सुनकर उसका स्वागत करते हैं और उसके साथ भोजन करते हैं, वे धन्य हैं। ये लोग स्वर्गारोहित होंगे और उन्हें स्वर्ग के राज्य में प्रवेश का अवसर मिलेगा। बुद्धिमान कुंवारियाँ प्रभु की वापसी को स्वीकार कर सकती हैं; मुर्ख कुंवारियाँ प्रभु की वापसी को स्वीकार नहीं करेंगी। मुर्ख कुंवारियों का अंत क्या होगा? उन्हें त्याग दिया जाएगा, हटा दिया जाएगा! इसलिए, केवल वही जो प्रभु में विश्वास करते हैं, केवल बुद्धिमान कुंवारियाँ ही परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार कर सकती हैं, सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त की गई सच्चाई के माध्यम से परमेश्वर की आवाज़ को पहचान सकती हैं, और परमेश्वर की वापसी की निश्चितता देख सकती हैं। प्रभु इस तरह के लोगों के साथ होते हैं। वे प्रभु के साथ भोजन करेंगे, अंततः शुद्ध किये जायेंगे, बचाए जायेंगे और स्वर्ग के राज्य में ले जाए जायेंगे।

जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति से (श्रृंखला 131)

मानवजाति का उद्धार मुख्य रूप से दो चरणों में होता है: पहला, देहधारी परमेश्वर ने पाप-बलि बनकर, छुटकारे का कार्य कियाI दूसरा, देहधारी परमेश्वर मानव का न्याय करता है, उसे ताड़ना देता है और उसे शुद्ध करता है। यह मानवजाति के लिए परमेश्वर के उद्धार के कार्य की सच्ची गवाही है। अगर आप केवल पहले चरण को स्वीकार कर सकते हैं, जो सिर्फ पाप-बलि को स्वीकार करना है, लेकिन अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार नहीं कर सकते, तब पाप-बलि का कोई मतलब नहीं है। पाप-बलि मानव को शुद्ध नहीं करती; वो ऐसा नहीं कर सकती। केवल न्याय और ताड़ना ही मानव को शुद्ध कर सकते हैं। तो पाप-बलि क्या है? यह आपको योग्यता देता है। अगर आप इसे स्वीकार करते हैं और प्रभु यीशु के नाम को स्वीकार करते हैं, आपके पाप क्षमा कर दिये जायेंगे, और आप परमेश्वर से प्रार्थना करने, उसके सामने आने और उसके कार्य को स्वीकार करने के योग्य हैं। क्या यह एक तरह की योग्यता नहीं है? कुछ कहते हैं, "यह गलत है। जैसे ही हम प्रभु यीशु को स्वीकार करते हैं, वैसे ही हमारे पाप क्षमा होते हैं। आप कैसे कह सकते हैं यह सिर्फ एक तरह की योग्यता है?" क्या यह सोचने का सही तरीका है? क्या यह तर्क मान्य है? क्या पाप क्षमा करना शुद्ध किये जाने के बराबर है? नहीं, यह नहीं है। इस प्रकार, आपके पापों को क्षमा करना परमेश्वर की कृपा है, उसकी कृपा आप पर उड़ेलना है। परमेश्वर आपके पापों की उपेक्षा करेगा, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप बिना पाप के हैं, और निश्चित तौर पर इसका यह मतलब भी नहीं है कि आप पाप नहीं करेंगे। इसलिए, विश्वासी जिनके पाप क्षमा किये जाते हैं, वे अभी भी पाप कर सकते हैं; झूठ बोल सकते हैं और पहले की तरह धोखा दे सकते हैं और लगातार पाप करने और फिर पापों को स्वीकारने के चक्र में फँसे रह सकते हैं। क्या यह सच नहीं है? अगर आप इसे सच्चाई के नज़रिये से देखते हैं, तो फिर क्या पाप-बलि मानव के शुद्धिकरण का प्रतिनिधित्व कर सकती है? क्या यह शुद्धिकरण का कार्य है? यह सिर्फ मानव को योग्यता देती है। जब एक बार आपके पास यह योग्यता होती है, आप परमेश्वर से प्रार्थना कर सकते हैं और उसकी कृपा का आनन्द ले सकते हैं। तो फिर, परमेश्वर की कृपा क्या है? यह आपको क्षमा करना है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप शुद्ध हैं। यह बस माफ़ी है। अनुग्रह के युग में पाप-बलि दिए जाने के बाद, क्या मानव स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य बन गया था? वो नहीं बना। हमारे पास क्या सबूत है? प्रभु यीशु ने कहा था, "जो मुझ से, 'हे प्रभु! हे प्रभु!' कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है" (मत्ती 7:21)। अगर आप कहते हैं, "हे प्रभु! हे प्रभु!" तो क्या आपके पाप क्षमा नहीं किये गए हैं? आप स्वर्ग के राज्य में प्रवेश क्यों नहीं कर सकते? इन वचनों के अनुसार, आप अभी भी स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते, भले ही आपके पाप क्षमा कर दिए गए। यह आपको राज्य में प्रवेश की योग्यता नहीं देता है; यह सिर्फ आपको परमेश्वर की प्रार्थना करने, और उसके सामने आने का अधिकार देता हैI तो फिर परमेश्वर ने क्यों मानव के लिए पाप-बलि दी? परमेश्वर पवित्र है। अगर आप एक पापी हैं, जो पाप करता है, और अगर आप शैतान की तरह हैं, आप परमेश्वर की गवाही देने के योग्य नहीं हैं। आप न तो उनकी गवाही देने के योग्य हैं और न ही उनकी प्रार्थना के। अगर आप उनसे प्रार्थना करते, तो आप उन्हें शर्मिंदा करते और उनके नाम को कलंकित करते। इसलिए, परमेश्वर ने पाप-बलि दी। उन्होंने आपके पापों को क्षमा किया। उन्होंने उनकी उपेक्षा की और आपको माफ़ कर दिया ताकि आप उनके सामने प्रार्थना के योग्य बनें। प्रभु यीशु के कार्य ने अंत के दिनों में न्याय और ताड़ना के लिए मार्ग खोल दिया। उसने पाप-बलि दी, और इसके माध्यम से, मानव यीशु के दूसरे आगमन को प्राप्त करने के और अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करने के योग्य हो पाया है। पाप-बलि का काम इसी बारे में था।

जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति से (श्रृंखला 136)

अंत के दिनों में परमेश्वर का मानव के न्याय और ताड़ना का कार्य किस प्रकार का है? यह मानवजाति को बचाने और पूर्ण करने का कार्य है; यह इन लोगों को उद्धार की ओर ले जाने और उन्हें परमेश्वर के राज्य में लाने का कार्य है। स्वर्ग के राज्य में स्वर्गारोहित किये जाने के लिए हर किसी का न्याय और उसे ताड़ित किया जाना चाहिए। परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का अनुभव करना परमेश्वर द्वारा स्वर्गारोहित किये जाने और स्वर्ग के राज्य में ले जाए जाने के व्यवहारिक कार्य का अनुभव करना होता है। स्वर्ग के राज्य में स्वर्गारोहित किये जाने का क्या अर्थ है? यह शुद्ध किये जाने के लिए परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करना, इस तरह से स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना और बने रहना है। "नहीं तो आपको कभी भी परमेश्वर द्वारा प्रशंसा प्राप्त किये जाने का अवसर नहीं मिलेगा।" परमेश्वर किस तरह के व्यक्ति की प्रशंसा करता है? वह उसकी प्रशंसा करता है जो परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का अनुभव करने के माध्यम से शुद्ध और पूर्ण होते हैं। अब आपने इस मामले को स्पष्ट रूप से देख लिया है? यह एक दृष्टिकोण है, और आपको परमेश्वर के कार्य का दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से देखना चाहिए, क्योंकि यह इकलौता अवसर है, आने वाली सदियों का एकमात्र अवसर। यह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश का इकलौता अवसर है। परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने वाले इज़राइलियों को इस तरह का अवसर नहीं दिया गया, दो हज़ार वर्षों के अनुग्रह के युग के दौरान, प्रभु यीशु में विश्वास करने वालों को भी यह अवसर नहीं दिया गया था, इसके बजाय, अंत के दिनों में जन्म लेने वाले जिन्होंने परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर लिया है, उन्हें यह अवसर दिया गया है। अगर आप यह अवसर खो देते हैं, तो आपके पास फिर कभी परमेश्वर द्वारा प्रशंसा पाने का अवसर नहीं होगा। परमेश्वर द्वारा प्रशंसा पाने के अवसर के बिना, क्या आप स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं? अगर ऐसा है, तो आप कभी प्रवेश नहीं कर पायेंगे, क्योंकि यही इकलौता मौका है।

जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति से (श्रृंखला 122)

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धर्मोपदेश और संगति: वास्तव में भोज में शामिल होना अंत के दिनों के परमेश्वर के न्याय से गुज़रना और शुद्ध होना है

धर्मोपदेश और संगति: वास्तव में भोज में शामिल होना अंत के दिनों के परमेश्वर के न्याय से गुज़रना और शुद्ध होना है

परमेश्वर का न्याय सत्य के माध्यम से न्याय है और इसका अनुभव और आनन्द केवल परमेश्वर के घर में लिया जा सकता है। यह बाहरी संसार में प्राप्त नहीं किया जा सकताI क्या यह परमेश्वर द्वारा असाधारण उन्नति नहीं है? (हाँ।) परमेश्वर हमें भोज में शामिल होने की अनुमति देता है—यह भोज है क्या? यह न्याय के माध्यम से शुद्ध होना है, और अंततः मसीह के वचनों को खाने और पीने के माध्यम से सत्य को प्राप्त करना हैI इस भोज का मूल्य बहुत बड़ा है। लोगों को सच्चाई प्राप्त होने पर कौन से शब्द परिपूर्ण होते हैं? परमेश्वर लोगों को पूर्ण करने के लिए सच्चाई का उपयोग करता है, लोगों का जीवन बनाना ताकि वे सच्चाई की छवि को जी सकें—यह भोज में शामिल होने से प्राप्त परिणाम हैं और यह परमेश्वर की इच्छा है। बाहर से, न्याय के वचन निंदा लगते हैं, लेकिन वास्तव में वे शुद्ध और पूर्ण करते हैं। बस न्याय का ज़िक्र उन लोगों को पहाड़ों की तरफ भगाता है जो सत्य से प्यार नहीं करते, जबकि जो सत्य की खोज करते हैं वे आज्ञाकारी हैं। "अगर मेरा न्याय किया जाता है, वो जैसा है वैसा है, और अगर मेरी कटाई-छँटाई और निपटारा किया जाता है तब भी मैं आज्ञापालन करूँगा। मेरे साथ जैसा भी व्यवहार किया जाता है मैं ठीक रहूंगा; परमेश्वर मेरे लिए जो भी इंतज़ाम करते हैं मैं स्वीकार करूँगा।" शुरुआत में यह बहुत कठिन है, लेकिन कुछ दिन भुगतने के बाद, लोग कहते हैं: "मुझमें इतनी अद्भुत भावना क्यों है? यह कैसे है कि मुझमें वास्तव में एक बदलाव सा आ गया है? यह कैसे है कि मेरा चीज़ों को देखने का नज़रिया भी बदल गया है और मेरा परमेश्वर के साथ घनिष्ठ संबंध है? यह कैसे है कि अब मैं कुछ सच्चाईयों को समझता हूँ? ओह, तो भोज में भाग लेना इस बारे में है। कड़वे के माध्यम से मीठा आता है, और मैंने मीठे का स्वाद चखा है। प्रतीत होता है इस भोज में भाग लेना इतना भी बुरा नहीं है। अब मैंने जान गया हूँ कि परमेश्वर का अद्भुत इरादा लोगों को परिपूर्ण करना है। बाहर से, यह परमेश्वर के वचनों की निंदा, न्याय, और ताड़ना है, और परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव हम पर पड़ना है, लेकिन अंत में परिणाम सम्पूर्ण शुद्धिकरण और पूर्णता है।" अब आपने समझा न्याय क्या है, सत्य क्या है और भोज में शामिल होना क्या है, है न?

जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति से (श्रृंखला 103)

"यहाँ कुछ लोग हैं जो इस भोज में बीस या तीस वर्षों से भाग ले रहे हैं, और कुछ हैं जो कुछ वर्षों से भाग ले रहे हैं। क्या उन्होंने बहुत सी फसल नहीं काटीहै? फसल बहुत ज्यादा रही है; उन्होंने बहुत कुछ हासिल किया है! एक बात यह है कि परमेश्वर के न्याय और ताड़ना ने लोगों को बहुत सी सच्चाईयों और रहस्यों को समझने की अनुमति दी है। दूसरी बात यह है कि न्याय और ताड़ना के परमेश्वर के वचनों ने उनमें वास्तव में शुद्धिकरण का फल साथ ही साथ धीरे-धीरे पूर्ण होने का भी फल उत्पन्न किया है। "शुद्धिकरण का फल" क्या दर्शाता है? शैतानी दर्शन, कानून, तर्क और मानव में मौजूद सभी तरह के जहर पहले साफ़ किये जाते हैं और वे मानवजाति के भ्रष्टाचार की असलियत के साथ उसकी शैतानी प्रकृति और सार को जान जाते हैं। यह लोगों के जीवन में प्रवेश और उनके स्वभाव में परिवर्तन के लिए बहुत प्रभावी है। और जो सबसे मूल्यवान है वह है कि वे परमेश्वर के लिए अलग-अलग स्तर के सम्मान अपने हृदयों में विकसित करते हैं क्योंकि उन्होंने परमेश्वर द्वारा किये गए न्याय के माध्यम से प्रकट की गयी परमेश्वर की धार्मिकता का स्वाद चखा है। क्योंकि उनकी परमेश्वर के प्रति श्रद्धा सच्ची है, वे सभी तरह की बुराईयों से दूर रहने में सक्षम हैं और उनके शब्दों में पाप नहीं है और वे और हिंसा नहीं करते हैं। और यहाँ तक कि उनके विचारों और इरादों को भी पर्याप्त रूप से साफ़ कर दिया गया है। अतीत में परमेश्वर का विरोध और उसकी आलोचना करना उनके लिए बहुत सामान्य था, लेकिन अब वे आलोचना नहीं करते या जब वे पूरी तरह से कुछ समझ नहीं पाते तो बेलगाम नहीं बोलते। इन सबसे ऊपर, वे आशीर्वाद, स्वर्ग का राज्य, ताज पहनाया जाना या इनाम जैसी शानदार इच्छाओं के बारे में सोचने की हिम्मत भी नहीं करते। वे उन चीज़ों का पीछा करने की हिम्मत नहीं करते, उन्हें लगता है कि उन्हें प्राप्त करना अर्थपूर्ण नहीं है। वे सभी सच्चाई को खोजने, अपने जीवन में बढ़ने, परमेश्वर को जानने, और अपने स्वभाव को बदलने पर ध्यान केन्द्रित करना शुरू करते हैं। वे परमेश्वर के प्रेम के प्रतिफल के लिए स्वीकार्य रूप से अपना कर्तव्य करने पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। क्या यह शुद्ध होने की प्रक्रिया नहीं है? यह शुद्ध होने से प्राप्त परिणाम भी है। क्या जीवन में इस तरह की प्रविष्टि और क्या इस तरह के वास्तविक बदलाव परमेश्वर के न्याय के कार्य के फल नहीं हैं? जितना अधिक आप परमेश्वर के न्याय से गुजरेंगे उतना अधिक आप प्राप्त करेंगे। जितने अधिक स्पष्ट रूप से आप सत्य को समझते हैं, उतने अधिक आप बदल जायेंगे। यदि आप परमेश्वर के न्याय और ताड़ना से कम गुज़रते हैं; आप कम फल पाएंगे और कम बदलेंगे; जो सत्य आप समझते हैं वह निश्चित रूप से सतही होगी। यह एक तथ्य है। परमेश्वर के चुने हुए लोगों में सभी जो सत्य को समझते हैं और वास्तविकता में प्रवेश करते हैं, जिनके भ्रष्ट स्वभावों को बड़े पैमाने पर शुद्ध किया गया है, आम तौर पर वे बहुत ही कम परमेश्वर का विरोध करते हैं या उसकी आलोचना करते हैं। यहाँ तक कि अगर उनकी आज्ञाकारिता और परमेश्वर से उनका प्रेम अपर्याप्त है, तब भी अपने हृदय की गहराईयों में वे पहले से ही परमेश्वर की मनोरमता महसूस करते हैं और देखते हैं कि परमेश्वर के लिए सच्ची आज्ञाकारिता क्या है। इस कारण से जीवन में उनका प्रवेश लगातार और भी गहरा होता जाता है। वे कम से कम भ्रष्ट होते जाते हैं, वे परमेश्वर की अधिक से अधिक आज्ञा मानते हैं, और परमेश्वर के लिए उनका प्रेम परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के कारण और अधिक बढ़ता जाता है। क्या इस तरह के लोगों को शुद्धि प्राप्त नहीं है? (उन्हें प्राप्त है।) ये वे लोग हैं जिनके लिए स्वर्ग के राज्य में एक स्थान है।

जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति से (श्रृंखला 103)

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धार्मिक दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं जो परमेश्वर के कार्य को मनुष्य के कार्य से अलग नहीं कर सकते हैं। बहुत से लोग जिनकी आराधना करते हैं उनके किये कार्य को परमेश्वर के कार्य के रूप में आदर देते हैं और देहधारी परमेश्वर के कार्य को मनुष्य द्वारा किए गए कार्य के रूप में देखते हैं। वे नहीं जानते हैं कि इससे परमेश्वर के स्वभाव का अपमान होता है, कि उसमें विश्वास करने के बावजूद वे परमेश्वर का विरोध कर रहे हैं और परमेश्वर की निंदा कर रहे हैं, और कि इससे वे अपने आप को परमेश्वर का शत्रु बना रहे हैं। तो परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के कार्य में सचमुच क्या अंतर है? देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर जिन लोगों का उपयोग करते हैं, उनमें क्या वास्तविक अंतर है?

चमकती पूर्वी बिजली, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया का सृजन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के प्रकट होने और उनका काम, परमेश्वर यीशु के दूसरे आगमन, अंतिम दिनों के मसीह की वजह से किया गया था। यह उन सभी लोगों से बना है जो अंतिम दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करते हैं और उसके वचनों के द्वारा जीते और बचाए जाते हैं। यह पूरी तरह से सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से स्थापित किया गया था और चरवाहे के रूप में उन्हीं के द्वारा नेतृत्व किया जाता है। इसे निश्चित रूप से किसी मानव द्वारा नहीं बनाया गया था। मसीह ही सत्य, मार्ग और जीवन है। परमेश्वर की भेड़ परमेश्वर की आवाज़ सुनती है। जब तक आप सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, आप देखेंगे कि परमेश्वर प्रकट हो गए हैं।

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सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की उत्पत्ति और विकास

सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की उत्पत्ति और विकास

अनुग्रह के युग में, प्रभु यीशु ने अपने अनुयायियों से वादा किया, "और यदि मैं जाकर तुम्हारे लिए जगह तैयार करूँ, तो फिर आकर तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊंगा कि जहाँ मैं रहूँ वहाँ तुम भी रहो" (यूहन्‍ना 14:3)। उन्होंने यह भविष्यवाणी भी की, "क्योंकि जैसे बिजली पूर्व से निकलकर पश्चिम तक चमकती है, वैसे ही मनुष्य के पुत्र का भी आना होगा" (मत्ती 24:27)। अंतिम दिनों में, जैसे कि उन्होंने स्वयं प्रतिज्ञा की और पहले से ही कह दिया, परमेश्वर ने वचन का उपयोग कर के, प्रभु यीशु के मोचन कार्य की नींव पर न्याय, ताड़ना, विजय और उद्धार का कार्य करने के लिए पुनः देह धारण किया है और दुनिया के पूर्व में—चीन—में अवतीर्ण हुआ है। बाइबिल की इन भविष्यवाणियों में "न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है" "वह जिसके कान हो, सुन ले कि आत्मा ने कलीसियाओं से क्या कहा।" भी पूरा हो गया है। अंतिम दिनों केपरमेश्वर के काम ने अनुग्रह का युग समाप्त कर दिया और राज्य का युग आरंभ किया। जैसे—जैसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार मुख्यभूमि चीन में तेजी से फैला, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया अस्तित्व में आयी। जैसा कि तथ्यों से सिद्ध हुआ है, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया पूरी तरह से परमेश्वर के अंतिम दिनों के काम के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आयी, और किसी व्यक्ति द्वारा स्थापित नहीं की गई थी। यही कारण है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया में चुने हुए लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम से प्रार्थना करते हैं, उसके काम के अनुसार चलते हैं, और उसके द्वारा व्यक्त किए गए सभी सत्यों को स्वीकार करते हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि ये चुने हुए लोग किसी मनुष्य में विश्वास करने के बजाय, मसीह में विश्वास करते हैं जो अंतिम दिनों में देहधारी हुआ है, शरीर में साकार हुई आत्मा व्यावहारिक परमेश्वर है। बाह्य रूप से, सर्वशक्तिमान परमेश्वर मनुष्य के एक साधारण पुत्र से अधिक कुछ नहीं है, किंतु सार रूप में वह परमेश्वर की आत्मा का मूर्तरूप है और सत्य, मार्ग और जीवन है। उसका काम और वचन परमेश्वर की आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति हैं और परमेश्वर की व्यक्तिगत रूप से उपस्थिति हैं। इसलिए, वह व्यावहारिक परमेश्वर है जो देहधारी हुआ है।

1991 में, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंतिम दिनों के मसीह ने, चीन में आधिकारिक रूप से अपनी सेवकाई करनी आरंभ की। फिर, उसने लाखों शब्द व्यक्त किए और अंतिम दिनों में महान श्वेत सिंहासन के न्याय का कार्य आरंभ किया। ठीक जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "न्याय का कार्य परमेश्वर का स्वयं का कार्य है, इसलिए प्राकृतिक रूप से इसे परमेश्वर के द्वारा किया जाना चाहिए; उसकी जगह इसे मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता है। क्योंकि सत्य के माध्यम से मानवजाति को जीतना न्याय है, इसलिए यह निर्विवाद है कि तब भी परमेश्वर मनुष्यों के बीच इस कार्य को करने के लिए देहधारी छवि के रूप में प्रकट होता है। अर्थात्, अंत के दिनों में, मसीह पृथ्वी के चारों ओर मनुष्यों को सिखाने के लिए और सभी सत्यों को उन्हें ज्ञात करवाने के लिए सत्य का उपयोग करेगा। यह परमेश्वर के न्याय का कार्य है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है")। "अंत के दिनों में परमेश्वर वचन का कार्य करता है, और ऐसे वचन पवित्र आत्मा के वचन हैं, क्योंकि परमेश्वर पवित्र आत्मा है और देहधारी भी हो सकता है; इसलिए, पवित्र आत्मा के वचन, जैसे अतीत में बोले गए थे, आज देहधारी परमेश्वर के वचन हैं। ...कार्य को करने के लिए परमेश्वर को कथनों को बोलने के लिए, उसे अवश्य देहधारण करना चाहिए, अन्यथा उसका कार्य उसके उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "वह मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर के प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है जिसने उसे अपनी ही धारणाओं में परिभाषित किया है?")। अंतिम दिनों के मसीह की उपस्थिति और कथनों के कारण, बहुत अधिक लोग जो सत्य के प्यासे और सत्य की खोज करते हैं जीत लिए गए हैं और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन से शुद्ध हो चुके हैं, और परमेश्वर के न्याय और ताड़ना, परमेश्वर की उपस्थिति और उद्धारक की वापसी को देख चुके हैं।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया सर्वशक्तिमान परमेश्वर—लौटे हुए परमेश्वर यीशु—अंतिम दिनों के मसीह की उपस्थिति और काम की वजह से और उसके धर्मी निर्णय और ताड़ना के अधीन, अस्तित्व में आयी। कलीसिया में उन सभी लोगों का समावेश है जो वास्तव में अंतिम दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करते हैं और परमेश्वर के वचन
द्वारा जीते और बचाये जाते हैं। इसे पूरी तरह से सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से स्थापित किया गया था, और व्यक्तिगत रूप से उसके द्वारा नेतृत्व और मार्गदर्शन किया जाता है, और इसे किसी भी तरह से किसी भी व्यक्ति द्वारा स्थापित नहीं किया गया था। यह एक ऐसा तथ्य है जिसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया में सभी चुने हुए लोगों द्वारा स्वीकार किया गया है। देहधारी परमेश्वर द्वारा उपयोग किया जाने वाला कोई भी परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत है, और परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से नियुक्त किया गया और गवाही देने के लिए है, ठीक वैसे ही जैसे कि यीशु ने व्यक्तिगत रूप से बारह शिष्यों को चुना और नियुक्त किया। जो लोग परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाते हैं, वे केवल उसके काम में ही सहयोग करते हैं, और उसके बदले में परमेश्वर के कार्य को नहीं कर सकते हैं। कलीसिया उन लोगों द्वारा स्थापित नहीं की गई थी जो परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाते हैं, न ही परमेश्वर के चुने हुए लोग उन पर विश्वास करते हैं या उनका पालन करते हैं। अनुग्रह के युग की कलिसीयाओं की स्थापना पौलुस और अन्य प्रेरितों द्वारा नहीं की गई थी, बल्कि ये प्रभु यीशु के काम के परिणाम थे और इन्हें स्वयं प्रभु यीशु द्वारा स्थापित किया गया था। इसी तरह, अंतिम दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया उन लोगों द्वारा स्थापित नहीं की गई है जिन्हें परमेश्वर द्वारा उपयोग किया गया था बल्कि यह सर्वशक्तिमान परमेश्वर के काम के परिणाम है। परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने वाले लोग, मनुष्य का कर्तव्य करते हुए, केवल कलीसियाओं को सींचते, आपूर्ति करते और उनका मार्गदर्शन करते हैं। यद्यपि परमेश्वर के द्वारा उपयोग किए गए लोगों द्वारा परमेश्वर के चुने हुए लोगों का नेतृत्व किया जाता है, उन्हें सींचा जाता है और आपूर्ति की जाती है, तब भी वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अलावा किसी अन्य को नहीं मानते या किसी अन्य का अनुसरण नहीं करते हैं, और उस (परमेश्वर) के वचनों और काम को स्वीकार करते और उनका पालन करते हैं। यह एक तथ्य है जिसे कोई इनकार नहीं कर सकता है। देहधारी परमेश्वर की उपस्थिति और काम की वजह से, सभी धार्मिक संप्रदायों में परमेश्वर के कई सच्चे विश्वासियों ने अंततः परमेश्वर की आवाज सुनी है, देखा है कि प्रभु यीशु पहले ही आ चुके हैं और अंतिम दिनों में न्याय का कार्य कर चुके हैं, और उन सभी ने पुष्टिकी है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर वापस आए हुए प्रभु यीशु हैं—और परिणामस्वरूप, उन्होंने अंतिम दिनों के उसके काम को स्वीकार कर लिया है। वे सभी जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन द्वारा जीते जाते हैं, उसके नाम के अधीन हो जाते हैं। इसलिए, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के सभी चुने हुए लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, और उसका अनुसरण, आज्ञा-पालन और उसकी आराधना करते हैं। परमेश्वर के न्याय और अनुशासन के कार्य का अनुभव करके, चीन के चुने हुए लोग उसके धर्मी स्वभाव की सराहना करने के लिए आए हैं, और उन्होंने उसकी महिमा और क्रोध को देखा है, और इसलिए वे पूरी तरह से परमेश्वर के वचन द्वारा जीते जा चुके हैं और वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सामने परास्त हो गए हैं, और परमेश्वर के वचन के न्याय और ताड़ना को मानने और स्वीकार करने के इच्छुक हैं। इस प्रकार, उन्होंने परमेश्वर के उद्धार को प्राप्त कर लिया है।

क्योंकि सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए वचन मानव जाति को बचाने के लिए परमेश्वर की प्रबंधन योजना के रहस्यों का खुलासा करते हैं, परमेश्वर के चुने हुए लोगों को, परमेश्वर के शब्दों का खुलासा करने में समझने में आया कि हर युग में परमेश्वर का नया नाम है, और उसका नया नाम इस बात का प्रतीक है कि परमेश्वर नए काम कर रहा है, और इसके अलावा, यह कि परमेश्वर प्राचीन युग को समाप्त कर रहा है और एक नया युग आरंभ कर रहा है। परमेश्वर के नाम का अर्थ बहुत महान और गहन है! इसमें परमेश्वर के काम का महत्व समाहित है। परमेश्वर युग को बदलने और उस युग के अपने काम का प्रतिनिधित्व करने के लिए नामों का उपयोग करता है। व्यवस्था के युग में, व्यवस्थाओं और आज्ञाओं को जारी करने और पृथ्वी पर मानवजाति के जीवन का मार्गदर्शन करने के लिए उसने यहोवा के नाम का उपयोग किया। अनुग्रह के युग में, उसने मानवजाति को छुटकारा दिलाने वाला काम करने के लिए यीशु के नाम का उपयोग किया। राज्य के युग के आगमन के साथ, उसने परमेश्वर के घर से शुरू करते हुए न्याय का कार्य करने, मनुष्य को शुद्ध करने, मनुष्य को बदलने और मनुष्य को बचाने के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम का उपयोग किया है। परमेश्वर का नया नाम कुछ ऐसा नहीं है जिसे मानव द्वारा मनमाने ढंग से पुकारा जाता है, बल्कि अपने काम की आवश्यकताओं के कारण परमेश्वर ने स्वयं लिया था। कार्य के प्रत्येक चरण में परमेश्वर द्वारा लिये जाने वाले नाम की जड़ें बाइबिल में है, और उस नाम की भविष्यवाणी प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में बहुत समय पहले समय से की गई थी जो प्रभु यीशु तब लेंगे जब वह अंतिम दिनों में वापस आते हैं: "जो जय पाए उसे मैं अपने परमेश्‍वर के मन्दिर में एक खंभा बनाऊँगा, और वह फिर कभी बाहर न निकलेगा; और मैं अपने परमेश्‍वर का नाम और अपने परमेश्‍वर के नगर अर्थात् नये यरूशलेम का नाम, जो मेरे परमेश्‍वर के पास से स्वर्ग पर से उतरनेवाला है, और अपना नया नाम उस पर लिखूँगा" (प्रकाशितवाक्य 3:12)। "प्रभु परमेश्‍वर, जो है और जो था और जो आनेवाला है, जो सर्वशक्‍तिमान है, यह कहता है, 'मैं ही अल्फ़ा और ओमेगा हूँ'" (प्रकाशितवाक्य 1:8)। "प्रभु परमेश्‍वर, जो है और जो था और जो आनेवाला है, जो सर्वशक्‍तिमान है, यह कहता है, 'मैं ही अल्फ़ा और ओमेगा हूँ'" (प्रकाशितवाक्य 19:6)। राज्य के युग में सर्वशक्तिमान परमेश्वर का नाम प्रकाशितवाक्य की पुस्तक की भविष्यवाणियों को वास्तव में पूरा करता है। परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, उसी ने सब चीजों का सृजन किया और उन पर शासन करता है, और वही प्रथम और अंतिम है; उसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहना हम सबके लिए सर्वाधिक उचित है। तब से, लोगों ने देहधारी परमेश्वर को सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहा है और देहधारी मसीह को व्यावहारिक परमेश्वर भी कहा है। और इस प्रकार सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया का नाम पड़ा।

जब साम्राज्य का सुसमाचार मुख्यभूमि चीन में फैला, तो परमेश्वर ने संपूर्ण सृष्टि में आत्मा के समस्त कार्य को पुनः प्राप्त किया और इसे लोगों के उस समूह पर संकेन्द्रित किया जिसने अंतिम दिनों के परमेश्वर के काम को स्वीकार किया था, और उन पर जो पूर्वनियत और परमेश्वर द्वारा चुने गए थे और ईमानदारी से सही रास्ते की खोज में थे। क्योंकि पवित्र आत्मा का काम स्थानांतरित कर दिया गया था, इसलिए सभी संप्रदायों ने पवित्र आत्मा के काम को खो दिया और एक बंजर भूमि बन गए, और लोगों के पास सत्य के मार्ग को खोजने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं रहा। इसने बाइबिल में की गई भविष्यवाणी को वास्तव में पूरा किया है, "देखो, ऐसे दिन आते हैं, जब मैं इस देश में महँगी करूँगा; उस में न तो अन्न की भूख और न पानी की प्यास होगी, परन्तु यहोवा के वचनों के सुनने ही की भूख प्यास होगी" (आमोस 8:11)। पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में, विभिन्न संप्रदायों के जिन लोगों ने सत्य का अनुसरण किया और वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास किया, वे मसीह विरोधियों और दुष्ट नौकरों के प्रतिबंधों और बाधाओं को तोड़कर बाहर आ गए, और अंततः उन्होंने परमेश्वर की आवाज़ को पहचाना, और अधिकाधिक लोग परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौट आए। हर जगह सभी धर्मों के एक होने और सभी राष्ट्रों का इस पर्वत की ओर प्रवाहित होने का सुखद दृश्य दिखाई दिया। जैसे ही सभी संप्रदायों के ऐसे लोग जिन्हें वास्तव में परमेश्वर में विश्वास था बड़ी संख्या में लौट आए, तो अधिकांश संप्रदाय ढह गए और लंबे समय से नाम मात्र पर ही अस्तित्व में हैं। परमेश्वर के काम के कदमों को कौन रोक सकता है? परमेश्वर के चुने हुए लोगों को परमेश्वर की ओर लौटने से कौन बाधित कर सकता है? यह ऐसा था मानो कि पूरे धार्मिक समुदाय को सीधे स्थापित किया गया हो। लौटने की धारा तेजी से हिलोरे लेती हुई लहरों की तरह थी। परमेश्वर के काम के रास्ते में कोई शक्ति नहीं खड़ी हो सकती थी! जबसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर प्रकट हुए और उनका काम शुरू हुआ, तब से सीसीपी सरकार सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को अनवरत रूप से उत्पीड़ित करती आ रही है। इसने अंतिम दिनों के परमेश्वर के काम को समाप्त करने का प्रयास करते हुए, मसीह और परमेश्वर के सेवकों का बुरी तरह से शिकार किया है और परमेश्वर के चुने हुए लोगों का निर्दयतापूर्वक उत्पीड़न कियाहै। इसने इस बात की योजना बनाने के लिए कि कैसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को समाप्त किया जाए, कई आपातकालीन बैठकें बुलाई हैं। इसने कई गुप्त दस्तावेज़ तैयार और जारी किए हैं और विभिन्न उपाय शुरू किए हैं जो खोटे और शैतानी हैं: सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को अपमानित करते हुए हर जगह नोटिस लगाना, सार्वजनिक नोटिस जारी करना, अकारण अफ़वाहें गढ़ने, लांछन और झूठे आरोप लगाने के लिए टेलीविजन, रेडियो, अख़बारों, इंटरनेट और अन्य मीडिया का उपयोग करना; बलपूर्वक लोगों को बुरी शिक्षाओं और भ्रम के साथ राजी करना, और ज़बर्दस्ती मत परिवर्तन (ब्रेनवॉशिंग) और आत्मसातकरण करना; पर्यवेक्षण और नियंत्रण के लिए थ्री-सेल्फचर्च का उपयोग करना, खुलेआम जाँच करने और गुप्त रूप से पूछताछ करने के लिए जासूसों को भेजना, जनसाधारण पर नियंत्रण रखना, पड़ोसी देशों से निगरानी का आदेश देना, और बड़े पुरस्कार का वादा करके लोगों को शिकायत दर्ज करने के लिए प्रोत्साहित करना; लोगों के घरों की मनमाना तलाशी लेना, उनके घरों को लूटना और उनकी संपत्ति जब्त करना, जुर्मानों के जरिये धन ऐंठना और अनुचित साधनों से धन संचित करना; परमेश्वर के चुने हुए लोगों की गुप्त गिरफ्तारी करना, इच्छानुसार उन्हें श्रम शिविरों में रोक कर रखना और कैद करना, यातनाओं के माध्यम से अपराध-स्वीकारोक्ति निकालना, शरीर और दिमाग को तहस-नहस करना, और दंडाभाव के साथ लोगों को पीट कर मार डालना; यहाँ तक कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कलीसिया को दबाने के लिए सशस्त्र पुलिस और सैनिकों की नियुक्त भी करना; इत्यादि। सीसीपी सरकार ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कलीसिया के मसीहियों—परमेश्वर के चुने हुए लोगों—को अमानवीय रूप से गिरफ्तार किया और सताया है, जिसके कारण उन्हें अपनी संपत्ति की अनैतिक डकैती और भौतिक एवं आध्यात्मिक यातनाओं और दुःखों को भुगतना पड़ा, और यहाँ तक कि कई लोगों की मृत्यु हो गई। सरकार के कार्य भयावह रहे हैं। जैसा कि लिखित दस्तावेज़ हैं, कम से कम सत्तर ईसाईयों को जुलाई 2018 तक यातना देकर मार दिया गया है। उदाहरण के लिए ज़ाई योंगजियांग (पुरुष, 43 वर्ष), सुईजी काउंटी, एन्हुई प्रांत के वुगौऊ टाउन के एक मसीही को 30 अप्रैल 1997 के शुरुआती घंटों में चुपके से स्थानीय पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया था और उसके साथ घातक रूप से दुर्व्यवहार किया गया था। 10 मई को, जब ज़ाई के परिवार ने शवदाह पर उसका शरीर देखा, तो वह सभी जगह काला और बैंगनी और खून से सना हुआ था, और उसने सिर पर कई घातक घावों का सामना किया था। ये ऐझोंग (पुरुष, 42 वर्ष), शुयांग काउंटी, जियांग्सू प्रांत के एक मसीही, को 26 मार्च 2012 को कलीसिया के लिए माल खरीदते समय सीसीपी पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया था। तीसरे दिन, उसे पीट-पीट कर मार डाला गया। जियांग गुइझी (महिल, 46 वर्ष, उस समय सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया का एक वरिष्ठ नेता), पिंग्यू काउंटी के क्विंग्हे जिले, हेनान प्रांत के एक मसीही को 4 जनवरी, 2013 को ज़िन्मी शहर, हेनानप्रांत में सीसीपी पुलिस द्वारा गुप्त रूप से गिरफ्तार और कैद कर लिया गया था। पुलिस अधिकारियों ने एक अवैध अदालत स्थापित की और अपराध-स्वीकरण निकालने के लिए यातना का उपयोग किया। पुलिस द्वारा किए गए शारीरिक शोषण के परिणामस्वरूप 12 फरवरी की सुबह-सुबह जियांग की मृत्यु हो गई... इस से परे, सीसीपी पुलिस द्वारा दसियों हजार अन्य मसीहियों को भी गिरफ्तार और कैद किया गया है। कुछ को ड्रग्स के इंजेक्शन दिए गए और उनमें सीजोफ्रेनिया विकसित हो गया; कुछ लोग यातना के द्वारा इतनी बुरी तरह से अपंग हो गए कि वे स्वयं की देखभाल करने में असमर्थ रहे; कुछ को श्रम शिविरों में कैद किया गया, और उनकी रिहाई के बाद सीसीपी सरकार द्वारा उन पर निगरानी रखी जाती थी और उन्हें उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित रखा जाता था। अपरिष्कृत आँकड़ों के अनुसार, 2011 से 2013 तक के दो अल्प वर्षों में, परमेश्वर के चुने हुए 3,80,380 लोगों को मुख्य भूमि चीन में सीसीपी सरकार द्वारा गिरफ्तार किया और हिरासत में लिया गया था। इन लोगों में से, ने अवैध रूप से पूछताछ के दौरान सभी प्रकार की यातनाएँ सहीं; पर विभिन्न आरोप लगवाए गए थे और उनसे बेशर्मी से से अधिक जुर्माना लिया या जबरदस्ती वसूला गया; 35,330 ने अपने घर लुटवाए, और सार्वजनिक सुरक्षा अंगों और उनके अधीनस्थों के द्वारा कम से कम (कलीसिया को चढ़ावे और व्यक्तिगत संपत्ति सहित) बलात् और आधारहीन ढंग से जब्त कर लिए गए या पुलिस अधिकारियों द्वारा जेब में रख लिए गए थे। जब सीसीपी सरकार की गिरफ्तारी और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के मसीहियों के उत्पीड़न की बात आती है, तो ये मोटे-मोटे आँकड़े हैं, और जब सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के सभी मसीह लोगों की बात आती है, तो वे हिमशैल का सिर्फ एक शीर्ष हैं। वास्तव में, जब से सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने अपना काम शुरू किया, तब से परमेश्वर की कलीसिया के अनगिनत मसीहियों को सीसीपी सरकार द्वारा गिरफ्तार किया, सताया, छिपाया गया, अथवा उन पर निगरानी रखी गई है। इसने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कलीसिया को रक्त पिपासा से दबाने के लिए मुख्यभूमि चीन को आतंक की दुनिया में बदलते हुए हर क्रूर साधन का उपयोग किया। इसके अलावा, सभी संप्रदायों द्वारा कलीसिया को भी कलंकित, निंदित किया गया और उस पर हमले किए गए। यह तुरंत दूर-दूर तक फैली अफवाहों और हर तरह के कलंक, दुर्व्यवहार और अपशब्दों के तूफान का कारण बना। पूरा समाज और धार्मिक समुदाय सभी प्रकार के प्रतिकूल प्रचार से भर गए। सच्चे परमेश्वर के प्रति भ्रष्ट मानवता का प्रतिरोध और सच्चे मार्ग का उत्पीड़न अपनी चरम पर पहुँच गया था।

चूँकि मानवता शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दी गई थी, इसलिए परमेश्वर ने मानवजाति को बचाने की अपनी प्रबंधन योजना कभी नहीं रोकी। मानवजाति, हालाँकि, सत्य को नहीं जानती है, यह परमेश्वर को तो और भी कम जानती है। परिणामस्वरूप, हर बार जब भी परमेश्वर नया काम शुरू करने के लिए देहधारण करता है, उसे सत्ताधारियों और धार्मिक समूहों द्वारा अस्वीकृत कर दिया और सताया जाता है। दो हजार साल पहले, जब यीशु ने देहधारण किया, तो उसे रोमन सरकार और यहूदी विश्वास द्वारा सताया और गिरफ्तार किया गया था, और अंत में उसेसूली पर चढ़ाया गया था। अंतिम दिनों में, जब से परमेश्वर न्याय का कार्य करने के लिए चीन में देहधारण कर लौटे हैं, तब से सीसीपी सरकार द्वारा उन्हें क्रूरता से सताया और उनका पीछा किया गया है, और मसीही धर्म के सभी संप्रदायों द्वारा भी अभिशप्त किया गया है, उन पर झूठे आरोप लगाए गए हैं, उन्हें निंदित, और अस्वीकृत किया गया है। यह मनुष्य के भ्रष्टाचार और दुष्टता का स्पष्ट संकेत है। हम कल्पना कर सकते हैं कि परमेश्वर के लिए राक्षसों के इस तरह के किले में अपना काम पूरा करना कितना कठिन है, जहाँ भारी काले बादल छाए रहते हैं और शैतान शक्ति का उपयोग करते हैं। तथापि, परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, और उनके पास सर्वोच्च अधिकार और शक्ति है। भले ही शैतान की ताकतें कितनी ही व्याप्त हों, भले ही वे कैसे विरोध और आक्रमण करती हों, यह सब किसी लाभ का नहीं है। बस लगभग 20 वर्षों में, गंभीर दमन के अधीन पूरे चीन में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार फैल चुका है। देशभर में कई लाख कलीसियाएँ उभर आई हैं और लाखों लोगों ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम की अधीनता स्वीकार कर ली है। लगभग तत्काल ही, सभी संप्रदाय उजाड़ हो गए, क्योंकि परमेश्वर के अनुयायियों ने परमेश्वर की आवाज़ सुन ली है, और वे आवाज़ का पीछा करते हुए पहले ही वापस आ चुकी हैं, परमेश्वर के सामने गिर चुकी हैं, और उन्हें परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से सिंचित किया गया और उनका मार्गदर्शन किया गया है। इसने बाइबिल में भविष्यवाणी को पूरा किया है कि "हर जाति के लोग धारा के समान उसकी ओर चलेंगे।" यह अपरिहार्य है कि परमेश्वर में सभी सच्चे विश्वासी अंत में सर्वशक्तिमान परमेश्वर की ओर मुड़ेंगे, क्योंकि यह लंबे समय से परमेश्वर द्वारा नियोजित और पूर्वनियत किया गया है। कोई इसे बदल नहीं सकता है! वे झूठे विश्वासी, जिन्हें परमेश्वर पर विश्वास केवल इतना ही है कि वे अपनी पेट भर रोटियाँ खा सकें, और वे विभिन्न शत्रु जो दुष्टता करते हैं, सर्वशक्तिमान परमेश्वर का विरोध और निंदा करते हैं, सब परमेश्वर के काम द्वारा समाप्त कर दिए गए हैं। परमेश्वर के काम द्वारा समस्त धार्मिक समुदाय पूरी तरह से नष्ट और विघटित कर दिया गया है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का काम अंत में महिमा में समाप्त हो गया है। इस अवधि के दौरान, सीसीपी सरकार के उन्मत्त प्रतिरोध और रक्तरंजित दमन के बावजूद, परमेश्वर के साम्राज्य का सुसमाचार अभी भी विद्युत गति से फैल गया है। परमेश्वर के काम को हटाने और मिटाने का सीसीपी का षड़यंत्र विफलता के साथ समाप्त हो गया है। परमेश्वर का विरोध करने वाली सभी दुष्ट ताकतों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया है और परमेश्वर के तेजस्वी और कुपितन्याय के बीच में पलट दिया गया है। ठीक जैसे कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "वे सभी जिनसे मैं प्रेम करता हूँ वे निश्चय ही अनन्त काल तक जीवित रहेंगे, और वे सभी जो मेरे विरूद्ध खड़े होते हैं उन्हें निश्चय ही मेरे द्वारा अनन्त काल तक ताड़ना दी जाएगी। क्योंकि मैं एक ईर्ष्यालु परमेश्वर हूँ, मैं उन सब के कारण जो मनुष्यों ने किया है उन्हें हल्के में नहीं छोडूँगा। मैं पूरी पृथ्वी पर निगरानी रखूँगा, और, संसार की पूर्व दिशा में धार्मिकता, प्रताप, कोप और ताड़ना के साथ प्रकट हो जाऊँगा, और मैं मानवता के असंख्य मेज़बानों पर स्वयं को प्रकट करूँगा!" (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिये परमेश्वर के कथन "वचन देह में प्रकट होता है" के "छब्बीसवाँ कथन")। "मेरा राज्य समस्त ब्रह्माण्ड के ऊपर आकार ले रहा है, और मेरा सिंहासन खरबों लोगों के हृदयों में प्रभुत्व वाला हो रहा है। स्वर्गदूतों की सहायता से, मेरी महान उपलब्धि शीघ्र ही फलित हो जाएगी। मेरे सभी पुत्र और लोग, मेरे साथ उनके फिर से एक होने, और फिर कभी अलग न होने की चाहना करते हुए, साँस रोक कर मेरे आगमन की प्रतीक्षा करते हैं। मेरे राज्य की असंख्य आबादी, मेरे उनके साथ होने की वजह से, हर्षित उत्सव में एक दूसरे की ओर क्यों नहीं भाग सकती है? क्या यह कोई ऐसा पुनर्मिलन हो सकता है जिसके लिए कोई कीमत चुकाने की आवश्यकता नहीं है? मैं सभी मनुष्यों की नज़रों में सम्मानित हूँ, सभी के वचनों में मेरी घोषणा होती है। जब मैं लौटूँगा, तब मैं शत्रु की सभी ताक़तों को और भी अधिक जीतूँगा। समय आ गया है! मैं अपने कार्य को गति दूँगा, मैं मनुष्यों के बीच राजा के रूप में शासन करूँगा! मैं लौटने के बिन्दु पर हूँ! और मैं प्रस्थान करने ही वाला हूँ! यही है वह जिसकी हर कोई आशा कर रहा है, यही है वह जिसकी वे अभिलाषा करते हैं? मैं संपूर्ण मानवजाति को मेरे दिन के आगमन को देखने दूँगा और मेरे दिन के आगमन का स्वागत करने दूँगा" (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिये परमेश्वर के कथन "वचन देह में प्रकट होता है" के "सत्ताईसवाँ कथन")। जैसे—जैसे राज्य का सुसमाचार फैला, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया अधिक बड़ी होती गई, और विश्वासियों की संख्या बिना रुके बढ़ती गई। आज, यह इतना बढ़ रहा है जितना पहले कभी नहीं बढ़ा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर-अंतिम दिनों के मसीह—द्वारा व्यक्त किया गया वचन लंबे समय से हजारों परिवारों तक फैल गया है, और अधिकाधिक लोगों द्वारा स्वीकार किया जा रहा है। परमेश्वर के वचन ने अपने सर्वोच्च अधिकार और शक्ति का प्रदर्शन किया है। यह निर्विवाद तथ्य पूरी तरह से सिद्ध करता है कि "परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है!"

"आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था" (यूहन्ना 1:1)। आरम्भ में, परमेश्वर ने वचन से आकाश और पृथ्वी और उन सभी चीजों को बनाया, और इस वचन से मानवता का मार्गदर्शन किया। अंतिम दिनों में, परमेश्वर वचन के साथ हर चीज को पूरा भी करता है। परमेश्वर के चुने हुए लोगों की पूर्णता और मसीह के राज्य की प्राप्ति दोनों ही परमेश्वर के वचन द्वारा प्राप्त की जाएँगी। अपने आप में, इस बारे में कुछ भी अपवाद नहीं है कि कैसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया परमेश्वर के वचन के काम से उत्पन्न हुई, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन के मार्गदर्शन में विकसित हुई है, और, इसके अलावा, सीसीपी सरकार के निष्ठुर दमन और उत्पीड़न और धार्मिक समूहों में मसीह विरोधियों की ताकतों की उन्मत्त निंदा और विरोध के बावजूद बढ़ रही है। यह पूरी तरह से परमेश्वर के वचन के अधिकार और शक्ति को दर्शाता है। यह कहा जा सकता है कि, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की उपस्थिति और काम के बिना, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया नहीं होगी, और परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए वचनों के बिना, ऐसेही सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया भी मौजूद नहीं होगी। आजवह अपने व्यक्त किए हुए लाखों वचनों के साथ अपने चुने हुए लोगों को सिंचित कर और भोजन दे रहा है, और वे सभी लोग जिन्होंने उसके काम को स्वीकार कर लिया है, उसके वचनों के मार्गदर्शन का आनंद ले रहे हैं और मनुष्य को बचाने के उसके काम का अनुभव कर रहे हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "पूर्ण ब्रह्माण्ड में मैं अपना कार्य कर रहा हूं, और पूर्व में गर्जना करते हुए धमाके निरंतर होते हैं और सभी सम्प्रदायों और पंथों को हिला देते हैं। मेरी वाणी ने सभी लोगों को वर्तमान में लाने में अगुवाई की है। मैं अपनी वाणी से सभी लोगों को जीत लूंगा, ताकि वे इस धारा में आएं, मेरे सामने नतमस्तक हों, क्योंकि मैंने बहुत पहले अपनी महिमा सारी धरती से वापस ले ली है और इसे नए रूप में पूर्व में जारी कर दिया है। ऐसा कौन है जो मेरी महिमा नहीं देखना चाहता? कौन है जिसे उत्सुकता से मेरी वापसी की प्रतीक्षा नहीं है? कौन है जिसे मेरे पुन: प्रकटन की प्यास नहीं है? कौन है जिसे मेरी मनोरमता की अभिलाषा नहीं है? कौन है जो रोशनी में नहीं आना चाहेगा? कौन है जो कनान की समृद्धि नहीं देखना चाहेगा? कौन है जो उद्धारक के लौटने की इच्छा नहीं रखता? कौन है जो महान सर्वशक्तिमान की आराधना नहीं करता? मेरी वाणी समस्त धरती पर फैल जाएगी; मैं चाहता हूं कि मैं अपने पसंदीदा लोगों के सामने अपने अधिक वचन व्यक्त करूं। भयंकर गर्जना की तरह जो पर्वतों और नदियों को हिलाकर रख देती है, मैं अपने वचन पूर्ण ब्रह्माण्ड और मानवता के सामने बोलता हूँ। अत: मेरे मुख के वचन इंसान के लिए खज़ाना बन गए हैं, और सभी लोग मेरे वचनों को संजोकर रखते हैं। बिजली पूर्व से लेकर पश्चिम तक चमकती है। मेरे वचन ऐसे हैं कि इंसान इन्हें त्यागना नहीं चाहता और साथ ही उन्हें कल्पना से परे पाता है, लेकिन उसमें भरपूर आनंद लेता है। किसी नवजात शिशु की तरह, लोग मेरे आगमन की खुशियां और आनंद मना रहे हैं। अपनी वाणी के ज़रिए मैं सभी लोगों को अपने सामने लाऊंगा। उसके बाद, मैं औपचारिक रूप से इंसानी नस्ल में प्रवेश करूंगा ताकि वे आकर मेरी आराधना करें। उस महिमा के साथ जो मुझसे प्रसारित होती है और उन वचनों के साथ जो मेरे मुख में हैं, मैं इसे ऐसा बनाऊंगा कि सभी लोग मेरे सामने आएं और देखें कि बिजली पूर्व से चमकती है और मैं पूर्व के 'जैतून के पर्वत' पर्यंत अवतरित हो चुका हूं। वे देखेंगे कि मैं बहुत पहले से ही इस धरती पर हूं, यहूदियों का पुत्र होकर नहीं बल्कि पूर्व की बिजली होकर क्योंकि मैं बहुत पहले ही पुनर्जीवित हो चुका हूं, और लोगों के बीच से जा चुका हूं, और लोगों के बीच पुन: अपनी महिमा के साथ प्रकट हुआ हूं। मैं वो हूं जिसे अनंत युगों पहले पूजा जाता था, और मैं वो शिशु भी हूं जिसे अनंत युगों पहले इस्राएलियों द्वारा त्याग दिया गया था। इसके अलावा, मैं आज के युग का सर्व-महिमामय सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूं! सभी मेरे सिंहासन के समक्ष आओ और मेरी महिमामयी मुखाकृति का अवलोकन करो, मेरी वाणी सुनो, और मेरे कर्मों को देखो। यही मेरी इच्छा की समग्रता है; यही मेरी योजना का अंत और चरम है, तथा मेरे प्रबंधन का प्रयोजन है। सभी देश मेरी आराधना करें, सभी जिह्वा मुझे स्वीकृति दें, हर व्यक्ति मुझमें निष्ठा रखे, और प्रत्येक व्यक्ति मेरी प्रजा बने!" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "सात गर्जनाएँ—भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्माण्ड में फैल जाएंगे")। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन के कारण परमेश्वर के चुने हुए लोगों को महान उद्धार प्राप्त हुआ है। मुख्यभूमि चीन में परमेश्वर का काम अंततः महिमा में समाप्त हो गया है। अब परमेश्वर के चुने हुए लोग हर देश और जगह में उसके वचन को फैला रहे हैं और उसके कामों की गवाही दे रहे हैं। परमेश्वर का वचन पूरे विश्व में फैल जाएगा, और शीघ्र ही वह सभी राष्ट्रों और सभी लोगों के सामने सार्वजनिक रूप से प्रकट होगा। परमेश्वर की उपस्थिति की लालसा करने वाले हर देश और जगह के लोगों ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि जिस परमेश्वर के सार्वजनिक रूप से प्रकट होने की वे लालसा करते हैं वह पहले से ही गुप्त रूप से चीन में अवतरित हो गया है और उसने विजय और उद्धार के काम का एक चरण पूरा कर लिया है।

अंतिम दिनों में, जब युग लगभग समाप्त होने ही वाला है, तो परमेश्वर महान लाल अजगर के निवास स्थान, तानाशाही शासकों के विशाल जमघट: चीन, नास्तिकता के कट्टर गढ़ में देहधारण करता है और गुप्त रूप से अवतरित होता है। अपने बहुविध विवेक और शक्ति से, परमेश्वर शैतान के विरुद्ध लड़ाई करता है और अपनी प्रबंधन योजना का केंद्रीय काम करता है—शैतान की पूरी तरह पराजय और सभी मानव-जाति का उद्धार। फिर भी, सत्तासीन सीसीपी के निराधार आरोपों, निंदा, छलरचना और अपयश की वजह से, तथ्यों से अनजान कई लोग वास्तव में सीसीपी की अफवाहों पर विश्वास करते हैं। धार्मिक समूह, विशेष रूप से, आज के दिन भी परमेश्वर के आगमन की निंदा और ईशनिंदा करते रहते हैं, और वे परमेश्वर के काम का विरोध करने के लिए पूरी तरह से नास्तिक सीसीपी सरकार के पक्ष में खड़े हैं। यह कितना दुःखद है! ये लोग कभी अपेक्षा नहीं करते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर, जिसका वे विरोध करते हैं, वास्तव में वापस आए हुए प्रभु यीशु हैं। परमेश्वर के सार्वजनिक रूप से प्रकट होने पर, वे अपने दाँतों को पीसते और अपनी छाती को पीटते हुए केवल रोएँगे। यह पूरी तरह से प्रकाशितवाक्य की पुस्तक के वचनों को पूरा करता है, "देखो, वह बादलों के साथ आनेवाला है, और हर एक आँख उसे देखेगी, वरन् जिन्होंने उसे बेधा था वे भी उसे देखेंगे, और पृथ्वी के सारे कुल उसके कारण छाती पीटेंगे। हाँ। आमीन" (प्रकाशितवाक्य 1:7)। अंततः महान श्वेत सिंहासन का न्याय आरम्भ होता है! सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "राज्य में, सृष्टि की असंख्य चीज़ें पुनः जीवित होना और अपनी जीवन शक्ति फिर से प्राप्त करना आरम्भ करती हैं। पृथ्वी की अवस्था में परिवर्तनों के कारण, एक भूमि और दूसरी भूमि के बीच की सीमाएँ भी खिसकना शुरू करती हैं। पूर्व काल में, मैं भविष्यवाणी कर चुका हूँ: जब भूमि से भूमि विभाजित हो जाती है, और भूमि से भूमि संयुक्त हो जाती है, तो यही वह समय होगा जब मैं राष्ट्र को तोड़-फोड़ कर टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा। इस समय, मैं सारी सृष्टि को फिर से नया करूँगा और समस्त ब्रहमाण्ड को पुनः-विभक्त करूँगा, इस प्रकार पूरे विश्व को व्यवस्थित रूप से रखूँगा, और इसकी पुरानी अवस्था को नए में रूपान्तरित कर दूँगा। यह मेरी योजना है। ये मेरे कार्य हैं। जब संसार के सभी राष्ट्र और लोग मेरे सिंहासन के सामने लौटते हैं, तो उसके बाद मैं स्वर्ग के सारी उपहारों को लेकर उन्हें मानवीय संसार को दे दूँगा, ताकि, मेरे कारण, वह बेजोड़ उपहारों से लबालब भर जाएगा। किन्तु जब तक पुराना संसार निरन्तर बना रहता है, मैं सारे विश्व में खुले तौर पर अपनी प्रशासनिक आज्ञाओं की घोषणा करते हुए, अपने प्रचण्ड प्रकोप को इनके राष्ट्रों के ऊपर तेजी से फेंकूँगा, और जो कोई उनका उल्लंघन करता है उनको ताड़ना दूँगा:

जैसे ही मैं बोलने के लिए विश्व की तरफ अपने चेहरे को घुमाता हूँ, सारी मानवजाति मेरी आवाज़ को सुनती है, और उसके बाद उन सभी कार्यों को देखती है जिसे मैंने समूचे ब्रह्माण्ड में गढ़ा है। वे जो मेरी इच्छा के विरूद्ध जाते हैं, अर्थात्, जो मनुष्य के कार्यों से मेरा विरोध करते हैं, वे मेरी ताड़ना के अधीन नीचे गिर जाएँगे। मैं स्वर्ग के असंख्य तारों को लूँगा और उन्हें फिर से नया कर दूँगा, और मेरे कारण सूर्य और चन्द्रमा को नया बना दिया जाएगा—आकाश अब और वैसा नहीं रहेगा जैसा वह था; पृथ्वी पर बेशुमार चीज़ों को फिर से नया बना दिया जाएगा। मेरे वचनों के माध्यम से सभी पूर्ण हो जाएँगे। विश्व के भीतर अनेक राष्ट्रों को नए सिरे से विभक्त कर दिया जाएगा और मेरे राष्ट्र के द्वारा बदल दिया जाएगा, जिसकी वजह से पृथ्वी के राष्ट्र हमेशा हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएँगे और एक राष्ट्र बन जाएँगे जो मेरी आराधना करता हो; पृथ्वी के सभी राष्ट्रों को नष्ट कर दिया जाएगा, और उनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। विश्व के भीतर मनुष्यों में, वे सभी जो शैतान से संबंध रखते हैं उनका सर्वनाश कर दिया जाएगा; वे सभी जो शैतान की आराधना करते हैं उन्हें जलती हुई आग के द्वारा नीचा दिखाया जाएगा—अर्थात्, उनको छोड़कर जो अभी इस धारा के अन्तर्गत हैं, बाकियों को राख में बदल दिया जाएगा। जब मैं बहुत से लोगों को ताड़ना देता हूँ, तो वे जो, भिन्न-भिन्न अंशों में, धार्मिक संसार में हैं, मेरे कार्यों के द्वारा जीत लिए जा कर मेरे राज्य में लौट आएँगे, क्योंकि उन्होंने एक श्वेत बादल पर सवार पवित्र जन के आगमन को देख लिया होगा। समस्त मानवता अपने-अपने स्वभाव का अनुसरण करेगी, और जो कुछ उसने किया है उससे भिन्न-भिन्न ताड़नाएँ प्राप्त करेगी। वे जो मेरे विरूद्ध खड़े हुए हैं सभी नष्ट हो जाएँगे; जहाँ तक उनकी बात है जिन्होंने पृथ्वी पर अपने कार्यों में मुझे शामिल नहीं किया है, वे, क्योंकि उन्होंने जिस प्रकार अपने आपको दोषमुक्त किया है, पृथ्वी पर मेरे पुत्रों और मेरे लोगों के शासन के अधीन निरन्तर बने रहेंगे। मैं अपने महान कार्य की समाप्ति की घोषणा करने के लिए पृथ्वी पर अपनी ध्वनि आगे करते हुए अपने आपको असंख्य लोगों और असंख्य राष्ट्रों के सामने प्रकट करूँगा, ताकि समस्त मानवजाति अपनी आँखों से देखे" (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिये परमेश्वर के कथन "वचन देह में प्रकट होता है" के "छब्बीसवाँ कथन")। मानवजाति के इतिहास में, हम देखते हैं कि कैसे सभी दुष्ट ताकतें, जो खुले तौर पर परमेश्वर का विरोध और उन्मत्त रूप से परमेश्वर का प्रतिरोध करती हैं, परमेश्वर द्वारा नष्ट कर दी जाती हैं। चार हज़ार साल पहले, उनके गंभीर पापों के परिणामस्वरूप, सदोम और अमोरा के शहर आग और गंधक से झुलस गए थे जिसे परमेश्वर ने स्वर्ग से भेजा था। ऐसे ही रोमन साम्राज्य भी प्रभु यीशु के प्रति इसके प्रतिरोध एवं निंदा और ईसाईयों के उत्पीड़न की वजह से परमेश्वर से भेजी गई विपत्तियों द्वारा नष्ट कर दिया गया था। अंतिम दिनों में, परमेश्वर की निंदा और प्रतिरोध करने वाली कोई भी दुष्ट ताकत परमेश्वर द्वारा अभिशप्त हो जाएगी और निश्चित रूप से उसके द्वारा नष्ट कर दी जाएगी। यह वास्तव में परमेश्वर का धर्मी स्वभाव है!

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "परमेश्वर का राज्य मानवता के मध्य विस्तार पा रहा है, यह मानवता के मध्य बन रहा है, यह मानवता के मध्य खड़ा हो रहा है; ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है जो मेरे राज्य को नष्ट कर सके। ...तुम लोग निश्चय ही, मेरी रोशनी के नेतृत्व में, अंधकार की शक्तियों के गढ़ को तोड़ोगे। तुम अंधकार के मध्य निश्चय ही मार्गदर्शन करने वाली ज्योति से वंचित नहीं रहोगे। तुम सब निश्चय ही सम्पूर्ण सृष्टि पर स्वामी होगे। तुम लोग शैतान पर निश्चय ही विजयी बनोगे। तुम सब निश्चय ही महान लाल ड्रैगन के राज्य के पतन को देखोगे और मेरी विजय की गवाही के लिए असंख्य लोगों की भीड़ में खड़े होगे। तुम लोग निश्चय ही पाप के देश में दृढ़ और अटूट खड़े रहोगे। तुम सब जो कष्ट सह रहे हो, उनके मध्य तुम मेरे द्वारा आने वाली आशीषों को प्राप्त करोगे और मेरी महिमा के भीतर के ब्रह्माण्ड में निश्चय ही जगमगाओगे" (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिये परमेश्वर के कथन "वचन देह में प्रकट होता है" के "उन्नीसवाँ कथन")। "जब कार्य के तीन चरण समाप्ति पर पहुँचेंगे, तो ऐसे लोगों का समूह बनेगा जो परमेश्वर के प्रति गवाही देते हैं, ऐसे लोगों का एक समूह जो परमेश्वर को जानते हैं। ये सभी लोग परमेश्वर को जानेंगे और सत्य को व्यवहार में लाने में समर्थ होंगे। वे मानवता और समझ को धारण करेंगे और परमेश्वर के उद्धार के कार्य के तीनों चरणों को जानेंगे। यही कार्य अंत में निष्पादित होगा, और यही लोग 6000 साल के प्रबंधन के कार्य का सघन रूप हैं, और शैतान की अंतिम पराजय की सबसे शक्तिशाली गवाही हैं। जो परमेश्वर की गवाही दे सकते है वे ही परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं और आशीषों को प्राप्त करने में समर्थ होंगे, और ऐसा समूह होंगे जो बिल्कुल अंत तक बना रहेगा, जो परमेश्वर के अधिकार को धारण करेंगे और परमेश्वर की गवाही देंगे। शायद तुम लोगों में से वे सभी, या शायद केवल आधे या केवल थोड़े से ही इस समूह के एक सदस्य बन सकते हैं—यह तुम लोगों की इच्छा और तलाश पर निर्भर करता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है")। परमेश्वर का वचन पूरा हो जाएगा, और जो पूरा हो जाएगा वह हमेशा के लिए रहेगा। साम्राज्य का भविष्य उज्ज्वल और वैभवशाली है! सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने मुख्यभूमि चीन में पराजित करने वालों का एक समूह पहले से ही बना लिया है। परमेश्वर का अंतिम दिनों का काम पहले ही पूरा हो चुका है! अब, चीन में उसके गुप्त, आगमन के दौरान परमेश्वर द्वारा किया गया प्रायोगिक काम महिमा में समाप्त हो गया है, और शीघ्र ही वह सभी राष्ट्रों और स्थानों पर सार्वजनिक रूप से दिखाई देगा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के चुने हुए लोग पराजित करने वालों का एक समूह हैं जिसे परमेश्वर ने चीन में बनाया है। पवित्र मिशन का दायित्व ले कर, वे परमेश्वर के काम की गवाही दे रहे हैं और सभी देशों और स्थानों पर परमेश्वर का पवित्र नाम घोषित कर रहे हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार तेजी से दुनिया भर में फैल रहा है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया पाने और खोजने के लिए सभी राष्ट्रों और स्थानों के लिए 'वचन देह में प्रकट होता है' इंटरनेट पर निःशुल्क उपलब्ध है। कोई भी इनकार करने की हिम्मत नहीं करता है कि वे परमेश्वर के वचन हैं, और कोई भी इनकार करने की हिम्मत नहीं करता है कि वे सत्य हैं। सत्य के लिए प्यासे और प्रकाश के लिए लालायित अधिकाधिक लोग अंतिम दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर के काम को तलाश रहे हैं और उसकी जाँच-पड़ताल कर रहे हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की शाखाएँ दुनिया भर के दर्जनों प्रमुख देशों और क्षेत्रों में स्थापित की गई हैं क्योंकि अधिकाधिक लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर की ओर लौटते हैं। मानव-जाति परमेश्वर के वचन के बीच धीरे-धीरे जाग रही है, और उसने सत्य को स्वीकार करना और जानना शुरू कर दिया है। परमेश्वर का वचन समस्त मानव-जाति का मार्गदर्शन करेगा और हर चीज को पूरा करेगा। सभी लोग जो वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करते हैं और सही मार्ग की खोज करते हैं, निश्चित रूप से परमेश्वर की ओर लौट आएँगे और उसके सिंहासन के सामने आज्ञाकारी बनेंगे, और समस्त मानव-जाति जान जाएगी कि परमेश्वर आ गया है, और प्रकट हुआ है, और यह कि उसका नाम समस्त मानव-जाति के बीच निश्चित रूप से महान होगा।

New Hindi Christian Song 2019 | "कैसे ढूंढें परमेश्वर के नक़्शे-कदम" (Lyrics)

New Hindi Christian Song 2019 | "कैसे ढूंढें परमेश्वर के नक़्शे-कदम" (Lyrics)

ढूंढ रहे हैं चूंकि हम, परमेश्वर के नक़्शे-कदम,
परमेश्वर की क्या इच्छा है, ढूंढ कर ही रहेंगे हम,
ढूंढ कर रहेंगे हम उसके वचन और कथन।

क्योंकि जहां प्रभु के नये वचन हैं,
वहां प्रभु की वाणी है,
जहां प्रभु के नक़्शे-कदम हैं,
वहां प्रभु के काम हैं।
जहां प्रभु की अभिव्यक्ति है,
वहां प्रभु का अवतरण है,
और जहां प्रभु का अवतरण है,
वहां सत्य, मार्ग और जीवन है।

परमेश्वर के नक़्शे-कदम जब ढूंढ रहे थे,
"तुमने इन वचनों को नज़रंदाज़ किया:
“प्रभु सत्य है, प्रभु मार्ग है, और प्रभु ही जीवन है।” "
लोगों को जब सत्य कभी मिल जाता है,
"नक़्शे-कदम पा लिये प्रभु के, यकीं नहीं हो पाता है।
नक़्शे-कदम पा लिये प्रभु के, "
प्रभु अवतरण तो बिल्कुल, स्वीकार नहीं हो पाता है।
भूल बड़ी गम्भीर है! भूल बड़ी गम्भीर है!
प्रभु अवतरण लोगों के मत के, अनुकूल नहीं हो सकता है,
प्रभु अवतरण लोगों की फ़रियाद पर, कभी नहीं हो सकता है।
काम प्रभु जब करता है,
तो चयन स्वयं ही करता है, और अपनी ही योजना पर चलता है।
अपना ही मकसद है उसका, अपना ही तरीका होता है।

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**Hindi Christian Movie | धन्‍य हैं वे, जो मन के दीन हैं | Have You Welcomed the Return of Lord Jesus?

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शो योंघान दक्षिण कोरिया में एक कलीसिया के पादरी हैं। उन्होंने दशकों तक उत्साहपूर्वक परमेश्वर की सेवा की और अपने साथी विश्वासियों का गहरा सम्मान अर्जित किया। हाल के वर्षों से, उनकी कलीसिया दिन-प्रतिदिन ज्‍़यादा-से-ज्‍यादा उजाड़ होती जा रही है। बुरे कर्म अधिक-से-अधिक सामान्‍य हो रहे थे, और वे खुद भी अपने आप को इन पापों में फंसा पाते थे। परिणामस्वरूप, वे बेहद दुखी भ्रमित महसूस करते थे। ... बहुत विचार करने के बाद, उन्होंने संकल्‍पपूर्वक कलीसिया का अपना पद और अपना संप्रदाय छोड़ दिया और इस उम्‍मीद में ऐसी कलीसिया की खोज की जहां पवित्र आत्मा का कार्य हो, ताकि वे अपने पापों से मुक्‍त होने का अपना मार्ग प्राप्त कर सकें। उन्होंने कई पंथों का दौरा किया, लेकिन उनके उजाड़पन, भ्रष्टता ने उन्हें और अधिक हारा हुआ, भ्रमित, और असहाय बना दिया। उन्‍होंने प्रभु से गिड़गिड़ा कर याचना करी "प्रभु आप कहां हैं"। जब शो योंघान ने अंत के दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य्र को देखना शुरू किया, तो वह यह जानकर उन्‍हें सुखद आश्चर्य हुआ कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन अधिकार, शक्ति और सत्य से भरे हुए हुए हैं! कलीसिया के गवाहों की संगति और गवाही सुनने के बाद, शो योंघान को सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों से समझ में आया कि क्योंकि वे प्रभु यीशु के एक विश्वासी है, इस लिए उनके पापों को क्षमा कर दिया गया है और परमेश्वर के अनुग्रह से उन्हें बचा लिया गया है, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर दोबारा कभी भी उन्हें एक पापी के रूप में कलंकित नहीं करेंगे, और वे परमेश्वर के सामने आने उनकी आराधना करने और परमेश्वर के अनुग्रह और आशीर्वाद का आनंद लेने के हकदार हैं। हालांकि, उनकी गहरी अंतर्निहित पापी प्रकृति के कारण, वे अभी भी पाप से बंधे और नियंत्रित है, और पवित्र नहीं बन सकते हैं। केवल अंत के दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को स्‍वीकार करके ही वे धीरी-धीरे पाप से मुक्‍त होकर, वास्‍तव में शुद्धिकरण और उद्धार पा सकेंगे, और परमेश्वर द्वारा उनके राज्य में ले जाए जा सकते हैं। इस समय, शो योंघान उत्साह से भर गए और उन्होंने खुशी-खुशी अंत के दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्यों को स्वीकार कर लिया और परमेश्वर के सिंहासन के सामने खड़े होने के लिए वापस लौट गए।

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Hindi Christian Movie | परमेश्वर का नाम बदल गया है?! | The Savior Lord Jesus Has Come Back

**Hindi Christian Movie | परमेश्वर का नाम बदल गया है?! | The Savior Lord Jesus Has Come Back

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ग ह्वा नामक महिला दक्षिणी चीन की एक गृह कलीसिया की प्रचारिका हैं। प्रभु में विश्वास करना शुरू करने के बाद, उन्‍होंने बाइबल में पाया कि पुराने नियम में परमेश्वर को यहोवा कहा जाता था, और नये नियम में यीशु। परमेश्वर के अलग-अलग नाम क्यों हैं? इस सवाल ने वांग ह्वा को बड़े असमंजस में डाल दिया। उन्होंने बाइबल में इसका जवाब ढूँढ़ने की कोशिश की, लेकिन इसका रहस्य उन्हें समझ नहीं आया .... लेकिन वे दृढ़ता से विश्वास करती थीं कि स्वर्ग के अंतर्गत मनुष्यों के लिए दूसरा कोई नाम नहीं दिया गया है, इसलिए अकेले यीशु ही उद्धारक हैं, और जब तक हम यीशु के नाम पर कायम रहेंगे, हमें स्वर्ग के राज्य में अवश्य आरोहित कर दिया जाएगा। फिर भी एक दिन, वांग ह्वा ने एक चौंका देनेवाली खबर सुनी: परमेश्वर का नाम बदल गया है! उसके बाद उनके दिल में जिज्ञासा जाग गई और वे शांत नहीं रह पायीं...

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Hindi Gospel Movie | बाइबल के बारे में रहस्य का खुलासा | Do You Know the Inside Story of the Bible?

**Hindi Gospel Movie | बाइबल के बारे में रहस्य का खुलासा | Do You Know the Inside Story of the Bible?

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फेंग ज्याह्वई, चीन की एक गृह कलीसिया की प्रचारक हैं। उन्‍होंने कई सालों से प्रभु में विश्‍वास किया है और सदा यह सोचा कि बाइबल परमेश्‍वर से प्रेरित है, कि अपनी आस्‍था में इसका अनुसरण करना आवश्‍यक है, परमेश्‍वर के वचन बाइबल के बाहर नहीं प्रकट होते, और बाइबल से भटकना विधर्म है। परंतु हाल के वर्षों में कलीसिया के उजाड़ हो जाने और विश्‍वासियों के अपनी आस्‍था के प्रति उदासीन हो जाने से, उनमें गहन संशय पैदा हुआ। वे बाइबल के बारे में चाहे जैसे भी बातें करतीं, तो भी वे अपनी कलीसिया को पुनर्जिवित करने में असफल रहीं .. जब तक कि एक सहकर्मी, भाई युआन ने, सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर की कलीसिया के गवाहों को आमंत्रित नहीं किया। गहन चर्चाओं के कई दौरों के पश्‍चात् फेंग ज्याह्वई अंतत: बाइबल की अंदरूनी कहानी और उसका सार समझ जाती हैं। वे उसके बाहर कदम रखती हैं, मेम्‍ने के पदचिन्‍हों पर चलती हैं, और अन्‍य विश्‍वासियों को सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर की ओर मुड़ने में उनकी रहनुमाई करती हैं।

चमकती पूर्वी बिजली, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया का सृजन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के प्रकट होने और उनका काम, परमेश्वर यीशु के दूसरे आगमन, अंतिम दिनों के मसीह की वजह से किया गया था। यह उन सभी लोगों से बना है जो अंतिम दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करते हैं और उसके वचनों के द्वारा जीते और बचाए जाते हैं। यह पूरी तरह से सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से स्थापित किया गया था और चरवाहे के रूप में उन्हीं के द्वारा नेतृत्व किया जाता है। इसे निश्चित रूप से किसी मानव द्वारा नहीं बनाया गया था। मसीह ही सत्य, मार्ग और जीवन है। परमेश्वर की भेड़ परमेश्वर की आवाज़ सुनती है। जब तक आप सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, आप देखेंगे कि परमेश्वर प्रकट हो गए हैं।

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तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे, ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा

तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे, ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा

**तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे, ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा

**क्या तुम यीशु को देखना चाहते हो? क्या तुम यीशु के साथ रहना चाहते हो? क्या तुम यीशु के द्धारा कहे गए वचनों को सुनना चाहते हो? यदि ऐसा है, तो तुम यीशु के लौटने का कैसे स्वागत करेंगे? क्या तुम पूरी तरह से तैयार हो? किस ढंग से तुम यीशु के लौटने का स्वागत करेंगे? मुझे लगता है कि प्रत्येक भाई और बहन जो यीशु का अनुसरण करतें हो यीशु का अच्छी तरह से स्वागत करना चाहेंगे। परन्तु क्या तुम लोगों ने इस पर विचार किया है: जब यीशु वापस आएगा तो क्या तुम सचमुच में उसे पहचान लोगे? क्या तुम लोग सचमुच में वह सब कुछ समझ जाएँगे जो वह कहेगा? क्या तुम लोग वे सब कार्य जो यीशु करेगा, उन्हें, बिना किसी शर्त के, सचमुच में स्वीकार कर लेंगे? वे सब जिन्होंने बाइबल पढ़ी है, यीशु के लौटने के बारे में जानते हो, और वे सब जिन्होंने बाइबल को अभिप्राय से पढ़ी है, उसके आगमन की प्रतीक्षा करते हो। तुम सब लोग उस क्षण के आने के ऊपर ग्रस्त हो गए हो, और तुम लोगों की ईमानदारी प्रशंसनीय है, तुम लोगों का विश्वास वास्तव में स्पृहणीय है, परन्तु क्या तुम लोग यह एहसास करते हो कि तुम लोगों ने एक गंभीर त्रुटी की है? यीशु किस ढंग से वापस आएगा? तुम लोग विश्वास करते हो कि यीशु श्वेत बादल पर वापस आएगा, परन्तु मैं तुम लोगों से पूछता हूँ: यह श्वेत बादल किस चीज का संकेत करता है? यीशु के कई अनुयायी उसके आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं, उनमें से किन लोगों के बीच वह उतरेगा? यदि तुम लोग उन प्रथम में से हो जिनके मध्य में यीशु उतरेगा, तो क्या अन्य लोग इसे बुरी तरह से अनुचित नहीं समझेंगे? मैं जानता हूँ कि तुम लोगों की यीशु के प्रति बड़ी ईमानदारी और सत्यनिष्ठा है, परन्तु क्या तुम लोग कभी यीशु से मिले हो? क्या तुम लोग उसके स्वभाव को जानते हो? क्या तुम लोग कभी उसके साथ रहे हो? तुम लोग उसके बारे में वास्तव में कितना समझते हो? कुछ कहेंगे कि ये वचन उन्हें एक फूहड़ अवस्था में डाल देते हैं। वे कहेंगे, "मैंने बाइबल को शुरू से लेकर अंत तक बहुत बार पढ़ा है। मैं यीशु को कैसे समझ नहीं सकता हूँ? यीशु के स्वभाव की तो बात ही छोड़ो–मैं तो उसके कपड़ों का रंग भी जानता हूँ जिन्हें वह पहनना पसंद करता है। जब तुम यह कहते हो कि मैं उसे नहीं समझता हूँ तो क्या तुम मेरा अपमान नहीं कर रहे हो?" मैं सुझाव देता हूँ कि तुम इन मुददों पर विवाद न करो; और यह बेहतर रहेगा कि शांत हो जाओ और निम्नलिखित प्रश्नों के बारे में संगति करो: सबसे पहले, क्या तुम जानते हो कि वास्तविकता क्या है और सिद्धांत क्या है? दूसरा, क्या तुम जानते हो कि अवधारणा क्या है, और सत्य क्या है? तीसरा, क्या तुम जानते हो कि कल्पित क्या है और वास्तविक क्या है?

कुछ लोग इस तथ्य से इनकार करते हो कि वे यीशु को नहीं समझते हैं। और फिर भी मैं कहता हूँ कि तुम लोग यीशु के बारे में थोड़ा भी नहीं जानते हो, और यीशु के एक भी वचन को नहीं समझते हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम लोगों में से हर एक बाइबल के विवरणों के कारण, दूसरों के द्धारा जो कहा गया है उसकी वजह से, उसका अनुसरण करता है। उसके साथ रहना तो दूर, तुम लोगों ने यीशु को कभी देखा भी नहीं है, और यहाँ तक कि थोड़े से समय के लिए भी उसके साथ नहीं रहे हो। वैसे तो, क्या यीशु के बारे में तुम लोगों की समझ सिद्धान्त के अलावा और कुछ नहीं है? क्या यह वास्तविकता से विहीन नहीं है? शायद कुछ लोगों ने यीशु का चित्र देखा होगा, या कुछ ने व्यक्तिगत रूप से यीशु के घर को देखा होगा। हो सकता है कि कुछ ने यीशु के कपड़ों को छुआ होगा। फिर भी उसके बारे में तुम्हारी समझ सैद्धांतिक है और व्यवहारिक नहीं है, भले ही तुमने यीशु द्वारा खाए गए भोजन को व्यक्तिगत रूप से चखा हो। चाहे जो भी मामला हो, तुमने यीशु को कभी भी नहीं देखा है, और दैहिक रूप में कभी भी उसके साथी नहीं रहे हो, इसलिए यीशु के बारे में तुम्हारी समझ हमेशा खोखला सिद्धांत ही होगी जो सच्चाई से विहीन है। शायद मेरे वचन तुम्हारे लिए थोड़ी रूचि के हों, परन्तु मैं तुमसे यह पूछता हूँ: यद्यपि तुमने अपने पसंदीदा लेखक की कई पुस्तकों को पढ़ा होगा, फिर भी क्या तुम कभी उसके साथ समय बिताये बिना उसे पूरी तरह समझ सकते हो? क्या तुम जानते हो कि उसका व्यक्तित्व कैसा है? क्या तुम जानते हो कि वह किस प्रकार का जीवन जीता है? क्या तुम उसकी भावनात्मक स्थिति के बारे में कुछ भी जानते हो? तुम तो उस व्यक्ति को भी पूरी तरह से नहीं समझ सकते हो जिसका तुम आदर करते हो, तो तुम यीशु मसीह को संभवतः कैसे समझ सकते हो? प्रत्येक चीज जो तुम यीशु के बारे में समझते हो कल्पना और अवधारणा से भरपूर होती है, और इसमें सत्य या वास्तविकता नहीं होती है। इससे दुर्गंध आती है, यह मांस से भरा हुआ है। कैसे इस तरह की कोई समझ तुम्हें यीशु के लौटने का स्वागत करने के योग्य बनाती है? यीशु उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे जो देह की कल्पनाओं और अवधारणाओं से भरे हुए हैं। वे जो यीशु को नहीं समझ पाते हैं कैसे उसका विश्वासी होने के योग्य हैं?

फरीसियों ने यीशु का विरोध क्यों किया, क्या तुम लोग उसका कारण जानना चाहते हो? क्या तुम फरीसियों के सार को जानना चाहते हो? वे मसीहा के बारे में कल्पनाओं से भरे हुए थे। इससे ज्यादा और क्या, उन्होंने केवल इस बात पर विश्वास किया कि मसीहा आएगा, मगर जीवन के इस सत्य की खोज नहीं की। और इसलिए, वे आज भी मसीहा की प्रतीक्षा करते हैं, क्यों उन्हें जीवन के मार्ग के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं है, और नहीं जानते कि सत्य का मार्ग क्या है? तुम लोग कैसे कहते हो कि ऐसे मूर्ख, हठधर्मी और अज्ञानी लोग परमेश्वर के आशीष प्राप्त करेंगे? वे मसीहा को कैसे देख सकते हैं? वे यीशु का विरोध करते थे क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा को नहीं जानते थे, क्योंकि वे यीशु के द्धारा कहे गए सत्य के मार्ग को नहीं जानते थे, और, ऊपर से, क्योंकि उन्होंने मसीहा को नहीं समझा था। और क्योंकि उन्होंने मसीहा को कभी नहीं देखा था, और कभी भी मसीहा के साथ नहीं रहे थे, उन्होंने सिर्फ़ मसीहा के नाम को खोखली श्रद्धांजलि देने की गलती की जबकि किसी न किसी ढंग से मसीहा के सार का विरोध करते रहे। ये फरीसी सार रूप से हठधर्मी एवं अभिमानी थे और सत्य का पालन नहीं करते थे। परमेश्वर में उनके विश्वास का सिद्धांत है: इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा उपदेश कितना गहरा है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा अधिकार कितना ऊँचा है, तुम मसीह नहीं हो जब तक तुम्हें मसीहा नहीं कहा जाता। क्या ये दृष्टिकोण हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण नहीं हैं? मैं तुम लोगों से पुनः पूछता हूँ: मान लीजिए कि तुम लोगों में यीशु के बारे में थोड़ी सी भी समझ नहीं है, तो क्या तुम लोगों के लिए उन गलतियों को करना अत्यंत आसान नहीं है जो बिल्कुल आरंभ के फरीसियों ने की थी? क्या तुम सत्य के मार्ग को जानने के योग्य हो? क्या तुम सचमुच में यह विश्वास दिला सकते हो कि तुम मसीह का विरोध नहीं करोगे? क्या तुम पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करने के योग्य हो? यदि तुम नहीं जानते हो कि क्या तुम ईसा का विरोध करोगे, तो मेरा कहना है कि तुम पहले से ही मौत के कगार पर जी रहे हो। जो लोग मसीहा को नहीं जानते थे वे सभी यीशु का विरोध करने में, यीशु को अस्वीकार करने में, उन्हें बदनाम करने में सक्षम थे। जो लोग यीशु को नहीं समझते हैं वे सब उसे अस्वीकार करने एवं उन्हें बुरा भला कहने में सक्षम हैं। इसके अलावा, वे यीशु के लौटने को शैतान के द्वारा दिए जाने वाले धोखे के समान देखने में सक्षम हैं और अधिकांश लोग देह में लौटे यीशु की निंदा करेंगे। क्या इस सबसे तुम लोगों को डर नहीं लगता है? जिसका तुम लोग सामना करते हो वह पवित्र आत्मा के विरोध में ईशनिंदा होगी, कलीसियाओं के लिए पवित्र आत्मा के वचनों का विनाश होगा और यीशु के द्वारा व्यक्त किए गए समस्त को ठुकराना होगा। यदि तुम लोग इतने संभ्रमित हो तो यीशु से क्या प्राप्त कर सकते हो? यदि तुम लोग हठधर्मिता से अपनी गलतियों को मानने से इनकार करते हो, तो श्वेत बादल पर यीशु के देह में लौटने पर तुम लोग यीशु के कार्य को कैसे समझ सकते हो? यह मैं तुम लोगों को बताता हूँ: जो लोग सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं, मगर अंधों की तरह यीशु के श्वेत बादलों पर आगमन का इंतज़ार करते हैं, निश्चित रूप से पवित्र आत्मा के विरोध में ईशनिंदा करेंगे, और ये वे वर्ग हैं जो नष्ट कर दिए जायेंगे। तुम लोग सिर्फ़ यीशु के अनुग्रह की कामना करते हो, और सिर्फ़ स्वर्ग के सुखद राज्य का आनंद लेना चाहता हो, मगर जब यीशु देह में लौटा, तो तुमने यीशु के द्वारा कहे गए वचनों का कभी भी पालन नहीं किया, और यीशु के द्वारा व्यक्त किये गए सत्य को कभी भी ग्रहण नहीं किया है। यीशु के एक श्वेत बादल पर वापस आने के तथ्य के बदले में तुम लोग क्या थामें रखना चाहोगे? क्या वही ईमानदारी जिसमें तुम लोग बार-बार पाप करते रहते हो, और फिर बार-बार उनकी स्वीकारोक्ति करते हो? एक श्वेत बादल पर वापस आने वाले यीशु के लिए तुम बलिदान में क्या अर्पण करोगे? क्या कार्य के वे वर्ष जिनकी तुम लोग स्वयं सराहना करते हो? लौट कर आये यीशु को तुम लोगों पर विश्वास कराने के लिए तुम लोग किस चीज को थाम कर रखोगे? क्या वह आपका अभिमानी स्वभाव है, जो किसी भी सत्य का पालन नहीं करता है?

तुम लोगों की सत्यनिष्ठा सिर्फ़ वचनों में है, तुम लोगों का ज्ञान सिर्फ़ बौद्धिक और वैचारिक है, तुम लोगों की मेहनत सिर्फ स्वर्ग की आशीषें पाने के लिए है, और इसलिए तुम लोगों का विश्वास अवश्य ही किस प्रकार का हो सकता है? आज भी, तुम लोग सत्य के प्रत्येक वचन को एक बहरे कान से ही सुनते हो। तुम लोग नहीं जानते हो कि परमेश्वर क्या है, तुम लोग नहीं जानते हो कि ईसा क्या है, तुम लोग नहीं जानते हो कि यहोवा का आदर कैसे करें, तुम लोग नहीं जानते हो कि कैसे पवित्र आत्मा के कार्य में प्रवेश किया जाए, और तुम लोग नहीं जानते हो कि परमेश्वर के स्वंय के कार्य और मनुष्य के धोखे के बीच कैसे भेद करें। तुम परमेश्वर के द्वारा व्यक्त किये गए किसी सत्य के वचन की केवल निंदा करना ही जानते हो जो तुम्हारे विचार के अनुरूप नहीं होता है। तुम्हारी विनम्रता कहाँ है? तुम्हारी आज्ञाकारिता कहाँ है? तुम्हारी सत्यनिष्ठा कहाँ है? सत्य को खोजने की तुम्हारी इच्छा कहाँ है? परमेश्वर के बारे में तुम्हारा आदर कहाँ है? मैं तुम लोगों बता दूँ, कि जो परमेश्वर में संकेतों की वजह से विश्वास करते हैं वे निश्चित रूप से उस श्रेणी के होंगे जो विनाश को झेलेगी। वे जो देह में लौटे यीशु के वचनों को स्वीकार करने में अक्षम हैं वे निश्चित रूप से नरक के वंशज, महान फ़रिश्ते के वंशज हैं, उस श्रेणी के हैं जो अनंत विनाश के अधीन की जाएगी। कई लोग मैं क्या कहता हूँ इसकी परवाह नहीं करते हैं, किंतु मैं ऐसे हर तथाकथित संत को बताना चाहता हूँ जो यीशु का अनुसरण करते हैं, कि जब तुम लोग यीशु को एक श्वेत बादल पर स्वर्ग से उतरते हुए अपनी आँखों से देखो, तो यह धार्मिकता के सूर्य का सार्वजनिक प्रकटन होगा। शायद वह तुम्हारे लिए एक बड़ी उत्तेजना का समय होगा, मगर तुम्हें पता होना चाहिए कि जिस समय तुम यीशु को स्वर्ग से उतरते हुए देखोगे तो यही वह समय भी होगा जब तुम दण्ड दिए जाने के लिए नीचे नरक चले जाओगे। यह परमेश्वर की प्रबंधन योजना की समाप्ति की घोषणा होगी, और यह तब होगा जब परमेश्वर सज्जन को पुरस्कार और दुष्ट को दण्ड देगा। क्योंकि परमेश्वर का न्याय मनुष्य के संकेतों को देखने से पहले ही समाप्त हो चुका होगा, जब वहाँ सिर्फ़ सत्य की अभिव्यक्ति ही होगी। वे जो सत्य को स्वीकार करते हैं तथा संकेतों की खोज नहीं करते हैं और इस प्रकार शुद्ध कर दिए जाते हैं, वे परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौट चुके होंगे और सृष्टिकर्ता के आलिंगन में प्रवेश कर चुके होंगे। सिर्फ़ वे ही जो इस विश्वास में बने रहते हैं कि "यीशु जो श्वेत बादल पर सवारी नहीं करता है एक झूठा मसीह है" अनंत दण्ड के अधीन कर दिए जाएँगे, क्योंकि वे सिर्फ़ उस यीशु में विश्वास करते हैं जो संकेतों को प्रदर्शित करता है, परन्तु उस यीशु को स्वीकार नहीं करते हैं जो गंभीर न्याय की घोषणा करता है और जीवन में सच्चे मार्ग को बताता है। और इसलिए केवल यही हो सकता है कि जब यीशु खुलेआम श्वेत बादल पर वापस लौटें तो वह उसके साथ व्यवहार करें। वे बहुत हठधर्मी, अपने आप में बहुत आश्वस्त, बहुत अभिमानी हैं। ऐसे अधम लोग यीशु द्वारा कैसे पुरस्कृत किए जा सकते हैं? यीशु का लौटना उन लोगों के लिए एक महान उद्धार है जो सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं, परन्तु उनके लिए जो सत्य को स्वीकार करने में असमर्थ हैं यह निंदा का एक संकेत है। तुम लोगों को अपना स्वयं का रास्ता चुनना चाहिए, और पवित्र आत्मा के विरोध में ईशनिंदा नहीं करनी चाहिए और सत्य को अस्वीकार नहीं करना चाहिए। तुम लोगों को अज्ञानी और अभिमानी व्यक्ति नहीं बनना चाहिए, बल्कि ऐसा बनना चाहिए जो पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का पालन करता हो और सत्य की खोज करने के लिए लालायित हो; सिर्फ़ इसी तरीके से तुम लोग लाभान्वित होगे। मैं तुम लोगों को परमेश्वर में विश्वास के रास्ते पर सावधानी से चलने की सलाह देता हूँ। निष्कर्ष तक न पहुँचें; इससे ज्यादा और क्या, परमेश्वर में अपने विश्वास में लापरवाह और निश्चिन्त न बनें। तुम लोगों को जानना चाहिए, कि कम से कम, जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं उन्हें विनम्र और श्रद्धावान होना चाहिए। जिन्होंने सत्य को सुन लिया है और फिर भी इस पर अपनी नाक भौं सिकोड़ते हैं वे मूर्ख और अज्ञानी हैं। जिन्होंने सत्य को सुन लिया है और फिर भी लापरवाही के साथ निष्कर्षों तक पहुँचते हैं या सकी निंदा करते हैं ऐसे लोग अभिमान से घिरे हुए हैं। जो कोई भी यीशु पर विश्वास करता है वह दूसरों को श्राप देने या दूसरों की निंदा करने के योग्य नहीं है। तुम सब लोगों को एक ऐसा होना चाहिए जो तर्कसंगत हो और सत्य को स्वीकार करता हो। शायद, सत्य के मार्ग को सुन कर और जीवन के वचन को पढ़ कर, तुम विश्वास करते हो कि इन 10,000 वचनों में से सिर्फ़ एक ही वचन है जो तुम्हारे दृढ़ विश्वास के अनुसार और बाइबल के समान है, और फिर तुम्हें उसमें इन वचनों में से 10,000वें वचन की खोज करते रहना चाहिए। मैं अब भी तुम्हें सुझाव देता हूँ कि विनम्र बनो, अति-आत्मविश्वासी न बनो, और अपने आप को बहुत ऊँचा न उठाओ। परमेश्वर के लिए अपने हृदय में इतना थोड़ा सा आदर रखकर, तुम बड़े प्रकाश को प्राप्त करोगे। यदि तुम इन वचनों की सावधानी से जाँच करो और इन पर बार-बार मनन करो, तब तुम समझोगे कि वे सत्य हैं या नहीं, वे जीवन हैं या नहीं। शायद, केवल कुछ वाक्यों को पढ़ कर, कुछ लोग इन वचनों की बिना देखे ही यह कहते हुए निंदा करेंगे, "यह पवित्र आत्मा की कुछ प्रबुद्धता से अधिक कुछ नहीं है," अथवा "यह एक झूठा मसीह है जो लोगों को धोखा देने के लिए आया है।" जो लोग ऐसी बातें कहते हैं वे अज्ञानता से अंधे हो गए हैं! तुम परमेश्वर के कार्य और बुद्धि को बहुत कम समझते हो और मैं तुम्हें पुनः आरंभ से शुरू करने की सलाह देता हूँ! अंत के दिनों में झूठे मसीहों के प्रकट होने की वजह से परमेश्वर द्वारा व्यक्त किये गए वचनों की तुम लोगों को निंदा अवश्य नहीं करनी चाहिए, और क्योंकि तुम लोग धोखे से डरते हो इसलिए तुम लोगों को ऐसा अवश्य नहीं बनना चाहिए जो पवित्र आत्मा के विरोध में ईशनिंदा करे। क्या यह एक बड़ी दया नहीं होगी? यदि, बहुत जाँच के बाद, अब भी तुम्हें लगता है कि ये वचन सत्य नहीं हैं, मार्ग नहीं हैं, और परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं हैं, तो फिर अंततः तुम दण्डित किए जाओगे, और आशीषों के बिना होगे। यदि तुम ऐसे सत्य को जो साफ़-साफ़ और स्पष्ट रूप से कहा गया है स्वीकार नहीं कर सकते हो, तो क्या तुम परमेश्वर के उद्धार के अयोग्य नहीं हो? क्या तुम कोई ऐसे नहीं हो जो परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौटने के लिए पर्याप्त सौभाग्यशाली नहीं है? इस बारे में विचार करें! उतावले और अविवेकी न बनें, और परमेश्वर में विश्वास को एक खेल की तरह न समझें। अपनी मंजिल के लिए, अपनी संभावनाओं के लिए, अपने जीवन के लिए विचार करें, और अपने स्वंय के साथ ऊपरी तौर से दिलचस्पी न लें। क्या तुम इन वचनों को स्वीकार कर सकते हो?

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तुम्हें अपने मार्ग के अंतिम चरण में इस प्रकार चलना चाहिए

तुम्हें अपने मार्ग के अंतिम चरण में इस प्रकार चलना चाहिए

**तुम्हें अपने मार्ग के अंतिम चरण में इस प्रकार चलना चाहिए

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तुम सब अब अपने मार्ग के अंतिम चरण में हो, और यह इसका एक महत्वपूर्ण भाग है। शायद तुमने काफी दुःख सहा है, बहुत कार्य किया है, बहुत से मार्गों पर यात्रा की है, और बहुत उपदेशों को सुना है, और यहाँ तक पहुँचना सरल नहीं रहा है। यदि तुम उस दुःख को सह नहीं सकते जो तुम्हारे सामने है और यदि तुम वही करते रहते हो जो तुमने अतीत में किया था तो तुम सिद्ध नहीं किए जा सकते। यह तुम्हें डराने के लिए नहीं है — यह एक सच्चाई है। पतरस जब परमेश्वर के कार्य में से काफी हद तक होकर गया, तो उसने कुछ अंतर्दृष्टि और बातों को पहचानने की योग्यता प्राप्त की। उसने सेवा के सिद्धांत को भी काफी हद तक समझ लिया, बाद में वह उस कार्य के प्रति पूरी तरह से समर्पित होने में समर्थ हो गया जो यीशु ने उसे सौंपा था। वह महान शोधन जो उसने प्राप्त किया अधिकांशतः इसलिए था कि जो कार्य उसने किए, उनमें उसने अनुभव किया कि वह परमेश्वर के प्रति बहुत अधिक ऋणी है और वह कभी उस तक पहुँच नहीं पाएगा, और उसने पहचाना कि मनुष्यजाति बहुत अधिक भ्रष्ट है, इसलिए उसमें आत्म—ग्लानि की भावना थी। यीशु ने उससे बहुत सी बातें कहीं थीं और उस समय उसके पास थोड़ी सी समझ थी। कई बार उसने फिर भी विरोध और विद्रोह किया। यीशु के क्रूस पर चढ़ा दिए जाने के बाद, अंततः उसमें कुछ जागृति आई और उसने भयंकर रूप से दोषपूर्ण अनुभव किया। अंत में, यह एक ऐसे बिंदू पर पहुँच गया जहाँ वह तब परेशान हो गया जब उसे समझ आया कि वह सही नहीं था। वह अपनी दशा को अच्छी तरह से जानता था, और वह प्रभु की पवित्रता को भी अच्छी तरह से जानता था। परिणामस्वरूप, प्रभु के लिए प्रेम से भरा ह्रदय उसमें और अधिक बढ़ गया, और उसने अपने जीवन पर और अधिक ध्यान दिया। इसके कारण, उसने बहुत सी मुश्किलों को सहा, और यद्यपि कई बार यह ऐसा था जैसे कि उसे कोई गंभीर बीमारी हो और वह मृत्यु के दरवाजे के समीप भी प्रतीत हुआ, बहुत बार इस प्रकार से शोधन किए जाने के बाद उसे अपने बारे में अधिक समझ प्राप्त हुई, और केवल इस रीति से ही उसने प्रभु के लिए खरे प्रेम को विकसित किया था। ऐसा कहा जा सकता है कि उसका संपूर्ण जीवन शोधन में बीता, और उससे भी अधिक ताड़ना में बीता। उसका अनुभव दूसरे व्यक्ति के अनुभव से भिन्न था, और उसका प्रेम हर उस व्यक्ति से बढ़कर था जो सिद्ध नहीं किया गया था। उसको एक आदर्श के रूप में चुने जाने का कारण यह है कि उसने अपने जीवनकाल में सबसे अधिक पीड़ा का अनुभव किया और उसके अनुभव सबसे अधिक सफल थे। यदि तुम लोग वास्तव में मार्ग के अंतिम चरण में पतरस के समान चलने के योग्य हो, तो ऐसा कोई प्राणी नहीं है जो तुम्हारी आशीषों को छीन सके।

पतरस विवेक से भरा एक मनुष्य था — वह उस प्रकार का मनुष्यत्व था। जब वह पहले पहल यीशु का अनुसरण कर रहा था, तो उसमें भी विरोध और विद्रोह के बहुत से विचार थे, और वह उसके विषय में कुछ नहीं कर सकता था। परंतु जब वह यीशु का अनुसरण कर रहा था, तो उसने इन बातों को गंभीरता से नहीं लिया, और उसने विश्वास किया कि लोगों को वैसा ही होना चाहिए, और इसलिए पहले पहल उसने किसी आरोप को महसूस नहीं किया, और न ही उसने उससे कोई व्यवहार किया। यीशु उसकी प्रतिक्रियाओं के विषय में गंभीर नहीं था, और न ही उसने उन पर कोई ध्यान दिया। वह केवल उस कार्य को निरंतर करता रहा जो उसे करना था। उसने कभी पतरस या अपने भाइयों में कमियाँ नहीं निकलीं। तुम ऐसा कह सकते हो: "क्या ऐसा हो सकता था कि यीशु उन विचारों के बारे में जानता ही न हो जिनके साथ उन्होंने प्रतिक्रिया दी थी।" बिलकुल नहीं! इसका कारण यह था कि वह पतरस को वास्तव में समझ गया था — यह कहा जा सकता था कि उसके बारे में उसे बहुत समझ थी — कि उसने पतरस के विरुद्ध कोई कदम नहीं उठाए। उसने मनुष्यजाति से घृणा की परंतु उस पर दया भी की। क्या अब तुम लोगों में ऐसे बहुत से लोग नहीं है जो पौलुस के समान विरोधी हों, और जिनमें पतरस के समान उस समय प्रभु यीशु के प्रति बहुत सी धारणाएँ हों? मैं तुम्हें बता दूँ, अच्छा होगा कि तुम अपने तीसरे इंद्रियज्ञान में विश्वास न करो। तुम्हारी भावना भरोसा करने योग्य नहीं है और बहुत पहले उसे शैतान की भ्रष्टता के द्वारा पूरी तरह से नाश कर दिया गया था। क्या तुम सोचते हो कि तुम्हारी भावना पूर्ण रूप से सिद्ध है? पौलुस ने प्रभु यीशु का बहुत बार विरोध किया परंतु यीशु ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। क्या ऐसा हो सकता था कि वह बीमारों को चंगा करने और दुष्टात्माओं को निकालने में तो समर्थ था, परंतु पौलुस के भीतर की "दुष्टात्मा" को निकालने में समर्थ नहीं था? ऐसा क्यों है कि यीशु के पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण के बाद ही, जब पौलुस ने निर्दयतापूर्वक यीशु के चेलों को गिरफ़्तार करना जारी रखा, यीशु अंततः दमिश्क के मार्ग पर उसके सामने प्रकट हुआ, और उसे नीचे गिरा दिया? क्या ऐसा हो सकता था कि यीशु ने बहुत धीरे प्रतिक्रिया दी हो? या फिर यह इसलिए था कि उसके पास शरीर में कोई अधिकार नहीं था? क्या तुम सोचते हो कि जब तुम मेरी पीठ पीछे गुप्त रूप से विनाशकारी और विरोधी होते हो, तो मुझे पता नहीं चलता? क्या तुम सोचते हो कि पवित्र आत्मा की ओर से तुम्हें मिले प्रबोधन के टुकड़ों का प्रयोग मेरा विरोध करने के लिए किया जा सकता है? जब पतरस अपरिपक्व था, तो उसने यीशु के प्रति बहुत से विचारों को विकसित किया, फिर उसको दोष के अधीन क्यों नहीं रखा गया? इस समय, बहुत से लोग बिना दोष के कार्य कर रहे हैं, और तब भी जब उन्हें स्पष्ट रूप से बताया जाता है कि वैसा करना ठीक नहीं है, वे फिर भी नहीं सुनते। क्या यह पूरी तरह से मनुष्य के विद्रोह के कारण नहीं है? मैं अब बहुत कुछ कह चुका हूँ, परंतु अब भी तुममें विवेक की थोड़ी सी भी समझ नहीं है, फिर तुम मार्ग के अंतिम चरण में अंत तक कैसे चल पाओगे? क्या तुम्हें महसूस नहीं होता कि यह एक महत्वपूर्ण विषय है?

जब लोगों पर विजय प्राप्त कर ली जाती है तब वे परमेश्वर की कार्ययोजना का पालन करने के योग्य हो जाते हैं; वे परमेश्वर से प्रेम करने और उसका अनुसरण करने के लिए अपने विश्वास और अपनी इच्छा पर भरोसा करने के योग्य हो जाते हैं। अतः मार्ग के अंतिम चरण में कैसे चला जा सकता है? क्लेश का अनुभव करने के तुम्हारे दिनों में तुम्हें सभी कठिनाइयों को सहना आवश्यक है, और तुममें दुःख सहने की इच्छा भी होनी चाहिए; केवल इसी रीति से तुम मार्ग के इस चरण में अच्छी तरह से चल पाओगे। क्या तुम सोचते हो कि मार्ग के इस चरण में चलना उतना सरल है? तुम्हें जानना चाहिए कि तुम्हें कौनसा कार्य पूरा करना है, तुम सबको अपनी—अपनी क्षमता बढ़ानी होगी और अपने को पर्याप्त सत्य के साथ लैस करना होगा। यह एक या दो दिनों का कार्य नहीं है — यह उतना सरल भी नहीं जितना तुम सोचते हो! मार्ग के अंतिम चरण में चलना इस बात पर निर्भर करता है कि वास्तव में तुममें किस प्रकार का विश्वास और किस प्रकार की इच्छा है। शायद तुम अपने भीतर पवित्र आत्मा को कार्य करता हुआ नहीं देख सकते, या शायद तुम कलीसिया में पवित्र आत्मा के कार्य को खोज नहीं सकते, इसलिए तुम आगे के मार्ग के विषय में निराशावादी और हताश हो, और मायूसी से भरे हुए हो। विशेष रूप में, जो पहले बड़े—बड़े योद्धा थे वे सब गिर गए हैं — क्या यह सब तुम्हारे लिए आघात नहीं है? तुम्हें इन सब बातों को कैसे देखना चाहिए? क्या तुममें विश्वास है या नहीं? क्या तुम आज के कार्य को पूरी तरह से समझते हो या नहीं? ये बातें निर्धारित कर सकती हैं कि तुम मार्ग के अंतिम चरण में अच्छी तरह से चलने में समर्थ हो या नहीं।

ऐसा क्यों कहा जाता है कि तुम सब अपने अपने मार्ग के अंतिम चरण में हो? यह इसलिए है कि तुम सब वह सब कुछ समझते हो जो तुम्हें समझना चाहिए, और मैंने तुम सबको वह सब कुछ बता दिया है जो तुम लोगों को हासिल करना है। मैंने तुम सबको वह सब कुछ भी बता दिया है जो तुम लोगों के भरोसे छोड़ा गया है। अतः, जिसमें अब तुम सब चल रहे हो वह मेरे द्वारा अगुवाई प्राप्त मार्ग का अंतिम चरण है। मैं केवल यही चाहता हूँ कि तुम सब स्वतंत्र रूप से रहने की योग्यता को प्राप्त कर सको, कि चाहे समय कोई भी हो तुम्हारे पास सदैव चलने के लिए एक मार्ग हो, हमेशा के समान अपनी क्षमता को बढ़ाओ, परमेश्वर के वचनों को उचित रूप से पढ़ो, और एक उचित मानवीय जीवन जीओ। मैं अब तुम्हारी इस प्रकार से जीने में अगुवाई कर रहा हूँ, परंतु भविष्य में मैं ऐसा नहीं करूँगा। क्या तुम फिर भी इस प्रकार जी पाओगे? क्या तुम निरंतर आगे बढ़ पाओगे? पतरस का अनुभव यही था। जब यीशु उसकी अगुवाई कर रहा था, तो उसमें कोई समझ नहीं थी; वह हमेशा एक बच्चे के समान बेफिक्र था, और वह उन कार्यों के प्रति गंभीर नहीं था जो उसने किए। यीशु के प्रस्थान के बाद ही उसने अपना उचित मानवीय जीवन आरंभ किया। उसका अर्थपूर्ण जीवन यीशु के चले जाने के बाद ही आरंभ हुआ। यद्यपि उसमें सामान्य मनुष्यत्व का थोड़ा सा विवेक था और जो एक सामान्य मनुष्य में होना चाहिए, फिर भी उसका सच्चा अनुभव और अनुसरण यीशु के प्रस्थान तक नए रूप में आरंभ नहीं हुआ। इस समय तुम सबके लिए परिस्थितियाँ कैसी हैं? मैं अभी तुम्हारी अगुवाई इस मार्ग में कर रहा हूँ और तुम सोचते हो कि यह बहुत अच्छा है। ऐसे कोई बुरे वातावरण और कोई परीक्षाएँ नहीं हैं जो तुम पर पड़ती हैं, परंतु इस रीति से ऐसा कोई तरीका नहीं है कि तुम यह देख सको कि वास्तव में तुम्हारी क्षमता कितनी है, और न ही ऐसा कोई तरीका है जिसमें तुम यह देख सको कि क्या तुम वास्तव में एक ऐसे व्यक्ति हो या नहीं जो सत्य का अनुसरण करता है। तुम अपने मुंह से कहते हो कि तुम अपने तत्व को जानते हो, परंतु ये सब व्यर्थ के शब्द हैं। बाद में जब तुम वास्तविकताओं का सामना करोगे, केवल तभी तुम्हारी समझ प्रमाणित होगी। यद्यपि अभी तुम्हारे पास इस प्रकार की समझ है: "मैं समझता हूँ कि मेरा अपना शरीर बहुत ही भ्रष्ट है, और लोगों के शरीर का सार परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करना और उसका विरोध करना है। परमेश्वर के दंड और उसकी ताड़ना को ग्रहण करने के योग्य बनना ही उसकी संपूर्ण उन्नति है। मैं अब यह समझ चुका हूँ, और मैं परमेश्वर के प्रेम का बदला चुकाने के लिए तैयार हूँ," जो कि कहना आसान है, बाद में जब तुम पर क्लेश, परीक्षाएँ और दुःख आएँगे तो उनमें से होकर जाना आसान नहीं होगा। तुम सब प्रतिदिन इस तरीके का अनुसरण करते हो, परंतु तुम सब अब भी अपने अनुभव को निरंतर जारी रखने में असमर्थ हो। यह तब और भी बदतर हो जाएगा यदि मैं तुमको छोड़ दूँ और फिर कभी तुम पर कोई ध्यान न दूँ; अधिकाँश लोग गिर पड़ेंगे और नमक का खंभा, अर्थात् अपमान का प्रतीक बन जाएँगे। ये सब बातें संभव हैं। क्या तुम इनके विषय में चिंतित या व्याकुल नहीं हो? पतरस इस प्रकार के वातावरण से होकर गया और उसने इस प्रकार के दुःख का अनुभव किया, परंतु वह फिर भी दृढ़ खड़ा रहा। यदि ऐसा वातावरण तुम्हारे जीवन में लाया जाए, तो क्या तुम दृढ़ खड़े रह पाओगे? वे बातें जो यीशु ने कहीं और जो कार्य उसने किया जब वह पृथ्वी पर था, उसने पतरस को एक नींव प्रदान की, और इस नींव से वह बाद के मार्ग में चला। क्या तुम सब उस स्तर तक पहुँच सकते हो? जिन मार्गों पर तुम पहले चले हो और वे सत्य जिन्हें तुम पहले समझ चुके हो — क्या वे भविष्य में दृढ़ खड़े रहने की तुम्हारी नींव बन सकते हैं? क्या वे बाद में दृढ़ खड़े रहने का तुम्हारा दर्शन बन सकते हैं? मैं तुम लोगों को सत्य बताऊँगा — कोई यह कह सकता है कि जो कुछ लोग वर्तमान में समझते हैं वे सब धर्मसिद्धांत हैं। यह इसलिए है क्योंकि जो वे समझते हैं वे सब ऐसी बातें नहीं हैं जिनका अनुभव उन्होंने किया है। अब तक जिसे तुम निरंतर जारी रख सके वह पूरी तरह से नए प्रकाश की अगुवाई के कारण है। यह नहीं कि तुम्हारी क्षमता एक निश्चित स्तर तक पहुँच गई है, परंतु ये मेरे शब्द हैं जिन्होंने तुम्हारी आज तक अगुवाई की है; यह नहीं कि तुममें एक बड़ा विश्वास है, बल्कि मेरे वचनों की बुद्धि के कारण तुम अब तक मेरा अनुसरण कर पाए। यदि मैं अब नहीं बोलता, अपनी आवाज नहीं निकालता, तो तुम आगे बढ़ने में असमर्थ होते और उसी समय आगे बढ़ने से रुक जाते। क्या यह तुम लोगों की वास्तविक क्षमता नहीं है? तुम लोग बिलकुल नहीं जानते कि किन पहलुओं से भीतर प्रवेश करना है और किन पहलुओं से उनकी पूर्ति करनी है जिनकी तुममें कमी है। तुम लोग नहीं समझते कि एक अर्थपूर्ण मानवीय जीवन को कैसे जीएँ, परमेश्वर के प्रेम का बदला कैसे चुकाएँ, या एक मजबूत या प्रभावशाली गवाही कैसे दें। तुम लोग इन कार्यों को पूरा कर ही नहीं सकते! तुम लोग आलसी और निर्बुद्धि दोनों हो! तुम लोग केवल यह कर सकते हो कि किसी और बात पर निर्भर रहो, और जिस पर तुम लोग निर्भर रहते हो वह नया प्रकाश है, और वह है जो आगे तुम्हारी अगुवाई कर रहा है। आज तक तुम्हारा दृढ़ बने रहना पूरी तरह से नए प्रकाश और ताजा वचनों पर पूरी तरह से निर्भर रहने के द्वारा ही हुआ है। तुम लोग पतरस के समान बिलकुल नहीं हो, जो सच्चे मार्ग का अनुसरण करने में प्रवीण था, या अय्यूब के समान जो भक्ति के साथ यहोवा की आराधना करने और यह विश्वास करने में समर्थ था कि यहोवा ने चाहे कैसे भी उसकी परीक्षा ली हो और चाहे वह उसे आशीष दे या न दे, वह परमेश्वर ही है। क्या तुम ऐसा कर सकते हो? तुम सब पर विजय कैसे पाई गई है? एक पहलू है दंड, ताड़ना और श्राप, और दूसरा पहलू है वे रहस्य जो तुम सब पर विजय प्राप्त करते हैं। तुम सब गधों के समान हो। जो मैं कहता हूँ यदि वह आकर्षित करने वाला न हो, यदि कोई रहस्य न हो, तो तुम सब पर विजय प्राप्त नहीं की जा सकती। यदि कोई प्रचार करने वाले व्यक्ति हों और वे कुछ समय तक हमेशा एक जैसी बातों का प्रचार करते रहें, तो तुम सब दो सालों से भी कम समय में भाग खड़े होओगे, और तुम लोग आगे नहीं बढ़ पाओगे। तुम लोग नहीं जानते कि गहराई में कैसे जाएँ, न ही तुम लोग समझते हो कि सत्य या जीवन के मार्ग का अनुसरण कैसे करें। तुम लोग केवल उसे ही ग्रहण करने की बात समझते हो जो कुछ नया हो, जैसे कि रहस्यों या दर्शनों को सुनना, या फिर यह सुनना कि परमेश्वर कैसे कार्य करता था, या पतरस के अनुभवों को सुनना, या फिर यीशु के क्रूसीकरण की पृष्ठभूमि को सुनना ...। तुम लोग केवल इन बातों को सुनना चाहते हो, और जितना तुम सुनते हो, उतने ही अधिक उत्साहित हो जाते हो। तुम लोग यह सब अपने दुःख और विरक्ति को दूर करने के लिए सुनते हो! तुम्हारे जीवन इन नई बातों के द्वारा ही पूरी तरह से चलाए जाते हैं। क्या तुम सोचते हो कि तुम आज यहाँ तुम्हारे अपने विश्वास के द्वारा पहुंचे हो? क्या यह तुम्हारी उस क्षमता का तुच्छ, दयनीय अंश नहीं है जो तुममे है? तुम्हारी खराई कहाँ है? क्या तुम लोगों में मानवीय जीवन है? सिद्ध किए जाने के लिए तुम लोगों में कितने तत्व हैं? क्या मैं जो कह रहा हूँ वह वास्तविकता नहीं है? मैं इस रीति से बोलता और कार्य करता हूँ परंतु तुम लोग फिर भी कोई ध्यान नहीं देते। जब तुम लोग अनुसरण करते हो तो तुम लोग देखते भी रहते हो। तुम लोग हमेशा उदासीनता का रूप बनाए रखते हो, और तुम सब हमेशा नाक के द्वारा अगुवाई पाते हो। तुम सब लोग ऐसे ही आगे बढे हो। आज तक ताड़ना, परीक्षाओं और कष्टों ने ही तुम सब की यहाँ तक अगुवाई की है। यदि जीवन के प्रवेश पर आधारित कुछ संदेशों का ही प्रचार किया जाता, तो क्या तुम लोग बहुत पहले ही नहीं भटक गए होते? तुम लोगों में से प्रत्येक दूसरे से अधिक दंभ से भरा हुआ है; वास्तव में तुम सब कुछ और से नहीं बल्कि पित्त से भरे हुए हो! तुमने कुछ रहस्यों को समझ लिया है, और तुमने कुछ ऐसी बातों को समझ लिया है जिन्हें मनुष्यों ने पहले नहीं समझा था, इस प्रकार तुम अब तक मुश्किल से बने रहे हो। तुम लोगों के पास अनुसरण न करने का कोई कारण नहीं है, इसलिए तुमने मुश्किल से ही अपने आपको मजबूत किया है और बहाव के साथ बहे हो। यही वह परिणाम है जो मेरे वचनों के द्वारा प्राप्त किया गया है, परंतु यह निश्चित रूप से तुम्हारी सफलता नहीं है। तुम्हारे पास घमंड करने के लिए कुछ भी नहीं है। अतः कार्य के इस चरण में तुम लोगों की आज तक मुख्य रूप से वचनों के द्वारा अगुवाई की गई है। अन्यथा, इनमें से कौन लोग आज्ञा मानने में सक्षम होंगे? कौन आज तक बने रहने में सक्षम होगा? आरंभ से ही तुम लोग छोड़ देना चाहते थे, परंतु तुमने इसका साहस नहीं किया; तुम लोगों में साहस नहीं था। आज तक तुम लोग आधे—अधूरे मन से अनुसरण कर रहे हो।

यीशु को क्रूस पर चढ़ा दिए जाने और उसके प्रस्थान के बाद ही पतरस अपने मार्ग में आगे बढ़ने लगा, उस मार्ग में चलने लगा जिसमें उसे चलना चाहिए था; वह अपनी कमजोरियों और कमियों को देख लेने के बाद ही प्रशिक्षित होना आरंभ हुआ। उसने देखा कि उसमें बहुत कम प्रेम था और दुःख सहने की उसकी इच्छा अपर्याप्त थी, कि उसमें कोई अंतर्दृष्टि नहीं थी, और कि उसके विवेक में कमी थी। उसने देखा कि उसमें ऐसी बहुत सी बातें थीं जो यीशु की इच्छा के अनुरूप नहीं थीं, और ऐसी बहुत सी बातें थीं जो विद्रोही और विरोधी थीं और ऐसी भी बहुत सी बातें थीं जो मानवीय इच्छा के साथ मिली हुई थीं। यह उसके बाद ही हुआ कि उसे प्रत्येक पहलू में प्रवेश मिला। जब यीशु उसकी अगुवाई कर रहा था, तो उसने उसकी दशा को प्रकट किया और पतरस ने उसे स्वीकार किया और इच्छापूर्वक प्रतिज्ञाएँ कीं, परंतु उस समय से पहले तक उसमें सच्ची समझ नहीं थी। यह इसलिए था क्योंकि उसमें कोई अनुभव नहीं था, और वह अपनी क्षमता को बिलकुल नहीं जानता था। कहने का अर्थ यह है कि मैं तुम लोगों को अगुवाई देने के लिए अब केवल वचनों का प्रयोग कर रहा हूँ, और इतने कम समय में तुम लोगों को सिद्ध बनाना असंभव है, और तुम लोग केवल सत्य को समझ और जान पाओगे। इसका कारण यह है कि तुम पर विजय पाना और तुम्हारे हृदयों में तुम्हें आश्वस्त करना वर्तमान कार्य है, लोगों पर विजय प्राप्त करने के बाद ही उनमें से कुछ लोग सिद्ध किए जाएँगे। इस समय वे दर्शन और वे सत्य जिन्हें तुम समझते हो, वे तुम्हारे भविष्य के अनुभवों की एक नींव की रचना कर रहे हैं; भविष्य के क्लेश में तुम सब इन वचनों के व्यावहारिक अनुभव को प्राप्त करोगे। बाद में, जब परीक्षाएँ तुम्हारे ऊपर आएँगी और तुम क्लेश से होकर जाओगे, तो तुम उन वचनों के बारे में सोचोगे जिन्हें तुम आज कहते हो: चाहे कैसे भी क्लेश, परीक्षाओं, या बड़े कष्टों का मैं अनुभव करूँ, मुझे परमेश्वर को संतुष्ट करना आवश्यक है। पतरस के अनुभव के बारे में सोचें, और अय्यूब के अनुभव के बारे में सोचें — तुम आज के वचनों के द्वारा उत्तेजित हो जाओगे। केवल इस प्रकार से तुम्हारा विश्वास प्रेरित हो सकता है। उस समय, पतरस ने कहा कि वह परमेश्वर के दंड और उसकी ताड़ना को प्राप्त करने के योग्य नहीं था, और तब तक तुम भी सब लोगों को अपने द्वारा परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को दिखाने के लिए तैयार हो जाओगे। तुम तत्परता के साथ उसके दंड और उसकी ताड़ना को स्वीकार करने के लिए तैयार हो जाओगे, और उसका दंड, उसकी ताड़ना, और उसका श्राप तुम्हारे लिए राहत का कारण होगा। वर्तमान में, तुम सत्य के साथ लैस नहीं हो सकते। न केवल तुम भविष्य में दृढ़ खड़े रहने में असमर्थ होओगे, बल्कि वर्तमान कार्य में से होकर जाने में भी शायद सक्षम नहीं होओगे। इस रीति से, क्या तुम निष्कासन और सजा के पात्र नहीं होओगे? अभी ऐसी कोई वास्तविकताएँ नहीं हैं जो तुम पर आ पड़ी हों, और जिन किन्हीं पहलुओं में तुममें घटी है, मैंने उसमें तुम्हारी पूर्ति की है; मैं हर पहलू से बात करता हूँ। तुम लोगों ने वास्तव में अधिक दुःख नहीं सहे हैं; तुम लोग केवल वही ले लेते हो जो उपलब्ध होता है, तुम लोगों ने कोई मूल्य नहीं चुकाया है, और इससे बढ़कर तुम लोगों के पास अपने सच्चे अनुभव और अंतर्दृष्टियाँ भी नहीं हैं। इसलिए, जो तुम समझते हो वह तुम्हारी सच्ची क्षमता नहीं है। तुम लोग केवल समझ, ज्ञान और दृष्टि तक सीमित हो, परंतु तुमने अधिकाँश कटनी नहीं काटी है। यदि मैंने तुम लोगों पर कभी ध्यान नहीं दिया होता बल्कि तुम्हें तुम्हारे अपने घर में अनुभवों से होकर जाने देता, तो तुम बहुत पहले ही निकलकर इस बड़े संसार में वापस चले गए होते। जिस मार्ग पर तुम लोग भविष्य में चलोगे वह दुःख का मार्ग होगा, और यदि तुम लोग मार्ग के वर्तमान चरण में अच्छी तरह से चलते हो, और जब बाद में तुम बड़े क्लेश से होकर जाते हो, तो तुम लोगों के पास एक साक्षी होगी। तुम मानवीय जीवन के महत्व को समझते हो, और तुम मानवीय जीवन के सही मार्ग में हो, और भविष्य में परमेश्वर तुमसे जैसा भी व्यवहार करे, तुम बिना किन्हीं शिकायतों या विकल्पों के परमेश्वर की योजनाओं के प्रति समर्पित हो जाओगे, और तुम्हें परमेश्वर से कोई मांगें भी नहीं रहेंगी। इस रीति से तुम्हारा महत्व होगा। अभी तक तुम क्लेश से होकर नहीं गए हो, इसलिए तुम किसी भी बात का पालन कर सकते हो। तुम कहते हो कि परमेश्वर जैसे भी अगुवाई करता है ठीक है, और कि तुम उसकी सारी योजनाओं के प्रति समर्पित रहोगे! परमेश्वर चाहे तुम्हें श्राप देता है या ताड़ना देता है, तुम उसे संतुष्ट करने के लिए तैयार रहोगे। ऐसा कहकर जो अब तुम कहते हो वह जरुरी नहीं है कि तुम्हारी क्षमता को प्रस्तुत करे। अब तुम जो करने के लिए तैयार हो वह यह नहीं दर्शा सकता कि तुम अंत तक अनुसरण करने में सक्षम हो। जब बड़े क्लेश तुम पर आते हैं या जब तुम किसी सताव या उत्पीड़न से, या फिर बड़ी परीक्षाओं से होकर जाते हो, तो तुम उन शब्दों को नहीं कह पाओगे। यदि तुम उस प्रकार की समझ रख सकते हो तब तुम दृढ़ खड़े रहोगे, केवल यही तुम्हारी क्षमता होगी। उस समय पतरस कैसा था? उसने कहा: "प्रभु, मैं तेरे लिए अपना जीवन बलिदान कर दूँगा। यदि तू कहे कि मैं मरूँ, तो मैं मर जाऊँगा!" उस समय भी उसने इस रीति से प्रार्थना की थी, और उसने यह भी कहा था, "यदि दूसरे तुझसे प्रेम नहीं भी करते हैं तो भी मैं तुझसे अंत तक अवश्य प्रेम करूँगा। मैं हर समय तेरा अनुसरण करूँगा।" उस समय उसने यह कहा, परंतु जैसे ही परीक्षाएँ उस पर आईं, तो वह टूट गया और रोने लगा। तुम सब जानते हो कि पतरस ने तीन बार प्रभु का इनकार किया, है ना? ऐसे बहुत से लोग हैं जो तब रोते हैं और मानवीय निर्बलताओं को व्यक्त करते हैं जब परीक्षाएँ उन पर आ पड़ती हैं। तुम अपने स्वामी नहीं हो। इसमें, तुम स्वयं को नियंत्रित नहीं कर सकते। शायद आज तुम वास्तव में अच्छा कर रहे हो, परंतु वह इसलिए है क्योंकि तुम्हारे पास एक उपयुक्त वातावरण है। यदि कल यह बदल जाए, तो तुम अपनी कायरता और अयोग्यता को दिखाओगे, और तुम अपनी तुच्छता और अनुपयुक्तता को भी दिखाओगे। तुम्हारी "मर्दानगी" बहुत पहले ही बरबाद हो गई होगी, और कभी—कभी तुम हार मानकर बाहर भी निकल जाओगे। यह दिखाता है कि उस समय जो तुम समझते थे वह तुम्हारी वास्तविक क्षमता नहीं थी। एक व्यक्ति को लोगों की वास्तविक क्षमता को देखना आवश्यक होता है कि वे परमेश्वर से प्रेम करते हैं या नहीं, क्या वे वास्तव में परमेश्वर की योजना के प्रति समर्पित होने के योग्य हैं या नहीं, और क्या वे इस योग्य हैं या नहीं कि अपने सारे बल को वह प्राप्त करने में लगा दें जिसकी माँग परमेश्वर करता है और फिर भी परमेश्वर के प्रति समर्पित रहें और परमेश्वर को अपना सर्वोत्तम दें, फिर चाहे इसका अर्थ उनके द्वारा स्वयं को बलिदान चढ़ाना ही क्यों न हो।

तुम्हें यह याद रखना चाहिए कि वचनों को अब कह दिया गया है: बाद में, तुम बड़े क्लेश और बड़े दुःख से होकर जाओगे! सिद्ध बनना सरल या आसान बात नहीं है। कम से कम तुममें अय्यूब के समान विश्वास होना चाहिए या शायद उसके विश्वास से भी बड़ा विश्वास। तुम्हें जानना चाहिए कि ये परीक्षाएँ अय्यूब की परीक्षाओं से बड़ी होंगी, और कि तुम्हें फिर भी लम्बे समय की ताड़ना से होकर जाना अवश्य होगा। क्या यह एक सरल बात है? यदि तुम्हारी क्षमता में सुधार नहीं हो सकता, तो समझने की तुम्हारी योग्यता में कमी है, और तुम बहुत कम जानते हो, फिर उस समय तुम्हारे पास कोई साक्षी नहीं होगी, बल्कि तुम उपहास का पात्र बन जाओगे, अर्थात् शैतान के लिए एक खिलौना बन जाओगे। यदि तुम अभी दर्शनों को थामे नहीं रह सकते, तो तुम्हारी कोई नींव नहीं है, और भविष्य में तुम दुत्कार दिए जाओगे! मार्ग का हर भाग चलने के लिए सरल नहीं होता, इसलिए इसे हल्के में न लो। अभी इसे ध्यान से समझो और इस बात की तैयारी करो कि इस मार्ग के अंतिम चरण में उचित रीति से कैसे चलना है। यही वह मार्ग है जिस पर भविष्य में चलना होगा और इसमें सब लोगों को चलना होगा। तुम इस वर्तमान समझ को एक कान से सुनकर दूसरे से बाहर निकलने की अनुमति नहीं दे सकते, और यह न सोचो कि जो कुछ मैं तुमसे कह रहा हूँ बिलकुल व्यर्थ है। ऐसा दिन आएगा जब तुम इसका सदुपयोग करोगे — शब्दों को व्यर्थ ही नहीं कहा जा सकता। यह अपने आपको तैयार करने का समय है, यह भविष्य का मार्ग तैयार करने का समय है। तुम्हें उस मार्ग को तैयार करना चाहिए जिसमें तुम्हें बाद में चलना है; तुम इस बात के प्रति चिंतित और व्याकुल होना चाहिए कि बाद में तुम कैसे स्थिर खड़े रह पाओगे और भविष्य के मार्ग के लिए कैसे अच्छी तरह से तैयारी कर पाओगे। पेटू और आलसी मत बनो! तुम्हें अपनी जरुरत की सब चीजों को प्राप्त करने हेतु अपने समय का सर्वोत्तम इस्तेमाल करने के लिए सब कुछ करना होगा। मैं तुम्हें सब कुछ दे रहा हूँ ताकि तुम समझ जाओ। तुम लोगों ने अपनी—अपनी आँखों से देखा है कि तीन वर्षों से भी कम समय में मैंने बहुत सी बातें कहीं है और बहुत सा कार्य किया है। इस रीति से कार्य करने का एक पहलू यह है कि लोगों में बहुत घटी है, और दूसरा पहलू यह है कि समय बहुत कम है और इसमें और देरी नहीं की जा सकती। तुम जिस प्रकार से इसकी कल्पना करते हो, उसके आधार पर यह बहुत धीमा है, अतः मुझे कितनी दूर तुम्हारे साथ चलना होगा? यदि तुम चाहते हो मैं तब तक तुम्हारे साथ चलूँ जब तक कि बूढ़ा न हो जाऊँ, तो यह असंभव है! ऐसे लोगों तक पहुंचा जाना जरुरी है जो अपने मन में पूरी तरह से साफ़ हों, तब वे गवाही दे सकते हैं और उन्हें इस्तेमाल किया जा सकता है। क्या यह बहुत धीमा नहीं है? बड़े क्लेश से होकर जाने के द्वारा सब लोगों के भीतर सच्ची समझ विकसित हो जाएगी। यह कार्य का एक चरण है। एक बार जब तुम उन दर्शनों को समझ लेते हो जो आज पाए जाते हैं और सच्ची क्षमता को प्राप्त कर लेते हो, तो भविष्य में चाहे तुम जैसी भी कठिनाइयों से होकर गुजरो वे तुम पर जयवंत नहीं होंगी — तुम उनका सामना कर पाओगे। जब मैं कार्य के इस अंतिम चरण को पूरा कर लूँगा, और अंतिम वचनों को भी कह लूँगा, तो भविष्य में लोगों को अपने—अपने मार्ग पर चलना होगा। यह पहले कहे वचनों को पूरा करेगा: पवित्र आत्मा के पास हर व्यक्ति के लिए आदेश है और हर व्यक्ति के द्वारा किया जाने वाला कार्य है। भविष्य में, प्रत्येक व्यक्ति पवित्र आत्मा की अगुवाई के द्वारा उस मार्ग पर चलेगा जिस पर उन्हें चलना चाहिए। क्लेश के समय में होकर जाते हुए कौन किसको संभाल पाएगा? हरेक व्यक्ति के अपने दुःख हैं, और हरेक व्यक्ति की अपनी क्षमता है। किसी की क्षमता किसी दूसरे के जैसी नहीं होती। पति अपनी पत्नियों को नहीं संभालेंगे और माता—पिता अपने बच्चों को नहीं संभालेंगे; कोई किसी को नहीं संभाल पाएगा। यह आज के जैसा नहीं है — पारस्परिक संभाल और सहयोग आज भी संभव है। वह हर प्रकार के व्यक्ति का खुलासा किए जाने का समय होगा। कहने का अर्थ यह है कि जब परमेश्वर चरवाहे को मारेगा तो झुंड की भेड़ें तितर—बितर हो जाएँगी, और उस समय तुम लोगों के पास कोई सच्चा अगुवा नहीं होगा। लोगों में फूट पड़ जाएगी — यह आज के जैसा नहीं होगा, जहाँ तुम लोग एक सभा के रूप में एक साथ एकत्रित हो सकते हो। बाद में, जिनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होगा वे अपने वास्तविक रूप को दिखाएँगे। पति अपनी पत्नियों को बेच देंगे, पत्नियाँ अपने पतियों को बेच देंगी, बच्चे अपने माता—पिता को बेच देंगे, माता—पिता अपने बच्चों को सताएँगे — मानवीय हृदय का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता! केवल यह किया जा सकता है कि एक व्यक्ति उसी को थामे रहे जो उसके पास है, और मार्ग के अंतिम चरण में अच्छी तरह से चले। अभी तुम लोग इसे स्पष्टता से नहीं देखते और तुम सब निकटदर्शी हो। कार्य के इस चरण में से सफलतापूर्वक होकर जाना कोई सरल कार्य नहीं है।

क्लेश का समय बहुत अधिक लंबा नहीं होगा — यह एक वर्ष का भी नहीं होगा। यदि यह एक वर्ष जितना हो तो यह कार्य के अगले चरण में विलंब कर देगा, और लोगों की क्षमता अपर्याप्त होगी। यदि यह बहुत अधिक लंबा हो तो वे इसको सहन नहीं कर पाएँगे — उनकी क्षमता की अपनी सीमितताएँ हैं। जब मेरा अपना कार्य समाप्त हो जाएगा, तो अगला चरण लोगों के लिए उस मार्ग पर चलना होगा जिसमें उन्हें चलना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को यह समझना आवश्यक है कि उन्हें किस मार्ग पर चलना चाहिए — यह दुःख सहने का मार्ग है और दुःख सहने की प्रक्रिया है, और यह परमेश्वर से प्रेम करने की तुम्हारी इच्छा को शुद्ध करने का भी मार्ग है। कौनसे सत्यों में तुम्हें प्रवेश करना है, किन सत्यों को तुम्हें जोड़ना है, तुम्हें कैसे अनुभव करना है, और किस सत्य से तुम्हें प्रवेश करना है — तुम्हें ये सब बातें समझनी आवश्यक हैं। तुम्हें अभी अपने आपको लैस करना है। यदि तुम तब तक प्रतीक्षा करते हो जब क्लेश तुम पर आ पड़ता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्वयं के जीवन के बोझ को सहना आवश्यक है; सदैव दूसरों की प्रतीक्षा न करें कि वे चेतावनियाँ दें या तुम्हारे कानों को उठाएँ और तुमसे बात करें। मैं बहुत कुछ कह चुका हूँ पर तुम अभी तक नहीं जानते कि तुम्हें किस सत्य में प्रवेश करना है या किसके साथ स्वयं को लैस करना है। यह दर्शाता है कि तुमने परमेश्वर के वचनों को पढ़ने का प्रयास नहीं किया है। अपने स्वयं के जीवन के लिए कोई बोझ नहीं उठाते हो — यह कैसे ठीक हो सकता है? तुम इस बात के प्रति स्पष्ट नहीं हो कि तुम्हें किसमें प्रवेश करना चाहिए, तुम नहीं समझते कि तुम्हें क्या समझना चाहिए, और तुम इस बात के प्रति पूरी तरह से लापरवाह हो कि तुम्हें भविष्य का कौनसा मार्ग लेना चाहिए — क्या तुम समुद्र में बिखरे जहाज के टुकड़ों के समान नहीं हो? तुम किस कार्य के लायक हो? तुम लोग अभी अपने स्वयं के मार्गों का निर्माण कर रहे हो और उन्हें तैयार कर रहे हो। तुम्हें यह जानना आवश्यक है कि लोगों को क्या हासिल करना चाहिए और यह भी कि मनुष्य से परमेश्वर की मांगों का स्तर क्या है। तुममें यह समझ होनी आवश्यक है: चाहे कुछ भी हो, यद्यपि मैं बहुत ही भ्रष्ट हूँ, फिर भी मुझे परमेश्वर के समक्ष इन खराबियों को ठीक करना है। जब परमेश्वर ने मुझे नहीं बताया था, तो मैं नहीं समझता था, परंतु अब उसने मुझे बता दिया है, क्योंकि मैं समझ चुका हूँ तो मुझे इसे ठीक करने के लिए जल्दी करनी चाहिए कि मैं एक सामान्य मनुष्यत्व को जीऊँ, और एक ऐसे स्वरूप में जीऊँ जो परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करे। यद्यपि मैं पतरस के स्तर तक न भी जी पाऊँ, फिर भी कम से कम मुझे एक सामान्य मनुष्यत्व को जीना चाहिए, और इस रीति से मैं परमेश्वर के हृदय संतुष्ट कर सकता हूँ।

इस मार्ग का अंतिम चरण अब से लेकर भविष्य के क्लेश की समाप्ति तक रहेगा। मार्ग का यह चरण तब होगा जब लोगों की सच्ची क्षमता प्रकट होगी और यह भी प्रकट होगा कि क्या उनमें सच्चा विश्वास है या नहीं। क्योंकि मार्ग का यह चरण अतीत में लिए गए अन्य किसी चरण से कठिन होगा, और यह सड़क पहले से अधिक पथरीली होगी, इसे "मार्ग का अंतिम चरण" कहा जाता है। सत्य यह है कि यह मार्ग का सबसे अंतिम भाग नहीं है; इसका कारण यह है कि क्लेश में से होकर जाने के बाद तुम सुसमाचार को फ़ैलाने के कार्य में से होकर जाओगे और लोगों का एक ऐसा समूह होगा जो प्रयोग किए जाने के कार्य में से होकर जाएगा। अतः "मार्ग के अंतिम चरण" का उल्लेख केवल लोगों का शोधन करने के क्लेश और कठोर वातावरण के संदर्भ में किया गया है। अतीत में लिए गए मार्ग के भाग में, यह मैं था जो तुम्हें तुम्हारी प्रसन्नता भरी यात्रा में व्यक्तिगत रूप से अगुवाई कर रहा था, मैं तुम्हें अपने हाथ में लिए चल रहा था कि तुम्हें सिखाऊँ और मैं तुम्हें भोजन करा रहा था। यद्यपि तुम बहुत बार ताड़ना और दंड से होकर गए हो, फिर भी उन्होंने थोड़ा सा ही कष्ट तुम्हें दिया है। निःसंदेह उसने परमेश्वर पर विश्वास के तुम्हारे दृष्टिकोणों को थोड़ा बदल दिया है; यह तुम्हारे स्वभाव को काफी स्थिर बनाने का भी कारण रहा है, और इसने तुम्हें मेरे बारे में थोड़ी समझ प्राप्त करने भी दी है। परंतु मैं यह कह रहा हूँ, मार्ग के उस भाग में चलने में लोगों के द्वारा चुकाया जाने वाला मूल्य या पीड़ादायक प्रयास काफी कम है — यह मैं हूँ जिसने आज तक तुम्हारी अगुवाई की है। इसका कारण यह है कि मैं तुमसे कुछ भी करने की मांग नहीं करता और तुमसे रखी गई मेरी मांगें अधिक नहीं हैं — मैं केवल तुमसे वही लेने की मांग करता हूँ जो उपलब्ध है। इस समय के दौरान मैंने निरंतर तुम लोगों की आवश्यकताओं को पूरा किया है, और मैंने कभी अनुचित मांगों को नहीं रखा है। तुम लोगों ने बार—बार ताड़ना को सहा है, फिर भी तुम लोगों ने मेरी मूल मांगों को पूरा नहीं किया है। तुम लोग पीछे हट जाते हो और निरुत्साहित हो जाते हो, परंतु मैं इस पर ध्यान नहीं देता क्योंकि यह अब मेरे व्यक्तिगत कार्य का समय है और मैं मेरे प्रति तुम्हारी भक्ति को अधिक गंभीरता से नहीं लेता। परंतु यहाँ से बाहर जाने के मार्ग पर मैं न तो कार्य करूँगा और न ही बोलूँगा, और उस समय मैं तुम लोगों को ऐसे उबाऊ तरीके से निरंतर जारी रखने नहीं दूँगा। मैं तुम सबको अनुमति दूँगा कि तुम बहुत से सबक सीखो, और मैं तुम लोगों को केवल वही ले लेने की अनुमति नहीं दूँगा जो उपलब्ध है। जो सच्ची क्षमता तुम लोगों के भीतर आज है उसका खुलासा होना आवश्यक है। वर्षों चले तुम्हारे प्रयास फलदायक रहे हैं या नहीं यह इसमें देखा जाएगा कि तुम लोग मार्ग के अंतिम चरण में कैसे चलते हो। अतीत में, तुम लोगों ने सोचा था कि परमेश्वर पर विश्वास करना बहुत सरल था, और उसका कारण यह था कि परमेश्वर तुम्हारे साथ बहुत गंभीर नहीं था। और अब कैसी परिस्थिति है? क्या तुम लोग सोचते हो कि परमेश्वर पर विश्वास करना सरल है? क्या तुम लोग अब भी महसूस करते हो कि परमेश्वर पर विश्वास करना उतना प्रसन्नचित्त और चिंतामुक्त है जितने सड़क पर खेल रहे बच्चे होते हैं? यह सत्य है कि तुम लोग भेड़ें हो, फिर भी तुम लोगों को परमेश्वर के अनुग्रह का मूल्य चुकाने, और उस परमेश्वर को पूरी तरह से प्राप्त करने के लिए जिस पर तुम लोग विश्वास करते हो, उस मार्ग पर चलने के योग्य होना आवश्यक है जिस पर तुम्हें चलना चाहिए। अपने साथ खेल मत खेलो — स्वयं को मूर्ख मत बनाओ! यदि तुम मार्ग के इस चरण को पूरा कर सको, तो तुम मेरे सुसमाचार के कार्य के इस पूरे जगत में फैलने के अभूतपूर्व और विशाल दृश्य को देख पाओगे, और तुम्हें मेरे घनिष्ट बनने और सारे जगत में मेरे कार्य को फ़ैलाने में अपनी भूमिका को अदा करने का सौभाग्य मिलेगा। उस समय तुम बहुत ख़ुशी से उस मार्ग में निरंतर चलते रहोगे जिसमें तुम्हे चलना चाहिए। भविष्य असीमित रूप से उज्ज्वल होगा, परंतु प्राथमिक कार्य अभी मार्ग के इस अंतिम चरण में अच्छी तरह से चलना है। तुम्हें इस कार्य को करने के लिए प्रयास करना है और तैयारी करनी है। तुम्हें यह कार्य अभी करना आवश्यक है — यह अब अत्यावश्यकता का कार्य है!

Hindi Christian Movie | वे कौन हैं जो वापस आए हैं | Lord Jesus Christ Has Come Back (Hindi Dubbed)

**Hindi Christian Movie | वे कौन हैं जो वापस आए हैं | Lord Jesus Christ Has Come Back (Hindi Dubbed)

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Hindi Christian Movie | वे कौन हैं जो वापस आए हैं | Lord Jesus Christ Has Come Back (Hindi Dubbed)
किम योनग्रोक कोरियाई धार्मिक समुदाय का एक धर्मनिष्ठ पादरी था। सत्य की प्यास में, उसने बेसब्री से प्रभु यीशु के दूसरे आगमन की आशा लगा रखी थी। 2013 में एक दिन चोसन इल्बो नामक समाचारपत्र में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों पर उसकी नज़र पड़ी। अधिकार और सामर्थ्य से भरे इन वचनों का उस पर तत्काल प्रभाव पड़ा जो उसे अंदर तक छू गए। इस बात को सुनिश्चित करने के लिए कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही लौटकर आया प्रभु यीशु है, वह उद्धारकर्ता है जिनकी उसने इतने समय तक प्रतीक्षा की है, वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य और वचनों की खोज और जाँच करने लगा ... जैसे-जैसे एक के बाद एक उसके मन के प्रत्येक संदेह का समाधान होता गया, किम योनग्रोक इतना भावविभोर हो गया कि वह स्वयं साष्टांग प्रणाम करने लगा: सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंत के दिनों में प्रभु यीशु का दूसरा आगमन है। वह चुपचाप हमारे बीच आ चुका है और काफी समय से, परमेश्वर के घर से आरंभ होने वाला न्याय का कार्य कर रहा है!

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सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्यों को बचाने का कार्य भी है

सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्यों को बचाने का कार्य भी है

**सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्यों को बचाने का कार्य भी है

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सभी लोगों को पृथ्वी पर मेरे कार्य के उद्देश्य को समझने की आवश्यकता है, अर्थात्, मेरे कार्य का अंतिम उद्देश्य और इससे पहले कि इसे पूरा किया जा सके कौन सा स्तर मुझे इस कार्य में अवश्य प्राप्त कर लेना चाहिए। यदि, आज के दिन तक मेरे साथ चलते रहे लोग यह नहीं समझते हैं कि मेरा समस्त कार्य किस बारे में है, तो क्या वे मेरे साथ व्यर्थ में नहीं चल रहे हैं? जो लोग मेरा अनुसरण करते हैं उन्हें मेरी इच्छा जाननी चाहिए। मैं हज़ारों सालों से पृथ्वी पर कार्य करता आ रहा हूँ, और आज के दिन तक अभी भी मैं अपना कार्य इसी तरह से कर रहा हूँ। यद्यपि मेरे कार्य में असाधारण रूप से अनगिनत चीजें शामिल हैं फिर भी इस कार्य का उद्देश्य अपरिवर्तित बना रहता है, ठीक जैसे कि, उदाहरण के लिए, भले ही मैं मनुष्य के प्रति न्याय और ताड़ना से भरा हुआ हूँ, फिर भी जो मैं करता हूँ वह अभी भी उसे बचाने के वास्ते है, अपने सुसमाचार को बेहतर ढंग से फैलाने के वास्ते है और एक बार मुनष्य को पूर्ण बना दिए जाने पर अन्यजाति देशों के बीच अपने कार्य को आगे विस्तारित करने के लिए है। इसलिए आज, एक ऐसे समय में जब कई लोग लंबे समय से अपनी आशा में अत्यधिक निराश हो चुके हैं, मैं अभी भी निरन्तर अपना कार्य कर रहा हूँ, और निरन्तर उस कार्य को कर रहा हूँ जो मनुष्य को न्याय और ताड़ना देने के लिए मुझे अवश्य करना चाहिए। इस तथ्य के बावजूद कि जो कुछ मैं कहता हूँ मनुष्य उस से उकता गया है और इस तथ्य की परवाह किए बिना कि उसे मेरे कार्य के साथ स्वयं को चिंतित करने की कोई इच्छा नहीं है, मैं तब भी अपना कर्तव्य कर रहा हूँ क्योंकि मेरे कार्य का उद्देश्य अपरिवर्तित रहता है और मेरी मूल योजना तोड़ी नहीं जाएगी। मेरे न्याय का प्रकार्य मनुष्य को मेरी आज्ञाओं का बेहतर ढंग से पालन करने में सक्षम बनाना है, और मेरी ताड़ना का प्रकार्य मनुष्य को एक अधिक प्रभावी ढंग से बदलना है। यद्यपि जो मैं करता हूँ वह मेरे प्रबन्धन के वास्ते है, किन्तु मैंने कभी भी कुछ ऐसा नहीं किया है जो मनुष्य के लाभ के बिना हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि मैं इस्राएल से बाहर के सभी देशों को ठीक इस्राएलियों के समान ही आज्ञाकारी बनाना चाहता हूँ और उन्हें एक वास्तविक मनुष्य बनाना चाहता हूँ, ताकि इस्राएल के बाहर की भूमियों पर मेरे लिए पैर रखने की जगह हो। यह मेरा प्रबन्धन है; यही वह कार्य है जिसे मैं अन्यजाति देशों पर निष्पादित कर रहा हूँ। अभी भी, बहुत से लोग मेरे प्रबन्धन को नहीं समझते हैं क्योंकि उन्हें इन चीज़ों में कोई रुचि नहीं है, बल्कि केवल अपने स्वयं के भविष्य और मंज़िलों के बारे में परवाह करते हैं। इस बात की परवाह किए बिना कि मैं क्या कहता हूँ, लोग उस कार्य के प्रति उदासीन हैं जो मैं करता हूँ, इसके बजाय वे अनन्य रूप से अपनी भविष्य की मंज़िलों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। चीज़ें इसी तरह से चलती रहें, तो मेरा कार्य कैसे फैलाया जा सकता है? मेरा सुसमाचार सारे संसार तक कैसे फैलाया जा सकता है? तुम लोगों को जान लेना चाहिए कि जब मेरा कार्य फैलाया जाता है, तो मैं तुम्हें तितर-बितर करूँगा, और तुम लोगों को उसी तरह मारूँगा ठीक जैसे यहोवा ने इस्राएल के प्रत्येक कबीले को मारा था। यह सब कुछ मेरे सुसमाचार को समस्त पृथ्वी पर फैलाने, और मेरे कार्य को अन्यजाति देशों तक फैलाने के लिए किया जाएगा, ताकि वयस्कों और बच्चों के द्वारा एक समान रूप से मेरे नाम को बढ़ाया जा सके और मेरा पवित्र नाम सभी कबीलों और देशों के लोगों के मुँह में बुलंद हो सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस अंतिम युग में, मेरा नाम को अन्यजातियों के बीच गौरवान्वित किया जायेगा, मेरे कर्मों को अन्यजाति देश देखेंगे और वे मुझे मेरे कर्मों के कारण सर्वशक्तिमान कहेंगे, और मेरे वचन शीघ्र ही घटित हो सकते हैं। मैं सभी लोगों को ज्ञात करवाऊँगा कि मैं केवल इस्राएलियों का ही परमेश्वर नहीं हूँ, बल्कि अन्यजातियों का भी हूँ, यहाँ तक कि उनका भी हूँ जिन्हें मैंने शाप दिया है। मैं सभी लोगों को यह देखने दूँगा कि मैं समस्त सृष्टि का परमेश्वर हूँ। यह मेरा सबसे बड़ा कार्य है, अंत के दिनों के लिए मेरी कार्य योजना का उद्देश्य है, और अंत के दिनों में पूरा किया जाने वाला एकमात्र कार्य है।

वह कार्य जिसका मैं हज़ारों सालों से प्रबंधन करता आ रहा हूँ वह केवल अंत के दिनों में ही मनुष्य के सामने पूर्णतः प्रकट होता है। केवल अब है कि मैंने अपने प्रबन्धन के पूरे रहस्य को मनुष्य के लिए खोला है। मनुष्य मेरे कार्य के उद्देश्य को जानता है और इसके अतिरिक्त उसने मेरे सभी रहस्यों की समझ प्राप्त कर ली है। और मैंने मनुष्य को उस मंज़िल के बारे में सब कुछ बता दिया है जिसके बारे में वह चिंतित है। मैंने पहले से ही मनुष्य के लिए अपने सारे रहस्यों को अनावृत कर दिया है जो लगभग 5,900 सालों से अधिक समय से गुप्त थे। यहोवा कौन है? मसीहा कौन है? यीशु कौन है? तुम लोगों को यह सब ज्ञात होना चाहिए। मेरा कार्य इन्हीं नामों पर निर्भर करता है। क्या तुम लोग इसे समझ गए हो? मेरे पवित्र नाम की घोषणा कैसे की जानी चाहिए? किसी ऐसे देश में मेरे नाम को कैसे फैलाया जाना चाहिए जिसने मुझे मेरे किसी भी नाम को पुकारा हो? मेरा कार्य पहले से ही फैलने की प्रक्रिया में है, और मैं उसकी परिपूर्णता को किसी भी और सभी देशों में फैलाऊँगा। चूँकि मेरा कार्य तुम लोगों में किया गया है, इसलिए मैं तुम लोगों को वैसे ही मारूँगा ठीक जैसे यहोवा ने इस्राएल में दाऊद के घर के चरवाहों को मारा था, और हर देश में तुम्हारे फैलने का कारण बनूँगा। क्योंकि अंत के दिनों में, मैं सभी देशों को टुकड़ों-टुकड़ों में कुचल दूँगा और उनके लोगों के नए सिरे से विभाजित होने का कारण बनूँगा। जब मैं पुनः वापस आऊँगा, तो सारे देश पहले से ही मेरी जलती हुई आग की लपटों द्वारा निर्धारित सीमाओं में विभाजित हो चुके होंगे। उस समय, मैं अपने आप को नए सिरे से मानवजाति के सामने झुलसाने वाले सूरज के समान व्यक्त करूँगा, और पवित्र व्यक्ति की छवि में अपने आपको स्पष्ट रूप से उन्हें दिखाऊँगा जिसे उन्होंने कभी नहीं देखा है, और असंख्य देशों के बीच चलूँगा, ठीक जैसे मैं, यहोवा, कभी यहूदी कबीलों के बीच चला था। तब से, मैं पृथ्वी पर उनके जीवन में मानवजाति की अगुवाई करूँगा। वे वहाँ मेरी महिमा को निश्चित रूप से देखेंगे, और उनके जीवन में उनकी अगुवाई के लिए हवा में बादल के एक खम्भे को भी वे निश्चित रूप से देखेंगे, क्योंकि मैं अपना प्रकटन पवित्र स्थानों में करता हूँ। मनुष्य मेरी धार्मिकता के दिन और मेरी महिमामय अभिव्यक्ति को भी देखेगा। वैसा तब होगा जब मैं सारी पृथ्वी पर शासन करूँगा और अपने कई पुत्रों को महिमा में लाऊँगा। पृथ्वी में हर कहीं, मनुष्य नीचे झुकेगा, और मानवजाति के बीच मेरा तम्बू उस कार्य की चट्टान पर दृढ़ता से खड़ा होगा जिसे मैं आज कर रहा हूँ। मनुष्य मन्दिर में भी मेरी सेवा करेंगे। गन्दी और घृणास्पद चीज़ों से ढकी हुई वेदी को मैं टुकड़ों में चूर-चूर कर दूँगा और नए सिरे से बनाऊँगा। पवित्र वेदी पर नवजात मेम्नों और बछड़ों का चट्टा लग जाएगा। मैं आज के मन्दिर को तबाह कर दूँगा और एक नया मन्दिर बनाऊँगा। वह मन्दिर जो अब खड़ा है, जो घृणास्पद लोगों से भरा हुआ है, ढह जाएगा और वह मन्दिर जो मैं बनाऊँगा वह मेरे प्रति वफादार सेवकों से भरा होगा। वे मेरे मन्दिर की महिमा के वास्ते एक बार फिर से खड़े होंगे और मेरी सेवा करेंगे। तुम लोग निश्चित रूप से उस दिन को देखोगे जब मैं बड़ी महिमा को प्राप्त करूँगा, तुम लोग निश्चित रूप से उस दिन को भी देखोगे जब मैं मन्दिर को तबाह करूँगा और एक नया मन्दिर बनाऊँगा। तुम लोग मनुष्यों के संसार में मेरे तम्बू के आने के दिन को भी देखोगे। जैसे ही मैं मन्दिर को चकनाचूर करूँगा, वैसे ही मैं अपने तम्बू को मनुष्यों के संसार में ले आऊँगा; यह वैसा ही होगा जैसा कि जब लोग मुझे उतरते हुए देखते हैं। जब मैं सभी देशों को चकनाचूर कर दूँगा, तब से अपने मन्दिर को बनाते हुए और अपनी वेदी को स्थापित करते हुए, मैं उन्हें नए सिरे से एक साथ इकट्ठा करूँगा ताकि सभी मुझे बलिदान अर्पित करें, मेरे मंदिर में मेरी सेवा करें, और अन्यजाति देशों में मेरे कार्य के प्रति स्वयं को निष्ठापूर्वक समर्पित करें। वे एक याजक के लबादे और एक मुकुट के साथ, मुझ यहोवा की महिमा के बीच, और मेरा प्रताप उनके ऊपर मँडराते हुए और उनके साथ बने रहते हुए, आज के दिन के इस्राएलियों के जैसे होंगे। अन्यजाति देशों में भी मेरा कार्य उसी तरह से पूरा किया जाएगा। जैसा मेरा कार्य इस्राएल में है, वैसा ही मेरा कार्य अन्यजाति देशों में भी होगा क्योंकि मैं इस्राएल में अपने कार्य का विस्तार करूँगा और इसे अन्यजातियों के देशों में फैलाऊँगा।

अब वह समय है जब मेरा आत्मा बड़ी चीजें कर रहा है, और वह समय है जब मैं अन्यजाति देशों के बीच कार्य आरंभ कर रहा हूँ। इससे भी अधिक, यह वह समय है जब मैं सभी सृजित प्राणियों को वर्गीकृत कर रहा हूँ और प्रत्येक को उसकी संबंधित श्रेणी में रख रहा हूँ, ताकि मेरा कार्य अधिक स्फूर्ति से और प्रभावशाली ढंग से आगे बढ़ सके। और इसलिए, जो मैं तुम लोगों से माँग करता हूँ वह अभी भी है कि तुम लोग मेरे सम्पूर्ण कार्य के लिए अपने पूरे अस्तित्व को अर्पित करो; और, इसके अतिरिक्त, कि तुम्हें उस सम्पूर्ण कार्य को स्पष्ट रूप से जान लेना चाहिए और उसके प्रति निश्चित हो जाना चाहिए जो मैंने तुम लोगों में किया है, और मेरे कार्य में अपनी पूरी ताक़त लगा देनी चाहिए ताकि यह और अधिक प्रभावी हो सके। इसे ही तुम लोगों को अवश्य समझ लेना चाहिए। बहुत पीछे तक ढूँढते हुए, या दैहिक सुख की खोज करते हुए, स्वयं से लड़ना बंद करो, जो मेरे कार्य में विलंब करवाएगा और तुम्हारे बेहतरीन भविष्य को ख़राब कर देगा। ऐसा करना, तुम लोगों को सुरक्षा देने में समर्थ होने से दूर यह केवल तुम लोगों पर बर्बादी लाएगा। क्या यह तुम लोगों की मूर्खता नहीं होगी? जिसका तुम लोग आज लालच के साथ आनन्द उठा रहे हो यही वह चीज़ है जो तुम लोगों के भविष्य को बर्बाद कर रही है, जबकि वह दर्द जिसे तुम लोग आज सह रहे हो यही वह चीज़ है जो तुम लोगों की सुरक्षा कर रहा है। तुम लोगों को इन चीज़ों के प्रति स्पष्ट रूप से जागरूक अवश्य हो जाना चाहिए ताकि उन प्रलोभनों से दूर रहा जाए और जिससे बाहर निकलने के लिए तुम्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी और उस घने कोहरे में प्रवेश करने से बचा जाए जो धूप को रोक देता है। जब घना कोहरा छँटेगा, तो तुम लोग अपने आपको महान दिन के न्याय में पाओगे। उस समय तक, मेरा दिन मनुष्य तक पहुँच चुका होगा? तुम लोग मेरे न्याय से कैसे बच निकलोगे? तुम सूर्य की झुलसा देनेवाली गर्मी को सहन करने में कैसे समर्थ होगे? जब मैं मनुष्य पर अपनी विपुलता प्रदान करता हूँ, तो वह उसे अपने आँचल में नहीं सँजोता है, बल्कि उसके बजाए उसे ऐसी जगहों में फेंक देता है जहाँ इस पर कोई ध्यान नहीं देता है। जब मेरा दिन मनुष्य पर उतरेगा, तो वह मेरी विपुलता को खोज पाने या उस सच्चाई के कड़वे वचनों का पता लगाने में अब और समर्थ नहीं होगा जो मैंने उसे बहुत पहले बोले थे। वह बिलखेगा और रोएगा, क्योंकि उसने प्रकाश की चमक को खो दिया है और अंधकार में गिर गया है। आज जो तुम लोग देखते हो वह मात्र मेरे मुँह की तीखी तलवार है। तुम लोगों ने मेरे हाथ में छड़ी या उस ज्वाला को नहीं देखा है जिससे मैं मनुष्य को जलाता हूँ, और इसीलिए तुम लोग अभी भी मेरी उपस्थिति में अभिमानी और असंयमी हो। इसीलिए तुम लोग उस बात पर मानव जिह्वा के साथ विवाद करते हुए जो मैंने तुम लोगों से कही थी, अभी भी मेरे घर में मेरे साथ लड़ते हो। मनुष्य मुझसे नहीं डरता है, यद्यपि आज तक मेरे साथ शत्रुता जारी रख रहा है, उसे तब भी बिल्कुल भी कोई भय नहीं है। तुम लोगों के मुँह में अधर्मी जिह्वा और दाँत हैं। तुम लोगों के वचन और कार्य उस साँप के समान हैं जिसने हव्वा को पाप करने के लिए प्रलोभित किया था। तुम लोग एक दूसरे से आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत की माँग करते हो, और तुम लोग अपने लिए पद, प्रतिष्ठा और लाभ को झपटने के लिए मेरी उपस्थिति में संघर्ष करते हो, फिर भी तुम लोग नहीं जानते हो कि मैं गुप्त रूप से तुम लोगों के वचनों एवं कर्मों को देख रहा हूँ। यहाँ तक कि इस से पहले कि तुम लोग मेरी उपस्थिति में भी आओ, मैंने तुम लोगों के हृदयों की ठीक तली की ही थाह ले ली है। मनुष्य हमेशा मेरे हाथ की पकड़ से बच निकलना और मेरी आँखों के निरीक्षण से बचना चाहता है, किन्तु मैं कभी भी उसके वचनों या कर्मों से कतराया नहीं हूँ। इसके बजाए, मैं उद्देश्यपूर्ण ढंग से उन वचनों और कर्मों को अपनी नज़रों में प्रवेश करने की अनुमति देता हूँ ताकि मैं उनकी अधार्मिकता को ताड़ना दे सकूँ, और उसके विद्रोह पर न्याय निष्पादित कर सकूँ। इस प्रकार, मनुष्य के गोपनीय वचन और कर्म हमेशा मेरे न्याय के आसन के सामने रहते हैं, और मेरे न्याय ने मनुष्य को कभी नहीं छोड़ा है, क्योंकि उसका विद्रोह बहुत ज़्यादा है। मेरा कार्य मनुष्य के उन सभी वचनों और कर्मों को जला कर शुद्ध करना है जो मेरी आत्मा की उपस्थिति में कहे और किए गए थे। इस तरह से, जब मैं पृथ्वी से चला जाऊँगा, तो मनुष्य तब भी मेरे प्रति वफादारी को बनाए रखने में समर्थ होगा, और पृथ्वी पर मेरे कार्य को उस दिन तक निरन्तर होने देते हुए जब तक कि वह पूरा न हो जाए, तब भी मेरी सेवा उसी तरह से करेगा जैसे मेरे पवित्र सेवक मेरे कार्य में करते हैं।

New Hindi Christian Movie | "जागृति" | God Awakens My Soul (Hindi Dubbed)

**New Hindi Christian Movie | "जागृति" | God Awakens My Soul (Hindi Dubbed)

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लू शाउएन चीन की एक गृह कलीसिया में प्रचारिका थीं। धार्मिक पादरियों और एल्डर्स द्वारा फैलायी गयी गलत धारणाओं में विश्वास करके वे इस बात पर जोर देती रहीं कि "प्रभु यीशु ने पहले ही मनुष्य के पापों को माफ़ कर दिया है, और जो लोग प्रभु में विश्वास करते हैं, वे हमेशा बचा लिये जाएंगे। उन्हें परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार करने की ज़रूरत नहीं है।" उन्होंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के राज्य के सुसमाचार को बार-बार ठुकराया और उसका विरोध किया.....मगर, एक अप्रत्याशित घटना ने उन्हें यह मालूम करने का मौका दिया कि उनके पादरी, लोगों के सामने एक ख़ास तरह से बर्ताव करते थे, और उनकी पीठ पीछे अपना असली चेहरा दिखाते थे, और वे देख पा रही थीं कि उनके पादरी कितने पाखंडी थे। यही समय था जब सर्वशक्तिमान परमेश्वर का राज्य का सुसमाचार उन तक पहुंचा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के गवाह उनके साथ बड़े सब्र से परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य के बारे में संगति करते और उसकी गवाही देते, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को सुनने के बाद, वे बचाये जाने और पूर्ण उद्धार पाने के बीच के फर्क की सच्चाई को समझ पायीं, और यह जान पायीं कि पहले वे जिन धारणाओं को पकड़े हुए थीं, वे सिर्फ मनुष्य की कल्पना की उड़ान थीं और परमेश्वर के कार्य की वास्तविकता के मुताबिक़ नहीं थीं। मगर, जब उनके पादरी को इस बारे में पता चला, तो उन्होंने विश्वासियों को उनकी निंदा करने और उन्हें त्याग देने को उकसाया, और लू शाउएन पर दबाव डालने के लिए उनके परिवार तक को खींच लिया....लू शाउएन दर्द में डूब गयीं और बेसहारा महसूस करने लगीं। अंत में, वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों से सत्य को समझ पायीं, और वे यह देख पायीं कि धार्मिक दुनिया के उनके पादरी पाखंडी थे, परमेश्वर के दुश्मन थे, जो सत्य से नफ़रत करते थे और उनका स्वभाव एक मसीह-विरोधी हैवान का था। लू शाउएन पूरी तरह जागरूक हो चुकी थीं, और उन्होंने अपने पादरी के धोखे और नियंत्रण को ठुकरा दिया था। उन्होंने सत्य की खोज करने और पूर्ण उद्धार प्राप्त करने का मार्ग अपना कर सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण किया ....

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देह की चिन्ता करने वालों में से कोई भी कोप के दिन से नहीं बच सकता है

देह की चिन्ता करने वालों में से कोई भी कोप के दिन से नहीं बच सकता है

**देह की चिन्ता करने वालों में से कोई भी कोप के दिन से नहीं बच सकता है

**आज, मैं तुम लोगों की उत्तरजीविता के वास्ते इस प्रकार से धिक्कारता हूँ, ताकि मेरा कार्य सुचारू रूप से प्रगति करे, और ताकि सम्पूर्ण जगत में मेरा आरंभिक कार्य, मेरे वचनों, अधिकार, प्रताप और मेरे न्याय को सभी देशों और राष्ट्रों के लोगों के लिए प्रकट करते हुए, और भी अधिक उचित ढंग से और उत्तम तरह से किया जा सके। जो कार्य मैं तुम लोगों के बीच करता हूँ वह सम्पूर्ण जगत में मेरे कार्य का आरम्भ है। यद्यपि अभी अंत के दिन चल रहे हैं, फिर भी ज्ञात रहे कि "अंत के दिन" केवल एक नए युग का नाम हैः ठीक व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के समान, यह एक युग का संकेत है, और यह, अंतिम कुछ वर्षों या महीनों के बजाय, एक सम्पूर्ण युग को इंगित करता है। फिर भी अंत के दिन अनुग्रह के युग और व्यवस्था के युग से काफ़ी अलग हैं। अंत के दिनों का कार्य इस्राएल में नहीं, बल्कि अन्यजातियों के बीच किया जाता है; यह मेरे सिंहासन के सामने इस्राएल के बाहर के सभी राष्ट्रों और कबीलों के लोगों पर विजय है, ताकि सम्पूर्ण जगत की मेरी महिमा ब्रह्माण्ड को भर सके। यह इसलिए है ताकि मैं और भी अधिक महिमा प्राप्त कर सकूँ, ताकि पृथ्वी के सभी प्राणी मेरी महिमा को हर राष्ट्र को, निरंतर पीढ़ी दर पीढ़ी सौंप सकें, और स्वर्ग एवं पृथ्वी के सभी प्राणी मेरी उस समस्त महिमा को देख सकें जो मैंने पृथ्वी पर अर्जित की है। अंत के दिनों के दौरान किया गया कार्य विजय का कार्य है। यह पृथ्वी पर सभी लोगों के जीवन का मार्गदर्शन नहीं, बल्कि पृथ्वी पर मानवजाति के सहस्रों-वर्षों लंबे अविनाशी दुःखों का अंत है। परिणामस्वरूप, अंत के दिनों का कार्य इस्राएल में किए गए हज़ार वर्षों के कार्य के जैसा नहीं हो सकता है, न ही यहूदिया में महज़ दस सालों के कार्य के जैसा हो सकता है जो बाद में परमेश्वर के दूसरे देहधारण तक कई हज़ार सालों तक जारी रहा। अंतिम दिनों के लोग केवल देह में आये मुक्तिदाता के पुनः प्रकटन से मिलते हैं, और वे परमेश्वर के व्यक्तिगत कार्य और वचन को प्राप्त करते हैं। अंत के दिनों की समाप्ति में दो हज़ार वर्ष नहीं लगेंगे; वे संक्षिप्त हैं, उस समय के जैसे जब यीशु मसीह ने यहूदिया में अनुग्रह के युग का कार्य किया। ऐसा इसलिए है क्योंकि अंतिम दिन सम्पूर्ण युग का उपसंहार हैं। ये परमेश्वर की छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना की पूर्णता और समाप्ति हैं, और ये मनुष्य के दुःखों की जीवन यात्रा का समापन करते हैं। ये समस्त मानवजाति को एक नए युग में नहीं ले जाते हैं या मानवजाति के जीवन को जारी नहीं रहने देते हैं। यह मेरी प्रबंधन योजना या मनुष्य के अस्तित्व के लिए कोई महत्व नहीं रखेगा। यदि मानवजाति इसी प्रकार चलती रही, तो देर-सवेर उसे शैतान द्वारा पूरी तरह से निगल लिया जाएगा, और वे आत्माएँ जो मुझ से सम्बन्ध रखती हैं अंततः पूरी तरह से उसके हाथों द्वारा जब्त कर ली जाएँगी। मेरा कार्य केवल छह हजार वर्ष तक रहेगा, और मैंने वचन दिया है कि समस्त मानवजाति पर शैतान का नियंत्रण भी छह हजार वर्षों से अधिक तक नहीं रहेगा। और इसलिए, समय पूरा हुआ। मैं अब और न तो जारी रखूँगा और न ही विलंब करूँगा: अंत के दिनों के दौरान मैं शैतान को परास्त कर दूँगा, मैं अपनी सम्पूर्ण महिमा वापस ले लूँगा, और मैं पृथ्वी पर उन सभी आत्माओं को वापस ले लूँगा जो मुझसे संबंधित हैं ताकि ये व्यथित आत्माएँ दुःख के सागर से बच कर बाहर आ जाएँ, और इस प्रकार पृथ्वी पर मेरे समस्त कार्य का समापन होगा। इस दिन के बाद, मैं पृथ्वी पर फिर कभी भी देहधारी नहीं बनूँगा, और पूर्ण-नियंत्रण करने वाला मेरा आत्मा फिर कभी भी पृथ्वी पर काम नहीं करेगा। मैं पृथ्वी पर केवल एक कार्य करूँगाः मैं मानवजाति को "पुनः बनाऊँगा", ऐसी मानवजाति जो पवित्र हो, और जो पृथ्वी पर मेरा विश्वसनीय शहर हो। परन्तु जान लो कि मैं सम्पूर्ण संसार को जड़ से नहीं मिटाऊँगा, न ही मैं समस्त मानवजाति को जड़ से मिटाऊँगा। मैं उस शेष तृतीयांश को रखूँगा—वह तृतीयांश जो मुझसे प्रेम करता है और मेरे द्वारा पूरी तरह से जीत लिया गया है, और उन्हें अत्यधिक भेड़ों, पशुओं पृथ्वी की समस्त संपदा से पोषित करते हुए, मैं इस तृतीयांश को उपजाऊ बनाऊँगा और पृथ्वी पर कई गुना बढ़ाऊँगा ठीक वैसे ही जैसे इस्राएलियों ने व्यवस्था के अधीन किया था। यह मानवजाति हमेशा मेरे साथ रहेगी, मगर यह आज की बुरी तरह से गंदी मानवजाति की तरह नहीं होगी, बल्कि ऐसी मानवजाति होगी जो उन सभी लोगों का जनसमूह होगी जो मेरे द्वारा प्राप्त कर लिए गए हैं। इस प्रकार की मानवजाति को शैतान के द्वारा नष्ट, व्याकुल नहीं किया जाएगा या घेरा नहीं जायेगा, और ऐसी एकमात्र मानवजाति होगी जो मेरे द्वारा शैतान पर विजय प्राप्त करने के बाद पृथ्वी पर विद्यमान रहेगी। यही वह मानवजाति है जो आज मेरे द्वारा जीत ली गई है और जिसने मेरी प्रतिज्ञा प्राप्त कर ली है। और इसलिए, अंत के दिनों के दौरान मेरे द्वारा जीती गई मानवजाति वह मानवजाति भी होगी, जिसे छोड़ दिया जाएगा और जो मेरे अनन्त आशीष प्राप्त करेगी। शैतान पर मेरी विजय की यही एकमात्र गवाही होगी, और शैतान के साथ मेरे युद्ध का एकमात्र विजयोपहार होगा। युद्ध के ये विजयोपहार मेरे द्वारा शैतान के अधिकार क्षेत्र से बचाया गए हैं और ये ही मेरी छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना के ठोस-रूप और परिणाम हैं। ये विश्वभर के हर राष्ट्र और संप्रदाय, और हर स्थान और देश से आते हैं। ये भिन्न-भिन्न जातियों के हैं, भिन्न-भिन्न भाषाओं, रीति-रिवाज़ों और त्वचा के रंगों वाले हैं, और ये विश्व के हर देश और संप्रदाय में और यहाँ तक कि संसार के हर कोने में भी फैले हुए हैं। अंततः, वे पूर्ण मानवजाति, मनुष्यों का ऐसा जनसमूह जो शैतान की ताकतों द्वारा अगम्य है, की रचना करने के लिए एक साथ आएँगे। मानवजाति के बीच जिन लोगों को मेरे द्वारा बचाया और जीता नहीं गया है वे ख़ामोशी से समुद्र की गहराईयों में डूब जाएँगे, और मेरी भस्म करने वाली लपटों द्वारा हमेशा के लिए जला दिए जाएँगे। मैं इस पुरानी, अत्यधिक गंदी मानवजाति को जड़ से उसी तरह मिटाऊँगा जैसे मैंने मिस्र की पहली संतानों और मवेशियों को जड़ से मिटाया, केवल इस्राएलियों को छोड़ते हुए, जिन्होंने मेमने का मांस खाया, मेमने का लहू पीया, और अपने दरवाजे की चौखट को मेमने के लहू से चिह्नित किया। क्या जो लोग मेरे द्वारा जीत लिए गए हैं और मेरे परिवार के हैं वे भी ऐसे लोग नहीं हैं जो मुझ मेमने के मांस को खाते हैं और मुझ मेमने के लहू को पीते हैं, और मेरे द्वारा छुटकारा दिलाये गये हैं और मेरी आराधना करते हैं? क्या ऐसे लोगों के साथ हमेशा मेरी महिमा नहीं बनी रहती है? क्या वे लोग जो मुझ मेमने के देह के बिना हैं पहले से ही चुपचाप सागर की गहराईयों में नहीं डूब गए हैं? आज तुम मेरा विरोध करते हो, और आज मेरे वचन ठीक इस्राएल के पुत्रों और पौत्रों को यहोवा द्वारा कहे गए वचन के अनुसार ही हैं। फिर भी तुम लोगों के हृदय की गहराईयों में उपस्थित कठोरता मेरे कोप के संचय का कारण बन रही है, तुम लोगों की देह पर और भी अधिक दुःख, तुम लोगों के पापों पर और अधिक न्याय, और तुम लोगों की अधार्मिकता पर और भी अधिक क्रोध ला रही है। जब आज तुम लोग मुझसे इस प्रकार का व्यवहार करते हो, तो किसे मेरे कोप के दिन पर छोड़ा जा सकता है? किसकी अधार्मिकता ताड़ना की मेरी आँखों से बच कर भाग सकती है? किसके पाप मुझ, सर्वशक्तिमान के, हाथों से बच सकते हैं? किसकी अवज्ञा मुझ, सर्वशक्तिमान के, न्याय से बच सकती है? मैं, यहोवा, इस प्रकार, तुम लोगों से, अन्यजातियों के वंशजों से, बात करता हूँ, और जिन वचनों को मैं तुम लोगों से कहता हूँ वे व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के सभी कथनों से बढ़ कर हैं, फिर भी तुम लोग मिस्र के सभी लोगों से ज्यादा कठोर हो। जब मैं विश्राम में काम करता हूँ तो क्या तुम लोग मेरे कोप को संचित नहीं करते हो? कैसे तुम लोग मुझ, सर्वशक्तिमान के दिन से बिना चोट खाए बच कर निकल सकते हो?

मैंने इस प्रकार से तुम लोगों बीच कार्य किया और बातचीत की है, मैंने बहुत सारी ऊर्जा व्यय की और प्रयास किए हैं, फिर भी क्या तुम लोगों ने कभी भी उस बात को सुना है जो मैं तुम लोगों को स्पष्ट रूप से कहता हूँ? तुम लोग कहाँ मुझ सर्वशक्तिमान के सामने झुके हो? तुम लोग मुझ से इस प्रकार से व्यवहार क्यों करते हैं? क्यों जो कुछ तुम लोग कहते और करते हो वह मेरे क्रोध को भड़काता है? तुम्हारे हृदय इतने कठोर क्यों हैं? क्या मैंने कभी भी तुम्हें मार गिराया है? क्यों तुम लोग मुझे दुःखी और चिंतित करने के अलावा और कुछ नहीं करते हो? क्या तुम लोग अपने ऊपर मेरे, यहोवा के कोप के दिन के आने की प्रतीक्षा कर रहे हो? क्या तुम लोगों की अवज्ञा द्वारा भड़काए हुए मेरे क्रोध को तुम पर भेजने के लिए मेरी प्रतीक्षा कर रहे हो? क्या मैं जो कुछ भी करता हूँ वह तुम लोगों के लिए नहीं है? फिर भी तुम लोगों ने सदैव मुझ यहोवा के साथ इस प्रकार का व्यवहार किया: मेरे बलिदान को चुराना, मेरे घर की वेदी के चढ़ावों को घर ले जा कर भेड़ियों की माँद में छोटे और बड़े शावकों को खिलाना; लोग, मुझ सर्वशक्तिमान के वचनों को, मलमूत्र के समान गंदा हो जाने के लिए पाखाने में उछालते हुए एक दूसरे से लड़ाई करते हैं, गुस्से से घूरते हुए तलवारों और भालों के साथ एक दूसरे का सामना करते हैं। तुम लोगों में ईमानदारी कहाँ है? तुम लोगों की मानवता पाशविकता बन गई है! तुम लोगों के हृदय बहुत पहले पत्थरों में बदल गए हैं। क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि जब मेरे कोप का दिन आएगा तब मुझ सर्वशक्तिमान के विरुद्ध आज की गई तुम लोगों की दुष्टता का मैं न्याय करूँगा? क्या तुम लोगों को लगता है कि मुझे इस प्रकार से बेवकूफ बनाकर, मेरे वचनों को कीचड़ में फेंक कर और उन पर ध्यान न देकर—मेरी पीठ पीछे इस प्रकार के कार्य करके तुम लोग मेरी कुपित नज़रों से बच निकल सकते हो? क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि जब तुम लोगों ने मेरे बलिदानों को चुराया और मेरी सम्पत्ति के लिए लालायित हुए, तभी तुम लोग मुझ यहोवा की आँखों द्वारा पहले से ही देखे जा चुके थे? क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि जब तुम लोगों ने मेरे बलिदानों को चुराया, तो यह उस वेदी के सामने था जिस पर बलिदान चढ़ाए जाते हैं? तुमने कैसे मान लिया कि तुम इतने चालाक हो कि मुझे इस तरह से धोखा दे सकोगे? मेरा प्रचण्ड प्रकोप कैसे तुम लोगों की बुरी करतूतों से दूर रह सकता है? मेरा क्रोध कैसे तुम लोगों के घृणित पापों को नज़रंदाज़ कर सकता है? आज तुम लोग जो बुराई करते हो वह तुम लोगों के लिए कोई मार्ग नहीं खोलती है, बल्कि तुम्हारे कल के लिए ताड़ना संचित करती है; यह तुम लोगों के प्रति मुझ सर्वशक्तिमान की ताड़ना को भड़काती है। कैसे तुम लोगों की बुरी करतूतें और बुरे वचन मेरी ताड़ना से बच सकते हैं? कैसे तुम लोगों की प्रार्थनाएँ मेरे कानों तक पहुँच सकती हैं? कैसे मैं तुम लोगों की अधार्मिकता के बचने का मार्ग खोल सकता हूँ? मैं कैसे अपनी अवहेलना करने में तुम लोगों की बुरी करतूतों को जाने दे सकता हूँ? कैसे मैं तुम लोगों की ज़ुबानों को काटकर अलग नहीं कर सकता हूँ जो साँप की ज़ुबान के समान जहरीली है? तुम लोग मुझे अपनी धार्मिकता के वास्ते नहीं पुकारते हो, बल्कि इसके बजाय अपनी अधार्मिकता के परिणामस्वरूप मेरे कोप को संचित करते हो। मैं तुम लोगों को कैसे क्षमा कर सकता हूँ? मेरी, सर्वशक्तिमान की, नज़रों में, तुम लोगों के वचन और कार्य दोनों ही गंदे हैं। मेरी, सर्वशक्तिमान की नज़रें, तुम लोगों की अधार्मिकता को एक निर्मम ताड़ना के रूप में देखती हैं। कैसे मेरी धर्मी सजा और न्याय तुम लोगों से दूर जा सकती है? क्योंकि तुम लोग मेरे साथ ऐसा करते हो, मुझे दुःखी और कुपित करते हो, इसलिए मैं कैसे तुम लोगों को अपने हाथों से बच कर निकलने दे सकता हूँ और उस दिन से दूर होने दे सकता हूँ जब मैं, यहोवा तुम लोगों को ताड़ना और श्राप दूँगा? क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि तुम लोगों के सभी बुरे वचन और कथन पहले से ही मेरे कानों तक पहुँच चुके हैं? क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि तुम लोगों की अधार्मिकता ने पहले से ही मेरी धार्मिकता के पवित्र लबादे को गंदा कर दिया है? क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि तुम लोगों की अवज्ञा ने पहले से ही मेरे उग्र क्रोध को भड़का दिया है? क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि तुम लोगों ने बहुत पहले से ही मुझे अति कुपित कर रखा है और बहुत समय पहले ही मेरे धैर्य को आजमा चुके हो? क्या तुम नहीं जानते हो कि तुम लोग मेरी देह के टुकड़े करके उसे पहले ही नष्ट कर चुके हो? मैंने अब तक इतना सहा है, कि मैं तुम लोगों के प्रति अब और अधिक सहिष्णु नहीं होते हुए, अपना क्रोध प्रकट करता हूँ। क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि तुम लोगों की बुरी करतूतें पहले ही मेरी आँखों के सामने आ गई हैं, कि मेरी पुकारें मेरे पिता के कानों तक पहले ही पहुँच चुकी हैं? वह कैसे तुम लोगों को मेरे साथ इस प्रकार का व्यवहार करने दे सकता है? क्या मैं तुम लोगों में जो भी कार्य करता हूँ वह तुम लोगों के वास्ते नहीं है? फिर भी तुम लोगों में से कौन मेरे, यहोवा के, कार्य को अधिक प्रेम करने लगा है? क्या मैं कमज़ोर होने, और जो पीड़ा मैंने सही है उसकी वजह से, अपने पिता की इच्छा के प्रति विश्वासघाती हो सकता हूँ? क्या तुम लोग मेरे हृदय को नहीं समझते हो? मैं तुम लोगों से उसी तरह बोलता हूँ जैसे यहोवा बोलता था; क्या मैंने तुम लोगों के लिए काफी कुछ नहीं त्यागा है? भले ही मैं अपने पिता के कार्य के वास्ते इन सभी कष्टों को सहने को तैयार हूँ, फिर भी तुम लोग उस ताड़ना से कैसे मुक्त हो सकते हो जिसे मैं अपने कष्टों के परिणामस्वरूप तुम पर लाऊँगा? क्या तुम लोगों ने मेरा बहुत आनंद नहीं ले लिया है? आज, मैं अपने परमपिता द्वारा तुम को प्रदान किया गया हूँ; क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि तुम लोग मेरे उदार वचनों की अपेक्षा कहीं अधिक का आनंद लेते हो? क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि मेरा जीवन तुम लोगों के जीवन और जिन चीजों का तुम आनन्द लेते हो उनके बदले है? क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि मेरे परमपिता ने शैतान के साथ युद्ध करने के लिए मेरे जीवन का उपयोग किया है, कि उसने मेरा जीवन तुम लोगों को प्रदान किया है, जिसने तुम लोगों को सौ गुना प्राप्त करवाया, और तुम लोगों को कितने ही प्रलोभनों से बचने दिया? क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि यह केवल मेरे कार्य के माध्यम से ही है कि तुम लोगों को कई प्रलोभनों से और कई उग्र ताड़नाओं से छूट दी गई है? क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि यह केवल मेरे ही कारण है कि मेरे परमपिता ने तुम लोगों को अभी तक आनन्द लेने दिया है? आज तुम लोगों के हृदय कैसे इतने कठोर हो सकते हैं, मानो कि वे उन पर कड़ी चमड़ी उग आई हो? कैसे वह दुष्टता जो तुम आज करते हो उस कोप के दिन से बच सकती है जो पृथ्वी से मेरे जाने के बाद आएगा? कैसे मैं उन हृदय से अत्यंत कठोर लोगों को यहोवा के क्रोध से बचने दे सकता हूँ?

अतीत के बारे में सोचो: कब तुम लोगों के प्रति मेरी दृष्टि क्रोधित, और मेरी आवाज़ कठोर हुई है? मैंने कब तुम लोगों में बेवजह गलतियाँ निकालीं हैं? मैंने कब तुम लोगों को अनुचित रूप से प्रताड़ित किया है? मैंने कब तुम लोगों को तुम्हारे मुँह पर डाँटा है? क्या यह मेरे कार्य के वास्ते नहीं है कि मैं तुम लोगों को हर प्रलोभन से बचाने के लिए अपने परमपिता को पुकारता हूँ? तुम लोग मेरे साथ इस प्रकार का व्यवहार क्यों करते हो? क्या मैंने कभी भी अपने अधिकार का उपयोग तुम लोगों की देह को मार गिराने के लिए किया है? तुम लोग मुझे इस प्रकार का प्रतिफल क्यों दे रहे हो? मेरे प्रति कभी हाँ और कभी ना करने के बाद, तुम लोग न हाँ में हो और न ही ना में, तुम लोग मेरे प्रति धोखेबाज़ हो, मुझसे बातों को छिपाते हो, और तुम लोगों के मुँह अधार्मिकता की थूक से भरे हुए हैं? क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम लोगों की ज़ुबानें मेरे आत्मा को धोखा दे सकती हैं? क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम लोगों की ज़ुबानें मेरे कोप से बच सकती हैं? क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम लोगों की ज़ुबानें मुझ यहोवा के कार्यों की, जिस तरह से भी वे चाहें, आलोचना कर सकती हैं? क्या मैं ऐसा परमेश्वर हूँ जिसके बारे में मनुष्य आलोचना कर सकता है? क्या मैं छोटे से भुनगे को इस प्रकार से अपनी ईशनिंदा करने दे सकता हूँ? मैं कैसे ऐसे अवज्ञा के पुत्रों को अपने अनन्त आशीषों के बीच रख सकता हूँ? तुम लोगों के वचनों और कार्यों ने तुम लोगों को काफी समय तक उजागर और निन्दित किया है। जब मैंने स्वर्ग को फैलाया और सभी चीजों का सृजन किया, तो मैंने किसी भी प्राणी को उसके अनुसार भाग लेने की अनुमति नहीं दी, किसी भी चीज को, जैसा वह चाहे वैसे, मेरे कार्य और मेरे प्रबंधन में गड़बड़ करने की अनुमति तो बिल्कुल नहीं दी। मैंने किसी भी मनुष्य या वस्तु को सहन नहीं किया; मैं कैसे उन लोगों को छोड़ सकता हूँ जो मेरे प्रति निर्दयी और क्रूर और अमानवीय हैं? मैं कैसे उन लोगों को क्षमा कर सकता हूँ जो मेरे वचनों के विरोध में विद्रोह करते हैं? मैं कैसे उन्हें छोड़ सकता हूँ जो मेरी अवज्ञा करते हैं? क्या मनुष्य की नियति मुझ सर्वशक्तिामन के हाथों में नहीं है? मैं कैसे तुम्हारी अधार्मिकता और अवज्ञा को पवित्र मान सकता हूँ? तुम्हारे पाप मेरी पवित्रता को कैसे दूषित कर सकते हैं? मैं अधर्मी की अशुद्धता से दूषित नहीं होता हूँ, न ही मैं अधर्मियों के चढ़ावों का आनन्द लेता हूँ। यदि तुम मुझ यहोवा के प्रति वफादार होते, तो क्या तुम मेरी वेदी से बलिदानों को अपने लिए ले सकते थे? क्या तुम मेरे पवित्र नाम की ईशनिंदा करने के लिए अपनी विषैली ज़ुबान का उपयोग कर सकते थे? क्या तुम इस प्रकार से मेरे वचनों के विरुद्ध विद्रोह कर सकते थे? क्या तुम मेरी महिमा और पवित्र नाम को, एक दुष्ट, शैतान की सेवा करने के लिए एक उपकरण के रूप में उपयोग कर सकते थे? मेरा जीवन पवित्र लोगों के आनन्द के लिए प्रदान किया जाता है। मैं अपने जीवन के साथ कैसे तुम्हें, तुम्हारी इच्छानुसार, खेलने और खुद के बीच संघर्ष के एक उपकरण के रूप में उपयोग करने की अनुमति दे सकता हूँ? तुम लोग मेरे प्रति जैसे हो उसमें, अच्छाई के मार्ग में इतने निर्दयी और इतने अभावग्रस्त कैसे हो सकते हो? क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि मैंने पहले ही तुम लोगों की बुरी करतूतों को जीवन के इन वचनों में लिख दिया है? जब मैं मिस्र को दण्ड देता हूँ तब तुम लोग कोप के दिन से कैसे बच कर निकल सकते हो? कैसे तुम लोगों को इस तरह बार-बार अपना विरोध और अनादर करने की अनुमति दे सकता हूँ? मैं तुम लोगों को स्पष्ट रूप से कहता हूँ, कि जब वह दिन आएगा, तो तुम लोगों की ताड़ना मिस्र की ताड़ना की अपेक्षा अधिक असहनीय होगी! तुम लोग कैसे मेरे कोप के दिन से बच कर निकल सकते हो? मैं तुम लोगों को सत्य कहता हूँ: मेरी सहनशीलता तुम लोगों की बुरी करतूतों के लिए तैयार की गयी थी, और उस दिन तुम लोगों की ताड़ना के लिए विद्यमान है। एक बार जब मैं अपनी सहनशीलता के अंत में पहुँच गया तो क्या तुम लोग वह नहीं होगे जो कुपित न्याय को भुगतोगे? क्या सभी बातें मुझ सर्वशक्तिमान के हाथों में नहीं हैं? मैं कैसे इस प्रकार से स्वर्ग के नीचे तुम लोगों को अपनी अवज्ञा की अनुमति दे सकता हूँ? तुम लोगों का जीवन अत्यंत कठोर होगा क्योंकि तुम मसीहा से मिल चुके हो, जिसके बारे में कहा गया कि वह आएगा, फिर भी जो कभी नहीं आया। क्या तुम लोग उसके शत्रु नहीं हो? यीशु तुम लोगों का मित्र रहा है, फिर भी तुम लोग मसीहा के शत्रु हो। क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि यद्यपि तुम लोग यीशु के मित्र हो, किन्तु तुम लोगों की बुरी करतूतों ने उन लोगों के पात्रों को भर दिया है जो घृणित हैं? यद्यपि तुम लोग यहोवा के बहुत करीबी हो, किन्तु क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि तुम लोगों के बुरे वचन यहोवा के कानों तक पहुँच गए हैं और उन्होंने उसके क्रोध को भड़का दिया है? वह तुम्हारा करीबी कैसे हो सकता है, और वह कैसे तुम्हारे उन पात्रों को नहीं जला सकता है, जो बुरी करतूतों से भरे हुए हैं? कैसे वह तुम्हारा शत्रु नहीं हो सकता है?
स्रोत राज्य के अवरोहण का सुसमाचा: देह की चिन्ता करने वालों में से कोई भी कोप के दिन से नहीं बच सकता है

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परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है

परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है

**परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है

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बहुत सारी ऐसी चीज़ें हैं जिनके विषय में मैं आशा करता हूँ कि आप उसे प्राप्त करेंगे। फिर भी, आपकी गतिविधियाँ और आपका जीवन मेरी माँगों को सम्पूर्णता से पूरा करने में असमर्थ हैं, इसलिए, सीधे मुद्दे पर आकर अपने दिल और मन की बात आपको समझाता हूं। ये मानते हुए कि आपकी परखने और प्रशंसा करने की योग्यताएँ बेहद कमज़ोर हैं, आप पूरी तरह मेरे विवेक और सार से लगभग बिलकुल अनजान हैं, तो ये अति आवश्यक है कि मैं इसके बारे में आपको सूचित करूँ। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप पहले कितना समझते थे या फिर आप इन विषयों को समझने में इच्छुक हैं कि नहीं, फिर भी मुझे उनके बारे में आपको विस्तारपूर्वक बताना होगा। ये कोई ऐसा विषय नहीं हैं जो आपके लिए बिलकुल अनजान हो, परन्तु ऐसा नहीं लगता कि आप इसे समझते हैं या इसमें जो अर्थ निहित है उससे परिचित हैं। बहुतों के पास समझ की बस एक हल्की-सी रोशनी है और मुख्यतः इस विषय का एक छिछला ज्ञान है। सच्चाई को बेहतर ढंग से अपनाने में आपकी मदद करने के लिये, अर्थात मेरे वचनों को अभ्यास में लाने के लिये पहले आपको इस विषय को समझना होगा। अन्यथा आपका विश्वास अस्पष्ट, कपटपूर्ण, और धर्म के रंगों में रंगा हुआ बना रहेगा। यदि आप परमेश्वर के स्वभाव को नहीं समझोगे, तब आप जो उसके लिए करना चाहते हैं उसे करना आपके लिए असंभव होगा। यदि आप परमेश्वर के अस्तित्व को नहीं जानते हैं, तो भी उसके आदर और भय को धारण करना असंभव होगा, केवल बेपरवाह असावधानी और घुमा-फिराकर कहना और इसके अतिरिक्त असाध्य ईश-निन्दा होगी। परमेश्वर के स्वभाव को समझना वास्तव में बहुत महत्वपूर्ण है, और परमेश्वर के अस्तित्व के ज्ञान को कभी भी नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता, फिर भी किसी ने भी पूरी तरह इस विषय का परीक्षण नहीं किया है या उसकी गहराई मे नहीं गए हैं। यह बिलकुल साफ-साफ देखा जा सकता है कि आपने मेरे द्वारा दिए गए सभी प्रशासनिक आदेशों को निरस्त कर दिया है। यदि आप परमेश्वर के स्वभाव को समझ नहीं सकते, तो आप आसानी से उसके स्वभाव को ठेस पहुँचा देंगे। ऐसा अपराध स्वयं परमेश्वर को क्रोधित करने के समान है, और अंततः प्रशासनिक आदेशों के विरूद्ध एक गुनाह बन जाता है। अब आपको एहसास हो जाना चाहिए कि जब आप उसके सार को समझ जाते हैं तो आप परमेश्वर के स्वभाव को समझ सकते हैं, और परमेश्वर के स्वभाव को समझना उसके प्रशासनिक आदेशों को समझने के बराबर है। निश्चित रूप से, परमेश्वर के स्वभाव में बहुत सारे प्रशासनिक आदेश शामिल हैं, परन्तु उसके स्वभाव की सम्पूर्णता को उनमें प्रकट नहीं किया गया है। इसमें परमेश्वर के स्वभाव से और ज़्यादा परिचित होने की जरूरत है।

आज मैं आप से सामान्य बोलचाल की भाषा में बात नहीं कर रहा हूँ, अतः आपको मेरे वचनों पर ईमानदारी से ध्यान देना होगा और, इसके अतिरिक्त, गहराई से उन पर विचार करना होगा। इस से मेरा अभिप्राय यह है कि आप ने उन वचनों के प्रति जो मैं ने कहे हैं, बहुत थोड़ा-सा प्रयास किया है। जब परमेश्वर के स्वभाव की बात आती है, तो उस पर मनन करने के लिए आप और भी अनिच्छुक हो जाते हैं, और इस पर बहुत ही कम लोग समर्पित होते हैं। इसलिए मैं कहता हूँ कि आपका विश्वास मात्र शब्दों का आडम्बर है। अभी भी, अपनी अति महत्वपूर्ण कमज़ोरियों के लिए आप में से एक ने भी कोई सच्चा प्रयास नहीं किया है। आपके लिए इतना दर्द सहने के बावजूद आपने मुझे शर्मिन्दा किया है। इस में कोई आश्चर्य नहीं कि आप सभी परमेश्वर का भय एवं उसकी आज्ञाओं को नहीं मानते हैं और ऐसा जीवन जीते हैं जिस में कोई सत्य नहीं है। इस प्रकार के लोगों को संत कैसे माना जाएगा? स्वर्ग ऐसी बात को बर्दाश्त नहीं करेगा! चूंकि आप समझने से इतना भय खाते हैं, तो मुझे कुछ और साँसें न्योछावर करनी होंगी।

परमेश्वर का स्वभाव एक ऐसा विषय है जो बहुत गूढ़ दिखाई देता है और जिसे आसानी से स्वीकार नहीं किया जाता, क्योंकि उसका स्वभाव मनुष्यों के व्यक्तित्व के समान नहीं है। परमेश्वर के पास भी आनन्द, क्रोध, दुखः, और खुशी की भावनाएँ हैं, परन्तु ये भी भावनाएँ उन मनुष्यों की भावनाओं से जुदा हैं। परमेश्वर का अपना अस्तित्व और स्वत्वबोध है। जो कुछ वह प्रकट और उजागर करता है वह उसके सार और उसकी पहचान का प्रस्तुतिकरण है। उसकी हस्ती, उसका स्वत्वबोध, साथ ही उसके सार और पहचान को किसी मनुष्य के द्वारा बदला नहीं जा सकता है। उसका स्वभाव मानव जाति के प्रति उसके प्रेम, मानवजाति के लिए उसकी दिलासा, मानवजाति के प्रति नफरत, और उस से भी बढ़कर, मानवजाति की सम्पूर्ण समझ के चारों ओर घूमता रहता है। फिर भी, मुनष्य का व्यक्तित्व आशावादी, जीवन्त, या कठोर हो सकता है। परमेश्वर का स्वभाव सब बातों में सभी चीज़ों और जीवित प्राणियों के शासक, सारी सृष्टि के प्रभु से सम्बन्ध रखता है। उसका स्वभाव आदर, सामर्थ, कुलीनता, महानता, और सब से बढ़कर, सर्वोच्चता का प्रतिनिधित्व करता है। उसका स्वभाव अधिकार और उन सब का प्रतीक है जो धर्मी, सुन्दर, और अच्छा है। इस के अतिरिक्त, यह इस का भी प्रतीक है कि परमेश्वर को अंधकार और शत्रु के बल के द्वारा दबाया या उस पर आक्रमण नहीं किया जा सकता है, साथ ही इस बात का प्रतीक भी है कि उसे किसी भी सृजे गए प्राणी के द्वारा ठेस नहीं पहुंचाई जा सकती है (और उसे ऐसा करने की अनुमति नहीं है)। उसका स्वभाव सब से ऊँची सामर्थ का प्रतीक है। कोई भी मनुष्य उसके कार्य और उसके स्वभाव को अस्थिर नहीं कर सकता है। परन्तु मनुष्य का व्यक्तित्व पशुओं से थोड़ा बेहतर होने के चिह्न से बढ़कर कुछ भी नहीं है। मनुष्य के पास अपने आप में और स्वयं में कोई अधिकार नहीं है, कोई स्वायत्तता नहीं है, और स्वयं को श्रेष्ठ करने की कोई योग्यता भी नहीं है, वो तो बस एक तत्व है जो किसी व्यक्ति की चालाकी, घटना, या वस्तु के द्वारा भयातुर होकर नतमस्तक हो जाता है। परमेश्वर का आनन्द धार्मिकता और ज्योति की उपस्थिति और अभ्युदय से है; अँधकार और बुराई के विनाश से है। वह आनन्दित होता है क्योंकि वह मानवजाति के लिए ज्योति और अच्छा जीवन ले कर आया है; उसका आनन्द धार्मिकता का है, हर चीज़ के सकारात्मक होने का एक प्रतीक, और सब से बढ़कर कल्याण का प्रतीक। परमेश्वर का क्रोध अन्याय की मौजूदगी और उस अस्थिरता के कारण है जो इससे पैदा होती है जो उसकी मानवजाति को हानि पहुँचा रही है; बुराई और अँधकार की उपस्थिति के कारण, और ऐसी चीज़ों की उपस्थिति जो सत्य को बाहर धकेल देती है, और उस से भी बढ़कर ऐसी चीज़ों की उपस्थिति के कारण जो उनका विरोध करती हैं जो भला और सुन्दर है। उसका क्रोध एक चिह्न है कि वे सभी चीज़ें जो नकारात्मक हैं आगे से अस्तित्व में न रहें, और इसके अतिरिक्त यह पवित्रता का प्रतीक है। उसका दुखः मानवजाति के कारण है, जिसके लिए उस ने आशा की थी परन्तु वह अंधकार में गिर गई, क्योंकि जो कार्य वह मनष्यों के लिए करता है मनुष्य वह उसकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता, और क्योंकि वह जिस मानवजाति से प्रेम करता है वह ज्योति में पूरी तरह जीवन नहीं जी पाती। वह अपनी भोलीभाली मानवजाति के लिए, ईमानदार किन्तु अनजान मनुष्य के लिए, और अच्छे और अनिश्चित भाव वाले मनुष्य के लिए दुखः की अनुभूति करता है। उसका दुखः उसकी भलाई और उसकी करूणा का चिह्नहै, और सुन्दरता और उदारता का चिह्नहै। उसकी प्रसन्नता, वास्तव में, अपने शत्रुओं को हराने और मनुष्यों के भले विश्वास को प्राप्त करने से आती है। इसके अतिरिक्त, सभी शत्रु ताकतों को भगाने और हराने से और मनुष्यों के द्वारा भले और शांतिपूर्ण जीवन को प्राप्त करने से आती है। परमेश्वर की प्रसन्नता, मनुष्य के आनंद के समान नहीं है; उसके बजाए, यह मनोहर फलों को प्राप्त करने का एहसास है, एक एहसास जो आनंद से बढ़कर है। उसकी प्रसन्नता इस बात का चिह्नहै कि मानवजाति दुखः की जंज़ीरों को तोड़कर आज़ाद होकर ज्योति के संसार में प्रवेश करती है। दूसरे रूप में, मानवजाति की भावनाएँ सिर्फ स्वयं के सारे स्वार्थों के उद्देश्य के तहत अस्तित्व में हैं, धार्मिकता, ज्योति, या जो सुन्दर है उसके लिए नहीं, और स्वर्ग के अनुग्रह के लिए तो बिल्कुल नहीं। मानव जाति की भावनाएँ स्वार्थी हैं और अँधकार के संसार से वास्ता रखती हैं। वे इच्छा के लिए नहीं हैं, परमेश्वर की योजना के लिए तो बिल्कुल नहीं। इसलिए मनुष्य और परमेश्वर को एक ही साँस मे बोला नहीं जा सकता है। परमेश्वर सर्वदा सर्वोच्च है और हमेशा आदरणीय है, जबकि मनुष्य सर्वदा तुच्छ और हमेशा से निकम्मा है। यह इसलिए है क्योंकि परमेश्वर हमेशा बलिदान करता रहता है और मनुष्यों के लिए अपने आप को दे देता है; जबकि, मनुष्य हमेशा लेता है और सिर्फ अपने आप के लिए ही परिश्रम करता है। परमेश्वर सदा मानवजाति के अस्तित्व के लिए परिश्रम करता रहता है, फिर भी मनुष्य ज्योति और धार्मिकता में कभी भी कोई योगदान नहीं देता है। भले ही मनुष्य कुछ समय के लिए परिश्रम करे, लेकिन वह कमज़ोर होता है और हल्के से झटके का भी सामना नहीं सकता है, क्योंकि मनुष्य का परिश्रम केवल उसी के लिए होता है दूसरों के लिए नहीं। मनुष्य हमेशा स्वार्थी होता है, जबकि परमेश्वर सर्वदा स्वार्थविहीन होता है। परमेश्वर उन सब का स्रोत है जो धर्मी, अच्छा, और सुन्दर है, जबकि मनुष्य सब प्रकार की गन्दगी और बुराई का वाहक और फैलाने वाला है। परमेश्वर कभी भी अपनी धार्मिकता और सुन्दरता के सार-तत्व को नहीं पलटेगा, जबकि मनुष्य किसी भी समय धार्मिकता से विश्वासघात कर सकता है और परमेश्वर से दूर जा सकता है।

हर एक वाक्य जो मैं ने कहा है वह परमेश्वर के स्वभाव को सिद्ध करता है। आप यदि मेरे वचनों पर सावधानी से मनन करोगे तो अच्छा होगा, और आप निश्चय ही उनसे बड़ा लाभ उठाएंगे। परमेश्वर के सार-तत्व को समझना बड़ा ही कठिन काम है, परन्तु मैं भरोसा करता हूँ कि आप सभी के पास कम से कम परमेश्वर के स्वभाव का कुछ तो ज्ञान है। तब, मैं आशा करता हूँ कि आप वह कार्य जिससे परमेश्वर के स्वभाव को ठेस नहीं पहुँचती है और भी अधिक करेंगे और मुझे दिखाएँगे। तब ही मुझे पुनः आश्वासन मिलेगा। उदाहरण के लिए, परमेश्वर को हर समय अपने दिल में रखिए। जब आप कार्य करते हैं तो उसके वचनों के साथ बने रहिये। सब बातों में उसके विचारों की खोज कीजिए, और ऐसा कोई भी काम मत कीजिए जिससे परमेश्वर का अनादर और अपमान हो। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर को अपने हृदय के भविष्य के खालीपन को भरने के लिए अपने मन में मत रखिये। यदि आप ऐसा करेंगे, तो आप परमेश्वर के स्वभाव को ठेस लगायेंगे। यदि आपने परमेश्वर के विरूद्ध कभी भी ईशनिन्दा की टिप्पणी या शिकायत नहीं की है और अपने सम्पूर्ण जीवन में जो कुछ उसने आपको सौंपा है उस से यथोचित कार्य करने में समर्थ रहे हैं, साथ ही परमेश्वर के वचनों के लिए पूर्णतया समर्पण कर दिया है, तो आप प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करने से बच गये हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप ने कभी ऐसा कहा है, "मैं ऐसा क्यों न सोचूँ कि वह परमेश्वर है?", "मैं सोचता हूँ कि ये शब्द पवित्र आत्मा के प्रकाशन से बढ़कर और कुछ नहीं हैं", "मैं नहीं सोचता कि जो कुछ परमेश्वर करता है वह सही है", "परमेश्वर की मानवीयता मेरी मानवीयता से बढ़कर नहीं है", "परमेश्वर का वचन सामान्य रूप से विश्वास करने योग्य नहीं है," या अन्य प्रकार की दोषारोपण संबंधी टीका टिप्पणियाँ, तो मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि आप अपने पापों का अंगीकार करें और पश्चाताप करें। अन्यथा, आपको पापों की क्षमा के लिए कभी अवसर नहीं मिलेगा, क्योंकि आपने किसी मनुष्य को नहीं, बल्कि स्वयं परमेश्वर को ठेस पहुँचाई है। आप सोच सकते हैं कि आप मात्र एक मनुष्य पर न्याय-विचार कर रहे हैं, किन्तु परमेश्वर का आत्मा इस रीति से विचार नहीं करता है। उसके देह का अनादर उसके अनादर के बराबर है। यदि ऐसा है, तो क्या आपने परमेश्वर के स्वभाव को ठेस नहीं पहुँचाई है? आपको याद रखना होगा कि जो कुछ भी परमेश्वर के आत्मा के द्वारा किया गया है वह उसकेदेह में उसके कार्य का समर्थन करने और ऐसे कार्य को भली भांति करने के लिए किया गया है। यदि आप इसे महत्व न दें, तब मैं कह सकता हूँ आप ही वो शख्स हैं जो परमेश्वर पर विश्वास करने में कभी सफल नहीं हो पाएँगे। क्योंकि आपने परमेश्वर के क्रोध को भड़का दिया है, इस प्रकार आपको सज़ा देने के लिए उसे उचित दण्ड का इस्तेमाल करना होगा।

परमेश्वर के सार-तत्व से परिचित होना कोई खिलवाड़ की बात नहीं है। आपको उसके स्वभाव को समझना ही होगा। इस तरह से आप धीरे-धीरे परमेश्वर के सार-तत्व से परिचित होते जाएँगे, जब आप इस ज्ञान में प्रवेश कर लेंगे, और इस प्रकार आप एक ही साथ एक महान और ख़ू़बसूरत स्थिति में आगे बढ़ते जाएँगे। अंत में आप अपनी घृणित आत्मा पर इतनी लज्जा महसूस करेंगे कि आप अपनी शक्ल दिखाने से भी लजाएँगे। उस समय, आप परमेश्वर के स्वभाव को कम से कम ठेस पहुँचायेंगे, आपका हृदय परमेश्वर के निकट और भी निकट होता जाएगा, और धीरे-धीरे उसके लिए आपका प्यार आपके हृदय में बढ़ता जाएगा। ये मानवजाति के ख़ूबसूरत स्थिति में प्रवेश करने का एक चिह्न है। परन्तु आप ने इसे अभी प्राप्त नहीं किया है। आपने अपनी नियति के लिए यहाँ वहाँ भटकते हुए अपने आप को थका दिया है, तो परमेश्वर के स्वभाव से परिचित होने की कौन सोचेगा? क्या इसे जारी रहना चाहिए, आप अनजाने में प्रशासनिक आदेशों के विरूद्ध अपराध करेंगे क्योंकि आप परमेश्वर के स्वभाव के बारे में बहुत ही कम जानते हैं। तो क्या अब आप परमेश्वर के स्वभाव के विरूद्ध अपने अपराधों के लिये नींव नहीं खोद रहे हैं? मैं चाहता हूं कि आप इस बात को समझें कि परमेश्वर के स्वभाव और मेरे कार्य में कोई मतभेद नहीं है। क्योंकि यदि आप बार-बार प्रशासनिक आदेशों के विरूद्ध अपराध करते रहेंगे, तो आप में से कौन है जो दण्ड से बच पाएगा? तो क्या मेरा कार्य पूरी तरह व्यर्थ नहीं हो जाएगा? इसलिए, मैं अभी भी कहता हूँ कि अपने कार्यों का सूक्ष्म परीक्षण करने के साथ-साथ, आप जो कदम उठा रहे हैं उसके प्रति सावधान रहिए। यह एक बड़ी माँग है जो मैं आप से करूँगा और आशा करता हूँ कि आप इस पर सावधानी से विचार करेंगे और इसे महत्वपूर्ण समझेंगे। यदि एक दिन ऐसा आया जब आपके कार्य मुझे प्रचण्ड रूप से क्रोधित करें, तब परिणाम सिर्फ आपको ही भुगतने होंगे जिन पर आपको विचार करना होगा, और आपके स्थान पर दण्ड को सहने वाला और कोई नहीं होगा।

स्रोत राज्य के अवरोहण का सुसमाचार: परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है

The Second Coming of Jesus | Hindi Best Christian Movie "द्वार पर दस्तक" (Hindi Dubbed)

**The Second Coming of Jesus | Hindi Best Christian Movie "द्वार पर दस्तक" (Hindi Dubbed)

**दो हज़ार साल पहले, प्रभु यीशु ने भविष्‍यवाणी की थी, "आधी रात को धूम मची: 'देखो, दूल्हा आ रहा है! उससे भेंट करने के लिये चलो'" (मत्ती 25:6)।(© BSI) "देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ" (प्रकाशितवाक्य 3:20)। (© BSI) दो हज़ार वर्षों से, प्रभु के विश्‍वासी चौकन्‍ने रहकर द्वार पर प्रभु की दस्तक की प्रतीक्षा कर रहे हैं, तो प्रभु जब लौटेगा तब वह किस तरह मनुष्‍यजाति के द्वार पर दस्तक देगा? अंत के दिनों में, कुछ लोगों ने यह गवाही दी है कि प्रभु यीशु लौट आया है—देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर—और वह अंत के दिनों में न्‍याय का कार्य कर रहा है। इस समाचार ने पूरे धार्मिक जगत को कंपित कर दिया है। इस फिल्‍म की नायिका, यांग आइगुआंग, दशकों से प्रभु में विश्‍वास करते हुए, कार्य और धर्मोपदेश में हमेशा उत्साहपूर्वक शामिल रह कर प्रभु के लौटने के स्‍वागत की प्रतीक्षा करती रही हैं। एक दिन, दो लोग आते हैं, उसके दरवाज़े पर दस्‍तक देते हैं, यांग आइगुआंग और उसके पति को कहते हैं कि प्रभु यीशु लौट आया है, उनके साथ सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों को साझा करते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों से वे गहराई तक प्रेरित हो जाते हैं, लेकिन क्योंकि यांग आइगुआँग पादरियों और एल्‍डरों की भ्रांतियों, धोखों और बाध्‍यताओं के अधीन रह चुकी है, इसलिए वह सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर की कलीसिया के गवाहों को घर से बाहर निकाल देती हैं। उसके बाद, वे साक्षी लोग कई बार उनके द्वार को खटखटाते हैं और अंत के दिनों के परमेश्‍वर के कार्य की गवाही देते हुए यांग आइगुआँग को सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचन पढ़ कर सुनाते हैं। इस दौरान, पादरी लोग, बार-बार यांग आइगुआंग को व्‍यवधान पैदा कर रोकते हैं, और वह डगमगाती रहती हैं। हालाँकि, सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों को सुनने के माध्‍यम से, यांग आइगुआंग सत्‍य को समझने लगती है और पादरियों तथा एल्‍डर्स द्वारा फैलाई गई अफवाहों और भ्रांतियों के बारे में उसे विवेक प्राप्त हो जाता है। अंतत: वह समझ जाती हैं कि अंत के दिनों में अपनी वापसी के समय प्रभु लोगों के द्वारों पर किस तरह से दस्‍तक देता है, और हमें कैसे उनका स्‍वागत करना चाहिए। धुंध के छँटने पर, यांग आइगुआंग आख़िरकार परमेश्‍वर की आवाज को सुनती है और यह स्‍वीकार करती है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर ही सचमुच प्रभु यीशु की वापसी है!

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वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं

वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं

**सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन | वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं

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सभी मनुष्य यीशु के सच्चे रूप को देखने और उसके साथ रहने की इच्छा करते हैं। मैं विश्वास करता हूँ कि भाईयों या बहनों में से एक भी ऐसा नहीं है जो कहेगा कि वह यीशु को देखने या उसके साथ रहने की इच्छा नहीं करता है। यीशु को देखने से पहले, अर्थात्, इस से पहले कि तुम लोग देहधारी परमेश्वर को देखो, तुम्हारे भीतर अनेक विचार होंगे, उदाहरण के लिए, यीशु के रूप के बारे में, उसके बोलने का तरीका, उसके जीवन का तरीका, और इत्यादि। तथापि, जब तुम सब वास्तव में उसे देखते हो, तुम्हारे विचार तेजी से बदल जाएँगे। ऐसा क्यों है? क्या तुम लोग जानना चाहते हो? जबकि मनुष्य के सोच विचारों को नज़र अंदाज नहीं किया जा सकता है, यह मनुष्य के लिए बहुत अधिक असहनीय है कि वह मसीह के सार में परिवर्तन करे। तुम लोग मसीह को अविनाशी, एक संत मानते हो, लेकिन कोई मसीह को दिव्य सार के साथ नश्वर नहीं मानता है। इसलिए, अनेक लोग जो दिन रात परमेश्वर को देखने की लालसा करते हैं वास्तव में परमेश्वर के शत्रु हैं और परमेश्वर के अननुरूप हैं। क्या यह मनुष्य की ओर से की गई ग़लती नहीं है? तुम लोग अभी भी यह सोचते हो कि तुम्हारा विश्वास और तुम्हारी निष्ठा ऐसी है कि तुम सब मसीह के रूप को देखने के योग्य हो, परन्तु मैं तुमसे गुहार करता हूँ कि तुम अपने आपको और वास्तविक चीज़ों से सन्नद्ध कर लो! क्योंकि भूतकाल, वर्तमान, और भविष्य में बहुतेरे जो मसीह के सम्पर्क में आए वे असफल हो गए हैं और असफल हो जाएँगे; वे सभी फरीसियों की भूमिका निभाते हैं। तुम लोगों की असफलता का कारण क्या है? इसका सटीक कारण यह है कि तुम्हारे विचार में एक उदात्त, प्रशंसनीय परमेश्वर है। परन्तु सत्य ऐसा नहीं जिसकी मनुष्य कामना करता है। न केवल मसीह उदात्त नहीं है, बल्कि वह विषेश रूप से छोटा है; वह न केवल मनुष्य है बल्कि एक सामान्य मनुष्य है; वह न केवल स्वर्ग पर नहीं चढ़ सकता, बल्कि वह पृथ्वी पर भी स्वतन्त्रता से घूम नहीं सकता है। और इसलिए लोग उस के साथ सामान्य मनुष्य जैसा व्यवहार करते हैं; जब वे उसके साथ होते हैं तो जैसा उनको अच्छा लगे वैसा करते हैं, और उसके साथ लापरवाही से बोलते हैं, और तब भी पूरे समय "सच्चे मसीह" के आने का इन्तज़ार करते रहते हैं। जो मसीह पहले ही आ चुका है उसे तुम लोग ऐसा समझते हो कि वह एक साधारण मनुष्य है और उसके वचन को भी साधारण इंसान के वचन मानते हो। इसलिए, तुमने मसीह से कुछ भी प्राप्त नहीं किया है और उसके बजाए प्रकाश में अपनी कुरूपता को पूरी तरह प्रकट कर दिया है।

मसीह के सम्पर्क में आने से पहले, तुम विश्वास कर सकते हो कि तुम्हारा स्वभाव पूरी तरह बदला जा चुका है, तुम विश्वास कर सकते हो कि तुम मसीह के निष्ठावान अनुयायी हो, और तुम यह भी विश्वास कर सकते हो कि तुम मसीह की आशीषों को प्राप्त करने के लिए सबसे ज़्यादा योग्य हो। क्योंकि तुम कई मार्गों पर यात्रा कर चुके हो, बहुत काम कर चुके हो, और बहुत अधिक फल ला चुके हो, अतः तुम्हें वह व्यक्ति होना चाहिए जो अंत में मुकुट प्राप्त करता है। फिर भी, एक सच्चाई है जिसे तुम नहीं जानते हो: जब मनुष्य मसीह को देखता है तब उसका भ्रष्ट स्वभाव, विद्रोह और प्रतिरोध का खुलासा हो जाता है, और जिस विद्रोह और प्रतिरोध का खुलासा ऐसे अवसर पर होता है वह किसी अन्य समय की अपेक्षा कहीं ज़्यादा पूर्ण और निश्चित होता है। मसीह मनुष्य का पुत्र है और सामान्य मानवता रखता है जिस कारण मनुष्य न तो उसका सम्मान करता और न ही आदर करता है। परमेश्वर देह में रहता है इस कारण से मनुष्य का विद्रोह पूरी तरह और स्पष्ट रूप से प्रकाश में लाया जाता है। अतः मैं कहता हूँ कि मसीह के आगमन ने मानवजाति के सारे विद्रोह को खोज निकाला है और मानवजाति के स्वभाव को बहुत ही स्पष्ट रूप से दृश्य बना दिया है। इसे कहते हैं "लालच देकर एक बाघ को पहाड़ के नीचे ले आना" और "लालच देकर एक भेड़िए को गुफा से बाहर ले आना।" क्या तुम कह सकते हो कि तुम परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो? क्या तुम कह सकते हो कि तुम परमेश्वर के प्रति सम्पूर्ण आज्ञाकारिता दिखाते हो? क्या तुम कह सकते हैं कि तुम विद्रोही नहीं हो? कुछ लोग कहेंगेः हर समय जब परमेश्वर मेरे आस-पास सब बनाता है, मैं हमेशा आज्ञापालन करता हूँ और कभी शिकायत नहीं करता। इसके अतिरिक्त, मैं परमेश्वर के बारे में कोई धारणा नहीं बनाता हूँ। कुछ कहेंगेः सारा कार्य जो परमेश्वर के द्वारा मुझे सौंपा गया है, मैं उसे अपनी पूरी योग्यता के साथ करता हूँ और कभी भी लापरवाही नहीं करता। तब मैं तुम लोगों से यह पूछता हूँ: क्या तुम सब मसीह के साथ रहते हुए उसके अनुरूप हो सकते हो? और कितने लम्बे समय तक तुम सब उसके अनुरूप रहोगे? एक दिन? दो दिन? एक घण्टा? दो घण्टे? तुम्हारा विश्वास वास्तव में सराहनीय है, परन्तु तुम लोगों के पास अधिक दृढ़ता नहीं है। जब तुम सचमुच में मसीह के साथ रहते हो, तो तुम्हारी आत्म सच्चाई और आत्म महत्व धीरे तुम्हारे शब्दों और कार्यों के द्वारा प्रकट होने लगेगा, और इस प्रकार तुम्हारी अत्यधिक इच्छा और अनाज्ञाकारिता और असंतुष्टि स्वतः ही प्रकट हो जायेगी। आखिरकार, तुम्हारा अहंकार बहुत ज़्यादा बड़ा हो जाएगा, और जब तुम मसीह के उतने अननुरूप हो जाते हो जैसे जल और आग, तब तुम्हारे स्वभाव का पूरी तरह से खुलासा हो जायेगा। उस समय, तुम्हारी धारणाएँ अब और पर्दे में नहीं रह सकती हैं। तुम्हारी शिकायतें भी, अनायास ही प्रकट हो जाएँगी, और तुम्हारी नीच मानवता का भी पूरी तरह से खुलासा हो जाएगा। तौभी, तुम लगातार अपने विद्रोहीपन से मुकरते हो। और तुम विश्वास करते हो कि ऐसे मसीह को स्वीकार करना आसान नहीं है और वह मनुष्य के प्रति बहुत अधिक कठोर है, और तुम पूरी तरह उसके प्रति समर्पित हो जाते यदि वह कुछ अलग, या और अधिक दयालु मसीह होता। तुम लोग विश्वास करते हो कि तुम्हारे विद्रोह का एक कारण है, कि तुम सबने केवल तभी उसके विरूद्ध विद्रोह किया जब मसीह ने तुम लोगों को एक हद तक मजबूर किया। तुम सबने कभी यह एहसास नहीं किया है कि तुम लोग मसीह को परमेश्वर नहीं मानते, न ही तुम्हारे पास उसकी आज्ञा मानने की मनसा है। बल्कि,तुम ढीठाई से हठ करते हो कि मसीह तुम्हारे मन के अनुसार काम करे, और अन्य किसी काम के लिए जिसे ऐसे नहीं किया गया है, तुम यह विश्वास करते हो कि वह परमेश्वर नहीं मनुष्य है। क्या तुम लोगों में से बहुत से लोग ऐसे नहीं हैं जो उसके साथ इस तरह संतुष्ट हैं? वह कौन है जिस में तुम लोग विश्वास करते हो? और तुम लोग खोजते कैसे हो?

तुम सब हमेशा मसीह को देखने की कामना करते हो, लेकिन मैं ज़ोर देकर तुम सबसे गुहार करता हूँ कि तुम अपने आपको इस तरह ऊँचा न उठाओ; हर कोई मसीह को देख सकता है, परन्तु मैं यह कहता हूँ कि कोई मसीह को देखने के लायक नहीं है। क्योंकि मनुष्य का स्वभाव बुराई, अहंकार और विद्रोह से भरा हुआ है, जब तुम मसीह को देखते हो, तुम्हारा स्वभाव तुम्हें बर्बाद करेगा और तुम्हें मृत्युदंड देगा। एक भाई (या बहन) के साथ तुम्हारी संगति शायद तुम्हारे बारे में बहुत कुछ न दिखाए, परन्तु जब तुम मसीह के साथ संगति करते हो तो यह इतना आसान नहीं होता। किसी भी समय, तुम्हारी धारणा जड़ पकड़ सकती है, तुम्हारा अहंकार अंकुरित हो सकता है, और तुम्हारे विद्रोह में फल लग सकते हैं। ऐसी मानवता के साथ तुम कैसे मसीह के साथ संगति के काबिल हो सकते हो? क्या तुम वास्तव में उसके साथ प्रत्येक दिन के प्रत्येक पल में परमेश्वर जैसा बर्ताव कर सकते हो? क्या तुम में सचमुच परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता की वास्तविकता होगी? तुम सब अपने हृदयों में यहोवा के रूप में एक ऊँचे परमेश्वर की आराधना करते हो लेकिन दृश्यमान मसीह को मनुष्य समझते हो। तुम लोगों की समझ बहुत ही हीन है और तुम्हारी मानवता बहुत नीची है! तुम सब सदैव के लिए मसीह को परमेश्वर के रूप में मानने में असमर्थ हो; बल्कि, तुम लोग बस उसे खींच लेते हो और परमेश्वर मानकर उसकी आराधना करते हो जब तुम्हारी मर्ज़ी होती है। इसी लिए मैं कहता हूँ कि तुम लोग परमेश्वर के विश्वासी नहीं हो, परन्तु तुम सभी उनके सहअपराधी हो जो मसीह के विरूद्ध लड़ते हैं। यहाँ तक कि वे मनुष्य जो दूसरों पर कृपा दिखाते हैं उन्हें प्रतिफल दिया जाता है, फिर भी मसीह, जो तुम्हारे बीच में ऐसा ही कार्य करता है, उसे मनुष्य के द्वारा प्रेम नहीं किया जाता या प्रतिफल भी नहीं दिया जाता है, न ही उसे मनुष्य की आज्ञाकारिता प्राप्त होती है। क्या यह सबसे उदास करने वाली बात नहीं है?

ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर में तुम्हारे इतने वर्षों से विश्वास में, तुमने कभी किसी को श्राप नहीं दिया हो और न ही कोई बुरा कार्य किया हो, फिर भी तुम्हारी मसीह के साथ संगति में, तुम सच नहीं बोल सकते हो, सच्चाई से कार्य नहीं कर सकते, या मसीह के वचन का पालन नहीं कर सकते हो; तो मैं कहूँगा कि तुम संसार में सबसे अधिक कुटिल और कपटी हो। यदि तुम खासकर अपने रिश्तेदारों, मित्रों, पत्नी (या पति), बेटों और बेटियों, और माता पिता के प्रति स्नेहपूर्ण और निष्ठावान हो, और कभी दूसरों का फायदा नहीं उठाया, फिर भी तुम मसीह के अनुरूप नहीं हो और उसके साथ शान्ति से नहीं हो, तब भले ही तुम अपने पड़ोसियों के राहत के लिए अपना सब कुछ भेज दो या अपने पिता, माता और घराने की अच्छी देखभाल की हो, तब भी मैं कहूँगा कि तुम धूर्त हो, और साथ में चालाक भी हो। यदि तुम मनुष्य के अनुरूप हो या कुछ अच्छे काम कर सकते हो तो यह न सोचो कि तुम मसीह के अनुरूप हो। क्या तुम यह विश्वास करते हो कि तुम्हारी उदारता स्वर्ग की आशीषों को चुरा सकती है? क्या तुम सोचते हो कि अच्छे काम तुम्हारी आज्ञाकारिता का स्थान ले सकते हैं? तुम लोगों में से कोई भी निपटारा और छंटाई स्वीकार नहीं कर सकता, और सभी को मसीह की सरल मानवता को स्वीकार करने में कठिनाई होती है। फिर भी तुम सब परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता का दावा करते हो। तुम सबका एैसा विश्वास तुम्हारे ऊपर उचित प्रतिकार लेकर आएगा। काल्पनिक भ्रम में लिप्त होना और मसीह को देखने की चाहत करना बंद कर दो, क्योंकि तुम सभी आकार में बहुत छोटे हो, इतने कि तुम लोग उसे देखने के योग्य भी नहीं हो। जब तुमने पूरी रीति से अपने विद्रोह हटा दिया है और तुम मसीह के साथ शान्ति में हो सकते हो, तब परमेश्वर स्वाभाविक रूप से तुम्हारे सामने प्रकट होगा। यदि तुम बिना छंटाई या न्याय से गुज़रे परमेश्वर को देखने जाते हो, तब तुम निश्चित तौर पर परमेश्वर के विरोधी बन जाओगे और विनाश के योग्य ठहरोगे। मनुष्य का स्वभाव स्वाभाविक रूप से परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण है, क्योंकि सभी मनुष्यों को शैतान के द्वारा पूरी तरह भ्रष्ट कर दिया गया है। एक भ्रष्ट मनुष्य की परमेश्वर के साथ संगति से कोई अच्छी चीज़ नहीं उत्पन्न हो सकती है। मनुष्य के सारे कार्य और वचन निश्चित तौर पर उसकी भ्रष्टता का खुलासा करेंगे; और जब वह परमेश्वर के साथ जुड़ता है, तो उसका विद्रोह सभी पहलुओं में प्रकट होता है। मनुष्य तब अनजाने में मसीह का विरोध करता है, मसीह को धोखा देता है, और मसीह को अस्वीकार करता है; तब मनुष्य और भी ज़्यादा खतरनाक स्थिति में होगा। यदि यह जारी रहता है, तो वह दण्ड के अधीन हो जाएगा।

कुछ लोग यह विश्वास करते सकते हैं कि यदि परमेश्वर के साथ साहचर्य इतनी खतरनाक है, तो बुद्धिमानी होगी कि परमेश्वर क दूर कर दें। तब, ऐसे लोगों को क्या हासिल होगा? क्या वे परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होंगे? वास्तव में, परमेश्वर के साथ संगति बहुत ही कठिन है, परन्तु यह पूरी तरह इसलिए है क्योंकि मनुष्य भ्रष्ट है और इसलिए नहीं कि परमेश्वर मनुष्य के साथ जुड़ नहीं सकता है। तुम लोगों के लिए यह सबसे अच्छा होगा कि तुम सब स्वयं को जानने की सच्चाई पर ज़्यादा प्रयास करो। तुम सभी ने क्यों परमेश्वर की कृपा प्राप्त नहीं की है? तुम्हारा स्वभाव क्यों उसके लिए घिनौना है? क्यों तुम्हारे शब्द उसके लिए वीभत्स हैं? तुम लोग अपनी थोड़ी सी निष्ठा के लिए खुद की तारीफ करते हो और अपने छोटे से बलिदान के लिए प्रतिफल चाहते हो; जब तुम सब थोड़ी सी आज्ञाकारिता दिखाते हो तो तुम लोग दूसरों को नीची दृष्टि से देखते हो, और कुछ छोटे छोटे कार्यों को करके तुम सभी परमेश्वर का तिरस्कार करने लग जाते हो। तुम लोग परमेश्वर को स्वीकार करने के बदले धन-संपत्ति, भेंटों और प्रशंसा की अभिलाषा करते हो। जब तुम सब एक या दो सिक्के देते हो तो तुम्हारा हृदय दुखता है; जब तुम लोग दस देते हो, तब तुम सभी आशीषों की और दूसरों से अलग दिखने की अभिलाषा करते हो। जैसी तुम्हारी मानवता है उसके बारे में तो बात करना और सुनना भी वास्तव में अपमानजनक है। तुम्हारे शब्दों और कार्यों के बारे में प्रशंसापूर्ण क्या है? वे जो अपने कर्तव्यों को निभाते हैं और वे जो नहीं निभाते; वे जो अगुवाई करते हैं और वे जो अनुसरण करते हैं; वे जो परमेश्वर को ग्रहण करते और वे जो नहीं करते हैं; वे जो देते हैं और वे जो नहीं देते; वे जो प्रचार करते और वे जो वचन को ग्रहण करते हैं, और इत्यादि; इस प्रकार के सभी लोग अपनी ही तारीफ करते हैं। क्या तुम्हें यह हास्यास्पद नहीं लगता है? निश्चित रूप से तुम लोग जानते हो कि तुम सब परमेश्वर पर विश्वास करते हो, फिर भी तुम सभी परमेश्वर के अनुरूप नहीं हो सकते हो। निश्चित रूप से तुम सब जानते हो कि तुम अयोग्य हो, फिर भी तुम लोग डींग मारते ही रहते हो। क्या तुम्हें महसूस नहीं होता है कि तुम्हारी समझ ऐसी हो गई है कि अब तुम्हारे पास और आत्म-संयम नहीं है? ऐसी समझ के साथ तुम लोग परमेश्वर के साथ संगति करने के काबिल कैसे हो सकते हो? अब क्या तुम लोग अपने लिए भयभीत नहीं हो? तुम्हारा स्वभाव पहले ही ऐसा हो गया है कि तुम लोग परमेश्वर के अनुरूप नहीं हो सकते हो। क्या तुम्हारा विश्वास बेढंगा नहीं है? क्या तुम्हारा विश्वास बेतुका नहीं है? तुम अपने भविष्य से कैसे निपटोगे? तुम नीचे की ओर यात्रा करने के लिए मार्ग का चुनाव कैसे करोगे?

स्रोत राज्य के अवरोहण का सुसमाचार: वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं

Hindi Best Christian Movie | "मेरे काम में दखल मत दीजिए" | The Spiritual Awakening of Christians

**Hindi Best Christian Movie | "मेरे काम में दखल मत दीजिए" | The Spiritual (Hindi Dubbed)

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ली छींगशिंग चीन की एक गृह कलीसिया में प्रचारक हैं, और अनेक वर्षों से प्रभु में आस्थावान रही हैं। वे हमेशा उत्साह के साथ सुसमाचार के प्रचार का प्रभु का कार्य करती हैं, वे चौकस होकर प्रभु के आने का इंतज़ार कर रही हैं ताकि वे स्वर्ग के राज्य में लायी जा सकें। हाल के वर्षों में, ली छींगशिंग ने देखा है कि विभिन्न पंथ और कलीसिया पहले से कहीं अधिक वीरान होते जा रहे हैं। परंतु चमकती पूर्वी बिजली, चीन की कम्युनिस्ट सरकार और धार्मिक वर्गों द्वारा ज़बरदस्त निंदा और अत्याचार के बावजूद और ज़्यादा जोशपूर्ण हो गयी है। अलग-अलग सम्प्रदायों और पंथों की ज़्यादा-से-ज्यादा अच्छी भेड़ों और प्रधान भेड़ों ने चमकती पूर्वी बिजली को स्वीकार कर लिया है। इससे ली छींगशिंग का ध्यान थोड़ा आत्मचिंतन की ओर जाता है। ख़ास तौर से, उन्होंने गौर किया है कि धार्मिक वर्गों के पादरी और एल्डर सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की निंदा करने और उसको बदनाम करने के लिए तरह-तरह की अफवाहें फैलाने और बेमतलब बकवास करने से ज़रा भी नहीं हिचकते। वे चमकती पूर्वी बिजली के प्रचारकों को गिरफ्तार करने के लिए चीन की कम्युनिस्ट सरकार का सहयोग भी करते हैं। उनको लगता है कि पादरी और एल्डर की कारस्तानियां प्रभु के मार्ग से भटकी हुई हैं, और वे समझ पायी हैं कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और धार्मिक वर्ग जिसका विरोध और निंदा कर रहे हैं, वह सच्चा मार्ग हो सकती है, वह प्रभु का प्रकटन और कार्य हो सकती है। उसके बाद से कुछ सहकर्मियों के साथ मिल कर वे चमकती पूर्वी बिजली को खोजने और उसकी जांच-पड़ताल करने का फैसला करती हैं, लेकिन उन्हें पादरी और एल्डर के अपनाये तमाम हथकंडों से रुकावटों और तकलीफों का सामना करना पड़ता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़कर और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के प्रचारकों की गवाहियां सुनकर, ली छींगशिंग और दूसरे लोग, पादरी और एल्डर की अफवाहों और भ्रांतियों को समझने की काबिलियत हासिल कर लेते हैं। इससे वे सच्चे मार्ग की जांच-पड़ताल करने से अनुयायियों को रोकने के लिए उनके द्वारा इस्तेमाल किये गए घिनौने हथकंडों और नीच इरादों को समझ जाते हैं, वे पादरी और एल्डर के असली पाखंडी चेहरों को साफ़ देख लेते हैं। ली छींगशिंग और दूसरे लोग धार्मिक पादरी और एल्डर से ऊंची जोशपूर्ण आवाज़ में बोलते हैं, "हमारे काम में दखल मत दीजिए!" आखिरकार वे पादरी और एल्डर के चंगुल और बंदिशों को पूरी तरह से तोड़ कर बाहर निकल आते हैं और परमेश्वर के सिंहासन के सामने पहुँच जाते हैं।

Welcome the Second Coming of Christ | Best Hindi Christian Movie "मायाजाल को तोड़ दो" (Hindi Dubbed)

**Welcome the Second Coming of Christ | Best Hindi Christian Movie "मायाजाल को तोड़ दो" (Hindi Dubbed)

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फू जिन्‍हुआ चीन की एक गृह कलीसिया की एल्‍डर है। कई वर्षों से वह प्रभु में विश्‍वास रखती आई है और वह हमेशा सोचती थी कि बाइबल परमेश्‍वर द्वारा प्रेरित है, कि बाइबल के सभी वचन परमेश्‍वर के वचन हैं; कि उसे सिर्फ़ प्रभु में विश्‍वास करने और बाइबल के अनुसार चलने की आवश्‍यकता है, तथा जब प्रभु बादलों पर नीचे उतरेगा तो वह स्‍वर्ग के राज्‍य में स्‍वर्गारोहित हो जाएगी। हालाँकि, उसके सहकर्मी उसके मन में संदेह का बीजारोपण कर देते हैं। चार रक्तिम चंद्रग्रहण दिखाई दे चुके हैं, और प्रभु के आगमन की भविष्‍यवाणियाँ पूरी हो चुकी हैं। यह तर्कसंगत है कि प्रभु पहले ही वापिस आ चुका है, तो जब वह बादलों पर नीचे आया तो हमने उनका स्‍वागत क्‍यों नहीं किया? ... कुछ चिंतन के बाद, फू जिन्‍हुआ ने अंत के दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के कार्यों की खोज और जाँच करने का निर्णय लिया। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर की कलीसिया के गवाहों के साथ संगति और चर्चा के माध्यम से, फू जिन्‍हुआ आख़िरकार स्‍वर्ग के राज्‍य में प्रवेश करने का मार्ग साफ़ तौर पर देखती है और जिस मायाजाल के अधीन वह वर्षों से थी, उसे तोड़ कर मुक्‍त हो जाती है। वह अंत के दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के कार्य को स्‍वीकार करती है, परमेश्‍वर के सिंहासन के समक्ष लाई जाती है, और मेम्‍ने के विवाह भोज में शामिल होती है।

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बुलाए गए लोग बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं

बुलाए गए लोग बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं

**परमेश्वर के वचन | बुलाए गए लोग बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं |

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पृथ्वी पर मेरे अनुयायी होने के लिए मैंने कई लोगों को खोजा है। इन सभी अनुयायियों में, ऐसे लोग हैं जो याजकों की तरह सेवा करते हैं, जो अगुआई करते हैं, जो बेटों को आकार देते हैं, जो लोगों का गठन करते हैं और जो सेवा करते हैं। मैं उन्हें उस वफ़ादारी के अनुसार जो वे मेरे प्रति दिखाते हैं भिन्न-भिन्न श्रेणियों में विभाजित करता हूँ। जब सभी मनुष्यों को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत कर दिया जाएगा, अर्थात्, जब प्रत्येक प्रकार के मनुष्य की प्रकृति स्पष्ट कर दी जाएगी, तब मैं उनके उचित प्रकार के बीच प्रत्येक मनुष्य की गिनती करूँगा और प्रत्येक प्रकार को उसके उपयुक्त स्थान पर रखूँगा ताकि मैं मानवजाति के उद्धार के अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकूँ। बारी-बारी से, मैं उन लोगों के समूह को बुलाता हूँ जिन्हें मेरे घर पर वापस लौटाने के लिए मैं उन्हें बचाना चाहता हूँ, फिर इन सभी लोगों को अंत के दिनों के मेरे कार्यों को स्वीकार करने देता हूँ। साथ ही साथ, मैं मनुष्य को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत करता हूँ, फिर उसके कर्मों के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिफल या दण्ड देता हूँ। इस प्रकार के कदम मेरे कार्यों में शामिल है।

अब मैं पृथ्वी पर रहता हूँ, और मनुष्यों के बीच रहता हूँ। सभी मनुष्य मेरे कार्य का अनुभव कर रहे हैं और मेरे कथनों को देख रहे हैं, और इसके साथ मैं अपने प्रत्येक अनुयायी को सभी सच्चाईयाँ प्रदान करता हूँ ताकि वे मुझसे जीवन प्राप्त कर सकें और ऐसा मार्ग प्राप्त कर सकें जिस पर वे चल सकें। क्योंकि मैं परमेश्वर हूँ, जीवन का दाता हूँ। मेरे कार्य के कई सालों के दौरान, मनुष्य ने काफी प्राप्त किया है और काफी त्याग किया है, मगर मैं तब भी कहता हूँ कि मनुष्य मुझ पर वास्तव में विश्वास नहीं करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य केवल अपने ओंठों से स्वीकार करता है कि मैं परमेश्वर हूँ जबकि मेरे द्वारा बोले गए सत्य से असहमत होता है, और उस सत्य का तो बहुत ही कम अभ्यास करता है जो मैं उससे अपेक्षा करता हूँ। कहने का अर्थ है कि, मनुष्य केवल परमेश्वर के अस्तित्व को ही स्वीकार करता है, लेकिन सत्य के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता है; मनुष्य केवल परमेश्वर के अस्तित्व को ही स्वीकार करता है परन्तु जीवन के अस्तित्व को नहीं, मनुष्य केवल परमेश्वर के नाम को स्वीकार करता है परन्तु उसके सार को स्वीकार नहीं करता है। अपने उत्साह के कारण, मनुष्य मेरे लिए घृणित बन गया है। क्योंकि मनुष्य मुझे धोखा देने के लिए बस कानों को अच्छे लगने वाले वचनों को कहता है, और कोई भी सच्चे हृदय से मेरी आराधना नहीं करता है। तुम लोगों की वाणी में साँप का प्रलोभन है; इसके अलावा, यह चरम रूप से अहंकारी, असंदिग्ध रूप से प्रधान स्वर्गदूत द्वारा घोषणा है। और अधिक क्या, तुम्हारे कर्म शर्मनाक अंश तक तार-तार और फटे हुए हैं, तुम लोगों की असंयमित अभिलाषाएँ और लोलुप अभिप्राय सुनने में अपमानजनक हैं। तुम सब लोग मेरे घर में पतंगे, घृणा के साथ छोड़ी जाने वाली वस्तुएँ बन गए हो। क्योंकि तुम लोगों में से कोई भी सत्य का प्रेमी नहीं है, बल्कि ऐसे मनुष्य हो जो आशीषों के, स्वर्ग में आरोहण करने के, और मसीह के पृथ्वी पर अपनी सामर्थ्य का उपयोग करने के शानदार दर्शन को देखने के इच्छुक हैं। क्या तुम लोगों ने कभी सोचा है कि कोई तुम लोगों के समान, इतनी गहराई तक भ्रष्ट कोई मनुष्य, और जो बिल्कुल भी नहीं जानता है कि परमेश्वर क्या है, कैसे परमेश्वर का अनुसरण करने के योग्य हो सकता है? तुम लोग स्वर्ग में कैसे आरोहण कर सकते हो? तुम लोग कैसे महिमा को देखने के योग्य बन सकते हो, जो अपने वैभव में अभूतपूर्व है। तुम लोगों के मुँह छल और गंदगी, विश्वासघात और अहंकार के वचनों से भरे हैं। तुम लोगों ने मेरे प्रति कभी भी ईमानदारी के वचन नहीं कहे हैं, मेरे वचनों का अनुभव करने पर कोई पवित्र वचन, समर्पण करने के कोई वचन नहीं कहे हैं। अंततः तुम लोगों का यह विश्वास किसके जैसा है? तुम लोगों के हृदयों में अभिलाषाएँ और सम्पत्ति भरी हुई है; तुम्हारे दिमागों में भौतिक चीजें भरी हुई हैं। हर दिन, तुम लोग गणना करते हो कि मुझसे कोई चीज़ कैसे प्राप्त करो, तुमने मुझसे कितनी सम्पत्ति और कितनी भौतिक वस्तुएँ प्राप्त कर ली हैं। हर दिन, तुम लोग और भी अधिक आशीषें अपने ऊपर बरसने का इंतज़ार करते हो ताकि तुम लोग और भी अधिक तथा और भी बेहतर तरीके से उन चीज़ों का आनन्द ले सको जिनका आनंद लिया जा सकता है। प्रत्येक क्षण तुम लोगों के विचारों में जो रहता है वह मैं नहीं हूँ, न ही वह सत्य है जो मुझसे आता है, बल्कि तुम लोगों के पति (पत्नी), बेटे, बेटियाँ, या तुम क्या खाते या पहनते हो, और कैसे तुम लोगों का आनंद और भी अधिक बेहतर हो सकता है, आता है। यहाँ तक कि जब तुम लोग अपने पेट को ऊपर तक भर लेते हो, तब क्या तुम लोग एक लाश से जरा सा ही अधिक नहीं हो? यहाँ तक कि जब तुम लोग अपने बाहरी स्वरूप को सजा लेते हो, क्या तुम लोग तब भी एक चलती-फिरती लाश नहीं हो जिसमें कोई जीवन नहीं है? तुम लोग तब तक अपने पेट के लिए कठिन परिश्रम करते हो जब तक कि तुम लोगों के सिर के बाल सफेद हो कर चितकबरे नहीं हो जाते हैं, फिर भी तुम में से कोई भी मेरे कार्य के लिए एक बाल तक बलिदान नहीं करता है। तुम लोग अपनी देह के वास्ते, और अपने बेटों और बेटियों के लिए, लगातार बहुत सक्रिय हो, अपने शरीर पर भार डाल रहे हो और अपने मस्तिष्क को कष्ट दे रहे हो, फिर भी तुम में से कोई एक भी मेरी इच्छा के लिए चिंता या परवाह नहीं दिखाता है। वह क्या है जो तुम अब भी मुझ से प्राप्त करने की आशा रखते हो?

अपना कार्य करने में, मैं कभी भी जल्दबाज़ी नहीं करता हूँ। मनुष्य चाहे किसी भी तरीके से मेरा अनुसरण करे, मैं अपना कार्य प्रत्येक कदम के अनुसार, अपनी योजना के अनुसार करता हूँ। इसलिए, यद्यपि तुम लोग मेरे विरूद्ध बहुत अधिक विद्रोह कर सकते हो, किंतु मैं तब भी अपना कार्य नहीं रोकता हूँ और तब भी उन वचनों को बोलता रहता हूँ जो मैं बोलना चाहता हूँ। मैं अपने घर में उन सब को बुलाता हूँ जिन्हें मैंने पूर्वनियत किया है ताकि मेरे वचनों को सुनने के लिए उन्हें एक श्रोतागण बनाया जाए, और फिर उन सभी को अपने सिंहासन के सामने रखा जाए जो मेरे वचन का पालन करते हैं और मेरे वचन की अभिलाषा करते हैं। जो मेरे वचनों की ओर पीठ फेर लेते हैं, जो मेरी आज्ञा का पालन करने और मेरे प्रति समर्पण करने में असफल रहते हैं, और जो खुलकर मेरी अवहेलना करते हैं, वे अंतिम दण्ड की प्रतीक्षा करने के लिए एक ओर डाल दिए जाएँगे। सभी मनुष्य भ्रष्टता के बीच और दुष्ट के हाथ के अधीन रहते हैं, इसलिए मेरा अनुसरण करने वालों में से बहुत से लोग वास्तव में सत्य की अभिलाषा नहीं करते हैं। कहने का अर्थ है कि, अधिकांश सच्चे हृदय से या सत्य के साथ मेरी आराधना नहीं करते हैं, बल्कि भ्रष्टता, विद्रोह और कपटपूर्ण उपायों से मेरा विश्वास प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। यही कारण है कि मैं कहता हूँ: बुलाए हुए बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं। वे सभी जो बुलाए गए हैं अत्यंत भ्रष्ट हैं और एकही युग में रहते हैं, किन्तु जो चुने गए हैं वे केवल वह समूह हैं जो सत्य पर विश्वास करते हैं और इसे स्वीकार करते हैं और जो सत्य का अभ्यास करते हैं। ये लोग समष्टि का एक मामूली हिस्सा होते हैं, और इन लोगों के बीच से मैं और भी अधिक महिमा प्राप्त करूँगा। इन वचनों से मापने पर, क्या तुम लोग जानते हो कि तुम लोग चुने हुए लोगों में से हो? तुम लोगों का अन्त कैसा होगा?

मैं पहले ही कह चुका हूँ कि जो मेरा अनुसरण करते हैं वे बहुत हैं परन्तु जो मुझ से सच्चे दिल से प्रेम करते हैं वे बहुत ही कम हैं। हो सकता है कि कुछ लोग कहें कि, "यदि मैं तुमसे प्रेम नहीं करता तो क्या मैंने इतनी बड़ी क़ीमत चुकाई होती? यदि मैं तुमसे प्रेम नहीं करता तो क्या मैंने यहाँ तक तुम्हारा अनुसरण किया होता?" निश्चित रूप से, तुम लोगों के पास कई कारण हैं, और तुम लोगों का प्रेम, निश्चित रूप से, बहुत ही महान है, किन्तु मेरे लिए तुम लोगों के प्रेम का क्या सार है? "प्रेम", जिस प्रकार से यह कहलाता है, ऐसी भावना का संकेत करता है जो शुद्ध और दोष रहित हो, जहाँ तुम प्रेम करने, महसूस करने, और विचारशील होने के लिए अपने हृदय का उपयोग करते हो। प्रेम में कोई शर्त, कोई अवरोध, या कोई दूरी नहीं होती है। प्रेम में कोई संदेह, कोई कपट, और कोई धूर्तता नहीं होती है। प्रेम में कोई दूरी नहीं होती है और कुछ भी अशुद्ध नहीं होता है। यदि तुम लोग प्रेम करते हो, तो तुम धोखा नहीं दोगे, शिकायत, विश्वासघात, विद्रोह नहीं करोगे, किसी चीज को छीनोने या उसे प्राप्त करने की या किसी निश्चित राशि को प्राप्त करने की कोशिश नहीं करोगे। यदि तुम लोग प्रेम करते हो, तो खुशी-खुशी बलिदान करोगे, विपत्ति को सहोगे, और मेरे अनुकूल हो जाओगे। तुम अपना सर्वस्व मेरे लिए त्याग दोगे तुम लोगों का परिवार, तुम लोगों का भविष्य, तुम लोगों की जवानी, और तुम लोगों का विवाह, त्याग दोगे। अन्यथा तुम लोगों का प्रेम बिल्कुल भी प्रेम नहीं होगा, बल्कि केवल कपट और विश्वासघात होगा! तुम लोगों का प्रेम किस प्रकार का है? क्या यह सच्चा प्रेम है? या झूठा? तुम लोगों ने कितना त्याग किया है? तुमने कितना अर्पण किया है? मुझे तुम लोगों से कितना प्रेम प्राप्त हुआ है? क्या तुम लोग जानते हो? तुम लोगों के हृदय बुराई, विश्वासघात, और कपट से भरे हुए हैं, और परिणामस्वरूप, तुम लोगों के प्रेम में कितनी अशुद्धियाँ हैं? तुम लोग सोचते हो कि तुम लोगों ने मेरे लिए पर्याप्त त्याग किया है; तुम लोग सोचते हो कि मेरे लिए तुम लोगों का प्रेम पहले से ही पर्याप्त है। किन्तु फिर तुम लोगों के वचन और कार्य क्यों हमेशा अपने साथ विद्रोह और कपट लिए रहते हैं? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी तुम मेरे वचन को स्वीकार नहीं करते हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी मुझे एक तरफ़ डाल देते हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी तुम मेरे बारे में शक्की हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी तुम मेरे अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर सकते हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी उसके अनुकूल मेरे साथ व्यवहार नहीं करते हो जो मैं हूँ और हर मोड़ पर मेरे लिए चीज़ों को मुश्किल बनाते हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी तुम मुझे मूर्ख बनाने और हर मामले में मुझे धोखा देने का प्रयास करते हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरी सेवा करते हो, फिर भी तुम मुझसे डरते नहीं हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग सर्वथा और सभी चीजों में मेरा विरोध करते हो। क्या यह सब प्यार माना जाता है? तुम लोगों ने बहुत बलिदान किए हैं, यह सत्य है, जिसकी मैं तुमसे अपेक्षा करता हूँ। क्या इसे प्रेम माना जा सकता है? सावधानी पूर्वक किया गया अनुमान दर्शाता है कि तुम लोगों के भीतर मेरे लिए प्रेम का ज़रा सा भी आभास नहीं है। इतने सालों के कार्य और इतने सारे वचनों के बाद जो मैंने तुम लोगों को प्रदान किए हैं, तुम लोगों ने वास्तव में कितना प्राप्त किया है? क्या यह पीछे मुड़कर सावधानीपूर्वक देखने योग्य नहीं है? मैं तुम लोगों की भर्त्सना करता हूँ: जिन्हें मैं अपने पास बुलाता हूँ ये वे नहीं हैं जिन्हें कभी भी भ्रष्ट नहीं किया गया है; बल्कि, जिन्हें मैं चुनता हूँ ये वे हैं जो मुझसे वास्तव में प्रेम करते हैं। इसलिए, तुम लोगों को अपने वचनों और कर्मों में सतर्क रहना चाहिए, और अपने अभिप्रायों और विचारों को जाँचना चाहिए ताकि वे अपनी सीमा रेखा को पार न करें। अंत के दिनों के इस समय में, अपने प्रेम को मेरे सम्मुख अर्पित करने के लिए अपना अधिकतम प्रयास करें, कहीं ऐसा न हो कि मेरा कोप तुम लोगों के ऊपर से कभी भी न जाए!

स्रोत राज्य के अवरोहण का सुसमाचार: बुलाए गए लोग बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं

The True Meaning of Faith in God | Hindi Gospel Movie | "परमेश्वर में आस्था" (Hindi Dubbed)

**The True Meaning of Faith in God | Hindi Gospel Movie | "परमेश्वर में आस्था" (Hindi Dubbed)

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यू कोंगुआंग सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर की कलीसिया के साथ सुसमाचार को फैलाता है, और चीनी पुलिस की गिरफ्तारी से बचने की कोशिश करते हुए उसे स्थानीय गृह-कलीसिया के एक सहकर्मी, झेंग ज़ुन द्वारा बचाया जाता है। उसके बाद वह झेंग ज़ुन और अन्‍य लोगों के साथ, परमेश्‍वर में आस्‍था क्या होती है, परमेश्‍वर की स्‍वीकृति प्राप्‍त करने हेतु कैसे विश्‍वास करना चाहिए, और सत्‍य के अन्‍य पहलुओं पर, कई बार संगति करता है। अंत में, ये सत्‍य झेंग ज़ुन और दूसरों की लंबे समय से चले आ रही भ्रांतियों और कठिनाइयों का समाधान करते हैं, और उन्हें "परमेश्‍वर में आस्था" के सही अर्थ को समझने देते हैं और उनके हृदयों को मुक्‍त कर देते हैं।

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जो आज परमेश्वर के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं

जो आज परमेश्वर के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं

**परमेश्वर के वचन: | जो आज परमेश्वर के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं |

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परमेश्वर की गवाही देने के लिए और बड़े लाल अजगर को शर्मिन्दा करने के लिए तुम्हारे पास एक सिद्धांत, एक शर्त होनी चाहिए: अपने दिल में तुम्हें परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए और परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करना चाहिए। यदि तू परमेश्वर के वचनों में प्रवेश नहीं करेगा तो तेरे पास शैतान को शर्मिन्दा करने का कोई तरीका नहीं होगा। अपने जीवन के विकास द्वारा, तुम बड़े लाल अजगर को त्यागते हो और उसका अत्यधिक तिरस्कार करते हो, और केवल तभी बड़ा लाल अजगर पूरी तरह से शर्मिन्दा होगा। जितना अधिक तुम परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने के इच्छुक होगे, उतना ही अधिक परमेश्वर के प्रति तुम्हारे प्रेम का सबूत होगा और उस बड़े लाल अजगर के लिए घृणा होगी; जितना अधिक तुम परमेश्वर के वचनों का पालन करोगे, उतना ही अधिक सत्य के प्रति तुम्हारी अभिलाषा का सबूत होगा। जो लोग परमेश्वर के वचन की लालसा नहीं करते हैं वे बिना जीवन के होते हैं। ऐसे लोग वे हैं जो परमेश्वर के वचनों से बाहर ही रहते हैं और जो धर्म से संबंधित होते हैं। जो लोग सचमुच परमेश्वर पर विश्वास करते हैं उन्हें परमेश्वर के वचनों की और भी अधिक गहरी समझ होती है क्योंकि वे परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं। यदि तुम परमेश्वर के वचनों की अभिलाषा नहीं करते हो तो तुम वास्तव में उसके वचन को खा और पी नहीं सकते हो और यदि तुम्हें परमेश्वर के वचनों का ज्ञान नहीं है, तो तुम किसी भी प्रकार से परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकते या उसे संतुष्ट नहीं कर सकते।

परमेश्वर पर अपने विश्वास में, तुम्हें परमेश्वर को कैसे जानना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर को उसके आज के वचनों और कार्य के आधार पर जानना चाहिए, बिना किसी भटकाव या भ्रान्ति के, और अन्य सभी चीजों से पहले तुम्हें परमेश्वर के कार्य को जानना चाहिए। यही परमेश्वर को जानने का आधार है। वे सभी विभिन्न भ्रांतियां जिनमें परमेश्वर के वचनों की शुद्ध स्वीकृति नहीं है, वे धार्मिक अवधारणाएं हैं, वे ऐसी स्वीकृति हैं जो पथभ्रष्ट और गलत हैं। धार्मिक अगुवाओं की सबसे बड़ी कुशलता यह है कि वे अतीत में स्वीकृत परमेश्वर के वचनों को लेकर आते हैं और परमेश्वर के आज के वचनों के विरुद्ध उनकी जांच करते हैं। यदि आज के समय में परमेश्वर की सेवा करते समय, तुम पवित्र आत्मा द्वारा अतीत में कही गई प्रबुद्ध बातों को पकड़े रहते हो, तो तुम्हारी सेवा रुकावट उत्पन्न करेगी और तुम्हारे अभ्यास पुराने हो जाएँगे और धार्मिक अनुष्ठान से कुछ अधिक नहीं होंगे। यदि तुम मानते हो कि जो लोग परमेश्वर की सेवा करते हैं उनकी बाहरी प्रकृति विनम्र और धैर्यवान होनी चाहिए..., और यदि तुम आज इस प्रकार की जानकारी को अभ्यास में लाते हो तो ऐसा ज्ञान धार्मिक अवधारणा है, और इस प्रकार का अभ्यास एक पाखण्डी कार्य बन गया है। "धार्मिक अवधारणाएं" उन बातों को दर्शाती हैं जो अप्रचलित और पुराने ढंग की हैं (परमेश्वर के द्वारा पहले कहे गए वचनों और पवित्र आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर प्रकट किए गए प्रकाश की स्वीकृति समेत), और यदि वे आज अभ्यास में लाए जाते हैं, तो वे परमेश्वर के कार्य में बाधा उत्पन्न करते हैं, और मनुष्य को कोई भी लाभ नहीं देते हैं। यदि मनुष्य अपने भीतर की उन बातों को शुद्ध नहीं कर पाता है जो धार्मिक अवधारणाओं से आती हैं, तो वे बातें मनुष्यों द्वारा परमेश्वर की सेवकाई में बहुत बड़ी बाधा बन जाएँगी। धार्मिक अवधारणाओं वाले लोग पवित्र आत्मा के कार्यों के साथ किसी भी प्रकार से कदम से कदम नहीं मिला सकते हैं, वे एक कदम, फिर दो कदम पीछे हो जाएंगे—क्योंकि ये धार्मिक अवधारणाएं मनुष्य को असाधारण रूप से आत्मतुष्ट और घमण्डी बना देती हैं। परमेश्वर अतीत में कही गई बातों और किए गए कार्यों की कोई ललक महसूस नहीं करता है, यदि कुछ अप्रचलित हो गया है, तो वह उसे समाप्त कर देता है। निश्चय ही तुम अपनी अवधारणाओं को त्यागने में सक्षम हो? यदि तुम परमेश्वर के पूर्व में कहे गए वचनों पर बने रहते हो, तो क्या इससे यह सिद्ध होता है कि तुम परमेश्वर के कार्य को जानते हो? यदि तुम पवित्र आत्मा के प्रकाश को आज स्वीकार करने में असमर्थ हो, और उसके बजाय अतीत के प्रकाश से चिपके रहते हो, तो क्या इससे यह सिद्ध हो सकता है कि तुम परमेश्वर के नक्शेकदम पर चलते हो? क्या तुम अभी भी धार्मिक अवधारणाओं को छोड़ पाने में असमर्थ हो? यदि ऐसा है, तो तुम परमेश्वर का विरोध करने वाले बन जाओगे।

यदि मनुष्य धार्मिक अवधारणाओं को छोड़ दे, तो वह आज परमेश्वर के वचनों और उसके कार्य को मापने के लिए अपने दिमाग का इस्तेमाल नहीं करेगा, और उसके बजाय सीधे तौर पर उनका पालन करेगा। भले ही परमेश्वर का आज का कार्य साफ़ तौर पर अतीत के कार्य से अलग है, तुम अतीत के विचारों का त्याग कर पाते हो और आज सीधे तौर पर परमेश्वर के वचनों का पालन कर पाते हो। यदि तुम इस प्रकार के ज्ञान के योग्य हो कि तुम आज परमेश्वर के कार्य को सबसे मुख्य स्थान देते हो, भले ही उसने अतीत में किसी भी तरह से कार्य किया हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति होगे जो अपनी अवधारणों को छोड़ चुका है, जो परमेश्वर का आज्ञापालन करता है, और जो परमेश्वर के कार्य और वचनों का पालन करने में सक्षम है और परमेश्वर के पदचिह्नों का अनुसरण करता है। इस तरह, तुम ऐसे व्यक्ति होगे जो सचमुच परमेश्वर का आज्ञापालन करता है। तुम परमेश्वर के कार्य का विश्लेषण या अध्ययन नहीं करते हो; यह कुछ ऐसा है कि मानो परमेश्वर अपने अतीत के कार्य को भूल गया है और तुम भी उसे भूल गए हो। वर्तमान ही वर्तमान है, और अतीत, बीता हुआ कल हो गया है, और चूँकि परमेश्वर ने जो कुछ अतीत में किया था, आज उसे अलग कर दिया है, इसलिए तुम्हें भी उसमें टिके नहीं रहना चाहिए। केवल तभी तुम वैसे व्यक्ति बन पाओगे जो परमेश्वर का पूरी तरह से आज्ञापालन करता है और जिसने अपनी धार्मिक अवधारणाओं को पूरी तरह से त्याग दिया है।

क्योंकि परमेश्वर के कार्य में हमेशा नई-नई प्रगति होती है, इसलिए यहां पर नया कार्य है, और इसलिए अप्रचलित और पुराना कार्य भी है। यह पुराना और नया कार्य परस्पर विरोधी नहीं है, बल्कि एक दूसरे के पूरक है; प्रत्येक कदम पिछले कदम के बाद आता है। क्योंकि नया कार्य हो रहा है, इसलिए पुरानी चीजें निस्संदेह समाप्त कर देनी चाहिए। उदाहरण के लिए, मनुष्य की लम्बे समय से चली आ रही कुछ प्रथाओं और पारंपरिक कहावतों ने, मनुष्य के कई सालों के अनुभवों और शिक्षाओं के साथ मिलकर, मनुष्य के दिमाग में सभी प्रकार की अवधारणाएं बना दी हैं। फिर भी मनुष्यों के द्वारा इस प्रकार की अवधारणाएं बनाने के और भी अधिक अनुकूल बात यह है कि परमेश्वर ने अभी तक अपना वास्तविक चेहरा और निहित स्वभाव मनुष्य के सामने पूरी तरह से प्रकट नहीं किया है, और साथ ही प्राचीन समय के पारंपरिक सिद्धांतों का बहुत सालों से विस्तार हुआ है। इस प्रकार यह कहना सही होगा कि परमेश्वर में मनुष्यों के विश्वास में, विभिन्न अवधारणाओं का प्रभाव रहा है जिसके कारण मनुष्य के ज्ञान में निरंतर उत्पत्ति और विकास हुआ है जिसमें उसके पास परमेश्वर के प्रति सभी प्रकार की धारणाएं हैं—इस परिणाम के साथ कि परमेश्वर की सेवा करने वाले कई धार्मिक लोग उसके शत्रु बन बैठे हैं। इसलिए, लोगों की धार्मिक अवधारणाएं जितनी अधिक मजबूत होती हैं, वे परमेश्वर का विरोध उतना ही अधिक करते हैं, और वे परमेश्वर के उतने ही अधिक दुश्मन बन जाते हैं। परमेश्वर का कार्य हमेशा नया होता है और कभी भी पुराना नहीं होता है, और वह कभी भी सिद्धांत नहीं बनता, इसके बजाय, निरंतर बदलता रहता है और कमोवेश परिवर्तित होता रहता है। यह कार्य स्वयं परमेश्वर के निहित स्वभाव की अभिव्यक्ति है। यही परमेश्वर के कार्य का निहित सिद्धांत और अनेक उपायों में से एक है जिससे परमेश्वर अपने प्रबंधन को पूर्ण करता है। यदि परमेश्वर इस प्रकार से कार्य न करे, तो मनुष्य बदल नहीं पाएगा या परमेश्वर को जान नहीं पाएगा, और शैतान पराजित नहीं होगा। इसलिए, उसके कार्य में निरंतर परिवर्तन होता रहता है जो अनिश्चित दिखाई देता है, परन्तु वास्तव में ये समय-समय पर होने वाले परिवर्तन हैं। हालाँकि, मनुष्य जिस प्रकार से परमेश्वर पर विश्वास करता है, वह बहुत भिन्न है। वह पुराने, परिचित सिद्धांतों और पद्धतियों से चिपका रहता है, और जितने अधिक वे पुराने होते हैं उतने ही अधिक उसे प्रिय होते हैं। मनुष्य का मूर्ख दिमाग, एक ऐसा दिमाग जो पत्थर के समान दुराग्रही है, परमेश्वर के इतने सारे अथाह नए कार्यों और वचनों को कैसे स्वीकार कर सकता है? मनुष्य हमेशा नए रहने वाले और कभी भी पुराने न होने वाले परमेश्वर से घृणा करता है; वह हमेशा ही प्राचीन सफेद बाल वाले और स्थिर परमेश्वर को पसंद करता है। इस प्रकार, क्योंकि परमेश्वर और मनुष्य, दोनों की अपनी-अपनी पसंद है, मनुष्य परमेश्वर का बैरी बन गया है। इनमें से बहुत से विरोधाभास आज भी मौजूद हैं, ऐसे समय में जब परमेश्वर लगभग छः हजार सालों से नया कार्य कर रहा है। तब, वे किसी भी इलाज से परे हैं। हो सकता है कि यह मनुष्य की हठ के कारण या किसी मनुष्य के द्वारा परमेश्वर के प्रबंधन के नियमों की अनुल्लंघनीयता के कारण हो—परन्तु वे पादरी और महिलाएँ अभी भी फटी-पुरानी किताबों और दस्तावेजों से चिपके रहते हैं, जबकि परमेश्वर अपने प्रबंधन के अपूर्ण कार्य को ऐसे आगे बढ़ाता जाता है मानो उसके साथ कोई है ही नहीं। हालांकि ये विरोधाभास परमेश्वर और मनुष्यों के शत्रु बनाते हैं, और इनमें कभी मेल भी नहीं हो सकता है, परमेश्वर उन पर बिल्कुल ध्यान नहीं देता है, जैसे कि वे होकर भी नहीं हैं। फिर भी मनुष्य, अभी भी अपनी आस्थाओं से चिपका रहता है, और उन्हें कभी भी छोड़ता नहीं है। फिर भी एक बात बिल्कुल स्पष्ट है: हालांकि मनुष्य अपने रुख से विचलित नहीं होता है, परमेश्वर के कदम हमेशा आगे बढ़ते रहते हैं और वह अपना रुख परिस्थितियों के अनुसार हमेशा बदलता रहता है, और अंत में, यह मनुष्य ही होगा जो बिना लड़ाई लड़े हार जाएगा। परमेश्वर, इस समय, अपने हरा दिए गए दुश्मनों का सबसे बड़ा शत्रु है, और इंसानों में जो हार गए हैं और वे जो अभी भी हारने के लिए बचे हैं, उनके मध्य विजेता भी मौजूद हैं। परमेश्वर के साथ कौन प्रतिस्पर्धा कर सकता है और विजयी हो सकता है? मनुष्य की अवधारणाएं परमेश्वर से आती हुई प्रतीत होती हैं क्योंकि उनमें से कई परमेश्वर के कार्यों के द्वारा ही उत्पन्न हुई हैं। फिर भी परमेश्वर इस कारण से मनुष्यों को नहीं क्षमा करता है, इसके अलावा, न ही वह परमेश्वर के कार्य के बाहर खेप-दर-खेप "परमेश्वर के लिए" ऐसे उत्पाद उत्पन्न करने के लिए मनुष्य की प्रशंसा करता है। इसके बजाय, वह मनुष्यों की अवधारणाओं और पुरानी, पवित्र आस्थाओं के कारण बहुत ही ज्यादा चिढ़ा हुआ है और यहां तक कि वह उन तिथियों की भी उपेक्षा करता है जिसमे ये अवधारणाएं सबसे पहले सामने आई थीं। वह इस बात को बिल्कुल स्वीकार नहीं करता है कि ये अवधारणाएँ उसके कार्य के कारण बनी हैं, क्योंकि मनुष्य की अवधारणाएं मनुष्यों के द्वारा ही फैलाई जाती हैं; उनका स्रोत मनुष्यों की सोच और दिमाग है, परमेश्वर नहीं बल्कि शैतान है। परमेश्वर का इरादा हमेशा यही रहा है कि उसके कार्य नए और जीवित रहें, पुराने या मृत नहीं, और जिन बातों को वह मनुष्यों को दृढ़ता से थामे रखने के लिए कहता है वह युगों और कालों में विभाजित है, न कि अनन्त और स्थिर है। यह इसलिए क्योंकि वह परमेश्वर है जो मनुष्य को जीवित और नया बनने के योग्य बनाता है, बजाय शैतान के जो मनुष्य को मृत और पुराना बने रहने देना चाहता है। क्या तुम सब अभी भी यह नहीं समझते हो? तुम में परमेश्वर के प्रति अवधारणाएं हैं और तुम उन्हें छोड़ पाने में सक्षम नहीं हो क्योंकि तुम बंद-दिमाग वाले हो। ऐसा इसलिए नहीं है कि परमेश्वर के कार्य में बहुत कम बोध है, या इसलिए कि परमेश्वर का कार्य बहुत ही अमानवीय है—इसके अलावा, न ही ऐसा इसलिए है कि परमेश्वर अपने कर्तव्यों के प्रति हमेशा बेपरवाह रहता है। तुम अपनी अवधारणाओं को इसलिए नहीं छोड़ सकते हो क्योंकि तुम्हारे अंदर आज्ञाकारिता की अत्यधिक कमी है और क्योंकि तुममें परमेश्वर की सृष्टि की थोड़ी सी भी समानता नहीं है, और इसलिए नहीं कि परमेश्वर तुम्हारे लिए चीज़ों को कठिन बना रहा है। यह सब कुछ तुम्हारे ही कारण हुआ है और इसका परमेश्वर के साथ कोई भी सम्बन्ध नहीं है; सारे कष्ट और दुर्भाग्य केवल मनुष्य के कारण ही आये हैं। परमेश्वर के इरादे हमेशा नेक होते हैं: वह तुम्हें अवधारणा बनाने का कारण देना नहीं चाहता, बल्कि वह चाहता है कि युगों के बदलने के साथ-साथ तुम भी बदल जाओ और नए होते जाओ। फिर भी तुम फ़र्क नहीं कर सकते हो और हमेशा या तो अध्ययन या फिर विश्लेषण कर रहे होते हो। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर तुम्हारे लिए चीज़ें मुश्किल बना रहा है, बल्कि तुममें परमेश्वर के लिए आदर नहीं है, और तुम्हारी अवज्ञा भी बहुत ज्यादा है। एक छोटा सा प्राणी जो पहले परमेश्वर के द्वारा दिया गया था, उसका बहुत ही नगण्य भाग लेने का साहस करता है, और परमेश्वर पर आक्रमण करने के लिए उसे पलट देता है—क्या यह मनुष्यों के द्वारा अवज्ञा नहीं है? यह कहना उचित है कि परमेश्वर के सामने अपने विचारों को व्यक्त करने में मनुष्य पूरी तरह से अयोग्य है, और अपनी इच्छानुसार बेकार, बदबूदार, सड़े हुए सिद्धांतों के साथ ही साथ उन खोटी अवधारणाओं को व्यक्त करने में तो और भी अयोग्य है। क्या ये और भी बेकार नहीं हैं?

परमेश्वर की सचमुच सेवा करने वाला व्यक्ति वह है जो परमेश्वर के हृदय के करीब है और परमेश्वर के द्वारा उपयोग किए जाने के योग्य है, और जो अपनी धार्मिक अवधारणाओं को छोड़ पाने में सक्षम है। यदि तुम चाहते हो कि परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना फलदायी हो, तो तुम्हें अपनी धार्मिक अवधारणाओं का त्याग करना होगा। यदि तुम परमेश्वर की सेवा करने की इच्छा रखते हो, तो यह तुम्हारे लिए और भी आवश्यक होगा कि तुम सबसे पहले अपनी धार्मिक अवधारणाओं का त्याग करो और अपने सभी कार्यों में परमेश्वर के वचनों का पालन करो। परमेश्वर की सेवा करने के लिए व्यक्ति में यह सब गुण होना चाहिए। यदि तुममें इस ज्ञान की कमी है, जैसे ही तुम परमेश्वर की सेवा करोगे, तुम उसमें रुकावटें और बाधाएँ उत्पन्न करोगे, और यदि तुम अपनी अवधारणाओं को पकड़े रहोगे, तो तुम निश्चित तौर पर परमेश्वर के द्वारा फिर कभी न उठ पाने के लिए गिरा दिए जाओगे। उदाहरण के लिए, वर्तमान को देखो। आज के बहुत सारे कथन और कार्य बाइबिल के अनुरूप नहीं हैं और परमेश्वर के द्वारा पूर्व में किए गए कार्य के साथ असंगत भी हैं, और यदि आज्ञा मानने की इच्छा तुम्हारे अंदर नहीं है तो किसी भी समय तुम्हारा पतन हो सकता है। यदि तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप कार्य करना चाहते हो, तो तुम्हें सबसे पहले अपनी धार्मिक अवधारणाओं का त्याग करना होगा और अपने विचारों को ठीक करना होगा। भविष्य में कही जाने वाली बहुत सारी बातें अतीत में कही गई बातों से असंगत होगी, और यदि अब तुममें आज्ञापालन की इच्छा की कमी होगी, तो तुम अपने सामने आने वाले मार्ग पर चल नहीं पाओगे। यदि परमेश्वर के कार्य करने का कोई एक तरीका तुम्हारे भीतर जड़ जमा लेता है और तुम उसे कभी छोड़ते नहीं हो, तो यह तरीका तुम्हारी धार्मिक अवधारणा बन जाएगा। यदि परमेश्वर क्या है, इस सवाल ने तुम्हारे भीतर जड़ जमा लिया है तो तुमने सत्य को प्राप्त कर लिया है, और यदि परमेश्वर के वचन और सत्य तुम्हारा जीवन बनने के योग्य हैं, तो तुम्हारे भीतर परमेश्वर के बारे में अवधारणाएं अब और नहीं होंगी। जो कोई परमेश्वर के बारे में सही ज्ञान रखता है उसमें कोई भी अवधारणा नहीं होगी, और वह सिद्धांतों का पालन नहीं करेगा।

स्रोत राज्य के अवरोहण का सुसमाचार: जो आज परमेश्वर के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं

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Hindi Christian Movie "बदलाव की घड़ी" | How to Be Raptured Into the Kingdom of Heaven (Hindi Dubbed)

**Hindi Christian Movie "बदलाव की घड़ी" | How to Be Raptured Into the Kingdom of Heaven (Hindi Dubbed)

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सू मिंग्यू मुख्य-भूमि चीन में एक गृह कलीसिया में उपदेशिका हैं। वर्षों से वे प्रभु की धर्मनिष्ठ सेविका रही हैं, जो प्रभु के लिए उपदेश देने का कार्य करती हैं और कलीसिया के कार्य का भार उठाने पर ज़ोर देती हैं। वे बाइबल में पौलुस के कथन पर चलती हैं, यह समझते हुए कि केवल प्रभु में विश्वास कर लेने मात्र से धार्मिक कहलाया जा सकता है और अनुग्रह द्वारा रक्षा मिल सकती है। हालांकि मनुष्य अब भी निरंतर पाप करता है, परंतु उसके पाप प्रभु द्वारा क्षमा किये जा चुके हैं, और प्रभु के लौटने पर उसकी छवि उसी पल बदल कर पवित्र कर दी जायेगी उसे स्वर्ग के राज्य में आरोहित कर लिया जाएगा। परंतु, हाल के वर्षों में कलीसिया अधिक-से-अधिक उजाड़ हो गयी है, विश्वासी सामान्यत: नकारात्मक और कमजोर हो गए हैं, उनकी श्रद्धा और प्रेम ठंडे पड़ चुके हैं। कुछ सह-कार्यकर्ता प्रभु के वचन पर चलते हैं: “जो मुझ से, ‘हे प्रभु! हे प्रभु !’ कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है।” वे इस धारणा पर प्रश्न करते हैं कि “जब प्रभु लौटेंगे, तो वे उसी पल मनुष्य की छवि बदल देंगे और उसे स्वर्ग के राज्य में आरोहित कर लेंगे।” वे समझते हैं कि चूंकि हम अब भी निरंतर पाप करते हैं, पवित्रता पाने में बहुत अधिक असफल हैं, और परमेश्वर की इच्छा की अवज्ञा करते हैं, तो प्रभु के आने पर हमें स्वर्ग के राज्य में कैसे आरोहित किया जाएगा? चर्चा और वाद-विवाद के बाद, सू मिंग्यू समझती हैं कि प्रभु के वचन और प्रभु के आने पर उसी पल मनुष्य की छवि बदल देने के पौलुस के विचार में थोड़े विरोधाभास हैं। आखिर कौन-सा विचार सही है? सु मिज्ञू हृदय से दुविधा और उलझन में हैं। अपनी व्यावहारिक उलझन को सुलझाने के लिए, ताकि प्रभु उन्हें त्याग न दें, पवित्र आत्मा के कार्य वाली कलीसिया को ढूँढने के क्रम में, सू मिंग्यू चमकती पूर्वी बिजली का अध्ययन करने का फैसला करती हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के उपदेशकों के साथ चर्चा और वाद-विवाद करके, सू मिंग्यू और दूसरे लोग अंतत: स्वर्ग के राज्य में प्रवेश के एकमात्र मार्ग को समझ पाते हैं ...

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विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए

विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए

**परमेश्वर के वचन | विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए |

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वो क्या है जो मनुष्य ने प्राप्त किया है जब उसने सर्वप्रथम परमेश्वर में विश्वास किया? तुमने परमेश्वर के बारे में क्या जाना है? परमेश्वर में अपने विश्वास के कारण तुम कितने बदले हो? अब तुम सभी जानते हो कि परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास आत्मा की मुक्ति और देह के कल्याण के लिए ही नही है, और न ही यह उसके जीवन को परमेश्वर के प्रेम से सम्पन्न बनाने के लिए, इत्यादि है। जैसा यह है, यदि तुम परमेश्वर को सिर्फ़ देह के कल्याण के लिए या क्षणिक आनंद के लिए प्रेम करते हो, तो भले ही, अंत में, परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम इसके शिखर पर पहुँचता है और तुम कुछ भी नहीं माँगते, यह "प्रेम" जिसे तुम खोजते हो अभी भी अशुद्ध प्रेम होता है, और परमेश्वर को भाने वाला नहीं होता। वे लोग जो परमेश्वर के लिए प्रेम का उपयोग अपने बोझिल जीवन को सम्पन्न बनाने और अपने हृदय के एक शून्य को भरने के लिए करते हैं, ये वे हैं जो अपने जीवन को आसानी से जीना चाहते हैं, ना कि वे जो सचमुच में परमेश्वर को प्रेम करना चाहते हैं। इस प्रकार का प्रेम व्यक्ति की इच्छा के विरुद्ध होता है, भावनात्मक आनंद की खोज होता है, और परमेश्वर को इस प्रकार के प्रेम की आवश्यकता नहीं है। तो फिर, तुम्हारा प्रेम कैसा है? तुम परमेश्वर को किस लिए प्रेम करते हो? तुम में परमेश्वर के लिए कितना सच्चा प्रेम है? तुम लोगों में से अधिकतर का प्रेम वैसा ही है जिसका पहले जिक्र किया गया था। इस प्रकार का प्रेम सिर्फ़ यथापूर्व स्थिति को बरकरार रख सकता है; अनन्त स्थिरता को प्राप्त नहीं कर सकता, न ही मनुष्य में जड़ें जमा सकता है। इस प्रकार का प्रेम एक ऐसा फूल है जो खिलने के बाद फल नहीं देता और मुरझा जाता है। दूसरे शब्दों में, तुमने जब एक बार परमेश्वर को इस ढंग से प्रेम कर लिया और तुम्हें इस मार्ग पर आगे ले जाने वाला कोई ना हो, तो तुम गिर जाओगे। यदि तुम परमेश्वर को सिर्फ़ प्रेमी परमेश्वर के समय ही प्रेम कर सकते हो और उसके बाद तुम अपने जीवन स्वभाव में कोई बदलाव नहीं लाते, तो फिर तुम अंधकार में निरंतर घिरते चले जाओगे, तुम बच नहीं पाओगे, और शैतान द्वारा बांधे जाने और मूर्ख बनाये जाने से मुक्त होने में असमर्थ होगे। ऐसा कोई भी मनुष्य परमेश्वर को पूरी तरह से प्राप्त नहीं हो सकता; अंत में, उनकी आत्मा, प्राण, और शरीर शैतान के ही होंगे। यह असंदिग्ध है। वे सभी जो पूरी तरह से परमेश्वर को प्राप्त नहीं हो पाएँगे अपने मूल स्थान में वापस लौट जायेंगे, अर्थात, वापस शैतान के पास, और वे परमेश्वर के दंड के अगले चरण को स्वीकार करने के लिये, उस झील में जायेंगे जो आग और गन्धक से जलती रहती है। जो परमेश्वर के हो चुके हैं, वो वे होते हैं जो शैतान के खिलाफ विद्रोह करते हैं और उसके शासन से बच जाते हैं। ऐसे मनुष्य राज्य के लोगों में आधिकारिक रूप से गिने जायेंगे। इस तरह से राज्य के लोग अस्तित्व में आते हैं। क्या तुम इस प्रकार के व्यक्ति बनने को तैयार हो? तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किये जाने के लिए तैयार हो? क्या तुम शैतान के शासन से बचना और वापस परमेश्वर के पास जाना चाहते हो? क्या तुम अब शैतान के हो या तुम राज्य के लोगों में गिने जाते हो? ऐसी सारी चीज़ें स्पष्ट होनी चाहिए और आगे किसी भी स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए।

बीते समयों में, अनेक लोग मनुष्य की महत्वाकांक्षा और धारणाओं के साथ मनुष्य की आशाओं के लिए आगे बढ़े। अब इन मामलों पर चर्चा नहीं की जाएगी। कुंजी है अभ्यास का ऐसा ढंग खोजना जो तुम लोगों में से हर एक को परमेश्वर के सम्मुख एक सामान्य स्थिति बनाये रखने और धीरे-धीरे शैतान के प्रभाव की बेड़ियों को तोड़ डालने में सक्षम करे, ताकि तुम लोग परमेश्वर को प्राप्त हो सको और पृथ्वी पर वैसे जियो जैसे परमेश्वर तुमसे चाहता है। केवल इसी से परमेश्वर की इच्छा पूरी हो सकती है। परमेश्वर में विश्वास तो बहुत से लोग करते हैं, फिर भी न तो यह जानते हैं कि परमेश्वर क्या चाहता है और न ही यह कि शैतान क्या चाहता है। वे मूर्खता से विश्वास करते हैं और दूसरों का अंधानुकरण करते हैं, और इसलिए उनके पास कभी भी एक सामान्य ईसाई जीवन नहीं होता; मनुष्य का परमेश्वर के साथ जो सामान्य संबंध है वो होना तो दूर, उनके पास सामान्य व्यक्तिगत संबंध तक नहीं होते। इससे यह देखा जा सकता है कि मनुष्य की समस्याएं और गलतियां, और दूसरे कारण जो परमेश्वर की इच्छा के आड़े आते हैं बहुत हैं। यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि मनुष्य ने अपने आप को सही रास्ते पर नहीं रखा है, न ही उसने वास्तविक जीवन का अनुभव लिया है। तो इस प्रकार यह सही रास्ते पर आना क्या है? सही रास्ते पर आने का अर्थ है कि तुम सब समय परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत रख सकते हो और स्वाभाविक रूप से परमेश्वर के साथ संवाद कर सकते हो, तुम्हें क्रमशः यह पता लगने लगता है कि मनुष्य में क्या कमी है और परमेश्वर के विषय में एक गहरा ज्ञान होने लगता है। इसके द्वारा तुम्हें प्रतिदिन अपनी आत्मा में एक नया दृष्टि बोध और प्रकाश प्राप्त होता है; तुम सत्य में प्रवेश करने की अधिकाधिक लालसा करने लगते हो। हर दिन नया प्रकाश और नई समझ होती है। इस रास्ते के द्वारा, धीरे-धीरे तुम शैतान के प्रभाव से मुक्त होते जाते हो, और तुम्हारा जीवन महान बनता जाता है। इस प्रकार का व्यक्ति सही रास्ते पर आ चुका होता है। उपरोक्त के मुक़ाबले अपने वास्तविक अनुभवों का मूल्यांकन करो और तुमने परमेश्वर के विश्वास का जो रास्ता चुना है उसे उपरोक्त के मुकाबले जांचो। क्या तुम वह व्यक्ति हो जो सही रास्ते पर आ चुका है? तुम किन मामलों में शैतान की बेड़ियों और शैतान के प्रभाव से मुक्त हो चुके हो? यदि तुम सही रास्ते पर आ चुके हो तब भी शैतान के साथ तुम्हारे संबंधों का टूटना बाकी है। इस तरह, क्या परमेश्वर के प्रेम की इस तलाश का निष्कर्ष एक ऐसे प्रेम के रूप में होगा जो प्रमाणिक, समर्पित, और शुद्ध हो? तुम कहते हो कि परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम दृढ़ और हार्दिक है, फिर भी तुम शैतान की बेड़ियों से अपने आपको मुक्त नहीं कर पाये हो। क्या तुम परमेश्वर को मूर्ख नहीं बना रहे हो? यदि तुम परमेश्वर के लिए विशुद्ध प्रेम प्राप्त करना चाहते हो, परमेश्वर को प्राप्त हो जाना चाहते हो और चाहते हो कि तुम राज्य के लोगों में गिने जाओ तो तुम्हें पहले खुद को सही रास्ते पर लाना होगा।

स्रोत राज्य के अवरोहण का सुसमाचार: विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए
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परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है